sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_३८/३ ( विश्राम)
फल के उद्देश्य से कर्म मत करो
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"मां फलेषु कदाचन " और "मा कर्मफल हेतू: भु: " इन दो आज्ञाओ का अर्थ गहराई से समझने की आवश्यकता है।
*कर्म करने से पहले फल का बिल्कुल ध्यान न रखना , और आंखें बंद करके कर्म किए जाना , यह भी अर्थ नहीं है। भगवान की वाणी अत्यंत गर्भित और अर्थपूर्ण है । उसका अंधाधुंध कोई भी अर्थ घटन नहीं किया जा सकता है। उसका अर्थ घटन इस तरह से करना है कि उसका अर्थ व्यवहार में उपयोगी हो सके। कर्म करने से पहले फल का ध्यान रखना ही पड़ेगा।*
*उदाहरण के लिए ,,, यदि कोई किसान भीषण गर्मी के मौसम में जहां पानी की सुविधा ना हो, ऐसी बंजर , खराब, जमीन में अन्न का उत्तम बीज बोए तो भी वह बीज उष्ण ताप से जल जाएगा ।*
*कर्म के फल का विचार नहीं करना चाहिए , यह कहने का अर्थ है कि कर्म के फल में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। बल्कि कर्म का उत्तम फल प्राप्त हो ,, ऐसी सोच के साथ पुरुषार्थ तो करना ही चाहिए।*
*गीता मे फलत्याग का उपदेश है । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि फल को फेंक देना चाहिए , कर्म का फल मिलना ही नहीं चाहिए , अथवा फल लेना ही नहीं चाहिए । भगवत गीता तो कहती है कि --- कर्म आपको फल दिए बिना छोड़ेगा ही नहीं ।*
*मुझे कर्म का फल नहीं चाहिए , ऐसा कौन कहता है ? चोर , व्यभिचारी, दुष्ट कर्म करने वाला ही ऐसा कह सकता है, कि मुझे अपने कर्म का फल (पाप - दुख ) नहीं चाहिए । लेकिन ऐसा हो नहीं सकता । कर्म फल तो देगा ही और वह फल भोगना ही पड़ेगा।*
*इसलिए "फल मिलेगा तो ही कर्म करूंगा " ऐसे भ्रम में नहीं रहना #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta चाहिए।*
क्रमश: अब कल नये भाग के साथ ✍🏽
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