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अनिल साहू - Author on ShareChat
अनिल साहू
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#जय माँ गायत्री जय गुरुवर
মীতুন संसार में हैं ? क्या स्वर्ग और नरक इसी सबके मूल में स्वर्ग जितने भी सात्विक दैवी भाव हैं 37 की स्वर्णिम आभा है। उन्हें धारण करने में मनुष्य आंतरिक सुख का अनुभव करता है। क्षमा, दया, प्रेम॰ मृदुता, और संतोष सहानुभूति इन सभी दैवी  को अपने जीवन में गुणों सत्याचार उतारने से स्वर्ग जैसा सुख मिलता है। इन सबके मूल में भगवान भगवान की विशेष कृपा से मनुष्य इनके अनंत सुख का हैं उसका विवेक जाग्रत होता है । उसके हृदय में अनुभव करता है विराजित परम प्रभु उसे स्वर्ग का सुख प्रदान करते हैं | स्वर्ग आप की भी पहुँच के भीतर है, क्योंकि आप इन ईश्वरीय गुणों को धारण कर सकते हैं| चरित्र का पूर्ण विकास कर सकते हैं। रखिए मनुष्य शुभ कार्य करके देव बनते हैं। अतः याद शुभ कर्म कीजिए और इसी शरीर से भूसुर का पवित्र पद प्राप्त कीजिए। शुभ कार्य ही हैं | उन्हें करने में मनुष्य स्वर्ग का पुजते सुख और शांति प्राप्त करता है। आप शुद्ध, तेजस्वी, आनंदमय एवं प्रकाशवान् हैं | इसलिए आत्मबंधु दैवी को धारण करके स्वर्ग का सुख लूटिए। TUi नरक का प्रधान कारण तामसी भाव है। मनुष्य जब अज्ञान में होता है, तभी पाप करता है। मन में जमे हुए मनुष्य से दुर्भाव कराते हैं, अनेक नारकीय परेशानियों में धकेलते हैं दुष्कर्म अनीति और अधर्म के विचार सर्वथा त्यागने योग्य है।जो दैवी गुणों की उपेक्षा कर असत्य और पाशविक भावों को अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है ज्योति फरवरी १९६० पृष्ठ-१२ १४ २६८ अखण्ड মীতুন संसार में हैं ? क्या स्वर्ग और नरक इसी सबके मूल में स्वर्ग जितने भी सात्विक दैवी भाव हैं 37 की स्वर्णिम आभा है। उन्हें धारण करने में मनुष्य आंतरिक सुख का अनुभव करता है। क्षमा, दया, प्रेम॰ मृदुता, और संतोष सहानुभूति इन सभी दैवी  को अपने जीवन में गुणों सत्याचार उतारने से स्वर्ग जैसा सुख मिलता है। इन सबके मूल में भगवान भगवान की विशेष कृपा से मनुष्य इनके अनंत सुख का हैं उसका विवेक जाग्रत होता है । उसके हृदय में अनुभव करता है विराजित परम प्रभु उसे स्वर्ग का सुख प्रदान करते हैं | स्वर्ग आप की भी पहुँच के भीतर है, क्योंकि आप इन ईश्वरीय गुणों को धारण कर सकते हैं| चरित्र का पूर्ण विकास कर सकते हैं। रखिए मनुष्य शुभ कार्य करके देव बनते हैं। अतः याद शुभ कर्म कीजिए और इसी शरीर से भूसुर का पवित्र पद प्राप्त कीजिए। शुभ कार्य ही हैं | उन्हें करने में मनुष्य स्वर्ग का पुजते सुख और शांति प्राप्त करता है। आप शुद्ध, तेजस्वी, आनंदमय एवं प्रकाशवान् हैं | इसलिए आत्मबंधु दैवी को धारण करके स्वर्ग का सुख लूटिए। TUi नरक का प्रधान कारण तामसी भाव है। मनुष्य जब अज्ञान में होता है, तभी पाप करता है। मन में जमे हुए मनुष्य से दुर्भाव कराते हैं, अनेक नारकीय परेशानियों में धकेलते हैं दुष्कर्म अनीति और अधर्म के विचार सर्वथा त्यागने योग्य है।जो दैवी गुणों की उपेक्षा कर असत्य और पाशविक भावों को अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है ज्योति फरवरी १९६० पृष्ठ-१२ १४ २६८ अखण्ड
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  • शुभम अत्री [कुकू, शुभू] - Author on ShareChat
    शुभम अत्री [कुकू, शुभू]
    #🙏जय माँ गायत्री देवी🙏 #🙏🏻💐 जय माँ गायत्री देवी जी 💐🙏🏻 #🌹माँ गायत्री जयंती 🙏 #🪔गायत्री जयंती ✨ #R गुड मार्निग दिल से
    ShareChat @Mahendra Arts गायत्री ज्यँती 28 3/2026 சசர்பபரிசிசி ँ भूर्भुवः स्वः तमसो मा ज्योतिर्गमय ম রান  কা সক্াংা কল | जीवन  सृप्रभात
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    यज्ञ ऐसा आवश्यक कर्म है कि उसे करते ही रहना चाहिए क्योंकि इससे परमात्मा प्रसन्न होते हैं। जिस पर परमात्मा प्रसन्न होते हैं उसे किसी चीज की कमी नहीं रहती। यज्ञ परित्याग करने से मनुष्य अनेक सत्परिणामों से वंचित होकर अधोगामी बनता है। यज्ञ का ज्ञान विज्ञान वांग्मय २.५
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं सिंधु अगाध परे नर ते भव पद पंकज प्रेम न जे करते तुलसीदास जी ने इस संसार को एक अगाध भवसागर (गहरे समुद्र) की उपमा दी है, जिस प्रकार एक विशाल और गहरे समुद्र को बिना किसी सहारे के तैरकर पार करना असंभव होता है, उसी प्रकार जन्म॰्मरण, दुखनसुख और मोह-माया से भरे इस संसार रूपी सागर को पार करना अत्यंत कठिन है यदि मनुष्य भगवान के चरणों में सच्चा अनुराग और भक्ति भाव नहीं रखता हो तो वो भक्ति रूपी नौका से वंचित रह के भंवर में ही उलझा रहता हैं जाता हैं और सांसारिक दुखों और इस भवसागर में बार-बार जन्मनमरण के चक्र में गिरता रहता हैं, अर्थात भगवान का नाम और उनके चरणों में अनन्य प्रेम ही इस संसार रूपी सागर से तरने का सबसे सरल और एकमात्र सुगम उपाय है।
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं (C धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं ள वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम् मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शंकरं वंदे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्री रामभूपप्रियम् धर्म रूपी वृक्ष के मूल, विवेक रूपी समुद्र को आनंद देने वाले पूर्णचन्द्र, वैराग्य रूपी कमल के (विकसित करने पाप रूपी घोर अंधकार को निश्चय ही मिटाने वाले) सूर्य वाले, तीनों तापों को वाले, मोह रूपी बादलों के ೯೯ समूह को छिन्न-भिन्न करने की विधि (क्रिया) में आकाश ब्रह्माजी के वंशज (आत्मज) से उत्पन्न पवन स्वरूप, महाराज श्री रामचन्द्रजी के प्रिय श्री तथा कलंकनाशक शंकरजी की मैं वंदना करता हूँ ५ हर हर महादेव ৫
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    Minac8e೫q < 8uR9QUuLL0,1d5ಇ7 q೩5855೩೩೩೩ सद्चिब्तन हर  அ 66 यह बरिको स द्खते रहते हं कि सामन बेठ लंबी चेड़रि बातें करने वाला व्यकन हमरे विचरधार $37, बँधा सथि, अखण्ठ ज्यति याहमर सहित्य के मध्यमरः ক हय नहों ? यदि वह इनरबको उपेक्षा कराहे  ,ता हम कि यहदर्तक टिकन वाहानहीं है সময়ল ঠৈন ( जेहमर विचारंको प्यारनहों कर्ते , उनका मूल्य रलेरकेलमीप्र  निर्ढेशब्दभले हि॰ वे शिष्टाचार में नहों सनझते , ) S,SSI,RaE:aek: कानकीकेरई अगानहें खखे { किसबडू दूरहें / उनर्सा ।सकते / ~ परमप्ूज्य उरुद्व॰. (वङ्ग्य कं ६६ ' 7 awgpofficial Shantkun Rishi Chintan  +Wawgp org Shuntikun] Video
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं (C राम नाम गुन चरित सुहाए जनम करम अगनित श्रुति गाए जथा अनंत राम भगवान तथा कथा कीरति गुन नाना हतुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान राम का केवल रूप ही सुंदर नहीं है, बल्कि उनका नाम, उनके श्रेष्ठ गुण और उनकी लीलाएँ भी अत्यंत और कल्याणकारी हैं॰ वेद पुराणों में भगवान के अवतारों, उनके सुहावनी विस्तृत जन्मों और उनके दिव्य कर्मों का इतना वर्णन है कि उन्हें गिना नहीं जा सकता, जैसे ईश्वर सीमा से परे अनंत हैं उनका न कोई आदि है और न कोई अंत, ठीक वैसे ही उनकी गाथाएं और गुण भी असीम हैं, जिस प्रकार अनंत आकाश को पूरा नापा नहीं जा सकता, उसी प्रकार भगवान राम की कीर्ति और कथाओं का पूर्ण वर्णन कोई एक ग्रंथ या व्यक्ति नहीं कर सकता अर्थात रामकथा को किसी एक सीमा या ढांचे में नहीं बांधा जा सकता, देश, काल और भक्तों के भाव के अनुसार भगवान की कथाओं के अनेक रूप (विविधता) देखने को मिलते है
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं !! I नियत सा़फ़ और मन में विश्वास हो, तो ईश्वर हर बंद दरवाज़े के पीछे एक नया रास्ता खोल देते हैं सभी प्रभु प्रेमियों को सुबह की राम राम हरि शरणं !! I नियत सा़फ़ और मन में विश्वास हो, तो ईश्वर हर बंद दरवाज़े के पीछे एक नया रास्ता खोल देते हैं सभी प्रभु प्रेमियों को सुबह की राम राम
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं (C3 নিলামতু अनुरागी I I तजत बमन जिमि जन बड़भागी तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में भगवान श्री राम के प्रति सच्चा प्रेम जागृत हो जाता है, उसके लिए संसार के बड़े से बड़े धननवैभव और सुख का कोई मूल्य नहीं रह जाता, जिस प्रकार कोई व्यक्ति वमन उल्टी ) करने के बाद उस त्यागी हुई ओर वस्तु की देखना भी नहीं चाहता और उससे घृणा करता है॰ उसी प्रकार रामभक्त सांसारिक भोग-विलास को अत्यंत हेय और निस्सार मानकर त्याग देते हैं॰ हालांकि संसार में धननसंपत्ति छोड़ना आसान नहीं है॰ लेकिन केवल वही जीव ऐसा कर पाता है जो बड़भागी होता है, अर्थात जिस पर भगवान की परम कृपा होती है।
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं पितु  स्वामि सखा मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ भगवान जब वनवास के दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं और हैं, तब महर्षि वाल्मीकि उनसे रहने के लिए योग्य स्थान পুত্তন श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए बताते हैं कि उनके रहने के लिए सबसे उत्तम स्थान कहाँ है बाल्मीकि जी कहते है कि हे तात! जिनके स्वामी, मित्र, पिता, माता और गुरु सब कुछ केवल आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में आप सीता जी और अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए॰ ईश्वर को पाने के लिए बाहरी स्थानों की तलाश करने के बजाय अपने मन को निष्काम, निर्मल और अनन्य भक्ति से भरकर उसे प्रभु का मंदिर बनाना चाहिए हरि शरणं पितु  स्वामि सखा मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ भगवान जब वनवास के दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं और हैं, तब महर्षि वाल्मीकि उनसे रहने के लिए योग्य स्थान পুত্তন श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए बताते हैं कि उनके रहने के लिए सबसे उत्तम स्थान कहाँ है बाल्मीकि जी कहते है कि हे तात! जिनके स्वामी, मित्र, पिता, माता और गुरु सब कुछ केवल आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में आप सीता जी और अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए॰ ईश्वर को पाने के लिए बाहरी स्थानों की तलाश करने के बजाय अपने मन को निष्काम, निर्मल और अनन्य भक्ति से भरकर उसे प्रभु का मंदिर बनाना चाहिए
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    शुभ अरुणोदय "देह" ম ঐষা "रोग" अपनी होकर भी हानि पहुंचाता है.. और "औषधि" वन में पैदा होकर भी हमारा लाभ ही करती है.. "हित' वाला पराया भी अपना है॰. चाहने और अहित करने वाला अपना भी पराया है..!! गुरुदेव जय
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