sn vyas
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#रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान 🌺 जब राजा जनक के महल में नन्ही सीता जी का रोना बंद नहीं हुआ, तो उन्हें चुप कराने कौन आया? जनकनंदिनी माता सीता की अद्भुत रुदन लीला 🌺 🔸 मिथिला में छाई व्याकुलता आज मिथिला में राजा जनक के महल में बड़ी बेचैनी छाई हुई है। आज जनकलली (नन्ही सीता जी) का रोना बंद ही नहीं हो रहा है। कभी वे आंखें बंद कर लेती हैं, तो कभी आधी खोलती हैं। माता सुनयना जी बार-बार उन्हें छाती से लगाकर दूध पिलाने का प्रयास कर रही हैं, किंतु जनकलली की पीड़ा शांत होने का नाम ही नहीं ले रही। किसी ने कहा बिटिया को कोई रोग लग गया है, तो कोई इसे 'नजरदोष' या 'ग्रह-बाधा' बताने लगा। मिथिला में यह खबर आग की तरह फैल गई। जो जिस हाल में था, उसी हाल में अपनी सुध-बुध खोकर जनकमहल की ओर दौड़ पड़ा। 🔸 भगवान शंकर का तांत्रिक भेष में आगमन जब मिथिला की यह खबर भगवान शंकर के कानों में पड़ी, तो वे अपने आराध्य के दर्शन हेतु एक 'सिद्ध तांत्रिक' का वेष धारण कर मिथिला में प्रकट हो गए। गुदड़ी लपेटे, कांपता हुआ शरीर लिए यह तांत्रिक मिथिला की गलियों में आवाज लगाने लगा— "सुनो! मैं रोगों को दूर करने का व्रत लेकर तुम्हारे नगर आया हूँ। रोगी को ठीक किए बिना मैं अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करता।" 🔸 महल में प्रवेश और तांत्रिक की मूर्च्छा यह खबर जब महल पहुंची, तो दासी के माध्यम से तांत्रिक (भगवान शिव) को बुलाया गया। बीमार जनकलली को देखते ही भगवान शंकर भावावेश में आकर मूर्च्छित हो गए! यह देख माता सुनयना घबरा गईं कि यह कैसा तांत्रिक है जो स्वयं बेहोश हो गया। तभी शंकर जी ‘हरि! हरि!’ कहते हुए उठ बैठे और बोले— "मइया चिंता मत करो! मैं तो अपने गुरुदेव का ध्यान कर बच्ची की व्याधि का पता लगा रहा था।" 🔸 शिव जी की अद्भुत स्तुति और उपचार इसके बाद तांत्रिक ने नन्ही सीता जी की तीन बार परिक्रमा की और अपना सिर उनके चरणों में रख दिया। सुनयना जी ने टोका— "योगीराज! आप वृद्ध और ब्राह्मण होकर कन्या के चरणों में सिर क्यों रख रहे हैं?" शंकर जी ने बात बनाते हुए कहा— "मइया, यह तांत्रिक उपचार का तरीका है, आप बस देखती रहें।" फिर महादेव ने मन ही मन जनकलली की स्तुति की: ✨ जय जय शिशुरूपे तप्त चामी कराभे विमल कमल नेत्रे पूर्ण शीतांशु वक्त्रे। निखिल भुवन जीवानन्दनि:श्रेयसे श्रीजनकनृपति गेहे क्रीडमाने प्रसीद।। ✨ (अर्थात्: हे तपाये हुए स्वर्ण सी कांति और कमल नयनों वाली किशोरी! आप प्रसन्न हों।) 🔸 जनकलली की मुस्कान और अनोखी विदाई तांत्रिकाचार्य शंकर जी की भावपूर्ण प्रार्थना सुनकर जनकलली ने आराम से आंखें खोल दीं और प्रेमपूर्वक दुग्धपान करने लगीं। पूरे जनकमहल में खुशी की लहर दौड़ गई। महाराज जनक ने तांत्रिक को स्वर्ण, रजत और राजकोष देना चाहा, लेकिन शंकर जी ने इंकार कर दिया। उन्होंने कहा— "मुझे बस इस कन्या का पहना हुआ कोई वस्त्र दे दीजिए, वही मेरा रक्षा-कवच होगा।" माता सुनयना ने वस्त्र भेंट किया। तांत्रिक ने पुनः कन्या की परिक्रमा की, चरणों में शीश नवाया और वहां से अंतर्धान हो गए। 🙏 जनक सुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।। ताके जुग पद कमल मनावहूँ। जासु कृपा निरमल मति पावहूँ।।
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