sn vyas
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#महाभारत की कथा
महाभारत का महान युद्ध समाप्त हो चुका था। धर्म की स्थापना हो गई थी और अधर्म का अंत हो चुका था। कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र अब शांत था, लेकिन उस युद्ध की स्मृतियाँ अभी भी अर्जुन के मन में जीवित थीं। उन्होंने अपने जीवन में अनेक चमत्कार देखे थे। भगवान श्रीकृष्ण का सखा होने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त था। उन्होंने युद्ध के मध्य भगवान का विराट विश्वरूप भी देखा था, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ था। फिर भी उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था। क्या वास्तव में भगवान के सभी स्वरूपों को कोई जान सकता है? क्या उनकी लीलाएँ और रूप केवल उतने ही हैं, जितने मनुष्य देख पाता है? अर्जुन जितना भगवान के निकट आते गए, उतना ही उन्हें यह अनुभव होने लगा कि श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप अनंत, असीम और मानव बुद्धि से परे है।
एक दिन अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ एक शांत वन में बैठे थे। वातावरण अत्यंत पवित्र था। मंद-मंद वायु बह रही थी, पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई दे रहा था और चारों ओर प्रकृति की अद्भुत छटा फैली हुई थी। अर्जुन भगवान के चरणों में बैठे थे। कुछ देर मौन रहने के बाद उन्होंने विनम्र भाव से कहा, "हे माधव! मैंने आपका विराट स्वरूप देखा, आपकी अनगिनत लीलाएँ देखीं, फिर भी मेरे मन में ऐसा लगता है कि मैं आपको पूर्ण रूप से कभी जान ही नहीं पाया। आपकी महिमा अनंत है। यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे अपने किसी ऐसे दिव्य रहस्य का दर्शन कराइए, जिसे आज तक किसी ने न देखा हो।"
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने अर्जुन की ओर प्रेम से देखा। वे जानते थे कि यह प्रश्न अहंकार से नहीं, बल्कि सच्ची जिज्ञासा और भक्ति से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने कहा, "पार्थ, परमात्मा को किसी एक रूप में बाँधा नहीं जा सकता। मैं केवल मनुष्य नहीं हूँ, केवल देवता नहीं हूँ, केवल विराट ब्रह्मांड भी नहीं हूँ। मैं समस्त सृष्टि में विद्यमान हूँ। यदि तुम्हारा मन वास्तव में इस सत्य को समझने के लिए तैयार है, तो आज मैं तुम्हें अपना एक अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमय स्वरूप दिखाऊँगा।"
इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया प्रकट की। अचानक वातावरण बदलने लगा। चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। वृक्ष स्थिर हो गए, वायु रुक गई और समय मानो थम गया। अर्जुन ने देखा कि भगवान का सामान्य मानवीय स्वरूप धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगा। उनके सामने जो दिव्य रूप प्रकट हुआ, उसे देखकर अर्जुन आश्चर्य से स्तब्ध रह गए। उन्होंने ऐसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा था।
भगवान का यह अद्भुत स्वरूप नवगुंजर कहलाया। यह किसी एक प्राणी का शरीर नहीं था, बल्कि नौ विभिन्न जीवों के दिव्य अंगों से निर्मित था। उनके मुख पर मुर्गे का सिर था, जो जागरूकता और सतर्कता का प्रतीक था। उनकी गर्दन मोर की थी, जो सौंदर्य, दिव्यता और आनंद का प्रतीक मानी जाती है। उनके शरीर पर बैल का कूबड़ था, जो धैर्य, परिश्रम और धर्म का प्रतिनिधित्व करता था। उनकी कमर सिंह की थी, जो वीरता और निर्भीकता का प्रतीक थी। उनके तीन पैर हाथी के थे, जो स्थिरता, बुद्धिमत्ता और अपार शक्ति को दर्शाते थे। चौथा पैर बाघ का था, जो साहस, गति और संकल्प का प्रतीक था। उनकी पूँछ सर्प की भाँति लहराती थी, जो समय, ऊर्जा और अनंत शक्ति का संकेत देती थी। उनके शरीर में अन्य पशु-पक्षियों के दिव्य अंग भी समाहित थे, जो समस्त जीवों की एकता का प्रतीक थे। उनके एक हाथ में पूर्ण विकसित कमल का पुष्प सुशोभित था, जो पवित्रता, ज्ञान और परम चेतना का प्रतीक था।
अर्जुन कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाए कि उनके सामने कौन खड़ा है। यह कोई देवता था, कोई दिव्य प्राणी था या स्वयं प्रकृति का अद्भुत रूप? उनके हाथ अनायास ही गांडीव पर चले गए, किंतु अगले ही क्षण उनकी दृष्टि भगवान के हाथ में धारण किए हुए कमल पर पड़ी। उसी क्षण उनके हृदय में दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उन्होंने उस रूप से वही करुणा, वही प्रेम और वही अनंत तेज अनुभव किया, जो सदैव भगवान श्रीकृष्ण से अनुभव होता था। अर्जुन तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण रूप नहीं, बल्कि स्वयं उनके प्रिय सखा श्रीकृष्ण का एक अत्यंत रहस्यमय दिव्य स्वरूप है।
अर्जुन ने तुरंत अपना गांडीव नीचे रख दिया। वे दोनों हाथ जोड़कर भगवान के चरणों में झुक गए। उनकी आँखों से भक्ति के आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा, "हे प्रभु! मैं वास्तव में आपको कभी जान ही नहीं पाया। आप किसी एक रूप में सीमित नहीं हैं। आपकी महिमा तो अनंत है।"
भगवान श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में कहा, "पार्थ, यही इस रूप का रहस्य है। मनुष्य प्रायः यह सोचता है कि ईश्वर केवल किसी एक मूर्ति, एक शरीर, एक जाति या एक रूप में विद्यमान हैं। परंतु सत्य इससे कहीं अधिक व्यापक है। इस सृष्टि का प्रत्येक जीव, प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक नदी और प्रत्येक जीवन मेरे ही अस्तित्व का अंश है। जो सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखता है, वही वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है। नवगुंजर का यह स्वरूप इसी सत्य का प्रतीक है कि संपूर्ण सृष्टि अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति है।"
भगवान आगे बोले, "मुर्गे की जागरूकता, मोर की सुंदरता, सिंह का साहस, हाथी की बुद्धि, बैल का धैर्य, बाघ की शक्ति, सर्प की ऊर्जा और अन्य सभी जीवों के गुण एक ही परम सत्य में समाहित हैं। जब तक मनुष्य भेदभाव देखता है, तब तक वह मुझे पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। जब वह प्रत्येक जीव में उसी दिव्य चेतना का दर्शन करता है, तभी वह मेरे वास्तविक स्वरूप को समझ पाता है।"
अर्जुन का हृदय आनंद और विनम्रता से भर गया। उन्होंने अनुभव किया कि भगवान वास्तव में समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं। उन्होंने भगवान के उस दिव्य नवगुंजर स्वरूप की स्तुति की और पूर्ण समर्पण के साथ कहा, "हे प्रभु! अब मैं समझ गया हूँ कि आपका स्वरूप किसी सीमा में बँधा हुआ नहीं है। आप ही समस्त प्राणियों में, समस्त जगत में और प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं।"
कुछ ही क्षणों बाद वह रहस्यमय स्वरूप धीरे-धीरे विलीन होने लगा। भगवान पुनः अपने मधुर मानवीय स्वरूप में प्रकट हुए। वन का वातावरण फिर सामान्य हो गया, पक्षियों का कलरव लौट आया और समय अपनी गति से चलने लगा। किंतु अर्जुन का जीवन अब पहले जैसा नहीं रहा। उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हो चुका था, जो केवल भगवान की विशेष कृपा से ही संभव था।
समय बीतता गया। युग बदल गए। किंतु इस अद्भुत नवगुंजर स्वरूप की स्मृति विशेष रूप से ओडिशा की धार्मिक परंपराओं में जीवित रही। ओड़िया साहित्य के महान कवि सरला दास द्वारा रचित सरला महाभारत में इस दिव्य प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। वहाँ नवगुंजर को भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति, समस्त जीवों की एकता और परम चेतना के प्रतीक के रूप में बताया गया है।
ओडिशा की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ भी उसी अनंत और सर्वव्यापक परम तत्व के प्रतीक हैं। इसी कारण अनेक विद्वान और भक्त भगवान जगन्नाथ की परंपरा में नवगुंजर की भावना को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। विशेष रूप से श्रीजगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित पवित्र नीलचक्र को भगवान की अनंत, रहस्यमयी और सर्वव्यापक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अनेक श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि जैसे नवगुंजर रूप समस्त सृष्टि की एकता का संदेश देता है, वैसे ही भगवान जगन्नाथ भी किसी एक जाति, धर्म, वर्ग या समुदाय के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और समस्त जीव-जगत के भगवान हैं।
नवगुंजर की यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि परमात्मा को केवल मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक जीवन और संपूर्ण सृष्टि में समान रूप से विद्यमान हैं। जो व्यक्ति हर जीव में ईश्वर का दर्शन करता है, सभी के प्रति करुणा, प्रेम और सम्मान रखता है, वही वास्तविक भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण के रहस्यमय नवगुंजर स्वरूप का सबसे गहरा और सनातन संदेश है।
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