sn vyas
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‼️ भगवतकृपा हि केवलम् ‼️
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🌸#वैराग्य_संदीपनी_भाग_०९🌸
🐚 भाग - ९ 🐚
गतांक से आगे --
अहंबाद 'मैं' 'तैं' नहीं, दुष्ट संग नहिं कोइ ।
दुख ते दुख नहिं ऊपजै, सुख तें सुख नहिं होइ ॥३०॥
*सम कंचन काँचै गिनत, सत्रु दोइ ।*
*तुलसी या संसारमें, कहत संत जन सोई ॥३१॥*
जिसमें न तो अहंकार है, न मैं-तू या मेरा-तेरा है, जिसके कोई भी दुष्ट संग नहीं है, जिसको दुःख-दुःखजनक घटना से दुःख नहीं होता तथा सुख से हर्ष नहीं होता, जो सोने और काँच को समान समझता है, जिसको शत्रु-मित्र दोनों समान हैं तुलसीदासजी कहते हैं कि इस संसार में उसी को संतजन कहते हैं ॥३०-३१॥
*बिरले बिरले पाइए, माया त्यागी संत।*
*तुलसी कामी कुटिल कलि, केकी केक अनंत॥३२॥*
तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुग में माया का त्याग कर देने वाले संत कोई-कोई ही मिलते हैं, पर ऊपर से मीठा बोलने वाले और मौका लगते ही साँपोंको खा जानेवाले मोर- मोरिनी जैसे कामी-कुटिल लोगों का अन्त (पार) नहीं है ॥३२॥
*मैं तें मेट्यो मोह तम, उग्यो आतमा भानु।*
*संत राज सो जानिये, तुलसी या सहिदानु॥३३॥*
जिसके आत्मारूपी सूर्यका उदय हो गया और मैं-तू-रूप अज्ञानान्धकार का नाश हो गया, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसको संतराज (संतशिरोमणि) जानना चाहिये; क्योंकि यही उसकी पहचान है ॥३३॥
*शेष अगले भाग में...*
*🌺जय जय सियाराम🌺*
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