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- Rajinder Talwar🛎️ रुकिए! महाभारत का यह एक संदेश आज भी लाखों लोगों की सबसे बड़ी भूल उजागर करता है। महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण है। यह हमें सिखाती है कि गलती करना ही अपराध नहीं है, बल्कि गलत को देखकर भी मौन रहना या उसका साथ देना भी उतना ही बड़ा दोष है। सत्य का साथ देना कभी आसान नहीं होता, लेकिन इतिहास हमेशा उन्हीं को सम्मान देता है जिन्होंने धर्म और न्याय का साथ चुना। याद रखिए—कई बार हमारी चुप्पी भी किसी अन्याय को शक्ति दे देती है। ॥ जय श्रीकृष्ण ॥ 💛 विचार अच्छे लगें तो पोस्ट को शेयर जरूर करें ताकि यह प्रेरणादायक संदेश और लोगों तक भी पहुँच सके। अन्य Facebook प्रोफाइल एवं पेज भी देखें: 👉 Rajinder Talwar 👉 Sugar Truth by Rajinder Talwar #rajindertalwar #positivequotesbyrajindertalwar #Mahabharat #JaiShreeKrishna #LifeLessons#mahabharat #jai shree krishna2226
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- sn vyas#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣7️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्गार...(दिन 457) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ रोरूयमाणांस्तान् दृष्ट्वा परिदेवयतश्च सा । कारुण्यात् साधुभावाच्च कुन्ती राजन् न चक्षमे ।। १० ।। राजन् ! उन ब्राह्मण-परिवारके लोगोंको बहुत रोते और विलाप करते देख कुन्ती देवी अत्यन्त दयालुता तथा साधु-स्वभाव के कारण सहन न कर सकीं ।। १० ।। मथ्यमानेन दुःखेन हृदयेन पृथा तदा । उवाच भीमं कल्याणी कृपान्वितमिदं वचः ।। ११ ।। वसाम सुसुखं पुत्र ब्राह्मणस्य निवेशने । अज्ञाता धार्तराष्ट्रस्य सत्कृता वीतमन्यवः ।। १२ ।। उस समय उनका दुःख मानो कुन्तीदेवी के हृदय को मथे डालता था। अतः कल्याणमयी कुन्ती भीमसेन से इस प्रकार करुणायुक्त वचन बोलीं- 'बेटा! हमलोग इस ब्राह्मण के घर में दुर्योधन से अज्ञात रहकर बड़े सुख से निवास करते हैं। यहाँ हमारा इतना सत्कार हुआ है कि हम अपने दुःख और दैन्य को भूल गये हैं ।। ११-१२ ।। सा चिन्तये सदा पुत्र ब्राह्मणस्यास्य किं न्वहम् । प्रियं कुर्यामिति गृहे यत् कुर्युरुषिताः सुखम् ।। १३ ।। 'इसलिये पुत्र ! मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि इस ब्राह्मणका मैं कौन-सा प्रिय कार्य करूँ, जिसे किसीके घरमें सुखपूर्वक रहनेवाले लोग किया करते हैं ।। १३ ।। एतावान् पुरुषस्तात कृतं यस्मिन् न नश्यति । यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्यादभ्यधिकं ततः ।। १४ ।। 'तात! जिसके प्रति किया हुआ उपकार उसका बदला चुकाये बिना नष्ट नहीं होता, वही पुरुष है (और इतना ही उसका पौरुष- मानवता है कि) दूसरा मनुष्य उसके प्रति जितना उपकार करे, वह उससे भी अधिक उस मनुष्य का प्रत्युपकार कर दे ।। १४ ।। तदिदं ब्राह्मणस्यास्य दुःखमापतितं ध्रुवम्। तत्रास्य यदि साहाय्यं कुर्यामुपकृतं भवेत् ।। १५ ।। 'इस समय निश्चय ही इस ब्राह्मणपर कोई भारी दुःख आ पड़ा है। यदि उसमें मैं इसकी सहायता करूँ तो वास्तविक उपकार हो सकता है' ।। १५ ।। भीमसेन उवाच ज्ञायतामस्य यद् दुःखं यतश्चैव समुत्थितम् । विदित्वा व्यवसिष्यामि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ।। १६ ।। भीमसेन बोले- माँ ! पहले यह मालूम करो कि इस ब्राह्मणको क्या दुःख है और वह किस कारणसे प्राप्त हुआ है। जान लेनेपर अत्यन्त दुष्कर होगा, तो भी मैं इसका कष्ट दूर करने के लिये उद्योग करूँगा ।। १६ ।। वैशम्पायन उवाच एवं तौ कथयन्तौ च भूयः शुश्रुवतुः स्वनम् । आर्तिजं तस्य विप्रस्य सभार्यस्य विशाम्पते ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! वे माँ-बेटे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि पुनः पत्नी सहित ब्राह्मण का आर्तनाद उनके कानों में पड़ा ।। १७ ।। अन्तःपुरं ततस्तस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः। विवेश त्वरिता कुन्ती बद्धवत्सेव सौरभी ।। १८ ।। तब कुन्तीदेवी तुरंत ही उस महात्मा ब्राह्मणके अन्तः पुरमें घुस गयीं ठीक उसी तरह जैसे घरके भीतर बँधे हुए बछड़ेवाली गाय स्वयं ही उसके पास पहुँच जाती है ।। १८ ।। ततस्तं ब्राह्मणं तत्र भार्यया च सुतेन च । दुहित्रा चैव सहितं ददर्शावनताननम् ।। १९ ।। भीतर जाकर कुन्तीने ब्राह्मणको वहाँ पत्नी, पुत्र और कन्याके साथ नीचे मुँह किये बैठे देखा ।। १९ ।। ब्राह्मण उवाच धिगिदं जीवितं लोके गतसारमनर्थकम् । दुःखमूलं पराधीनं भृशमप्रियभागि च ।। २० ।। ब्राह्मणदेवता कह रहे थे- जगत्के इस जीवनको धिक्कार है; क्योंकि यह सारहीन, निरर्थक, दुःखकी जड़, पराधीन और अत्यन्त अप्रियका भागी है ।। २० ।। जीविते परमं दुःखं जीविते परमो ज्वरः । जीविते वर्तमानस्य दुःखानामागमो ध्रुवः ।। २१ ।। जीनेमें महान् दुःख है। जीवनकालमें बड़ी भारी चिन्ताका सामना करना पड़ता है। जिसने जीवन धारण कर रखा है, उसे दुःखोंकी प्राप्ति अवश्य होती है ।। २१ ।। आत्मा होको हि धर्मार्थी कामं चैव निषेवते । एतैश्च विप्रयोगोऽपि दुःखं परमनन्तकम् ।। २२ ।। जीवात्मा अकेला ही धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है। इनका वियोग होना भी उसके लिये महान् और अनन्त दुःखका कारण होता है ।। २२ ।। आहुः केचित् परं मोक्षं स च नास्ति कथंचन । अर्थप्राप्तौ तु नरकः कृत्स्न एवोपपद्यते ।। २३ ।। कुछ लोग चारों पुरुषार्थोंमें मोक्षको ही सर्वोत्तम बतलाते हैं, किंतु वह भी मेरे लिये किसी प्रकार सुलभ नहीं है। अर्थकी प्राप्ति होनेपर तो नरकका सम्पूर्ण दुःख भोगना ही पड़ता है ।। २३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️617
- sn vyas#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्गार...(दिन 456) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जनमेजय उवाच एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । अत ऊर्ध्वं द्विजश्रेष्ठ किमकुर्वत पाण्डवाः ।। १ ।। जनमेजय ने पूछा- द्विजश्रेष्ठ! कुन्तीके महारथी पुत्र पाण्डव जब एकचक्रा नगरीमें पहुँच गये, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ।। १ ।। वैशम्पायन उवाच एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । ऊषुर्नातिचिरं कालं ब्राह्मणस्य निवेशने ।। २ ।। वैशम्पायनजीने कहा- राजन् ! एकचक्रा नगरीमें जाकर महारथी कुन्तीपुत्र थोड़े दिनोंतक एक ब्राह्मणके घरमें रहे ।। २ ।। रमणीयानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च । पार्थिवानपि चोद्देशान् सरितश्च सरांसि च ।। ३ ।। चेरुर्भेक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते । बभूवुर्नागराणां च स्वैर्गुणैः प्रियदर्शनाः ।। ४ ।। जनमेजय ! उस समय वे सभी पाण्डव भाँति-भाँतिके रमणीय वनों, सुन्दर भूभागों, सरिताओं और सरोवरोंका दर्शन करते हुए भिक्षाके द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। अपने उत्तम गुणों के कारण वे सभी नागरिकों के प्रीति-पात्र हो गये थे ।। ३-४ ।। (दर्शनीया द्विजाः शुद्धा देवगर्भोपमाः शुभाः । भैक्षानर्हाश्च राज्यार्हाः सुकुमारास्तपस्विनः ।। सर्वलक्षणसम्पन्ना भैक्षं नार्हन्ति नित्यशः । कार्यार्थिनश्चरन्तीति तर्कयन्त इति ब्रुवन् ।। बन्धूनामागमान्नित्यमुपचिन्त्य तु नागराः । भाजनानि च पूर्णानि भक्ष्यभोज्यैरकारयन् ।। मौनव्रतेन संयुक्ता भैक्षं गृह्णन्ति पाण्डवाः । माता चिरगतान् दृष्ट्वा शोचन्तीति च पाण्डवाः । त्वरमाणा निवर्तन्ते मातृगौरवयन्त्रिताः ।।) उन्हें देखकर नगरनिवासी आपसमें तर्क-वितर्क करते हुए इस प्रकारकी बातें करते थे - 'ये ब्राह्मणलोग तो देखने ही योग्य हैं। इनके आचार-विचार शुद्ध एवं सुन्दर हैं। इनकी आकृति देवकुमारोंके समान जान पड़ती है। ये भीख माँगनेयोग्य नहीं, राज्य करनेके योग्य हैं। सुकुमार होते हुए भी तपस्यामें लगे हैं। इनमें सब प्रकारके शुभ लक्षण शोभा पाते हैं। ये कदापि भिक्षा ग्रहण करनेयोग्य नहीं हैं। शायद किसी कार्यवश भिक्षुकोंके वेशमें विचर रहे हैं।' वे नागरिक पाण्डवोंके आगमनको अपने बन्धुजनोंका ही आगमन मानकर उनके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भरे हुए पात्र तैयार रखते थे और मौनव्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उनसे वह भिक्षा ग्रहण करते थे। हमें आये हुए बहुत देर हो गयी, इसलिये माताजी चिन्तामें पड़ी होंगी-यह सोचकर माताके गौरव-पाशमें बँधे हुए पाण्डव बड़ी उतावलीके साथ उनके पास लौट आते थे। निवेदयन्ति स्म तदा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि । तया विभक्तान् भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक् पृथक् ।। ५ ।। प्रतिदिन रात्रिके आरम्भमें भिक्षा लाकर वे माता कुन्तीको सौंप देते और वे बाँटकर जिसके लिये जितना हिस्सा देतीं, उतना ही पृथक् पृथक् लेकर पाण्डवलोग भोजन करते थे ।। ५ ।। अर्ध ते भुञ्जते वीराः सह मात्रा परंतपाः । अर्ध सर्वस्य भैक्षस्य भीमो भुङ्क्ते महाबलः ।। ६ ।। वे चारों वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आधी भिक्षाका उपयोग करते थे और सम्पूर्ण भिक्षाका आधा भाग अकेले महाबली भीमसेन खाते थे ।। ६ ।। तथा तु तेषां वसतां तस्मिन् राष्ट्र महात्मनाम् । अतिचक्राम सुमहान् कालोऽथ भरतर्षभ ।। ७ ।। भरतवंशशिरोमणे ! इस प्रकार उस राष्ट्रमें निवास करते हुए महात्मा पाण्डवोंका बहुत समय बीत गया ।। ७ ।। ततः कदाचित् भैक्षाय गतास्ते पुरुषर्षभाः । संगत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथया सह ।। ८ ।। तदनन्तर एक दिन नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि चार भाई भिक्षाके लिये गये; किंतु भीमसेन किसी कार्यविशेषके सम्बन्धसे कुन्तीके साथ वहाँ घरपर ही रह गये थे ।। ८ ।। अथार्तिजं महाशब्दं ब्राह्मणस्य निवेशने । भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत ।। ९ ।। भारत! उस दिन ब्राह्मणके घरमें सहसा बड़े जोरका भयानक आर्तनाद होने लगा, जिसे कुन्तीने सुना ।। ९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️515