sn vyas
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#पौराणिक कथा
राजा विपश्चित और नरक के जीवों की कथा:
प्राचीन काल में 'विपश्चित' नाम के एक अत्यंत पराक्रमी, सत्यवादी और प्रजापालक राजा हुए। उनका संपूर्ण जीवन वेदों और शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार व्यतीत हुआ। उन्होंने सैकड़ों अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ संपन्न किए, ब्राह्मणों व याचकों को विपुल धन-गौ दान दिए और संपूर्ण प्रजा की अपनी संतान की तरह रक्षा की। उनके राज्य में अधर्म, चोरी, रोग या अकाल का कोई स्थान नहीं था।
वृद्धावस्था आने पर राजा ने अपने पुत्र को राज्य सौंप दिया और वन में जाकर तपस्या करते हुए शांतिपूर्वक अपने नश्वर शरीर का त्याग किया।
शरीर त्यागने के उपरांत राजा विपश्चित के समक्ष यमराज के दूत उपस्थित हुए। यमदूत उन्हें एक विमान में बैठाकर ले चले, परंतु वे स्वर्ग के ज्योतिर्मय मार्ग के बजाय उन्हें अंधकारमय, दुर्गम और भयानक 'रौरव नरक' के मार्ग से ले जाने लगे चलते-चलते राजा ने चारों ओर जो दृश्य देखा, उससे उनका हृदय कांप उठा:
वैतरणी नदी: रक्त, पीब, बाल और हड्डियों से भरी खौलती हुई नदी बह रही थी, जिसमें पापी जीव डूब-उतरा रहे थे।
असिपत्रवन: ऐसे वन जहाँ वृक्षों के पत्ते तलवार की धार जैसे तीखे थे, जो हवा चलने पर गिरकर पापियों के अंगों को छिन्न-भिन्न कर रहे थे।
भयानक यातनाएं: कहीं पापियों को लोहे के तपे हुए खंभों से चिपकाया जा रहा था, कहीं गर्म तेल के कड़ाहों में डाला जा रहा था, तो कहीं यमदूत नुकीले त्रिशूलों से उन्हें बींध रहे थे।
चारों ओर केवल आर्तनाद, चीत्कार और असह्य दुर्गंध फैली हुई थी।
राजा विपश्चित ने चकित होकर यमदूत से पूछा:
हे यमदूत! मैंने जीवन भर कोई अधर्म नहीं किया, सदा सत्य और धर्म का पालन किया। फिर तुम मुझे इस घोर नरक के मार्ग पर क्यों लेकर आए हो?यमदूत ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनय से उत्तर दिया:
हे धर्मराज स्वरूप राजन्! आपके संचित पुण्यों का कोई पार नहीं है। परंतु आपके जीवन में एक अत्यंत सूक्ष्म त्रुटि हुई थी। एक बार आपने अपनी धर्मपत्नी के पवित्र ऋतु-काल में जाने-अनजाने एक छोटे से शास्त्रीय नियम की अवहेलना कर दी थी। उसी लेशमात्र दोष के फल स्वरूप आपको कुछ क्षणों के लिए इस नरक-मार्ग का दर्शन कराया गया है। अब आपका वह अल्प दोष समाप्त हो चुका है। चलिए, स्वर्ग का दिव्य विमान और देवगण आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
यमदूत राजा विपश्चित को लेकर नरक के द्वार से बाहर स्वर्ग की ओर मुड़ने लगे जैसे ही राजा नरक के क्षेत्र से बाहर निकलने लगे, वैसे ही नरक में भयंकर यातनाएं झेल रहे हज़ारों-लाखों पापी जीव एक साथ व्याकुल होकर रोने-चिल्लाने लगे:
हे महात्मन्! हे पुण्यात्मा पुरुष! ठहर जाइए! दो घड़ी और यहीं रुक जाइए! कृपा करके हमें छोड़कर मत जाइए राजा विपश्चित ने पीछे मुड़कर देखा और पूछा—हे दुखियारे जीवों! तुम मुझे क्यों रोक रहे हो? मैं तो स्वयं इस दुर्गंध और ताप से व्याकुल हूँ।
नरक के जीवों ने हाथ जोड़कर करुण स्वर में कहा:
हे श्रेष्ठ पुरुष! जब से आप यहाँ पधारे हैं, आपके शरीर, आपके निष्पाप हृदय और आपके महान पुण्यों का स्पर्श करके जो वायु हमारे पास आ रही है, उसने इस नरक की धधकती आग को शांत कर दिया है। वैतरणी का खौलता जल शीतल हो गया है और यमदूतों के अस्त्र हमें फूलों जैसे प्रतीत हो रहे हैं। आपके यहाँ रहने से हमें असह्य कष्टों में भी परम सुख और शांति मिल रही है। आपके जाते ही हम पुनः उसी भयानक ज्वाला में जलने लगेंगे!
नरक के उन घोर पापियों का यह करुण विलाप सुनकर राजा विपश्चित का हृदय दया के सागर में डूब गया। उनकी आँखों से अश्रु बहने लगे राजा ने मन में विचार किया:
संसार में वह व्यक्ति सचमुच धन्य है, जिसके शरीर, धन या पुण्यों से किसी तड़पते हुए प्राणी के दुःखों का निवारण हो सके। जो सुख केवल अपने लिए भोगा जाए और जिसके पीछे दूसरों का क्रंदन छूट जाए, वह सुख वास्तव में नरक है राजा विपश्चित ने स्वर्ग ले जाने वाले यमदूतों से अत्यंत शांत और दृढ़ वाणी में कहा:
हे यमदूतों! मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा। तुम अपने विमान को वापस ले जाओ। यदि मेरे यहाँ खड़े रहने मात्र से इन असहाय और पीड़ा से तड़पते हुए जीवों को थोड़ी सी भी शांति मिलती है, तो मैं अपने अनंत काल का स्वर्ग-सुख त्यागने को तैयार हूँ। मैं यहीं इस नरक में निवास करूँगा यमदूत राजा का यह अद्वितीय त्याग देखकर अवाक रह गए। तीनों लोकों में राजा के इस निर्णय से हलचल मच गई।
राजा के इस महान संकल्प के साथ ही नरक का घोर अंधकार एक दिव्य, स्वर्णिम प्रकाश में बदल गया। साक्षात देवराज इंद्र और समस्त प्राणियों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले धर्मराज (यमराज) वहाँ प्रकट हुए इंद्र ने कहा:
हे राजर्षि विपश्चित! आपके यज्ञों, दानों और सदाचार के बल से आपके लिए देवलोक के सर्वोत्तम ऐश्वर्य, कल्पवृक्ष और अप्सराएं प्रतीक्षा कर रहे हैं। ये जीव तो अपने भयंकर कुकर्मों का फल भोग रहे हैं। इनके मोह में पड़कर आप अपना स्वर्ग-सुख क्यों नष्ट कर रहे हैं? चलिए, स्वर्ग का सिंहासन आपका स्वागत कर रहा है राजा विपश्चित ने इंद्र और यमराज को नमन करते हुए उत्तर दिया:
हे देवराज! जब तक मेरी आँखों के सामने ये हज़ारों जीव नरक की अग्नि में जल रहे हैं, तब तक मेरे लिए स्वर्ग की अमृत-धारा भी विष के समान है। राजा का सबसे पहला धर्म शरणागत और पीड़ितों की रक्षा करना है। यदि आप दोनों मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे कोई फल देना चाहते हैं, तो मेरे जीवन भर के समस्त यज्ञों, व्रतों, दानों और धर्म-कार्यों का संचित पुण्य इन सभी नरकवासियों को दान कर दीजिए, ताकि ये इस भयंकर यातना से सदा के लिए मुक्त हो जाएं!
राजा के मुख से अपने संपूर्ण पुण्यों के इस निःस्वार्थ दान की घोषणा सुनते ही आकाश से गंधर्वों का गान गूंज उठा और पुष्पों की अविरल वर्षा होने लगी धर्मराज यमराज ने गद्गद कंठ से कहा:
हे राजन्! आपके इस एक निस्वार्थ संकल्प और अगाध करुणा के प्रभाव से न केवल इन जीवों के पूर्व पाप भस्म हो गए हैं, बल्कि आपके पुण्यों का भंडार अनंत गुना बढ़ गया है उसी क्षण नरक की वैतरणी नदी अमृत-सरोवर बन गई, अंगारे कमलों में बदल गए और वहाँ उपस्थित सभी पापी जीव दिव्य देह धारण करके प्रकाशमान हो उठे। वे सभी राजा विपश्चित की जय-जयकार करते हुए दिव्य विमानों में बैठकर उच्च लोकों (स्वर्ग) को चले गए इसके पश्चात देवराज इंद्र और धर्मराज ने राजा विपश्चित को ससम्मान दिव्य रथ पर आसीन किया और उन्हें स्वर्ग से भी परे, जन्म-मरण के चक्र से मुक्त परम धाम (मोक्ष) की ओर ले गए।
परोपकार ही परम धर्म है मार्कण्डेय पुराण का यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि केवल अपने लिए पूजा-पाठ, दान या मोक्ष साधना स्वार्थ है सच्ची साधना वही है जो दूसरों के आंसुओं को पोंछने में समर्थ हो।
!! जय श्री कृष्णा!!
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