sn vyas
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#महाभारत की कथा
द्वापर युग का समय था। भारतवर्ष अनेक शक्तिशाली राज्यों में विभाजित था। कहीं धर्म का शासन था तो कहीं अहंकार और सत्ता की लालसा राज कर रही थी। उसी समय विदर्भ नाम का एक समृद्ध और वैभवशाली राज्य था, जिसके राजा थे धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय भीष्मक। प्रजा उन्हें पिता के समान मानती थी। उनके महल में किसी वस्तु का अभाव नहीं था, परंतु उनके जीवन का सबसे बड़ा गर्व उनकी पुत्री रुक्मणी थीं। रुक्मणी केवल अद्वितीय सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ही नहीं थीं, बल्कि ज्ञान, विनम्रता, करुणा और धर्म पालन में भी अनुपम थीं। जो भी उन्हें देखता, यही कहता कि मानो स्वयं देवी लक्ष्मी ने मानव रूप धारण कर लिया हो। उनके स्वयंवर की चर्चा पूरे आर्यावर्त में होने लगी थी। दूर-दूर के राजा, महारथी और राजकुमार उन्हें अपनी रानी बनाने का स्वप्न देख रहे थे। लेकिन किसी को यह ज्ञात नहीं था कि रुक्मणी का हृदय पहले ही किसी और को समर्पित हो चुका था।
रुक्मणी ने कभी श्रीकृष्ण को देखा नहीं था। फिर भी उनका मन उन्हीं में बस चुका था। इसका कारण था भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों का श्रवण। जब-जब कोई ऋषि, ब्राह्मण, यात्री या साधु विदर्भ आता, वह मथुरा और द्वारका के उस अद्भुत पुरुष की कथाएं सुनाता जिसने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया, जिसने असंख्य असुरों का संहार किया, जिसने धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और जो अपने भक्तों पर असीम कृपा बरसाते थे। रुक्मणी बड़े ध्यान से उन कथाओं को सुनतीं। धीरे-धीरे उनके मन में श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा जागी, श्रद्धा भक्ति में बदली और भक्ति प्रेम में परिवर्तित हो गई। उन्होंने मन ही मन संकल्प कर लिया कि यदि विवाह करेंगी तो केवल श्रीकृष्ण से, अन्यथा जीवन भर अविवाहित रहेंगी। उनके लिए कृष्ण केवल एक वीर राजा नहीं थे, वे उनके आराध्य, उनके स्वामी और उनके प्राणों के आधार बन चुके थे।
राजा भीष्मक अपनी पुत्री के मन को समझते थे। वे स्वयं भी श्रीकृष्ण के गुणों से परिचित थे और चाहते थे कि रुक्मणी का विवाह उन्हीं से हो। लेकिन राजमहल में एक और शक्ति थी जो इस निर्णय के विरुद्ध खड़ी थी। वह था रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी। रुक्मी अत्यंत महत्वाकांक्षी और अहंकारी था। उसे श्रीकृष्ण से गहरा वैर था। वह चाहता था कि विदर्भ का संबंध उन राजाओं से बने जो कृष्ण के विरोधी थे। इसलिए उसने अपनी बहन का विवाह चेदी नरेश शिशुपाल से करने का निर्णय लिया। शिशुपाल स्वयं भी अहंकारी और अत्याचारी था, परंतु उसकी मित्रता मगध सम्राट जरासंध और अन्य शक्तिशाली राजाओं से थी। रुक्मी को यही राजनीतिक गठबंधन अधिक लाभदायक लगा। जब रुक्मणी को इस निर्णय का पता चला तो उनका हृदय व्याकुल हो उठा। उनके सामने एक ओर परिवार की आज्ञा थी और दूसरी ओर उनके आराध्य श्रीकृष्ण।
अंततः रुक्मणी ने वह साहसिक निर्णय लिया जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने अपने विश्वासपात्र ब्राह्मण को बुलाया और उसके हाथों श्रीकृष्ण के लिए एक गुप्त संदेश भेजा। वह पत्र किसी साधारण राजकुमारी का प्रेम-पत्र नहीं था, बल्कि एक भक्त की अपने भगवान से अंतिम पुकार थी। उसमें उन्होंने लिखा कि उन्होंने अपने मन, वचन और कर्म से श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार कर लिया है। यदि भगवान उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे तो वे किसी अन्य पुरुष से विवाह नहीं करेंगी। उन्होंने यह भी लिखा कि विवाह से एक दिन पूर्व वे देवी अंबिका के मंदिर में पूजा करने जाएंगी। यदि श्रीकृष्ण उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते हैं, तो वहीं से उन्हें अपने साथ ले जाएं। अन्यथा वे अपने प्राण त्याग देंगी। पत्र के प्रत्येक शब्द में भक्ति, विश्वास और समर्पण की गहराई झलक रही थी।
विश्वासपात्र ब्राह्मण कठिन यात्राएं पार करता हुआ अंततः द्वारका पहुंचा। जब उसने श्रीकृष्ण को रुक्मणी का संदेश सुनाया तो भगवान मुस्कुरा उठे। वे समझ गए कि यह केवल एक कन्या का प्रेम नहीं, बल्कि देवी लक्ष्मी का अपने नारायण को स्मरण है। उन्होंने ब्राह्मण का अत्यंत सम्मान किया और बिना विलंब किए विदर्भ जाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपना दिव्य रथ तैयार कराया और सारथि दारुक के साथ तीव्र गति से विदर्भ की ओर प्रस्थान किया। दूसरी ओर विदर्भ में विवाह की तैयारियां अपने चरम पर थीं। शिशुपाल अपने वैभव और सेना के साथ पहुंच चुका था। उसके साथ मगध सम्राट जरासंध, शाल्व, दंतवक्र तथा अनेक शक्तिशाली राजा भी उपस्थित थे। पूरा नगर सैनिकों से घिरा हुआ था। ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी युद्ध की तैयारी हो रही हो।
विवाह से एक दिन पूर्व रुक्मणी देवी अंबिका के मंदिर पहुंचीं। उन्होंने देवी के चरणों में गिरकर प्रार्थना की, "हे जगदंबा! यदि मेरा प्रेम पवित्र है, यदि मेरी भक्ति सच्ची है, तो आज मेरे आराध्य अवश्य आएंगे।" पूजा समाप्त कर वे मंदिर से बाहर निकलीं। तभी दूर से धूल का विशाल गुबार उठा। देखते ही देखते एक दिव्य रथ बिजली की गति से मंदिर की ओर बढ़ता दिखाई दिया। रथ पर स्वयं श्रीकृष्ण विराजमान थे। उनका तेज देखकर लोग स्तब्ध रह गए। श्रीकृष्ण बिना किसी भय के सीधे रुक्मणी के समीप पहुंचे। उन्होंने प्रेमपूर्वक उनका हाथ थामा और उन्हें रथ पर बैठा लिया। यह सब इतनी शीघ्रता से हुआ कि सैनिक और राजा कुछ समझ ही नहीं पाए। रुक्मणी ने तनिक भी विरोध नहीं किया, क्योंकि यह अपहरण नहीं था। यह उनकी प्रार्थना का उत्तर था, उनके जीवन का सबसे पवित्र क्षण था।
जब शिशुपाल और अन्य राजाओं को इस घटना का समाचार मिला तो पूरा विदर्भ रणभूमि में बदल गया। शिशुपाल क्रोध से कांप उठा। जरासंध ने तुरंत अपनी सेना को आदेश दिया कि कृष्ण का पीछा किया जाए। हजारों रथ, हाथी, घोड़े और सैनिक श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ पड़े। कुछ ही समय में भयंकर युद्ध आरंभ हो गया। तभी श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम भी अपनी विशाल सेना लेकर वहां पहुंच गए। बलराम ने अपनी हल और गदा से अनेक महारथियों को परास्त कर दिया। श्रीकृष्ण ने भी युद्धभूमि में ऐसा पराक्रम दिखाया कि बड़े-बड़े योद्धा उनके सामने टिक न सके। जरासंध और उसके सहयोगियों को पीछे हटना पड़ा। लेकिन युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था।
रुक्मी ने प्रतिज्ञा की थी कि यदि वह कृष्ण को पराजित किए बिना लौट आया तो कभी विदर्भ वापस नहीं जाएगा। वह अकेला ही अपनी सेना लेकर श्रीकृष्ण के पीछे निकल पड़ा। कुछ दूर जाकर उसने कृष्ण के रथ को रोक लिया और युद्ध की चुनौती दी। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। रुक्मी ने अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के सामने उसका पराक्रम टिक न सका। कुछ ही समय में उसका धनुष टूट गया, रथ नष्ट हो गया और वह भूमि पर गिर पड़ा। श्रीकृष्ण उसे दंड देने के लिए तैयार हुए। तभी रुक्मणी रथ से उतरकर भगवान के चरणों में गिर पड़ीं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु! यह मेरा बड़ा भाई है। इसके अपराध बड़े हैं, लेकिन कृपा करके इसके प्राण मत लीजिए।" भगवान ने रुक्मणी की करुणा का सम्मान किया। उन्होंने रुक्मी का वध नहीं किया, किंतु उसके अभिमान को तोड़ने के लिए उसका अपमान अवश्य किया। रुक्मी लज्जा से विदर्भ लौटने का साहस न कर सका और उसने एक नया नगर बसाकर वहीं जीवन व्यतीत किया।
श्रीकृष्ण रुक्मणी को लेकर द्वारका पहुंचे। वहां वैदिक मंत्रों और शुभ मुहूर्त में दोनों का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। देवताओं ने पुष्पवर्षा की। ऋषियों ने आशीर्वाद दिया और पूरी द्वारका उत्सव में डूब गई। यह केवल एक राजा और राजकुमारी का विवाह नहीं था। यह स्वयं लक्ष्मी और नारायण का पुनर्मिलन था। इसी कारण इस विवाह को दिव्य और सनातन प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
विवाह के बाद रुक्मणी द्वारका की प्रमुख महारानी बनीं। उन्होंने सदैव विनम्रता, सेवा और धर्म का पालन किया। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम इतना निष्कलंक था कि वे उनके बिना एक क्षण भी स्वयं को पूर्ण नहीं मानती थीं। एक बार श्रीकृष्ण ने परिहास करते हुए कहा कि रुक्मणी ने उनसे विवाह करके भूल कर दी है। यह सुनते ही रुक्मणी का हृदय टूट गया और वे मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें उठाकर समझाया कि यह केवल हास्य था। इस घटना से संसार को यह ज्ञात हुआ कि रुक्मणी का प्रेम किसी सांसारिक आकर्षण पर नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और निष्काम भक्ति पर आधारित था।
आज भी गुजरात की पवित्र नगरी द्वारका में स्थित रुक्मणी देवी मंदिर इस दिव्य कथा की स्मृति को जीवित रखे हुए है। लाखों श्रद्धालु वहां जाकर भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मणी के चरणों में प्रणाम करते हैं। यह कथा केवल एक राजकुमारी के विवाह की नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास की है जिसमें एक भक्त अपने भगवान को बिना देखे भी अपना सर्वस्व मान लेता है। यह कथा सिखाती है कि जब भक्ति सच्ची हो, संकल्प अडिग हो और हृदय निर्मल हो, तब स्वयं भगवान अपने भक्त की रक्षा के लिए समस्त संसार को चुनौती देने में भी संकोच नहीं करते। प्रेम और भक्ति की यही शक्ति रुक्मणी हरण की इस अमर कथा को सनातन इतिहास में सदैव अमर बनाए रखती है। जय श्रीकृष्ण। जय माता रुक्मणी।
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