sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣8️⃣2️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः सूर्यकन्या तपती को देखकर राजा संवरण का मोहित होना...(दिन 482) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्जुन उवाच तापत्य इति यद् वाक्यमुक्तवानसि मामिह । तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थ विनिश्चितम् ।। १ ।। अर्जुनने कहा- गन्धर्व! तुमने 'तपतीनन्दन' कहकर जो बात यहाँ मुझसे कही है, उसके सम्बन्धमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि तापत्यका निश्चित अर्थ क्या है? ।। १ ।। तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वयम् । कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।। २ ।। साधुस्वभाव गन्धर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हमलोग तापत्य कहलाते हैं? हम तो अपनेको कुन्तीका पुत्र समझते हैं। अतः 'तापत्य' का यथार्थ रहस्य क्या है, यह जाननेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है ।। २ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम् ।। ३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उनके यों कहनेपर गन्धर्वने कुन्तीनन्दन धनंजयको वह कथा सुनानी प्रारम्भ की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ।। ३ ।। गन्धर्व उवाच हन्त ते कथयिष्यामि कथामेतां मनोरमाम् । यथावदखिलां पार्थ सर्वबुद्धिमतां वर ।। ४ ।। गन्धर्व बोला- समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार ! इस विषयमें एक बहुत मनोरम कथा है, जिसे मैं यथार्थ एवं पूर्णरूपसे आपको सुनाऊँगा ।। ४ ।। उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद् वचः । तत् तेऽहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना भव ।। ५ ।। मैंने जिस कारण अपने वक्तव्यमें तुम्हें 'तापत्य' कहा है, वह बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। ५ ।। य एष दिवि धिष्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा । एतस्य तपती नाम बभूव सदृशी सुता ।। ६ ।। विवस्वतो वै देवस्य सावित्र्यवरजा विभो । विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती तपसा युता ।। ७ ।। ये जो आकाशमें उदित हो अपने तेजोमण्डलके द्वारा यहाँसे स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहे हैं, इन्हीं भगवान् सूर्यदेवके तपती नामकी एक पुत्री हुई, जो पिताके अनुरूप ही थी। प्रभो! वह सावित्रीदेवीकी छोटी बहिन थी। वह तपस्यामें संलग्न रहनेके कारण तीनों लोकोंमें तपती नामसे विख्यात हुई ।। ६-७ ।। न देवी नासुरी चैव न यक्षी न च राक्षसी । नाप्सरा न च गन्धर्वी तथा रूपेण काचन ।। ८ ।। उस समय देवता, असुर, यक्ष एवं राक्षस जातिकी स्त्री, कोई अप्सरा तथा गधर्वपत्नी भी उसके समान रूपवती न थी ।। ८ ।। सुविभक्तानवद्याङ्गी स्वसितायतलोचना । स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेषा चैव भामिनी ।। ९ ।। न तस्याः सदृशं कंचित् त्रिषु लोकेषु भारत । भर्तारं सविता मेने रूपशीलगुणश्रुतैः ।। १० ।। उसके शरीरका एक-एक अवयव बहुत सुन्दर, सुविभक्त और निर्दोष था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और कजरारी थीं। वह सुन्दरी सदाचार, साधु-स्वभाव और मनोहर वेशसे सुशोभित थी। भारत ! भगवान् सूर्यने तीनों लोकोंमें किसी भी पुरुषको ऐसा नहीं पाया, जो रूप, शील, गुण और शास्त्रज्ञानकी दृष्टिसे उसका पति होनेयोग्य हो ।। ९-१० ।। सम्प्राप्तयौवनां पश्यन् देयां दुहितरं तु ताम् । नोपलेभे ततः शान्तिं सम्प्रदानं विचिन्तयन् ।। ११ ।। वह युवावस्थाको प्राप्त हो गयी। अब उसका किसीके साथ विवाह कर देना आवश्यक था। उसे उस अवस्थामें देखकर भगवान् सूर्य इस चिन्तामें पड़े कि इसका विवाह किसके साथ किया जाय। यही सोचकर उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ।। ११ ।। अथर्क्षपुत्रः कौन्तेय कुरूणामृषभो बली । सूर्यमाराधयामास नृपः संवरणस्तदा ।। १२ ।। कुन्तीनन्दन ! उन्हीं दिनों महाराज ऋक्षके पुत्र राजा संवरण कुरुकुलके श्रेष्ठ एवं बलवान् पुरुष थे। उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधना प्रारम्भ की ।। १२ ।। अर्घ्यमाल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियतः शुचिः । नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि ।। १३ ।। शुश्रूषुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दन । अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान् ।। १४ ।। पौरवनन्दन ! वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर पवित्र हो अर्घ्य, पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य आदि सामग्रियोंसे तथा भाँति-भाँतिके नियम, व्रत एवं तपस्याओंद्वारा बड़े भक्तिभावसे उदय होते हुए सूर्यकी पूजा करते थे। उनके हृदयमें सेवाका भाव था। वे शुद्ध तथा अहंकारशून्य थे ।। १३-१४ ।। ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि । तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ।। १५ ।। रूप में इस पृथ्वी पर उनके समान दूसरा कोई पुरुष नहीं था। वे कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे। अतः सूर्यदेव ने राजा संवरण को ही तपती के योग्य पति माना ।। १५ ।। दातुमैच्छत् ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम् । नृपोत्तमाय कौख्य विश्रुताभिजनाय च ।। १६ ।। कुरुनन्दन ! उन्होंने नृपश्रेष्ठ संवरणको, जिनका उत्तम कुल सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात था, अपनी कन्या देनेकी इच्छा की ।। १६ ।। यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा । तथा भुवि महीपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत् ।। १७ ।। जैसे आकाशमें उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार पृथ्वीपर राजा संवरण अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित थे ।। १७ ।। यथार्चयन्ति चादित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः । तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः ।। १८ ।। पार्थ! जैसे ब्रह्मवादी महर्षि उगते हुए सूर्यकी आराधना करते हैं, उसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य आदि प्रजाएँ महाराज संवरणकी उपासना करती थीं ।। १८ ।। स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा । बभूव नृपतिः श्रीमान् सुहृदां दुर्हदामपि ।। १९ ।। वे अपनी कमनीय कान्तिसे चन्द्रमाको और तेजसे सूर्यदेवको भी तिरस्कृत करते थे। राजा संवरण मित्रों तथा शत्रुओंकी मण्डलीमें भी अपनी दिव्य शोभासे प्रकाशित होते थे ।। १९ ।। एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव । तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वयम् ।। २० ।। कुरुनन्दन! ऐसे उत्तम गुणों से विभूषित तथा श्रेष्ठ आचार-व्यवहार से युक्त राजा संवरण को भगवान् सूर्य ने स्वयं ही अपनी पुत्री तपती को देने का निश्चय कर लिया ।। २० ।। स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः । चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल ।। २१ ।। कुन्तीनन्दन ! एक दिन अमितपराक्रमी श्रीमान् राजा संवरण पर्वतके समीपवर्ती उपवनमें हिंसक पशुओंका शिकार कर रहे थे ।। २१ ।। चरतो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः । ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः ।। २२ ।। स मृताश्वश्चरन् पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः । ददर्शासदृशीं लोके कन्यामायतलोचनाम् ।। २३ ।। कुन्तीपुत्र ! शिकार खेलते समय ही राजाका अनुपम अश्व पर्वतपर भूख-प्याससे पीड़ित हो मर गया। पार्थ! घोड़ेकी मृत्यु हो जानेसे राजा संवरण पैदल ही उस पर्वत-शिखरपर विचरने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विशाललोचना कन्या देखी, जिसकी समता करनेवाली स्त्री कहीं नहीं थी ।। २२-२३ ।। स एक एकामासाद्य कन्यां परबलार्दनः । तस्थौ नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः ।। २४ ।। शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेवाले नृपश्रेष्ठ संवरण अकेले थे और वह कन्या भी अकेली ही थी। उसके पास पहुँचकर राजा एकटक नेत्रोंसे उसकी ओर देखते हुए खड़े रह गये ।। २४ ।। स हि तां तर्कयामास रूपतो नृपतिः श्रियम् । पुनः संतर्कयामास रवेभ्रष्टामिव प्रभाम् ।। २५ ।। पहले तो उसका रूप देखकर नरेशने अनुमान किया कि हो-न-हो ये साक्षात् लक्ष्मी हैं; फिर उनके ध्यानमें यह बात आयी कि सम्भव है, भगवान् सूर्यकी प्रभा ही सूर्यमण्डलसे च्युत होकर इस कन्याके रूपमें आकाशसे पृथ्वीपर आ गयी हो ।। २५ ।। वपुषा वर्चसा चैव शिखामिव विभावसोः । प्रसन्नत्वेन कान्त्या च चन्द्ररेखामिवामलाम् ।। २६ ।। शरीर और तेजसे वह आगकी ज्वाला-सी जान पड़ती थी। उसकी प्रसन्नता और कमनीय कान्तिसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह निर्मल चन्द्रकला हो ।। २६ ।। गिरिपृष्ठे तु सा यस्मिन् स्थिता स्वसितलोचना । विभ्राजमाना शुशुभे प्रतिमेव हिरण्मयी ।। २७ ।। सुन्दर कजरारे नेत्रोंवाली वह दिव्य कन्या जिस पर्वत-शिखरपर खड़ी थी, वहाँ वह सोनेकी दमकती हुई प्रतिमा-सी सुशोभित हो रही थी ।। २७ ।। तस्या रूपेण स गिरिर्वेषेण च विशेषतः । स सवृक्षक्षुपलतो हिरण्मय इवाभवत् ।। २८ ।। विशेषतः उसके रूप और वेशसे विभूषित हो वृक्ष, गुल्म और लताओंसहित वह पर्वत सुवर्णमय-सा जान पड़ता था ।। २८ ।। अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वलोकेषु योषितः । अवाप्तं चात्मनो मेने स राजा चक्षुषः फलम् ।। २९ ।। उसे देखकर राजा संवरणकी समस्त लोकोंकी सुन्दरी युवतियोंमें अनादर-बुद्धि हो गयी। राजा यह मानने लगे कि आज मुझे अपने नेत्रोंका फल मिल गया ।। २९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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