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सुशील मेहता - Author on ShareChat
सुशील मेहता
674 views • 23 hours ago
पलटू साहिब का सबद #संतो की रचनायें
संत पलटू साहिब का सबद रे तुम तो निपट সং 433 3RI बटोरहु कौड़ी कौड़ी लाख नाहक किहेहु बेगारी। तहु चढ़ि चलेहु चारि के काँधे, दूनों हाथ पसारी।I बहुरि-्बहुरि कै राँध परोसी, आये मूड़ फेकारी। जाति कुटुँब सब रोवन लागे, सँग बूढ़ि महतारीII लागि तुहरे संग कोऊ नहिं जाई, कोठा महल अटारी। अपने स्वारथ को सब रोवै, झूठ मूठ के आरी।I धरमराय जब लेखा मँगिहैं करबेहु कौन बिचारी। पलटू कहत सुनो भाई साधो, इतनी अरज हमारीIl संत पलटू साहिब का सबद रे तुम तो निपट সং 433 3RI बटोरहु कौड़ी कौड़ी लाख नाहक किहेहु बेगारी। तहु चढ़ि चलेहु चारि के काँधे, दूनों हाथ पसारी।I बहुरि-्बहुरि कै राँध परोसी, आये मूड़ फेकारी। जाति कुटुँब सब रोवन लागे, सँग बूढ़ि महतारीII लागि तुहरे संग कोऊ नहिं जाई, कोठा महल अटारी। अपने स्वारथ को सब रोवै, झूठ मूठ के आरी।I धरमराय जब लेखा मँगिहैं करबेहु कौन बिचारी। पलटू कहत सुनो भाई साधो, इतनी अरज हमारीIl
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    सुशील मेहता
    पद दयाबाई #संतो की रचनायें
    पद गुरु बिनु चौरासी मन जावैII गुरु बिन राम भक्ति नहिं जागै। असुभ कर्म नहिं त्यागैII गुरु बिन गुरु ही दीन दयाल गोसाईं। गुरु सरनै जो कोइ जाई II पलटैं करैं काग सूँ हंसा। मन को मेटत हैं सब संसा Il गुरु हैं सागर FಹTI কৃণা गुरु हैं ब्रह्म रूप भगवाना II हानि लाभ दोउ सम करि जानैं | हदै गंर्रथि नीकी विधि मानैं Il दै उपदेश करैं भ्रम नासा। दया देत सुख सागर बासा।l गुरु को अहिनिस ध्यान जो करिये। बिधिवत सेवा में अनुसरिये। तन मन सूं अज्ञा में रहिये। गुरु आज्ञा बिन कछू न करिये।I दयाबाई पद गुरु बिनु चौरासी मन जावैII गुरु बिन राम भक्ति नहिं जागै। असुभ कर्म नहिं त्यागैII गुरु बिन गुरु ही दीन दयाल गोसाईं। गुरु सरनै जो कोइ जाई II पलटैं करैं काग सूँ हंसा। मन को मेटत हैं सब संसा Il गुरु हैं सागर FಹTI কৃণা गुरु हैं ब्रह्म रूप भगवाना II हानि लाभ दोउ सम करि जानैं | हदै गंर्रथि नीकी विधि मानैं Il दै उपदेश करैं भ्रम नासा। दया देत सुख सागर बासा।l गुरु को अहिनिस ध्यान जो करिये। बिधिवत सेवा में अनुसरिये। तन मन सूं अज्ञा में रहिये। गुरु आज्ञा बिन कछू न करिये।I दयाबाई
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    सुशील मेहता
    संत कबीर का पद #संतो की रचनायें
    "٦چ" मोको कहाँ ढूँढे बंदे मैं तो तेरे पास में ना मैं देवल ना मैं मस्जिद ना काबे कैलास में ना तो कौन क्रिया कर्म में नहीं जोग-बैराग में ना मैं छगरी ना मैं भेंड़ी ना मैं छूरी गाँड़ास में में नहीं पूछ में ना हड्डी ना नहीं खाल माँस में मैं तो रहौ सहर के बाहर मेरी पूरी मवास में खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं पल-्भर की तलास में भाई साधो सब कहै 'कबीर सुनो साँसन की साँस में (कबीर) "٦چ" मोको कहाँ ढूँढे बंदे मैं तो तेरे पास में ना मैं देवल ना मैं मस्जिद ना काबे कैलास में ना तो कौन क्रिया कर्म में नहीं जोग-बैराग में ना मैं छगरी ना मैं भेंड़ी ना मैं छूरी गाँड़ास में में नहीं पूछ में ना हड्डी ना नहीं खाल माँस में मैं तो रहौ सहर के बाहर मेरी पूरी मवास में खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं पल-्भर की तलास में भाई साधो सब कहै 'कबीर सुनो साँसन की साँस में (कबीर)
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    सुशील मेहता
    पद मीरा बाई #संतो की रचनायें
    पद मैं गिरधर के घर जाऊँ। गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ II रैण पड़ै तब ही उठ जाऊँ भोर भये उठ आऊँ। रैण दिना वा के संग खेलूँ ज्यूँ त्यूँ ताही रिझाऊँ II जो पहिरावै सोई पहिरूँ जो दे सोई खाऊँ। मेरी उण की प्रीत पुराणी उण बिन पल न रहाऊँII जहाँ बैठावें तितही बैठूँ बेचै तो बिक जाऊँ | मीरा के प्रभु गिरधर नागर बार-बार बलि जाऊँ।। मीराबाई
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    सुशील मेहता
    दोहा बुल्लेशाह #संतो की रचनायें
    दाहा नूँ लोक मत्तीं देंदे, बुल्ले : बुल्लया तू जा बसो विच मसीती | विच मसीतां की कुझ हुंदा , जे दिलों नमाज़ ना कीती ।। बुल्लेशाह दाहा नूँ लोक मत्तीं देंदे, बुल्ले : बुल्लया तू जा बसो विच मसीती | विच मसीतां की कुझ हुंदा , जे दिलों नमाज़ ना कीती ।। बुल्लेशाह
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    सुशील मेहता
    सबद संत गुलाल साहिब #संतो की रचनायें
    गुलाल साहिब का सबद आजु झरि बरखत बुंद सोहावन पिया कै रीति प्रीति छबि निरखत मन भावन पुलकि सुखमन सेज जे सूरत सँवारहिं झिलमिलि झलक दिखावन गरजत गगन अनंत सबद धुनि पिया पपीहा गावन उमग्यो सागर सलिल नीर भरो चहुँ दिसि लगत सोहवन उपज्यो सुक सन्मुख तिरपित भयो सब बिसरावन gfq 374 काम क्रोध मद लोभ छुटयो H अपनेहि साहब भावन कह ' गुलाल' जंजाल गयो तब हर दम भादौं सावन @o)' गुलाल साहिब का सबद आजु झरि बरखत बुंद सोहावन पिया कै रीति प्रीति छबि निरखत मन भावन पुलकि सुखमन सेज जे सूरत सँवारहिं झिलमिलि झलक दिखावन गरजत गगन अनंत सबद धुनि पिया पपीहा गावन उमग्यो सागर सलिल नीर भरो चहुँ दिसि लगत सोहवन उपज्यो सुक सन्मुख तिरपित भयो सब बिसरावन gfq 374 काम क्रोध मद लोभ छुटयो H अपनेहि साहब भावन कह ' गुलाल' जंजाल गयो तब हर दम भादौं सावन @o)'
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    सुशील मेहता
    पद संत शिवदयाल #संतो की रचनायें
    q| रंगीले रंग देओ चुनर हमारी रंगीले रंग देओ चुनर हमारी ऐसा रंग रंगी कृपा कर जग से हाो जाय न्यारी ये मन नित उपाय उठावत याको गढ लो सारी निर्मल होय प्रेम रंग भींजे जावे गगन अटारी दया होय जब भारी নদ্কাঠী सुरत अगम पद धारी 'राधास्वामी' प्यारे मेहर करो अब जल्दी लेव सुधारी संत सालिगराम q| रंगीले रंग देओ चुनर हमारी रंगीले रंग देओ चुनर हमारी ऐसा रंग रंगी कृपा कर जग से हाो जाय न्यारी ये मन नित उपाय उठावत याको गढ लो सारी निर्मल होय प्रेम रंग भींजे जावे गगन अटारी दया होय जब भारी নদ্কাঠী सुरत अगम पद धारी 'राधास्वामी' प्यारे मेहर करो अब जल्दी लेव सुधारी संत सालिगराम
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    सुशील मेहता
    पद गोरखनाथ #संतो की रचनायें
    4 अवधू राई, विषय न कासौं . ಣ51 ' दीसै कोई। जासौं अब रे आतम राम 4s1 ; सोई।। आपण ही मछ कछ आपण ही जाल। आपण ही धीवर आपण ही काल।I आपण ही स्यंघ बाध आपण ही गाइ। आपण ही मारीला आपण ही खाइ।I आपण ही टाटी फड़िका आपण ही লখ| आपण ही मारीला आपण ही कंध।। न्हाइबे कौं तीरथ न को देव। পুতিন भणंत गोरखनाथ अलख अभेव।l गोरखनाथ 4 अवधू राई, विषय न कासौं . ಣ51 ' दीसै कोई। जासौं अब रे आतम राम 4s1 ; सोई।। आपण ही मछ कछ आपण ही जाल। आपण ही धीवर आपण ही काल।I आपण ही स्यंघ बाध आपण ही गाइ। आपण ही मारीला आपण ही खाइ।I आपण ही टाटी फड़िका आपण ही লখ| आपण ही मारीला आपण ही कंध।। न्हाइबे कौं तीरथ न को देव। পুতিন भणंत गोरखनाथ अलख अभेव।l गोरखनाथ
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    सुशील मेहता
    दोहा बुल्लेशाह #संतो की रचनायें
    (( बुल्लया कसूर बेदस्तूर, ओथे जाणा बणया ज़रूर | ना कोई पुंन दान है, ना कोई लाग दस्तूर ।। बुल्लेशाह 11 (( बुल्लया कसूर बेदस्तूर, ओथे जाणा बणया ज़रूर | ना कोई पुंन दान है, ना कोई लाग दस्तूर ।। बुल्लेशाह 11
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    सुशील मेहता
    चौपाई संत कबीर #संतो की रचनायें
    "aluIsే" भरमि भरमि मूआ संसारा बिरले काहू तंतु बिचारः या जग में बहु गरूवा भयेऊ स्वर्गे आसा नरकहि गयेऊ মন নীক্কা सबै सियान कृतिम औगुन ते नहिं साहेब चीन्ह जो कहते जिव भौजल पापा जिव उन नाहिं उबारा एको 1 बूड़ि मरे ते भौजल माहीं आतम ज्ञान बिचारे नाहीं राम कहत मूआ संसारा आतम राम न काहू बिचारः बूझे सो जे त्रिभुवन सूझै गहिरी बानी बिरला बूझै (संत कबीर दास) "aluIsే" भरमि भरमि मूआ संसारा बिरले काहू तंतु बिचारः या जग में बहु गरूवा भयेऊ स्वर्गे आसा नरकहि गयेऊ মন নীক্কা सबै सियान कृतिम औगुन ते नहिं साहेब चीन्ह जो कहते जिव भौजल पापा जिव उन नाहिं उबारा एको 1 बूड़ि मरे ते भौजल माहीं आतम ज्ञान बिचारे नाहीं राम कहत मूआ संसारा आतम राम न काहू बिचारः बूझे सो जे त्रिभुवन सूझै गहिरी बानी बिरला बूझै (संत कबीर दास)
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