sn vyas
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#जय मां दुर्गा माता भगवती ने महिषासुर का वध किया, तब समस्त देवताओं ने राहत की सांस ली। लेकिन उस युद्ध की राख में एक और कहानी जन्म ले चुकी थी। महिषासुर का पुत्र गजासुर अपने पिता की मृत्यु से केवल क्रोधित नहीं था, बल्कि उसके मन में एक और भी बड़ी इच्छा जन्म ले चुकी थी। वह सोचता था कि यदि स्वयं भगवान शिव उसके अधीन हो जाएं, तो संसार की कोई शक्ति उसे कभी पराजित नहीं कर सकेगी। लेकिन वह यह भी जानता था कि महादेव को बल से नहीं, केवल तप, त्याग और भक्ति से ही पाया जा सकता है। यही विचार उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया।
गजासुर हिमालय की उन दुर्गम चोटियों पर पहुंचा जहां बर्फीली हवाएं शरीर को चीर देती थीं। उसने एक विशाल शिला पर आसन जमाया और अन्न-जल का पूर्ण त्याग कर दिया। समय बीतता गया। ऋतुएं बदलती रहीं। वर्षा आई, बर्फ गिरी, तपती धूप पड़ी, पर गजासुर अचल बैठा रहा। उसका शरीर सूखकर अस्थिपंजर जैसा हो गया, पर उसके मुख से केवल एक ही मंत्र निकलता था—"ॐ नमः शिवाय।" उसकी तपस्या की अग्नि इतनी प्रचंड हो गई कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगा। देवता व्याकुल हो उठे और अंततः कैलाशपति महादेव अपने भक्त की पुकार से प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गए।
गजासुर ने जैसे ही अपने आराध्य को सामने देखा, वह उनके चरणों में गिर पड़ा। महादेव ने स्नेहपूर्वक उसे उठाया और कहा, "वत्स, तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, जो इच्छा हो मांग लो।" गजासुर जानता था कि अमरत्व मांगना व्यर्थ है, क्योंकि जन्म लेने वाला एक दिन अवश्य मृत्यु को प्राप्त होता है। उसने कुछ क्षण आंखें बंद कीं और फिर हाथ जोड़कर बोला, "हे महादेव, यदि आप वास्तव में मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे यही वरदान दीजिए कि आप सदैव मेरे उदर में निवास करें। संसार की सबसे महान सत्ता मेरे भीतर रहे, इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा?" भोलेनाथ अपने भक्त की भक्ति से इतने प्रसन्न थे कि बिना किसी विचार के उन्होंने "तथास्तु" कह दिया। उसी क्षण उनका दिव्य तेज एक प्रकाशपुंज बनकर गजासुर के शरीर में प्रवेश कर गया।
महादेव के गजासुर के उदर में समाते ही सृष्टि का संतुलन डगमगा गया। कैलाश सूना पड़ गया। देवताओं का उत्साह समाप्त हो गया। यज्ञों का प्रभाव कम होने लगा। प्रकृति का प्रवाह मानो रुक गया। चारों ओर अजीब-सा अंधकार फैल गया। भगवान शिव के बिना सृष्टि ऐसी प्रतीत हो रही थी जैसे शरीर से प्राण निकल गए हों। दूसरी ओर गजासुर अत्यंत प्रसन्न था। उसे लगता था कि अब स्वयं देवाधिदेव उसके भीतर निवास कर रहे हैं, इसलिए उससे बड़ा और शक्तिशाली कोई नहीं।
जब माता पार्वती को यह ज्ञात हुआ कि महादेव गजासुर के उदर में कैद हैं, तो उनका हृदय शोक से भर उठा। कैलाश का प्रत्येक कण उन्हें अपने स्वामी की अनुपस्थिति का अनुभव करा रहा था। उन्होंने तुरंत भगवान विष्णु की शरण लेने का निश्चय किया। वैकुंठ पहुंचकर उन्होंने भगवान विष्णु को संपूर्ण घटना सुनाई। भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, "देवी, चिंता मत कीजिए। महादेव अपने भक्त के प्रेम में बंधे हैं, लेकिन उन्हें मुक्त कराने का उपाय मैं अवश्य करूँगा।"
भगवान विष्णु ने नंदी को बुलाया। उन्होंने नंदी को अत्यंत सुंदर आभूषणों और रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजाया। फिर स्वयं एक साधारण ग्वाले का रूप धारण कर लिया। हाथ में बांसुरी ली और नंदी को साथ लेकर गजासुर के राज्य की ओर चल पड़े। महल के बाहर पहुंचते ही भगवान विष्णु ने अपनी बांसुरी बजानी आरंभ की। वह धुन इतनी मधुर, इतनी अलौकिक थी कि पूरा असुर दरबार मंत्रमुग्ध हो गया। उसी समय नंदी ने ऐसा अद्भुत नृत्य प्रारंभ किया कि देखने वाला हर व्यक्ति अपनी सुध-बुध खो बैठा। स्वयं गजासुर भी उस दिव्य संगीत और नृत्य में डूब गया।
जब नृत्य समाप्त हुआ, तो गजासुर अत्यंत प्रसन्न होकर बोला, "ग्वाले, आज तुमने मुझे इतना आनंद दिया है कि मैं तुम्हें जो चाहो वह वरदान दूंगा। मांगो, क्या चाहते हो?" उसी क्षण भगवान विष्णु ने अपनी बांसुरी नीचे रखी और शांत स्वर में कहा, "यदि वास्तव में अपना वचन निभाना चाहते हो, तो अपने उदर में निवास कर रहे मेरे महादेव को मुक्त कर दो।"
यह सुनते ही गजासुर समझ गया कि उसके सामने कोई साधारण ग्वाला नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु खड़े हैं। वह जान गया कि अब उसका अंत निकट है। परंतु उसने अपने दिए हुए वचन से पीछे हटने का विचार भी नहीं किया। उसने अपनी तलवार उठाई, भगवान शिव का स्मरण किया और बिना एक क्षण की देर किए स्वयं अपने उदर को चीर डाला। उसके शरीर से रक्त की धारा बह निकली, पर उसी के साथ एक दिव्य प्रकाश भी बाहर निकला। अगले ही क्षण भगवान शिव अपने पूर्ण तेजस्वी स्वरूप में प्रकट हो गए। पूरा दरबार उनके प्रकाश से आलोकित हो उठा।
नंदी अपने स्वामी को देखकर आनंदाश्रुओं से भर उठे। भगवान विष्णु ने भी अपना वास्तविक चतुर्भुज स्वरूप धारण कर लिया। गजासुर भूमि पर पड़ा अंतिम सांसें ले रहा था। भगवान विष्णु उसके समीप आए और बोले, "गजासुर, तुमने अपने वचन की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग कर दिया। तुम्हारा यह त्याग सदैव स्मरण किया जाएगा।"
गजासुर ने बड़ी कठिनाई से अपनी आंखें खोलीं। उसने भगवान शिव को देखा और हाथ जोड़कर बोला, "हे प्रभु, मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य यही था कि आप मेरे भीतर निवास करते रहे। अब मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरे शरीर का यह चर्म आप सदैव धारण करें, ताकि मेरा जीवन आपकी सेवा में अमर हो जाए। और मेरा यह मस्तक भी किसी महान कार्य में उपयोग हो, जिससे मेरा जन्म सफल हो जाए।"
महादेव की आंखें करुणा से भर उठीं। उन्होंने कहा, "तथास्तु। आज से मैं गजचर्म धारण करने वाला कृतिवासा कहलाऊंगा। तुम्हारा यह चर्म मेरे वस्त्र के रूप में सदैव रहेगा।" इसके बाद भगवान विष्णु ने कहा, "हे गजासुर, तुम्हारा मस्तक व्यर्थ नहीं जाएगा। समय आने पर यही मस्तक मेरे प्रिय महादेव के पुत्र के धड़ पर स्थापित होगा और वह बालक समस्त संसार में प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता श्रीगणेश के नाम से प्रसिद्ध होगा।"
भगवानों के इन वचनों को सुनकर गजासुर के मुख पर अद्भुत शांति छा गई। उसने अंतिम बार भगवान शिव और भगवान विष्णु के दर्शन किए, "ॐ नमः शिवाय" का स्मरण किया और मुस्कुराते हुए अपने प्राण त्याग दिए। उसके बलिदान ने एक असुर को भी अमर भक्तों की श्रेणी में स्थान दिला दिया।
कालांतर में जब माता पार्वती के पुत्र गणेश का सिर कट गया और समस्त सृष्टि शोक में डूब गई, तब भगवान शिव को गजासुर का दिया हुआ वही वरदान स्मरण आया। उन्होंने गजासुर के पवित्र मस्तक को बाल गणेश के धड़ पर स्थापित किया। उसी क्षण गजानन का जन्म हुआ और भगवान गणेश समस्त देवताओं में प्रथम पूज्य घोषित हुए।
यही कारण है कि भगवान शिव आज भी गजचर्म धारण करते हैं और भगवान गणेश गजानन कहलाते हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति जाति, कुल या जन्म नहीं देखती। एक असुर भी यदि निष्कपट प्रेम, अटूट विश्वास और अपने वचन के लिए प्राणों का त्याग कर दे, तो भगवान उसे अमर बना देते हैं। इसलिए कहा गया है कि भगवान केवल बाहरी रूप नहीं देखते, वे भक्त के हृदय की निर्मलता और समर्पण को स्वीकार करते हैं। हर हर महादेव।
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