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अनिल साहू - Author on ShareChat
अनिल साहू
1K views • 22 days ago
#जय माँ गायत्री जय गुरुवर
हरि शरणं सिंधु अगाध परे नर ते भव पद पंकज प्रेम न जे करते तुलसीदास जी ने इस संसार को एक अगाध भवसागर (गहरे समुद्र) की उपमा दी है, जिस प्रकार एक विशाल और गहरे समुद्र को बिना किसी सहारे के तैरकर पार करना असंभव होता है, उसी प्रकार जन्म॰्मरण, दुखनसुख और मोह-माया से भरे इस संसार रूपी सागर को पार करना अत्यंत कठिन है यदि मनुष्य भगवान के चरणों में सच्चा अनुराग और भक्ति भाव नहीं रखता हो तो वो भक्ति रूपी नौका से वंचित रह के भंवर में ही उलझा रहता हैं जाता हैं और सांसारिक दुखों और इस भवसागर में बार-बार जन्मनमरण के चक्र में गिरता रहता हैं, अर्थात भगवान का नाम और उनके चरणों में अनन्य प्रेम ही इस संसार रूपी सागर से तरने का सबसे सरल और एकमात्र सुगम उपाय है।
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    Minac8e೫q < 8uR9QUuLL0,1d5ಇ7 q೩5855೩೩೩೩ सद्चिब्तन हर  அ 66 यह बरिको स द्खते रहते हं कि सामन बेठ लंबी चेड़रि बातें करने वाला व्यकन हमरे विचरधार $37, बँधा सथि, अखण्ठ ज्यति याहमर सहित्य के मध्यमरः ক हय नहों ? यदि वह इनरबको उपेक्षा कराहे  ,ता हम कि यहदर्तक टिकन वाहानहीं है সময়ল ঠৈন ( जेहमर विचारंको प्यारनहों कर्ते , उनका मूल्य रलेरकेलमीप्र  निर्ढेशब्दभले हि॰ वे शिष्टाचार में नहों सनझते , ) S,SSI,RaE:aek: कानकीकेरई अगानहें खखे { किसबडू दूरहें / उनर्सा ।सकते / ~ परमप्ूज्य उरुद्व॰. (वङ्ग्य कं ६६ ' 7 awgpofficial Shantkun Rishi Chintan  +Wawgp org Shuntikun] Video
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं जनम अनेक रचित अघ दहहीं सुमिरन जे नर करहीं सादर भव बारिधि गोपद इव तरहीं तुलसीदास जी कहते हैं कि अनजाने या मजबूरी में भी लिया गया राम   नाम जन्मों के पाप मिटा देता है॰ ऐसे में जो साधक पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से লিব नाम-्जप करते हैं॰ उनके यह विशाल भवसागर गाय के खुर से बने छोटे से गड्ढे के समान सुगम होे जाता है और वे सहज ही मोक्ष पा लेते हैं। जय सियाराम
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं पितु  स्वामि सखा मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ भगवान जब वनवास के दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं और हैं, तब महर्षि वाल्मीकि उनसे रहने के लिए योग्य स्थान পুত্তন श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए बताते हैं कि उनके रहने के लिए सबसे उत्तम स्थान कहाँ है बाल्मीकि जी कहते है कि हे तात! जिनके स्वामी, मित्र, पिता, माता और गुरु सब कुछ केवल आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में आप सीता जी और अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए॰ ईश्वर को पाने के लिए बाहरी स्थानों की तलाश करने के बजाय अपने मन को निष्काम, निर्मल और अनन्य भक्ति से भरकर उसे प्रभु का मंदिर बनाना चाहिए हरि शरणं पितु  स्वामि सखा मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ भगवान जब वनवास के दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं और हैं, तब महर्षि वाल्मीकि उनसे रहने के लिए योग्य स्थान পুত্তন श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए बताते हैं कि उनके रहने के लिए सबसे उत्तम स्थान कहाँ है बाल्मीकि जी कहते है कि हे तात! जिनके स्वामी, मित्र, पिता, माता और गुरु सब कुछ केवल आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में आप सीता जी और अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ निवास कीजिए॰ ईश्वर को पाने के लिए बाहरी स्थानों की तलाश करने के बजाय अपने मन को निष्काम, निर्मल और अनन्य भक्ति से भरकर उसे प्रभु का मंदिर बनाना चाहिए
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    गायत्रीतीर्थ शान्तिकञ्ज मन की शक्ति अपार है। वेगवान होने के कारण वह शीघ्र वश में नहीं आता | बिगड़ उठे तो ऊँट में चढ़ने के इच्छुक बालक की तरह झकझोर कर रख देता है। यदि मन शुद्ध , पवित्र और संकल्पवान बन जाए तो हमारे जीवन की धारा ही बदल सकती है। जिसने मन को जीत लिया उसने जगत को जीत लिया की कहावत चरितार्थ होे सकती है। ज्योति, १९६७ जुलाई Nअखण्ड युग बदलेगा , हम बदलेंगे - हम सुधरेंगे -  युग सुधरेगा शताद्दी  दाप ২০০: స్త్ वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी शनाकी 1926 2026 அ दिव्य प्रकाश का महापर्व २०२६ awgpofficial YoUTUBB Shantikunj Rishi chintan 8439014110 wwwawgporg
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    মীতুন संसार में हैं ? क्या स्वर्ग और नरक इसी सबके मूल में स्वर्ग जितने भी सात्विक दैवी भाव हैं 37 की स्वर्णिम आभा है। उन्हें धारण करने में मनुष्य आंतरिक सुख का अनुभव करता है। क्षमा, दया, प्रेम॰ मृदुता, और संतोष सहानुभूति इन सभी दैवी  को अपने जीवन में गुणों सत्याचार उतारने से स्वर्ग जैसा सुख मिलता है। इन सबके मूल में भगवान भगवान की विशेष कृपा से मनुष्य इनके अनंत सुख का हैं उसका विवेक जाग्रत होता है । उसके हृदय में अनुभव करता है विराजित परम प्रभु उसे स्वर्ग का सुख प्रदान करते हैं | स्वर्ग आप की भी पहुँच के भीतर है, क्योंकि आप इन ईश्वरीय गुणों को धारण कर सकते हैं| चरित्र का पूर्ण विकास कर सकते हैं। रखिए मनुष्य शुभ कार्य करके देव बनते हैं। अतः याद शुभ कर्म कीजिए और इसी शरीर से भूसुर का पवित्र पद प्राप्त कीजिए। शुभ कार्य ही हैं | उन्हें करने में मनुष्य स्वर्ग का पुजते सुख और शांति प्राप्त करता है। आप शुद्ध, तेजस्वी, आनंदमय एवं प्रकाशवान् हैं | इसलिए आत्मबंधु दैवी को धारण करके स्वर्ग का सुख लूटिए। TUi नरक का प्रधान कारण तामसी भाव है। मनुष्य जब अज्ञान में होता है, तभी पाप करता है। मन में जमे हुए मनुष्य से दुर्भाव कराते हैं, अनेक नारकीय परेशानियों में धकेलते हैं दुष्कर्म अनीति और अधर्म के विचार सर्वथा त्यागने योग्य है।जो दैवी गुणों की उपेक्षा कर असत्य और पाशविक भावों को अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है ज्योति फरवरी १९६० पृष्ठ-१२ १४ २६८ अखण्ड মীতুন संसार में हैं ? क्या स्वर्ग और नरक इसी सबके मूल में स्वर्ग जितने भी सात्विक दैवी भाव हैं 37 की स्वर्णिम आभा है। उन्हें धारण करने में मनुष्य आंतरिक सुख का अनुभव करता है। क्षमा, दया, प्रेम॰ मृदुता, और संतोष सहानुभूति इन सभी दैवी  को अपने जीवन में गुणों सत्याचार उतारने से स्वर्ग जैसा सुख मिलता है। इन सबके मूल में भगवान भगवान की विशेष कृपा से मनुष्य इनके अनंत सुख का हैं उसका विवेक जाग्रत होता है । उसके हृदय में अनुभव करता है विराजित परम प्रभु उसे स्वर्ग का सुख प्रदान करते हैं | स्वर्ग आप की भी पहुँच के भीतर है, क्योंकि आप इन ईश्वरीय गुणों को धारण कर सकते हैं| चरित्र का पूर्ण विकास कर सकते हैं। रखिए मनुष्य शुभ कार्य करके देव बनते हैं। अतः याद शुभ कर्म कीजिए और इसी शरीर से भूसुर का पवित्र पद प्राप्त कीजिए। शुभ कार्य ही हैं | उन्हें करने में मनुष्य स्वर्ग का पुजते सुख और शांति प्राप्त करता है। आप शुद्ध, तेजस्वी, आनंदमय एवं प्रकाशवान् हैं | इसलिए आत्मबंधु दैवी को धारण करके स्वर्ग का सुख लूटिए। TUi नरक का प्रधान कारण तामसी भाव है। मनुष्य जब अज्ञान में होता है, तभी पाप करता है। मन में जमे हुए मनुष्य से दुर्भाव कराते हैं, अनेक नारकीय परेशानियों में धकेलते हैं दुष्कर्म अनीति और अधर्म के विचार सर्वथा त्यागने योग्य है।जो दैवी गुणों की उपेक्षा कर असत्य और पाशविक भावों को अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है ज्योति फरवरी १९६० पृष्ठ-१२ १४ २६८ अखण्ड
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    समाधि स्थल का दिव्य दर्शन युगतीर्थ शांतिकुंज, गायत्री तीर्थ F೫r # 05:092026 अहंकार और स्वार्थ को भस्म कर देना ही सच्ची गायत्री यज्ञ साधना है, और निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। Iu Gnynyngy Wos ijie se 0 STrue Gayatri Yagya leads to Selfless Service; Grok के दुःख को महसूस करना , उनकी ट्रूसरों सहायता करना और उन्हें सहारा देना ही सच्ची मानवता है..! मानवता का यह सेँण व्यक्ति को न केवल सामाजिक रुप बल्कि आत्मिक मूल्यवान बनाता है.. संतोष भी देता है..!
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    Ming Tct ವu< 8uRoqluLL0,1dJM7 q೩5935೩೩೩  सदूचिन्तनः. मिंकर२६ . 08,0g.38 भगवान Oaarl कृष् जिनको हन परमला काा मानने ( , जिन्हने अपनेजीवन க3ன नें मह५ कार्यकिय हैं अनुकणण कखे हमशीक्ुदर गरणगकीओर কিল্ু? ध्र्ने उ॰कोे इतनी लेक॰ Sorr &rqaa& ! टॅप्रियग ह किलखं व्यक्त उनको अपना आर्ननकर पूजतेहं | ख्चे अर्थेनें उनको प्ूजायी ह किहमभी उबक रवहर् स्मनें बनय हुए नुर्ग पर्चलें | कष्णा <न्मष्ट ahonotnicial . Shantikun] RIshl Chintan  shantikunj Vided WWawgporg
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    गुरुर्बह्मा गुरुविंष्णुः गुरुदेंवो महेश्वरः || [ गुरुः साक्षातू परं बहा तस्मै श्रीगुरवे नमः || शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं एवं शुभकामनाएं देने वाला नहीं , शिक्षक केवल  নান  बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला होत है। वह समाज और राप्ट्र के निर्माण का आथार है, क्योंकि सच्चे शिक्षक ही संस्कार , चरित्र और उज्जवल भविप्य की नींव रखवे हैं। ಶ ಹT  எ सम्मान ही सच्ची सस्कार থিঃা ৪. चरित्र उज्जवल भविप्य अखिल विश्व गायत्री परिवार
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    गॅ्तिभानगीता madby 0 Day One Shloka Keeps Stress Away श्रृणुयादपि यो नरः। श्रद्धावाननसयश्च सोउपि मुक्तः शुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।। 1 8. ७१ जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण க, वह भी पापों से मुक्त होकर भी उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    समाधि स्थल का दिव्य दर्शन gfவf शांतिकुंज, हरिद्वार से गायत्री तीर्थ 03.09.2026 भगवान से केवल सुख मत माँगिए, ೧ सुख दुःख में सही राह पर चलने की बुद्धि भी माँगिए। हम बदलेंगे युग़ बदलेगा, हम सुर्थरेंगे युग सुधरेगा  गुरुवचन केवल शब्द नहीं होते , वे जीवन को प्रकाश देने चाले दीपक होते हैं..! जो गुरु के वचनों को अपने जीवन में उतार लेता है, उसकी हर राह सरल और सफल हाो जाती है./
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