sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा+4️⃣8️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः सूर्यकन्या तपती को देखकर राजा संवरण का मोहित होना...(दिन 483) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जन्मप्रभृति यत् किंचिद् दृष्टवान् स महीपतिः । रूपं न सदृशं तस्यास्तर्कयामास किंचन ।। ३० ।। भूपाल संवरणने जन्मसे लेकर (उस दिनतक) जो कुछ देखा था, उसमें कोई भी रूप उन्हें उस (दिव्य किशोरी) के सदृश नहीं प्रतीत हुआ ।। ३० ।। तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा । न चचाल ततो देशाद् बुबुधे न च किंचन ।। ३१ ।। उस कन्याने उस समय अपने उत्तम गुणमय पाशोंसे राजाके मन और नेत्रोंको बाँध लिया। वे अपने स्थानसे हिल-डुलतक न सके। उन्हें किसी बातकी सुध-बुध (भी) न रही ।। ३१ ।। अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुषम् । लोकं निर्मथ्य धात्रेदं रूपमाविष्कृतं कृतम् ।। ३२ ।। वे सोचने लगे, निश्चय ही ब्रह्माने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण लोकोंके सौन्दर्य-सिन्धुको मथकर इस विशाल नेत्रोंवाली किशोरीके इस मनोहर रूपका आविष्कार किया होगा ।। ३२ ।। एवं संतर्कयामास रूपद्रविणसम्पदा । कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा ।। ३३ ।। इस प्रकार उस समय उसकी रूप-सम्पत्तिसे राजा संवरणने यही अनुमान किया कि संसारमें इस दिव्य कन्याकी समता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है ।। ३३ ।। तां च दृष्ट्वैव कल्याणीं कल्याणाभिजनो नृपः । जगाम मनसा चिन्तां कामबाणेन पीडितः ।। ३४ ।। कल्याणमय कुलमें उत्पन्न हुए वे नरेश उस कल्याणस्वरूपा कामिनीको देखते ही काम-बाणसे पीड़ित हो गये। उनके मनमें चिन्ताकी आग जल उठी ।। ३४ ।। दह्यमानः स तीव्रेण नृपतिर्मन्मथाग्निना । अप्रगल्भां प्रगल्भस्तां तदोवाच मनोहराम् ।। ३५ ।। तदनन्तर तीव्र कामाग्निसे जलते हुए राजा संवरणने लज्जारहित होकर उस लज्जाशीला एवं मनोहारिणी कन्यासे इस प्रकार पूछा- ।। ३५ ।। कासि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि । कथं च निर्जनेऽरण्ये चरस्येका शुचिस्मिते ।। ३६ ।। 'रम्भोरु ! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किसलिये यहाँ खड़ी हो? पवित्र मुसकानवाली! तुम इस निर्जन वनमें अकेली कैसे विचर रही हो? ।। ३६ ।। त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता । विभूषणमिवैतेषां भूषणानामभीप्सितम् ।। ३७ ।। 'तुम्हारे सभी अंग परम सुन्दर एवं निर्दोष हैं। तुम सब प्रकारके (दिव्य) आभूषणोंसे विभूषित हो। सुन्दरि ! इन आभूषणोंसे तुम्हारी शोभा नहीं है, अपितु तुम स्वयं ही इन आभूषणोंकी शोभा बढ़ानेवाली अभीष्ट आभूषणके समान हो ।। ३७ ।। न देवीं नासुरीं चैव न यक्षीं न च राक्षसीम् । न च भोगवतीं मन्ये न गन्धर्वी न मानुषीम् ।। ३८ ।। 'मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, तुम न तो देवांगना हो न असुरकन्या, न यक्षकुलकी स्त्री हो न राक्षसवंशकी, न नागकन्या हो न गन्धर्वकन्या। मैं तुम्हें मानवी भी नहीं मानता ।। ३८ ।। या हि दृष्टा मया काश्चिच्छ्रुता वापि वराङ्गनाः । न तासां सदृशीं मन्ये त्वामहं मत्तकाशिनि ।। ३९ ।। 'यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी ! मैंने अबतक जो कोई भी सुन्दरी स्त्रियाँ देखी अथवा सुनी हैं, उनमेंसे किसीको भी मैं तुम्हारे समान नहीं मानता ।। ३९ ।। दृष्ट्वैव चारुवदने चन्द्रात् कान्ततरं तव । वदनं पद्मपत्राक्षं मां मथ्नातीव मन्मथः ।। ४० ।। 'सुमुखि ! जबसे मैंने चन्द्रमासे भी बढ़कर कमनीय एवं कमलदलके समान विशाल नेत्रोंसे युक्त तुम्हारे मुखका दर्शन किया है, तभीसे मन्मथ मुझे मथ-सा रहा है' ।। ४० ।। एवं तां स महीपालो बभाषे न तु सा तदा । कामार्तं निर्जनेऽरण्ये प्रत्यभाषत किंचन ।। ४१ ।। इस प्रकार राजा संवरण उस सुन्दरीसे बहुत कुछ कह गये; परंतु उसने उस समय उस निर्जन वनमें उन कामपीड़ित नरेशको कुछ भी उत्तर नहीं दिया ।। ४१ ।। ततो लालप्यमानस्य पार्थिवस्यायतेक्षणा । सौदामिनीव चाभ्रेषु तत्रैवान्तरधीयत ।। ४२ ।। राजा संवरण उन्मत्तकी भाँति प्रलाप करते रह गये और वह विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरी वहीं उनके सामने ही बादलोंमें बिजलीकी भाँति अन्तर्धान हो गयी ।। ४२ ।। तामन्वेष्टुं स नृपतिः परिचक्राम सर्वतः । वनं वनजपत्राक्षीं भ्रमन्नुन्मत्तवत् तदा ।। ४३ ।। तब वे नरेश कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस (दिव्य) कन्याको ढूँढ़नेके लिये वनमें सब ओर उन्मत्तकी भाँति भ्रमण करने लगे ।। ४३ ।। अपश्यमानः स तु तां बहु तत्र विलप्य च । निश्चेष्टः पार्थिवश्रेष्ठो मुहूर्त स व्यतिष्ठत ।। ४४ ।। जब कहीं भी उसे देख न सके, तब वे नृपश्रेष्ठ वहाँ बहुत विलाप करते-करते मूच्छित हो दो घड़ी तक निश्चेष्ट पड़े रहे ।। ४४ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि तपत्युपाख्याने सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७० ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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