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अनिल साहू - Author on ShareChat
अनिल साहू
2K views • 23 days ago
#जय माँ गायत्री जय गुरुवर
हरि शरणं पितु  स्वामि सखा मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ भगवान जब वनवास के दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं और हैं, तब महर्षि वाल्मीकि उनसे रहने के लिए योग्य स्थान পুত্তন श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए बताते हैं कि उनके रहने के लिए सबसे उत्तम स्थान कहाँ है बाल्मीकि जी कहते है कि हे तात! जिनके स्वामी, मित्र, पिता, माता और गुरु सब कुछ केवल आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में आप सीता जी और अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए॰ ईश्वर को पाने के लिए बाहरी स्थानों की तलाश करने के बजाय अपने मन को निष्काम, निर्मल और अनन्य भक्ति से भरकर उसे प्रभु का मंदिर बनाना चाहिए हरि शरणं पितु  स्वामि सखा मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ भगवान जब वनवास के दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं और हैं, तब महर्षि वाल्मीकि उनसे रहने के लिए योग्य स्थान পুত্তন श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए बताते हैं कि उनके रहने के लिए सबसे उत्तम स्थान कहाँ है बाल्मीकि जी कहते है कि हे तात! जिनके स्वामी, मित्र, पिता, माता और गुरु सब कुछ केवल आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में आप सीता जी और अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए॰ ईश्वर को पाने के लिए बाहरी स्थानों की तलाश करने के बजाय अपने मन को निष्काम, निर्मल और अनन्य भक्ति से भरकर उसे प्रभु का मंदिर बनाना चाहिए
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कंस और चाणूर जैसे असुरों का संहार करने वाले, देवकी और वसुदेव के हृदय को परम आनंद प्रदान करने वाले, संपूर्ण संसार के मार्गदर्शक और जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण के पावन चरणों में कोटि-कोटि वंदन समस्त जगत के तारणहार, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की आपको और आपके पूरे परिवार को मंगलमय हार्दिक शुभकामनाएँ माखनचोर, बंशीधर का आशीर्वाद आपके जीवन में सुख शांति, समृद्धि और अपार आनंद लेकर आए हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं मनिदीप, धरू जीह देहरीं द्वार যাম নাম तुलसी भीतर बाहेरहु, जौं उजिआर 4/67 तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि तुम अपने अंदर तमन) और बाहर ।संसार) दोनों जगह उजाला चाहते हो॰ तो अपनी जीभ रूपी चौखट पर राम-्नाम रूपी दीपक को रख लो अर्थात जिस तरह घर की चौखट पर रखा दीपक घर के अंदर और बाहर दोनों तरफ रोशनी फैलाता है॰ उसी तरह जीभ से नाम जप करने से मन का अंतःकरण शुद्ध होता है और व्यक्ति का राम व्यवहार व कर्म श्रेष्ठ बनता है
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं (C राम नाम गुन चरित सुहाए जनम करम अगनित श्रुति गाए जथा अनंत राम भगवान तथा कथा कीरति गुन नाना हतुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान राम का केवल रूप ही सुंदर नहीं है, बल्कि उनका नाम, उनके श्रेष्ठ गुण और उनकी लीलाएँ भी अत्यंत और कल्याणकारी हैं॰ वेद पुराणों में भगवान के अवतारों, उनके सुहावनी विस्तृत जन्मों और उनके दिव्य कर्मों का इतना वर्णन है कि उन्हें गिना नहीं जा सकता, जैसे ईश्वर सीमा से परे अनंत हैं उनका न कोई आदि है और न कोई अंत, ठीक वैसे ही उनकी गाथाएं और गुण भी असीम हैं, जिस प्रकार अनंत आकाश को पूरा नापा नहीं जा सकता, उसी प्रकार भगवान राम की कीर्ति और कथाओं का पूर्ण वर्णन कोई एक ग्रंथ या व्यक्ति नहीं कर सकता अर्थात रामकथा को किसी एक सीमा या ढांचे में नहीं बांधा जा सकता, देश, काल और भक्तों के भाव के अनुसार भगवान की कथाओं के अनेक रूप (विविधता) देखने को मिलते है
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं बिनु  सेएँ मम स्वामी Rf= হাম নমামি নমামি নমামী सरन गएँ मो से अघ रासी होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी तुलसीदास जी स्पष्ट करते हैं कि जीव चाहे कितने भी प्रयास राम की कृपा और सेवा के बिना मोक्ष या कर ले॰ लेकिन श्री भवसागर से मुक्ति संभव नहीं है, संसार-चक्र और अज्ञानता से मुक्ति पाने का एकमात्र सहज साधन भगवान श्री राम की अनन्य भक्ति और सेवा ही है, जीव चाहे कितना भी पापी क्यों न हो, यदि वह सच्चे मन से प्रभु की शरण में चला जाता है॰ तो ईश्वर उसके सारे पाप नष्ट कर उसे परम पावन बना देते हैं॰ ऐसे कृपालु स्वामी श्री राम को मैं बार-बार हूँ, नमस्कार करता हूँ॰ नमस्कार करता हूँ नमस्कार करता
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    गायत्रीतीर्थ शान्तिकञ्ज मन की शक्ति अपार है। वेगवान होने के कारण वह शीघ्र वश में नहीं आता | बिगड़ उठे तो ऊँट में चढ़ने के इच्छुक बालक की तरह झकझोर कर रख देता है। यदि मन शुद्ध , पवित्र और संकल्पवान बन जाए तो हमारे जीवन की धारा ही बदल सकती है। जिसने मन को जीत लिया उसने जगत को जीत लिया की कहावत चरितार्थ होे सकती है। ज्योति, १९६७ जुलाई Nअखण्ड युग बदलेगा , हम बदलेंगे - हम सुधरेंगे -  युग सुधरेगा शताद्दी  दाप ২০০: స్త్ वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी शनाकी 1926 2026 அ दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ awgpofficial YoUTUBB Shantikunj Rishi chintan 8439014110 wwwawgporg
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    गॅ्तिभानगीता madby 0 Day One Shloka Keeps Stress Away श्रृणुयादपि यो नरः। श्रद्धावाननसयश्च सोउपि मुक्तः शुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।। 1 8. ७१ जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण க, वह भी पापों से मुक्त होकर भी उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    মীতুন संसार में हैं ? क्या स्वर्ग और नरक इसी सबके मूल में स्वर्ग जितने भी सात्विक दैवी भाव हैं 37 की स्वर्णिम आभा है। उन्हें धारण करने में मनुष्य आंतरिक सुख का अनुभव करता है। क्षमा, दया, प्रेम॰ मृदुता, और संतोष सहानुभूति इन सभी दैवी  को अपने जीवन में गुणों सत्याचार उतारने से स्वर्ग जैसा सुख मिलता है। इन सबके मूल में भगवान भगवान की विशेष कृपा से मनुष्य इनके अनंत सुख का हैं उसका विवेक जाग्रत होता है । उसके हृदय में अनुभव करता है विराजित परम प्रभु उसे स्वर्ग का सुख प्रदान करते हैं | स्वर्ग आप की भी पहुँच के भीतर है, क्योंकि आप इन ईश्वरीय गुणों को धारण कर सकते हैं| चरित्र का पूर्ण विकास कर सकते हैं। रखिए मनुष्य शुभ कार्य करके देव बनते हैं। अतः याद शुभ कर्म कीजिए और इसी शरीर से भूसुर का पवित्र पद प्राप्त कीजिए। शुभ कार्य ही हैं | उन्हें करने में मनुष्य स्वर्ग का पुजते सुख और शांति प्राप्त करता है। आप शुद्ध, तेजस्वी, आनंदमय एवं प्रकाशवान् हैं | इसलिए आत्मबंधु दैवी को धारण करके स्वर्ग का सुख लूटिए। TUi नरक का प्रधान कारण तामसी भाव है। मनुष्य जब अज्ञान में होता है, तभी पाप करता है। मन में जमे हुए मनुष्य से दुर्भाव कराते हैं, अनेक नारकीय परेशानियों में धकेलते हैं दुष्कर्म अनीति और अधर्म के विचार सर्वथा त्यागने योग्य है।जो दैवी गुणों की उपेक्षा कर असत्य और पाशविक भावों को अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है ज्योति फरवरी १९६० पृष्ठ-१२ १४ २६८ अखण्ड মীতুন संसार में हैं ? क्या स्वर्ग और नरक इसी सबके मूल में स्वर्ग जितने भी सात्विक दैवी भाव हैं 37 की स्वर्णिम आभा है। उन्हें धारण करने में मनुष्य आंतरिक सुख का अनुभव करता है। क्षमा, दया, प्रेम॰ मृदुता, और संतोष सहानुभूति इन सभी दैवी  को अपने जीवन में गुणों सत्याचार उतारने से स्वर्ग जैसा सुख मिलता है। इन सबके मूल में भगवान भगवान की विशेष कृपा से मनुष्य इनके अनंत सुख का हैं उसका विवेक जाग्रत होता है । उसके हृदय में अनुभव करता है विराजित परम प्रभु उसे स्वर्ग का सुख प्रदान करते हैं | स्वर्ग आप की भी पहुँच के भीतर है, क्योंकि आप इन ईश्वरीय गुणों को धारण कर सकते हैं| चरित्र का पूर्ण विकास कर सकते हैं। रखिए मनुष्य शुभ कार्य करके देव बनते हैं। अतः याद शुभ कर्म कीजिए और इसी शरीर से भूसुर का पवित्र पद प्राप्त कीजिए। शुभ कार्य ही हैं | उन्हें करने में मनुष्य स्वर्ग का पुजते सुख और शांति प्राप्त करता है। आप शुद्ध, तेजस्वी, आनंदमय एवं प्रकाशवान् हैं | इसलिए आत्मबंधु दैवी को धारण करके स्वर्ग का सुख लूटिए। TUi नरक का प्रधान कारण तामसी भाव है। मनुष्य जब अज्ञान में होता है, तभी पाप करता है। मन में जमे हुए मनुष्य से दुर्भाव कराते हैं, अनेक नारकीय परेशानियों में धकेलते हैं दुष्कर्म अनीति और अधर्म के विचार सर्वथा त्यागने योग्य है।जो दैवी गुणों की उपेक्षा कर असत्य और पाशविक भावों को अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है ज्योति फरवरी १९६० पृष्ठ-१२ १४ २६८ अखण्ड
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    दिनांक : 5 ன்! எர் !! रुको मत !!! जब तक कि लक्ष्य न प्राप्त हो जाए। ক্রর 37 दूसरा हमारे प्रति बुराई करे {4 उद्वेगजनक बात कहे तो और उसे उत्तर মঙ্কত लेन्ै आगे नर्हीं बढ़ता | अपने ही मन में कह चाहिए कि इसका सबसे अच्छा उत्तर में जुटा मौन। जो अपने कर्त्तव्य कार्य 67 [ತವ್ಷತೆ के अवगुणों की खोज में नहीं है और आंतरिक प्रसन्नता रहती है। ফেনা जीवन में उतार- चढ़ाव आते हो रहते हैं। हँसते रहो, मुस्करांते रहो। ऐसा मुख किँस काम का जो हँसे नहीं मुस्कराए नर्हीं| जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति स्थिर रखना चाहते हैं , उनको दूसरों की आलोचनाओं से चिढ़ना नहीं चाहिए। हारिए न हिम्मत /६
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    समाधि स्थल का दिव्य दर्शन युगतीर्थ शांतिकुंज, गायत्री तीर्थ F೫r # 05:092026 अहंकार और स्वार्थ को भस्म कर देना ही सच्ची गायत्री यज्ञ साधना है, और निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। Iu Gnynyngy Wos ijie se 0 STrue Gayatri Yagya leads to Selfless Service; Grok के दुःख को महसूस करना , उनकी ट्रूसरों सहायता करना और उन्हें सहारा देना ही सच्ची मानवता है..! मानवता का यह सेँण व्यक्ति को न केवल सामाजिक रुप बल्कि आत्मिक मूल्यवान बनाता है.. संतोष भी देता है..!
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    Ming Tct ವu< 8uRoqluLL0,1dJM7 q೩5935೩೩೩  सदूचिन्तनः. मिंकर२६ . 08,0g.38 भगवान Oaarl कृष् जिनको हन परमला काा मानने ( , जिन्हने अपनेजीवन க3ன नें मह५ कार्यकिय हैं अनुकणण कखे हमशीक्ुदर गरणगकीओर কিল্ু? ध्र्ने उ॰कोे इतनी लेक॰ Sorr &rqaa& ! टॅप्रियग ह किलखं व्यक्त उनको अपना आर्ननकर पूजतेहं | ख्चे अर्थेनें उनको प्ूजायी ह किहमभी उबक रवहर् स्मनें बनय हुए नुर्ग पर्चलें | कष्णा <न्मष्ट ahonotnicial . Shantikun] RIshl Chintan  shantikunj Vided WWawgporg
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