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- सुशील मेहताश्रावण मास में जितने भी मंगलवार आते है, सभी व्रत मंगला गौरी व्रत कहलाते हैं। यह व्रत मंगलवार को रखे जाने के कारण मंगला गौरी व्रत कहलाते हैं। हिन्दू कैलेंडर में श्रावण मास भगवान शिव और माता गौरी को समर्पित होता है। स्त्री द्वारा श्रावण मास के दौरान व्रत करने का संकल्प लेती हैं या फिर श्रावण मास के आरम्भ से, अगले सोलह सप्ताह व्रत करने का संकल्प लेते हैं। मंगल गौरी व्रत केवल स्त्रियों द्वारा ही किया जाता है। स्त्रियाँ, मुख्यतः नवविवाहित स्त्रियाँ, सुखी वैवाहिक जीवन के लिये माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु इस व्रत को करती हैं। मंगला गौरी व्रत के साथ एक कथा का संबंध भी बताया जाता है जिसके अनुसार प्राचिन काल में एक नगर में धर्मपाल नामक का एक सेठ अपनी पत्नी के साथ सुख पूर्वक जीवन यापन कर रहा होता है. उसके जीवन में उसे धन वैभव की कोई कमी न थी. किंतु उसे केवल एक ही बात सताती थी जो उसके दुख का कारण बनती थी कि उसके कोई संतान नहीं थी. जिसके लिए वह खूब पूजा पाठ ओर दान पुण्य भी किया करता था. उसके इस अच्छे कार्यों से प्रसन्न हो भगवान की कृपा से उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन पुत्र की आयु अधिक नहीं थी ज्योतिषियों के अनुसार उसका पुत्र सोलहवें वर्ष में सांप के डसने से मृत्यु का ग्रास बन जाएगा। अपने पुत्र की कम आयु जानकर उसके पिता को बहुत ठेस पहुंची लेकिन भाग्य को कौन बदल सकता है, अतरू उस सेठ ने सब कुछ भगवान के भरोसे छोड़ दिया और कुछ समय पश्चा अपने पुत्र का विवाह एक योग्य संस्कारी कन्या से कर दिया सौभाग्य से उस कन्या की माता सदैव मंगला गौरी के व्रत का पूजन किया करती थी अतरू इस व्रत के प्रभाव से उत्पन्न कन्या को अखंड सौभाग्यवती होने का आशिर्वाद प्राप्त था जिसके परिणाम स्वरुप सेठ के पुत्र की दिर्घायु प्राप्त हुई। श्रावण माह के मंगलवारों का व्रत करने के बाद इसका उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन में खाना वर्जित होता है। मेंहदी लगाकर पूजा करनी चाहिए। पूजा चार ब्राह्मणों से करानी चाहिए। आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना सहित अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में मंगला गौरी व्रत को श्री मंगला गौरी व्रतम के रूप में भी जाना जाता है। क्षेत्रों के आधार पर, श्रावण मास के शुरुआती समय में पन्द्रह दिनों का अन्तर हो सकता है। पूर्णिमान्त कैलेण्डर में, जो कि आमतौर पर उत्तर भारतीय राज्यों में प्रचलित है, श्रावण माह अमान्त कैलेण्डर से पन्द्रह दिन पहले शुरू होता है। आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में, अमान्त चन्द्र कैलेण्डर का पालन किया जाता है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों जैसे, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार और झारखण्ड में पूर्णिमान्त चन्द्र कैलेण्डर का पालन किया जाता है। इसीलिये सावन सोमवार की आधी तारीखें दोनों कैलेण्डर में अलग-अलग होती हैं। #शुभ कामनाएँ 🙏913
- सुशील मेहताशुभ मंगलवार #शुभ कामनाएँ 🙏148
- asha Devi#supab 👌 saavn #🙏🙏shubhkamna 🙏🙏 #har har mahadev125147
- asha Devi#supab 👌 saavn #🙏🙏shubhkamna 🙏🙏 #jai bhole nath🙏mata parvati😍☺❤🙏🙏187255
- सुशील मेहताकल्कि अवतार जयंती हिंदू धर्म में और मुख्य रूप से वैष्णव परंपरा में वैष्णवों द्वारा हर साल श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को कल्कि जयंती के रूप में मनाया जाता है| हर साल कल्कि जयंती पर भगवान विष्णु मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है| इस दिन, भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और अपने द्वारा किए गए सभी बुरे कार्यों या पापों के लिए माफी मांगते हैं। साथ ही, वे अपने परिवार के शांतिपूर्ण जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं| भगवान कल्कि के आगमन को चिह्नित करने के लिए कल्कि जयंती का त्यौहार मनाया जाता है। भगवान कल्कि देवता, भगवान विष्णु के दसवें अवतार हैं। देवता के सभी 10 अवतारों में से 9, पहले ही अवतारित हो चुके हैं और केवल दसवें यानी अंतिम अवतार, भगवान कल्कि प्रकट होना बाकी है। सत्य युग के पुनरुत्थान और बुरे कर्मों (अधर्म) को खत्म करने के लिए, भगवान महाविष्णु के कलयुग में भगवान कल्कि के रूप में आने की उम्मीद है। इसलिए, दुनिया भर में देवता के आगमन की उम्मीद करने और आनंद लेने के लिए त्यौहार देश भर में कल्कि जयंती के रूप में मनाया जाता है। संस्कृत शब्द से, "कालका", नाम, 'कल्कि' उत्पन्न हुआ है। "कल्कि" नाम उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो इस ब्रह्मांड से सभी तरह की गंदगी और कचरे को समाप्त करता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु भगवान कल्कि के रूप में प्रकट होंगे ताकि अंधेरे बलों और इस दुनिया से बुराई को दूर किया जा सके, जिससे इस ब्रह्मांड में धार्मिकता (धर्म) और शांति स्थापित हो सके। यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||” ये श्लोक तो आपने सुना ही होगा भगवत गीता में जब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा, कि जब-जब धर्म की हानि होती है अधर्म का प्रकोप बढ़ने लगता है तब तब मेरा अवतार इस सृष्टि को पाप मुक्त करने हेतु निश्चित तौर पर होता है। आप यह जान लीजिए जब भी किसी प्रकार की आतताई बढ़ने लगती है तब भगवान का अवतार अवश्य होता है। चाहे वह कौन सा भी युग हो। अभी वर्तमान में कल युग चल रहा है और इस कलयुग में “कल्कि अवतार” होगा ऐसा शास्त्रों का कहना है। कल्कि अवतार के रूप में भगवान विष्णु अपना दसवां रुप प्रकट करेंगे ऐसा शास्त्रों का मानना है। #शुभ कामनाएँ 🙏1118
- सुशील मेहताचरक जयंती चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेद विशारद के रूप में विख्यात हैं। वे कुषाण राज्य के राजवैद्य थे। इनके द्वारा रचित चरक संहिता एक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ है। इसमें रोगनाशक एवं रोगनिरोधक दवाओं का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है। आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के अग्निवेशतन्त्र में कुछ स्थान तथा अध्याय जोड्कर उसे नया रूप दिया जिसे आज चरक संहिता के नाम से जाना जाता है । 300-200 ई. पूर्व लगभगआयुर्वेद के आचार्य महर्षि चरक की गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है।चरक की शिक्षा तक्षशिला में हुई ।इनका रचा हुआ ग्रंथ 'चरक संहिता' आज भी वैद्यक का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है। इन्हें ईसा की प्रथम शताब्दी का बताते हैं। कुछ विद्वानोंका मत है कि चरक कनिष्क के राजवैद्य थे परंतु कुछ लोग इन्हें बौद्ध काल से भी पहले का मानते हैं।आठवीं शताब्दी में इस ग्रंथ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और यह शास्त्र पश्चिमी देशों तक पहुंचा।चरक संहिता में व्याधियों के उपचार तो बताए ही गए हैं, प्रसंगवश स्थान-स्थान पर दर्शन और अर्थशास्त्र के विषयों की भी उल्लेख है।उन्होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों और उसके ज्ञान को इकट्ठा करके उसका संकलन किया । चरक ने भ्रमण करके चिकित्सकों के साथ बैठकें की, विचार एकत्र किए और सिद्धांतों को प्रतिपादित किया और उसे पढ़ाई लिखाई के योग्य बनाया। चरकसंहिता में पालि साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक - विनयपिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा के लिये)। इससे चरकसंहिता का उपदेशकाल उपनिषदों के बाद और बुद्ध के पूर्व निश्चित होता है। इसका प्रतिसंस्कार कनिष्क के समय 78 ई. के लगभग हुआ। त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है। किंतु कनिष्क बौद्ध था और उसका कवि अश्वघोष भी बौद्ध था, पर चरक संहिता में बुद्धमत का जोरदार खंडन मिलता है। अत: चरक और कनिष्क का संबंध संदिग्ध ही नहीं असंभव जान पड़ता है। पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में मत स्थिर करना कठिन है। #शुभ कामनाएँ 🙏1710
- सुशील मेहतानाग पंचमी नाग पंचमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन माह की शुक्ल पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है। लेकिन कहीं-कहीं दूध पिलाने की परम्परा चल पड़ी है। नाग को दूध पिलाने से पाचन नहीं हो पाने या प्रत्यूर्जता से उनकी मृत्यु हो जाती है। शास्त्रों में नागों को दूध पिलाने को नहीं बल्कि दूध से स्नान कराने को कहा गया है। इस दिन अष्टनागों की पूजा की जाती है। आज के पावन पर्व पर वाराणसी (काशी) में नाग कुआँ नामक स्थान पर बहुत बड़ा मेला लगता है, किंवदन्ति है कि इस स्थान पर तक्षक गरूड़ जी के भय से बालक रूप में काशी संस्कृत की शिक्षा लेने हेतु आये, परन्तु गरूड़ जी को इसकी जानकारी हो गयी,और उन्होंने तक्षक पर हमला कर दिया, परन्तु अपने गुरू जी के प्रभाव से गरूड़ जी ने तक्षक नाग को अभय दान कर दियाउसी समय से यहाँ नाग पंचमी के दिन से यहाँ नाग पूजा की जाती है,यह मान्यता है, कि जो भी नाग पंचमी के दिन यहाँ पूजा अर्चना कर नाग कुआँ का दर्शन करता है, उसकी जन्मकुन्डली के सर्प दोष का निवारण हो जाता है। नागपंचमी के ही दिन अनेकों गांव व कस्बों में कुश्ती का आयोजन होता है जिसमें आसपास के पहलवान भाग लेते हैं। गाय, बैल आदि पशुओं को इस दिन नदी, तालाब में ले जाकर नहलाया जाता है। हिन्दू संस्कृति ने पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया है। हमारे यहां गाय की पूजा होती है। कई बहनें कोकिला-व्रत करती हैं। कोयल के दर्शन हो अथवा उसका स्वर कान पर पड़े तब ही भोजन लेना, ऐसा यह व्रत है। हमारे यहाँ वृषभोत्सव के दिन बैल का पूजन किया जाता है। वट-सावित्री जैसे व्रत में बरगद की पूजा होती है, परन्तु नाग पंचमी जैसे दिन नाग का पूजन जब हम करते हैं, तब तो हमारी संस्कृति की विशिष्टता पराकाष्टा पर पहुंच जाती है। #शुभ कामनाएँ 🙏1011
- सुशील मेहतासिंह संक्रांति सिंह संक्रांति के दिन सूर्य देव अपनी राशि बदलते हैं. इस दिन पवित्र नदी में स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है. मान्यता है कि ऐसा करने से आरोग्यता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ज्योतिष शास्त्र (Astrology) में इसका विशेष महत्व है. सूर्य देव आज यानी 17 अगस्त, बुधवार को कर्क के निकलकर सिंह राशि में प्रवेश करेंगे. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, सिंह संक्रांति के दिन सूर्य देव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इसके अलावा इस दिन भगवान विष्णु और नरसिंह देव की पूजा की जाती है. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक ग्रहों के देवता सूर्य हर महीने राशि परिवर्तन करते हैं। हिंदू वेदों में बताया गया है कि संक्रांति के दिन व्यक्ति को पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए और सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए. माना जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को धन, वैभव, यश, बल, बुद्धि की प्राप्ति होती है. सिंह संक्रांति का प्रचलन दक्षिण भारत में अधिक है. मान्यता है कि भादव माह के इस पर्व पर भगवान विष्णु और भगवान नरसिंह की उपासना करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है. इसके साथ इस दिन भगवान सूर्य को भी विधिवत पूजा करने से और उन्हें अर्घ्य देने से सभी गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है। बता दें कि सिंह संक्रांति को घी संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है. वह इसलिए क्योंकि इस दिन घी का सेवन किया जाता है. आयुर्वेद में भी गाय के घी का सेवन सेहत के लिए सबसे फायदेमंद बताया गया है. सिंह संक्रांति के दिन घी का सेवन करने से कुंडली में राहु-केतु के द्वारा पड़ रहे अशुभ प्रभाव कम किए जा सकते हैं. साथ ही घी का सेवन करने से ऊर्जा, तेज, बुद्धि और स्मरण शक्ति में बढ़ोतरी होती है. इससे आत्म बल और आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है. शास्त्रों के अनुसार भादो मास के दौरान सूर्य देव को जल अर्पित करने से व्यक्ति को उत्तम लाभ होते हैं। सिंह संक्रांति सिंह संक्रांति के दिन सूर्य देव अपनी राशि बदलते हैं. इस दिन पवित्र नदी में स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है. मान्यता है कि ऐसा करने से आरोग्यता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ज्योतिष शास्त्र (Astrology) में इसका विशेष महत्व है. सूर्य देव आज यानी 17 अगस्त, बुधवार को कर्क के निकलकर सिंह राशि में प्रवेश करेंगे. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, सिंह संक्रांति के दिन सूर्य देव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. इसके अलावा इस दिन भगवान विष्णु और नरसिंह देव की पूजा की जाती है. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक ग्रहों के देवता सूर्य हर महीने राशि परिवर्तन करते हैं। हिंदू वेदों में बताया गया है कि संक्रांति के दिन व्यक्ति को पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए और सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए. माना जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को धन, वैभव, यश, बल, बुद्धि की प्राप्ति होती है. सिंह संक्रांति का प्रचलन दक्षिण भारत में अधिक है. मान्यता है कि भादव माह के इस पर्व पर भगवान विष्णु और भगवान नरसिंह की उपासना करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है. इसके साथ इस दिन भगवान सूर्य को भी विधिवत पूजा करने से और उन्हें अर्घ्य देने से सभी गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है। बता दें कि सिंह संक्रांति को घी संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है. वह इसलिए क्योंकि इस दिन घी का सेवन किया जाता है. आयुर्वेद में भी गाय के घी का सेवन सेहत के लिए सबसे फायदेमंद बताया गया है. सिंह संक्रांति के दिन घी का सेवन करने से कुंडली में राहु-केतु के द्वारा पड़ रहे अशुभ प्रभाव कम किए जा सकते हैं. साथ ही घी का सेवन करने से ऊर्जा, तेज, बुद्धि और स्मरण शक्ति में बढ़ोतरी होती है. इससे आत्म बल और आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है. शास्त्रों के अनुसार भादो मास के दौरान सूर्य देव को जल अर्पित करने से व्यक्ति को उत्तम लाभ होते हैं। #शुभ कामनाएँ 🙏817
- सुशील मेहतासावन का तीसरा सोमवार शिव जी सृष्टि के तीनों गुणों को नियंत्रित करते हैं. शिव जी स्वयं त्रिनेत्रधारी भी हैं. साथ ही शिव जी की उपासना भी मूल रूप से तीन स्वरूपों में ही की जाती है. तीनों स्वरूपों की उपासना के लिए सावन का तीसरा सोमवार सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. इस तीनों स्वरूपों की उपासना करके सावन के तीसरे सोमवार को मनोकामनाओं की पूर्ति की जा सकती है. शिवजी के इन स्वरूपों की उपासना अगर प्रदोष काल में करें तो सर्वोत्तम होगा। समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला तो शिव जी ने मानवता की रक्षा के लिए उस विष को पी लिया. उन्होंने विष को अपने कंठ में ही रोक लिया , जिससे उनका कंठ नीला हो गया. नीला कंठ होने के कारण शिव जी के इस स्वरूप को नीलकंठ कहा जाता है। इस स्वरूप की उपासना करने से शत्रु बाधा, षड़यंत्र और तंत्र मंत्र जैसी चीजों का असर नहीं होता. सावन के सोमवार को शिव जी के नीलकंठ स्वरूप की उपासना करने के लिए शिव लिंग पर गन्ने का रस की धारा चढ़ाएं. इसके बाद नीलकंठ स्वरूप के मंत्र- "ॐ नमो नीलकंठाय" का जाप करें. ग्रहों की हर बाधा समाप्त होगी।। शिव ने ही दुनिया में समस्त नृत्य संगीत और कला का आविष्कार किया है. नृत्य कला के तमाम भेद और सूक्ष्म चीजें भी शिव ने अपने शिष्यों को बताई और समझाईं हैं. उन्होंने ऐसे नृत्यों का सृजन किया जिसका असर हमारे मन शरीर और आत्मा पर पड़ता है. जीवन में सुख और शांति के लिए तथा आनंद का अनुभव करने के लिए नटराज स्वरुप की पूजा की जाती है. ज्ञान, विज्ञान, कला, संगीत और अभिनय के क्षेत्र में सफलता के लिए भी इनकी पूजा उत्तम होती है. सावन के सोमवार को घर में सफ़ेद रंग के नटराज की स्थापना सर्वोत्तम मानी जाती है. इनकी उपासना में सफेद रंग के फूल अर्पित करें।। जिनकी उपासना करके मृत्यु तक को जीता जा सके, शिव जी का वह स्वरूप है- मृत्युंजय. शिव जी इस स्वरुप में अमृत का कलश लेकर भक्त की रक्षा करते हैं. भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरुप की उपासना से अकाल मृत्यु से रक्षा, आयु रक्षा, स्वास्थ्य लाभ और मनोकामना पूर्ति होती है. सावन के सोमवार को भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरुप की उपासना करने के लिए शिव लिंग पर बेल पत्र और जलधारा अर्पित करें. इसके बाद शिवलिंग की अर्ध परिक्रमा करें , मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें. मृत्युंजय स्वरुप का मंत्र है- "ॐ हौं जूं सः" #शुभ कामनाएँ 🙏1114