sn vyas
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*॥ श्रीरामचरितमानस – मंगलाचरण ॥*
`🕉️ श्री गुरुवे नमः🚩`
*वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम् ।*
*यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥*
[ `श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड , मंगलाचरण – ३` ]
*प्रसङ्ग –* `गोस्वामी तुलसीदास जी रामकथा प्रारम्भ करने से पूर्व गुरु-वन्दना कर रहे हैं । प्रथम दो श्लोकों में गणेश एवं माँ शारदा वन्दना के उपरांत यह तीसरा श्लोक गुरु-वन्दना का है ।`
`श्लोकार्थ 👉🏻 मैं ज्ञानस्वरूप , नित्य , तथा साक्षात् कल्याण-स्वरूप शङ्कर-रूपी गुरु की वन्दना करता हूँ , जिनके आश्रय में रहने से टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है ।`
`भावार्थ 👉🏻 गुरु कोई व्यक्ति नहीं , बोध-स्वरूप है । वह शङ्कर है – " शं करोति इति शङ्करः " , कल्याण करता है । चन्द्रमा में स्वयं हजार दोष हैं – वक्रता/टेढ़ापन है , कलंक है , क्षय है , किन्तु वह जब शङ्कर के मस्तक पर स्थान प्राप्त हो गया , तो देवता भी उसे प्रणाम करते हैं । उसही प्रकार से – जीव कितना भी वक्र/टेढ़ा , पापी , दोषी क्यों न हो , यदि वह शङ्कर-रूपी गुरु के चरणों का आश्रय ले ले , तो वही जगत् में वन्दनीय हो जाता है । गुरु का आश्रय दोष को भी भूषण बना देता है ।`
`🙇🏻♂️👣 ऐसे बोधमय, नित्य , शङ्कर-स्वरूप श्रीगुरुदेव को मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ ।`
*गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।*
*गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥*
`🌼👣🌼॥ गुरु ही शिव है , शिव ही गुरु है ॥🌼👣🌼`
`जय श्री गुरुदेव🚩`
`हर हर महादेव🔱`
`हर हर शङ्कर🚩`
`जय जय शङ्कर🚩`
`~ सर्वज्ञ शङ्कर🚩`
`🌄🌆 प्रभात वन्दन 🌆🌄`
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