sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣8️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः तपती और संवरण की बातचीत...(दिन 484) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गन्धर्व उवाच अथ तस्यामदृश्यायां नृपतिः काममोहितः । पातनः शत्रुसङ्घानां पपात धरणीतले ।। १ ।। गन्धर्व कहता है- अर्जुन ! जब तपती अदृश्य हो गयी, तब काममोहित राजा संवरण, जो शत्रुसमुदायको मार गिरानेवाले थे, स्वयं ही बेहोश होकर धरतीपर गिर पड़े ।। १ ।। तस्मिन् निपतिते भूमावथ सा चारुहासिनी । पुनः पीनायतश्रोणी दर्शयामास तं नृपम् ।। २ ।। जब वे इस प्रकार मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, तब स्थूल एवं विशाल श्रोणीप्रदेशवाली तपतीने मन्द-मन्द मुसकराते हुए अपनेको राजा संवरणके सामने प्रकट कर दिया ।। २ ।। अथाबभाषे कल्याणी वाचा मधुरया नृपम् । तं कुरूणां कुलकरं कामाभिहतचेतसम् ।। ३ ।। उवाच मधुरं वाक्यं तपती प्रहसन्निव । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते न त्वमर्हस्यरिंदम ।। ४ ।। मोहं नृपतिशार्दूल गन्तुमाविष्कृतः क्षितौ । एवमुक्तोऽथ नृपतिर्वाचा मधुरया तदा ।। ५ ।। ददर्श विपुलश्रोणीं तामेवाभिमुखे स्थिताम् । अथ तामसितापाङ्गीमाबभाषे स पार्थिवः ।। ६ ।। मन्मथाग्निपरीतात्मा संदिग्धाक्षरया गिरा । साधु त्वमसितापाङ्गि कामार्तं मत्तकाशिनि ।। ७ ।। भजस्व भजमानं मां प्राणा हि प्रजहन्ति माम् । त्वदर्थं हि विशालाक्षि मामयं निशितैः शरैः ।। ८ ।। कामः कमलगर्भाभे प्रतिविध्यन् न शाम्यति । दष्टमेवमनाक्रन्दे भद्रे काममहाहिना ।। ९ ।। कुरुवंशका विस्तार करनेवाले राजा संवरण कामाग्निसे पीड़ित हो अचेत हो गये थे। उस समय जैसे कोई हँसकर मधुर वचन बोलता हो, उसी प्रकार कल्याणी तपती मीठी वाणीमें उन नरेशसे बोली- 'शत्रुदमन ! उठिये, उठिये; आपका कल्याण हो। राजसिंह ! आप इस भूतलके विख्यात सम्राट् हैं। आपको इस प्रकार मोहके वशीभूत नहीं होना चाहिये।' तपतीने जब मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा, तब राजा संवरणने आँखें खोलकर देखा। वही विशाल नितम्बोंवाली सुन्दरी सामने खड़ी थी। राजाके अन्तःकरणमें कामजनित आग जल रही थी। वे उस कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरीसे लड़खड़ाती वाणीमें बोले - 'श्यामलोचने! तुम आ गयीं, अच्छा हुआ। यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी ! मैं कामसे पीड़ित तुम्हारा सेवक हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो, अन्यथा मेरे प्राण मुझे छोड़कर चले जायेंगे। विशालाक्षि! कमलके भीतरी भागकी-सी कान्तिवाली सुन्दरि ! तुम्हारे लिये कामदेव मुझे अपने तीखे बाणोंद्वारा बार-बार घायल कर रहा है। यह (एक क्षणके लिये भी) शान्त नहीं होता। भद्रे! ऐसे समयमें जब मेरा कोई भी रक्षक नहीं है, मुझे कामरूपी महासर्पने डस लिया है ।। ३-९ ।। सा त्वं पीनायतश्रोणि मामाप्नुहि वरानने । त्वदधीना हि मे प्राणाः किन्नरोद्‌गीतभाषिणि ।। १० ।। 'स्थूल एवं विशाल नितम्बोंवाली वरानने! मेरे समीप आओ। किन्नरोंकी-सी मीठी बोली बोलनेवाली ! मेरे प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं ।। १० ।। चारुसर्वानवद्याङ्गि पद्येन्दुप्रतिमानने । न ह्यहं त्वदृते भीरु शक्ष्यामि खलु जीवितुम् ।। ११ ।। 'भीरु ! तुम्हारे सभी अंग मनोहर तथा अनिन्द्य सौन्दर्यसे सुशोभित हैं। तुम्हारा मुख कमल और चन्द्रमाके समान सुशोभित होता है। मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकूँगा ।। ११ ।। कामः कमलपत्राक्षि प्रतिविध्यति मामयम् । तस्मात् कुरु विशालाक्षि मय्यनुक्रोशमङ्गने ।। १२ ।। 'कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली सुन्दरि ! यह कामदेव मुझे (अपने बाणोंसे) घायल कर रहा है; विशाललोचने ! इसलिये तुम मुझपर दया करो ।। १२ ।। भक्तं मामसितापाङ्गि न परित्यक्तुमर्हसि । त्वं हि मां प्रीतियोगेन त्रातुमर्हसि भाविनि ।। १३ ।। 'कजरारे नेत्रोंवाली भामिनि ! मैं तुम्हारा भक्त हूँ। तुम मेरा परित्याग न करो। तुम्हें तो प्रेम पूर्वक मेरी रक्षा करनी चाहिये ।। १३ ।। त्वद्दर्शनकृतस्नेहं मनश्चलति मे भृशम् । न त्वां दृष्ट्वा पुनश्चान्यां द्रष्टुं कल्याणि रोचते ।। १४ ।। 'मेरा मन तुम्हारे दर्शनके साथ ही तुमसे अनुरक्त हो गया है। इसलिये वह अत्यन्त चंचल हो उठा है। कल्याणि! तुम्हें देख लेनेके बाद फिर दूसरी स्त्रीकी ओर देखनेकी रुचि मुझे नहीं रह गयी है ।। १४ ।। प्रसीद वशगोऽहं ते भक्तं मां भज भाविनि । दृष्ट्वैव त्वां वरारोहे मन्मथो भृशमङ्गने ।। १५ ।। अन्तर्गतं विशालाक्षि विध्यति स्म पतत्त्रिभिः । मन्मथाग्निसमुद्भूतं दाहं कमललोचने ।। १६ ।। प्रीतिसंयोगयुक्ताभिरद्भिः प्रह्लादयस्व मे । पुष्पायुधं दुराधर्ष प्रचण्डशरकार्मुकम् ।। १७ ।। त्वद्दर्शनसमुद्भूतं विध्यन्तं दुस्सहैः शरैः । उपशामय कल्याणि आत्मदानेन भाविनि ।। १८ ।। 'मैं सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ, मुझपर प्रसन्न हो जाओ। महानुभावे! मुझ भक्तको अंगीकार करो। वरारोहे! विशाल नेत्रोंवाली अंगने! जबसे मैंने तुम्हें देखा है, तभीसे कामदेव मेरे अन्तःकरणको अपने बाणोंद्वारा घायल कर रहा है। कमललोचने ! तुम प्रेमपूर्वक समागमके जलसे मेरे कामाग्निजनित दाहको बुझाकर मुझे आह्लाद प्रदान करो। कल्याणि ! तुम्हारे दर्शनसे उत्पन्न हुआ कामदेव फूलोंके आयुध लेकर भी अत्यन्त दुर्धर्ष हो रहा है। उसके धनुष और बाण दोनों ही बड़े प्रचण्ड हैं। वह अपने दुस्सह बाणोंसे मुझे बींध रहा है। महानुभावे! तुम आत्मदान देकर मेरे उस कामको शान्त करो ।। १५-१८ ।। गान्धर्वेण विवाहेन मामुपेहि वराङ्गने । विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते ।। १९ ।। 'वरांगने ! गान्धर्व विवाहद्वारा तुम मुझे प्राप्त होओ। सब विवाहोंमें गान्धर्व विवाह ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है' ।। १९ ।। तपत्युवाच नाहमीशाऽऽत्मनो राजन् कन्या पितृमती ह्यहम् । मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्याचस्व पितरं मम ।। २० ।। तपतीने कहा- राजन्! मैं ऐसी कन्या हूँ, जिसके पिता विद्यमान हैं; अतः अपने इस शरीरपर मेरा कोई अधिकार नहीं है। यदि आपका मुझपर प्रेम है तो मेरे पिताजीसे मुझे माँग लीजिये ।। २० ।। यथा हि ते मया प्राणाः संगृहीता नरेश्वर । दर्शनादेव भूयस्त्वं तथा प्राणान् ममाहरः ।। २१ ।। नरेश्वर ! जैसे आपके प्राण मेरे अधीन हैं, उसी प्रकार आपने भी दर्शनमात्र से ही मेरे प्राणों को हर लिया है ।। २१ ।। न चाहमीशा देहस्य तस्मान्नृपतिसत्तम । समीपं नोपगच्छामि न स्वतन्त्रा हि योषितः ।। २२ ।। का हि सर्वेषु लोकेषु विश्रुताभिजनं नृपम् । कन्या नाभिलषेन्नाथं भर्तारं भक्तवत्सलम् ।। २३ ।। नृपश्रेष्ठ ! मैं अपने शरीरकी स्वामिनी नहीं हूँ, इसलिये आपके समीप नहीं आ सकती; कारण कि स्त्रियाँ कभी स्वतन्त्र नहीं होतीं। आपका कुल सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात है। आप-जैसे भक्तवत्सल नरेश को कौन कन्या अपना पति बनाने की इच्छा नहीं करेगी? ।। २२-२३ ।। तस्मादेवं गते काले याचस्व पितरं मम । आदित्यं प्रणिपातेन तपसा नियमेन च ।। २४ ।। ऐसी दशामें आप यथासमय नमस्कार, तपस्या और नियमके द्वारा मेरे पिता भगवान् सूर्यको प्रसन्न करके उनसे मुझे माँग लीजिये ।। २४ ।। स चेत् कामयते दातुं तव मामरिसूदन । भविष्याम्यद्य ते राजन् सततं वशवर्तिनी ।। २५ ।। शत्रुसूदन नरेश! यदि वे मुझे आपकी सेवामें देना चाहेंगे तो मैं आजसे सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहूँगी ।। २५ ।। अहं हि तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता । अस्य लोकप्रदीपस्य सवितुः क्षत्रियर्षभ ।। २६ ।। क्षत्रियशिरोमणे! मैं इन्हीं अखिलभुवनभास्कर भगवान् सविताकी पुत्री और सावित्रीकी छोटी बहिन हूँ। मेरा नाम तपती है ।। २६ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि तपत्युपाख्याने एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें तपती-उपाख्यानविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७१ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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