sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(बकवधपर्व)
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्गार...(दिन 456)
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जनमेजय उवाच
एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । अत ऊर्ध्वं द्विजश्रेष्ठ किमकुर्वत पाण्डवाः ।। १ ।।
जनमेजय ने पूछा- द्विजश्रेष्ठ! कुन्तीके महारथी पुत्र पाण्डव जब एकचक्रा नगरीमें पहुँच गये, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ।। १ ।।
वैशम्पायन उवाच
एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः । ऊषुर्नातिचिरं कालं ब्राह्मणस्य निवेशने ।। २ ।।
वैशम्पायनजीने कहा- राजन् ! एकचक्रा नगरीमें जाकर महारथी कुन्तीपुत्र थोड़े दिनोंतक एक ब्राह्मणके घरमें रहे ।। २ ।।
रमणीयानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च । पार्थिवानपि चोद्देशान् सरितश्च सरांसि च ।। ३ ।।
चेरुर्भेक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते । बभूवुर्नागराणां च स्वैर्गुणैः प्रियदर्शनाः ।। ४ ।।
जनमेजय ! उस समय वे सभी पाण्डव भाँति-भाँतिके रमणीय वनों, सुन्दर भूभागों, सरिताओं और सरोवरोंका दर्शन करते हुए भिक्षाके द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। अपने उत्तम गुणों के कारण वे सभी नागरिकों के प्रीति-पात्र हो गये थे ।। ३-४ ।।
(दर्शनीया द्विजाः शुद्धा देवगर्भोपमाः शुभाः । भैक्षानर्हाश्च राज्यार्हाः सुकुमारास्तपस्विनः ।। सर्वलक्षणसम्पन्ना भैक्षं नार्हन्ति नित्यशः । कार्यार्थिनश्चरन्तीति तर्कयन्त इति ब्रुवन् ।। बन्धूनामागमान्नित्यमुपचिन्त्य तु नागराः । भाजनानि च पूर्णानि भक्ष्यभोज्यैरकारयन् ।।
मौनव्रतेन संयुक्ता भैक्षं गृह्णन्ति पाण्डवाः । माता चिरगतान् दृष्ट्वा शोचन्तीति च पाण्डवाः । त्वरमाणा निवर्तन्ते मातृगौरवयन्त्रिताः ।।)
उन्हें देखकर नगरनिवासी आपसमें तर्क-वितर्क करते हुए इस प्रकारकी बातें करते थे - 'ये ब्राह्मणलोग तो देखने ही योग्य हैं। इनके आचार-विचार शुद्ध एवं सुन्दर हैं। इनकी आकृति देवकुमारोंके समान जान पड़ती है। ये भीख माँगनेयोग्य नहीं, राज्य करनेके योग्य हैं। सुकुमार होते हुए भी तपस्यामें लगे हैं। इनमें सब प्रकारके शुभ लक्षण शोभा पाते हैं। ये कदापि भिक्षा ग्रहण करनेयोग्य नहीं हैं। शायद किसी कार्यवश भिक्षुकोंके वेशमें विचर रहे हैं।' वे नागरिक पाण्डवोंके आगमनको अपने बन्धुजनोंका ही आगमन मानकर उनके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भरे हुए पात्र तैयार रखते थे और मौनव्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उनसे वह भिक्षा ग्रहण करते थे। हमें आये हुए बहुत देर हो गयी, इसलिये माताजी चिन्तामें पड़ी होंगी-यह सोचकर माताके गौरव-पाशमें बँधे हुए पाण्डव बड़ी उतावलीके साथ उनके पास लौट आते थे।
निवेदयन्ति स्म तदा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि ।
तया विभक्तान् भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक् पृथक् ।। ५ ।।
प्रतिदिन रात्रिके आरम्भमें भिक्षा लाकर वे माता कुन्तीको सौंप देते और वे बाँटकर जिसके लिये जितना हिस्सा देतीं, उतना ही पृथक् पृथक् लेकर पाण्डवलोग भोजन करते थे ।। ५ ।।
अर्ध ते भुञ्जते वीराः सह मात्रा परंतपाः । अर्ध सर्वस्य भैक्षस्य भीमो भुङ्क्ते महाबलः ।। ६ ।।
वे चारों वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आधी भिक्षाका उपयोग करते थे और सम्पूर्ण भिक्षाका आधा भाग अकेले महाबली भीमसेन खाते थे ।। ६ ।।
तथा तु तेषां वसतां तस्मिन् राष्ट्र महात्मनाम् ।
अतिचक्राम सुमहान् कालोऽथ भरतर्षभ ।। ७ ।।
भरतवंशशिरोमणे ! इस प्रकार उस राष्ट्रमें निवास करते हुए महात्मा पाण्डवोंका बहुत समय बीत गया ।। ७ ।।
ततः कदाचित् भैक्षाय गतास्ते पुरुषर्षभाः । संगत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथया सह ।। ८ ।।
तदनन्तर एक दिन नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि चार भाई भिक्षाके लिये गये; किंतु भीमसेन किसी कार्यविशेषके सम्बन्धसे कुन्तीके साथ वहाँ घरपर ही रह गये थे ।। ८ ।।
अथार्तिजं महाशब्दं ब्राह्मणस्य निवेशने ।
भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत ।। ९ ।।
भारत! उस दिन ब्राह्मणके घरमें सहसा बड़े जोरका भयानक आर्तनाद होने लगा, जिसे कुन्तीने सुना ।। ९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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