विष्णु पुराण🚩🙏🚩

sn vyas
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1 days ago
#विष्णु पुराण🌹🙏 #विष्णु पुराण गाथा@ #विष्णु भगवान 🙏🏻 #विष्णु भगवान #भगवान विष्णु विष्णु पुराण के तृतीय अंश (अध्याय 7) में यमराज और उनके दूतों के बीच का यह प्रसिद्ध संवाद मिलता है। इस प्रसंग में यमराज स्वयं अपने दूतों को भगवान विष्णु के भक्तों की महिमा बताते हैं और उन्हें स्पष्ट निर्देश देते हैं कि वे किन मनुष्यों को छुएँ भी नहीं। कथा का विस्तार: 1. यमदूत का संशय: एक समय यमराज के एक दूत ने उनसे पूछा— "हे महाराज! आप समस्त प्राणियों के कर्मों का फल देने वाले और दण्डधिकारी हैं। इस सम्पूर्ण संसार में ऐसा कौन है, जो आपके अधिकार क्षेत्र से बाहर है? हम पाश और दण्ड लेकर किन लोगों को यमलोक लायें और किन्हें दूर से ही त्याग दें?" 2. यमराज का उत्तर और श्रीहरि की सर्वोच्चता: यमराज ने अपने दूतों के संशय को दूर करते हुए हाथ जोड़कर भगवान विष्णु का ध्यान किया और कहा: "हे दूतों! तुम मुझे ही सर्वशक्तिमान मत समझो। मैं भी संपूर्ण जगत् के स्वामी, सर्वव्यापक और जगदाधार भगवान विष्णु के अधीन हूँ। जैसे जल का स्वामी समुद्र है, वैसे ही समस्त लोकों के स्वामी श्रीहरि हैं। जो मनुष्य भगवान विष्णु का आश्रय ले चुके हैं, उन पर मेरा कोई अधिकार नहीं चलता।" 3. किन मनुष्यों के पास यमदूतों को नहीं जाना चाहिए? यमराज ने दूतों को चेतावनी देते हुए कुछ विशेष लक्षण बताए: हरि-स्मरण करने वाले: जो मनुष्य उठते, बैठते, सोते या जागते समय निश्छल मन से भगवान केशव, गोविंद, माधव या वासुदेव का नाम लेते हैं। समभाव रखने वाले: जो किसी से द्वेष नहीं करते, जिनका चित्त शांत है और जो सब प्राणियों में ईश्वर का रूप देखते हैं। पापहीन भक्त: जो पाप कर्मों से दूर रहते हैं और जिनके हृदय रूपी मंदिर में भगवान विष्णु स्थिर रूप से निवास करते हैं। यमराज कहते हैं— "हे दूतों! जो मनुष्य 'नमो वासुदेवाय' का उच्चारण करता है, वह पाप रूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि के समान है। ऐसे भगवद्भक्तों से तुम इतनी दूर रहो जैसे आग से सूखी घास दूर रहती है।" 4. यमदूतों को कड़ा निर्देश: यमराज ने अपने दूतों को ताकीद करते हुए कहा— "तुम केवल उन्हीं मनुष्यों को मेरे पास लाओ जो काम, क्रोध और तृष्णा के वशीभूत हैं, जो नास्तिक हैं, गुरु और शास्त्रों का अपमान करते हैं और जिन्होंने कभी भगवान विष्णु के चरणों में शीश नहीं झुकाया। परंतु जो श्रीहरि के शरणागत हैं, उनके पास जाने की भूल कभी मत करना; अन्यथा वे तो अभय हैं ही, उनका अनादर करने से हम स्वयं पाप के भागी बन जाएँगे।" शिक्षा: यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि सच्चे मन से किया गया भगवन्नाम का स्मरण और निष्काम भक्ति मनुष्य को काल और मृत्यु के भय से पूरी तरह मुक्त कर देती है।
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2 days ago
#विष्णु पुराण🙏 #विष्णु पुराण🌹🙏 #विष्णु पुराण🚩🙏🚩 विष्णु पुराण के प्रथम अंश (अध्याय 15) में महर्षि कण्डु और प्रम्लोचा अप्सरा का आख्यान मिलता है। यह कथा काम (वासना) के प्रभाव, समय के भ्रम और पश्चाताप के बाद ईश्वर भक्ति से परम पद पाने का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है। कथा का विस्तार: 1. महर्षि कण्डु की घोर तपस्या: महर्षि कण्डु परम ज्ञानी और तपोनिष्ठ ऋषि थे। वे मंदराचल पर्वत के पास गोमती नदी के सुंदर तट पर कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या का प्रभाव इतना तीव्र था कि स्वर्गलोक में देवराज इंद्र घबरा गए। इंद्र को लगा कि कण्डु जी अपनी तपस्या के बल से उनका इंद्रासन न छीन लें। इसलिए, उन्होंने महर्षि की तपस्या भंग करने के लिए 'प्रम्लोचा' नाम की अत्यंत रूपवती अप्सरा को भेजा। 2. प्रम्लोचा का आगमन और साधना भंग: प्रम्लोचा महर्षि कण्डु के आश्रम पहुँची और अपनी मधुर वाणी, गान और अलौकिक सौंदर्य से महर्षि का ध्यान भटकाने लगी। उसके अनुपम रूप और हाव-भाव को देखकर महर्षि कण्डु का संयम टूट गया और वे कामासक्ति के वशीभूत हो गए। वे अपनी संध्या-वंदन, जप और साधना को भूलकर प्रम्लोचा के साथ भोग-विलास में लीन हो गए। 3. समय का महा-भ्रम (शताब्दियों का बीत जाना): महर्षि कण्डु अप्सरा के प्रेम में इतने सुध-बुध खो बैठे कि उन्हें दिन और रात का अहसास ही नहीं रहा। वे प्रम्लोचा के साथ सैकड़ों वर्षों तक कुंजों और गुफाओं में विहार करते रहे। एक दिन सायंकाल के समय महर्षि कण्डु अचानक आश्रम से बाहर जाने लगे। प्रम्लोचा ने पूछा— "भगवान! आप इतनी शीघ्रता में कहाँ जा रहे हैं?" महर्षि ने उत्तर दिया— "देवी! संध्या का समय हो गया है। यदि मैं संध्या-वंदन और अग्निहोत्र नहीं करूँगा, तो मेरा धर्म नष्ट हो जाएगा।" यह सुनकर प्रम्लोचा मंद-मंद मुस्कुराई और बोली— "हे महात्मन! आप किस 'संध्या' की बात कर रहे हैं? आपके साथ तो सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। आज कोई एक दिन की संध्या नहीं है!" 4. महर्षि का बोध और पश्चाताप: प्रम्लोचा के वचन सुनकर महर्षि कण्डु स्तब्ध रह गए। उन्होंने अपने योगबल से देखा तो पाया कि वे सैकड़ों वर्षों तक अज्ञान के अंधकार में डूबे रहे और उन्हें लगा कि यह सब केवल एक ही दिन की बात है। उन्हें अपनी भूल और तपस्या के नाश होने का अत्यंत तीव्र दुख हुआ। क्रोध और पश्चाताप में भरकर उन्होंने कहा— "धिक्कार है मेरे इस संयम और ज्ञान को! नारी के रूप के मोह में पड़कर मैंने अपना संपूर्ण तपोबल गँवा दिया।" महर्षि ने प्रम्लोचा पर क्रोध तो किया, लेकिन यह सोचकर उसे भस्म नहीं किया कि उसने उनके साथ लंबा समय बिताया है। उन्होंने प्रम्लोचा से तुरंत वहाँ से चले जाने को कहा। 5. प्रम्लोचा का प्रस्थान और मारिषा का जन्म: महर्षि कण्डु के भय और घबराहट के कारण प्रम्लोचा के शरीर से अत्यधिक पसीना (स्वेद) छूटने लगा। जब वह आकाश मार्ग से जा रही थी, तब उसने अपने पसीने की बूंदों को वृक्षों के पत्तों पर पोंछा। उन्हीं पसीने की बूंदों और महर्षि के तेज से वृक्षों ने एक कन्या को पोषण दिया, जिसका नाम 'मारिषा' पड़ा। (यही मारिषा आगे चलकर प्रचेता-पुत्र दक्ष की माता बनीं)। 6. पुनः तपस्या और परम पद की प्राप्ति: प्रम्लोचा के जाने के बाद महर्षि कण्डु पूरी तरह विरक्त हो गए। वे समझ गए कि संसार के भोग-विलास क्षणभंगुर और विनाशकारी हैं। वे तुरंत 'पुरुषोत्तम क्षेत्र' (श्रीक्षेत्र/पुरी) चले गए। वहाँ उन्होंने भगवान विष्णु के 'विष्णु-स्तोत्र' का निरंतर जाप किया और केवल श्रीहरि के ध्यान में लीन हो गए। उनकी इस निष्काम भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें क्षमा किया और अंततः महर्षि कण्डु ने परम पद (मोक्ष) प्राप्त किया।
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5 days ago
#विष्णु पुराण गाथा@ #भगवान विष्णु गरुड़ पुराण पर आधारित है यह पावन कथा महाभारत के आदिपर्व और विष्णु पुराण में विस्तार से वर्णित है। महर्षि कश्यप जब पुत्र प्राप्ति के लिए विशाल यज्ञ कर रहे थे, तब सभी देवता और ऋषि अपनी शक्ति अनुसार समिधा (यज्ञ की लकड़ी) एकत्र कर रहे थे। बालखिल्य ऋषि, जिनका शरीर अंगूठे के पोर के बराबर (अंगुष्ठमात्र) था, वे साठ हजार मिलकर पलाश की एक छोटी टहनी को बड़ी श्रद्धा और परिश्रम से खींचकर ला रहे थे। मार्ग में एक गाय के खुर के निशान (गोष्पद) में भरे वर्षा के जल में वे गिर पड़े और बाहर निकलने का प्रयास करने लगे। तभी देवराज इंद्र अपने विशाल ऐरावत हाथी के समान पर्वताकार लकड़ियों के ढेर को उठाकर आकाश मार्ग से तीव्र वेग से गुजरे। इंद्र ने जब उन सूक्ष्म ऋषियों को जल में संघर्ष करते देखा, तो अहंकारवश उनका उपहास उड़ाया और उनका अनादर करते हुए उन्हें लांघकर चले गए। ऋषियों का घोर तप और संकल्प इस अपमान से क्षुब्ध होकर बालखिल्य ऋषियों ने उसी क्षण हवन कुंड प्रज्वलित कर आहुति देनी शुरू की। उन्होंने संकल्प लिया: "इन्द्रस्यान्यो भवेदिन्द्रः सर्वकामगमो बली।" (अर्थात: वर्तमान इंद्र को पदच्युत करने वाला, इच्छानुसार गमन करने वाला और अत्यंत बलवान एक 'नया इंद्र' उत्पन्न हो।) ऋषियों के तपोबल से इंद्र का सिंहासन डोल उठा। भयभीत इंद्र प्रजापति कश्यप की शरण में पहुंचे। कश्यप मुनि का समाधान और गरुड़ का प्राकट्य महर्षि कश्यप ने बालखिल्य ऋषियों को शांत किया और विनती की कि ब्रह्मा जी के विधान अनुसार देवराज का पद नष्ट न हो। ऋषियों ने कश्यप जी के सम्मान में अपने संकल्प का फल उन्हें सौंप दिया और कहा कि यह तेजस्वी उत्पन्न होने वाला जीव 'पक्षियों का इंद्र' (पक्षीराज) बनेगा। कश्यप मुनि ने वह तपोमय तेज अपनी पत्नी विनता को प्रदान किया, जिसके फलस्वरूप महाबली गरुड़ का जन्म हुआ। आगे चलकर गरुड़ ने अकेले ही अमरावती पर आक्रमण कर इंद्र सहित समस्त देवताओं को परास्त किया और अमृत कलश प्राप्त कर बालखिल्य ऋषियों के उस तेज और वचन को सत्य सिद्ध किया।
sn vyas
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1 months ago
#भगवान विष्णु गरुड़ पुराण पर आधारित है #🙏 विष्णु पुराण 🙏 #विष्णु पुराण🙏 नरक की कहानी: केवल "नमः" कहने से हुआ नरक के जीवों का उद्धार! मुद्गल जी की करुणामयी यात्रा एक समय की बात है, भगवान के एक महान भक्त मुद्गल नाम के ब्राह्मण यमराज से मिलने के लिए यमलोक गए। जब उन्होंने यमदूतों द्वारा पापी जीवों को दी जा रही भयानक और यातनादायक सजाओं को देखा, तो उन्होंने उन जीवों की ओर अत्यंत करुणा भरी दृष्टि से देखा और जीवों ने भी उन्हें देखा। मुद्गल जी के दर्शन मात्र से वे जीव तुरंत पवित्र हो गए और उन्हें अपने नारकीय कष्टों से क्षणिक आनंद और राहत का अनुभव हुआ। यमराज का स्पष्टीकरण यमराज ने मुद्गल जी को समझाया कि यह चमत्कार उनके पूर्व के तीसरे जन्म में परमेश्वर की पूजा करने तथा 'कृष्णाय नमः', 'वासुदेवाय नमः' जैसे भगवान के नामों के जप के साथ दान देने के प्रभाव (महिमा) से संभव हुआ है। यमराज ने यह भी कहा: "जो मनुष्य भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करते हैं, उन्हें प्रणाम करते हैं, उनकी शरण लेते हैं और 'कृष्णाय नमः', 'वासुदेवाय नमः' जैसे मंत्रों का जप करके उनकी आराधना करते हैं, वे मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आते।" नाम-जप की महिमा यह सुनकर, नरक में कष्ट भोग रहे जीवों ने "कृष्णाय नमः, गोविंदाय नमः, वासुदेवाय नमः" आदि मंत्रों का जप करना शुरू कर दिया। यद्यपि वे बंधे होने और दंडित किए जाने के कारण शारीरिक रूप से झुककर प्रणाम नहीं कर सकते थे, फिर भी उन्होंने केवल "नमः" कहकर वाचिक (वाणी द्वारा) प्रणाम अर्पित किया। भगवान के पवित्र नामों और "नमः" शब्द के संयुक्त प्रभाव की शक्ति से, नरक में उन्हें प्रताड़ित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले सभी यंत्रों ने काम करना बंद कर दिया; यमदूतों के हाथों के सभी अस्त्र-शस्त्र कुंठित (भोथरे) हो गए; नरक में जलने वाली अग्नि बुझ गई और सभी यमदूतों का बल क्षीण हो गया, जिससे वे नरक के निवासियों को आगे कोई सजा नहीं दे सके। नरक का दिव्य परिवर्तन जैसे-जैसे यह नाम-जप और अधिक बढ़ता गया, उस नरक में एक सुगंधित और शीतल मंद हवा बहने लगी; सभी को बांसुरी और वीणा जैसे मनमोहक वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि सुनाई देने लगी; वे अपने नारकीय रूपों से मुक्त हो गए और दिव्य वस्त्रों तथा आभूषणों से सुसज्जित हो गए। उनके इस नाम-जप के पावन प्रभाव को समझकर यमराज तुरंत अपने सिंहासन से उठे और नरक के उन निवासियों के चरणों में जल अर्पित करके उनका पूजन करने लगे। यमराज ने कहा: "जो लोग भगवान विष्णु—जो यज्ञवराह के नाम से जाने जाते हैं और जो समस्त देवताओं के स्वामी हैं—को प्रणाम करते हैं, मैं उन्हें बारंबार प्रणाम करता हूँ। यहाँ तक कि जो केवल 'विष्णवे नमः, कृष्णाय नमः' कहते हैं, मैं उनके आगे भी बार-बार सिर झुकाता हूँ।" जैसे ही यमराज यह कह रहे थे, वहाँ एक दिव्य विमान आया और नरक के वे सभी निवासी उस विमान में सवार होकर स्वर्ग लोकों के लिए प्रस्थान कर गए। भगवान के नामों के साथ "नमः" जोड़कर केवल वाणी से प्रणाम अर्पित करने मात्र से ही उनकी सजा अत्यंत कम हो गई और उनका पूरी तरह से उद्धार हो गया। (यह कथा विष्णुधर्म पुराण से ली गई है।)
sn vyas
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1 months ago
#विष्णु पुराण🙏 #विष्णु पुराण🚩🙏🚩 🙏विष्णु पुराण🙏 अठारह महापुराणों में 'विष्णु पुराण' का आकार सबसे छोटा है। किन्तु इसका महत्व प्राचीन समय से ही बहुत अधिक माना गया है। संस्कृत विद्वानों की दृष्टि में इसकी भाषा ऊंचे दर्जे की, साहित्यिक, काव्यमय गुणों से सम्पन्न और प्रसादमयी मानी गई है। इस पुराण में भूमण्डल का स्वरूप, ज्योतिष, राजवंशों का इतिहास, कृष्ण चरित्र आदि विषयों को बड़े तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। खण्डन-मण्डन की प्रवृत्ति से यह पुराण मुक्त है। धार्मिक तत्त्वों का सरल और सुबोध शैली में वर्णन किया गया है। सात हज़ार श्लोक इस पुराण में इस समय सात हज़ार श्लोक उपलब्ध हैं। वैसे कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हज़ार बताई जाती है। यह पुराण छह भागों में विभक्त है। प्रह्लाद को गोद में बिठाकर बैठी होलिका पहले भाग में सर्ग अथवा सृष्टि की उत्पत्ति, काल का स्वरूप और ध्रुव, पृथु तथा प्रह्लाद की कथाएं दी गई हैं। दूसरे भाग में लोकों के स्वरूप, पृथ्वी के नौ खण्डों, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष आदि का वर्णन है। तीसरे भाग में मन्वन्तर, वेदों की शाखाओं का विस्तार, गृहस्थ धर्म और श्राद्ध-विधि आदि का उल्लेख है। चौथे भाग में सूर्य वंश और चन्द्र वंश के राजागण तथा उनकी वंशावलियों का वर्णन है। पांचवें भाग में श्रीकृष्ण चरित्र और उनकी लीलाओं का वर्णन है जबकि छठे भाग में प्रलय तथा मोक्ष का उल्लेख है। 'विष्णु पुराण' में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है। रचनाकार पराशर ऋषि इस पुराण के रचनाकार पराशर ऋषि थे। ये महर्षि वसिष्ठ के पौत्र थे। इस पुराण में पृथु, ध्रुव और प्रह्लाद के प्रसंग अत्यन्त रोचक हैं। 'पृथु' के वर्णन में धरती को समतल करके कृषि कर्म करने की प्रेरणा दी गई है। कृषि-व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त करने पर जोर दिया गया है। घर-परिवार, ग्राम, नगर, दुर्ग आदि की नींव डालकर परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने की बात कही गई है। इसी कारण धरती को 'पृथ्वी' नाम दिया गया। 'ध्रुव' के आख्यान में सांसारिक सुख, ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति आदि को क्षण भंगुर अर्थात् नाशवान समझकर आत्मिक उत्कर्ष की प्रेरणा दी गई है। प्रह्लाद के प्रकरण में परोपकार तथा संकट के समय भी सिद्धांतों और आदर्शों को न त्यागने की बात कही गई है। कृष्ण चरित्र का वर्णन 'विष्णु पुराण' में मुख्य रूप से कृष्ण चरित्र का वर्णन है, यद्यपि संक्षेप में राम कथा का उल्लेख भी प्राप्त होता है। इस पुराण में कृष्ण के समाज सेवी, प्रजा प्रेमी, लोक रंजक तथा लोक हिताय स्वरूप को प्रकट करते हुए उन्हें महामानव की संज्ञा दी गई है। श्रीकृष्ण ने प्रजा को संगठन-शक्ति का महत्त्व समझाया और अन्याय का प्रतिकार करने की प्रेरणा दी। अधर्म के विरुद्ध धर्म-शक्ति का परचम लहराया। 'महाभारत' में कौरवों का विनाश और 'कालिया दहन' में नागों का संहार उनकी लोकोपकारी छवि को प्रस्तुत करता है। कृष्ण के जीवन की लोकोपयोगी घटनाओं को अलौकिक रूप देना उस महामानव के प्रति भक्ति-भावना की प्रतीक है। इस पुराण में कृष्ण चरित्र के साथ-साथ भक्ति और वेदान्त के उत्तम सिद्धान्तों का भी प्रतिपादन हुआ है। यहाँ 'आत्मा' को जन्म-मृत्यु से रहित, निर्गुण और अनन्त बताया गया है। समस्त प्राणियों में उसी आत्मा का निवास है। ईश्वर का भक्त वही होता है जिसका चित्त शत्रु और मित्र और मित्र में समभाव रखता है, दूसरों को कष्ट नहीं देता, कभी व्यर्थ का गर्व नहीं करता और सभी में ईश्वर का वास समझता है। वह सदैव सत्य का पालन करता है और कभी असत्य नहीं बोलता। राजवंशों का वृत्तान्त इस पुराण में प्राचीन काल के राजवंशों का वृत्तान्त लिखते हुए कलियुगी राजाओं को चेतावनी दी गई है कि सदाचार से ही प्रजा का मन जीता जा सकता है, पापमय आचरण से नहीं। जो सदा सत्य का पालन करता है, सबके प्रति मैत्री भाव रखता है और दुख-सुख में सहायक होता है; वही राजा श्रेष्ठ होता है। राजा का धर्म प्रजा का हित संधान और रक्षा करना होता है। जो राजा अपने स्वार्थ में डूबकर प्रजा की उपेक्षा करता है और सदा भोग-विलास में डूबा रहता है, उसका विनाश समय से पूर्व ही हो जाता है। कर्त्तव्यों का पालन इस पुराण में स्त्रियों, साधुओं और शूद्रों को श्रेष्ठ माना गया है। जो स्त्री अपने तन-मन से पति की सेवा तथा सुख की कामना करती है, उसे कोई अन्य कर्मकाण्ड किए बिना ही सद्गति प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार शूद्र भी अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए वह सब प्राप्त कर लेते हैं, जो ब्राह्मणों को विभिन्न प्रकार के कर्मकाण्ड और तप आदि से प्राप्त होता है। कहा गया है- शूद्रोश्च द्विजशुश्रुषातत्परैद्विजसत्तमा:। तथा द्भिस्त्रीभिरनायासात्पतिशुश्रुयैव हि॥[1] अर्थात शूद्र ब्राह्मणों की सेवा से और स्त्रियां प्रति की सेवा से ही धर्म की प्राप्ति कर लेती हैं। आध्यात्मिक चर्चा 'विष्णु पुराण' के अन्तिम तीन अध्यायों में आध्यात्मिक चर्चा करते हुए त्रिविध ताप, परमार्थ और ब्रह्मयोग का ज्ञान कराया गया है। मानव-जीवन को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके लिए देवता भी लालायित रहते हैं। जो मनुष्य माया-मोह के जाल से मुक्त होकर कर्त्तव्य पालन करता है, उसे ही इस जीवन का लाभ प्राप्त होता है। 'निष्काम कर्म' और 'ज्ञान मार्ग' का उपदेश भी इस पुराण में दिया गया है। लौकिक कर्म करते हुए भी धर्म पालन किया जा सकता है। 'कर्म मार्ग' और 'धर्म मार्ग'- दोनों का ही श्रेष्ठ माना गया है। कर्त्तव्य करते हुए व्यक्ति चाहे घर में रहे या वन में, वह ईश्वर को अवश्य प्राप्त कर लेता है। महाभारतकालीन भारत का मानचित्र भारतवर्ष को कर्मभूमि कहकर उसकी महिमा का सुंदर बखान करते हुए पुराणकार कहता है- इत: स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्तश्च गम्यते। न खल्वन्यत्र मर्त्यानां कर्मभूमौ विधीयते ॥[2] अर्थात यहीं से स्वर्ग, मोक्ष, अन्तरिक्ष अथवा पाताल लोक पाया जा सकता है। इस देश के अतिरिक्त किसी अन्य भूमि पर मनुष्यों पर मनुष्यों के लिए कर्म का कोई विधान नहीं है। इस कर्मभूमि की भौगोलिक रचना के विषय में कहा गया है- उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्ष तद्भारतं नाम भारती यत्र संतति ॥[3] अर्थात समुद्र कें उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो पवित्र भूभाग स्थित है, उसका नाम भारतवर्ष है। उसकी संतति 'भारतीय' कहलाती है। इस भारत भूमि की वन्दना के लिए विष्णु पुराण का यह पद विख्यात है- गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात्। कर्माण्ड संकल्पित तवत्फलानि संन्यस्य विष्णौ परमात्मभूते। अवाप्य तां कर्ममहीमनन्ते तस्मिंल्लयं ये त्वमला: प्रयान्ति ॥[4] अर्थात देवगण निरन्तर यही गान करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और मोक्ष के मार्ग् पर चलने के लिए भारतभूमि में जन्म लिया है, वे मनुष्य हम देवताओं की अपेक्षा अधिक धन्य तथा भाग्यशाली हैं। जो लोग इस कर्मभूमि में जन्म लेकर समस्त आकांक्षाओं से मुक्त अपने कर्म परमात्मा स्वरूप श्री विष्णु को अर्पण कर देते हैं, वे पाप रहित होकर निर्मल हृदय से उस अनन्त परमात्म शक्ति में लीन हो जाते हैं। ऐसे लोग धन्य होते हैं। 'विष्णु पुराण' में कलि युग में भी सदाचरण पर बल दिया गया है। इसका आकार छोटा अवश्य है,