sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣8️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(चैत्ररथपर्व)
एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवों की पंचाल यात्रा और अर्जुन के द्वारा चित्ररथ गन्धर्व की पराजय एवं उन दोनों की मित्रता...(दिन 480)
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अर्जुन उवाच
बिभीषिका वै गन्धर्व नास्त्रज्ञेषु प्रयुज्यते । अस्त्रज्ञेषु प्रयुक्तेयं फेनवत् प्रविलीयते ।। २७ ।।
अर्जुनने कहा-गन्धर्व! जो अस्त्र-विद्याके विद्वान् हैं, उनपर तुम्हारी यह घुड़की नहीं चल सकती। अस्त्र-विद्याके मर्मज्ञोंपर फैलायी हुई तुम्हारी यह माया फेनकी तरह विलीन हो जायगी ।। २७ ।।
मानुषानतिगन्धर्वान् सर्वान् गन्धर्व लक्षये । तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं न तु मायया ।। २८ ।।
गन्धर्व! मैं जानता हूँ कि सम्पूर्ण गन्धर्व मनुष्योंसे अधिक शक्तिशाली होते हैं, इसलिये मैं तुम्हारे साथ मायासे नहीं, दिव्यास्त्रसे युद्ध करूँगा ।। २८ ।।
पुरास्त्रमिदमाग्नेयं प्रादात् किल बृहस्पतिः । भरद्वाजाय गन्धर्व गुरुर्मान्यः शतक्रतोः ।। २९ ।।
गन्धर्व ! यह आग्नेय अस्त्र पूर्वकालमें इन्द्रके माननीय गुरु बृहस्पतिजीने भरद्वाज मुनिको दिया था ।। २९ ।।
भरद्वाजादग्निवेश्य अग्निवेश्याद् गुरुर्मम । साध्विदं मह्यमददद् द्रोणो ब्राह्मणसत्तमः ।। ३० ।।
भरद्वाजसे इसे अग्निवेश्यने और अग्निवेश्यसे मेरे गुरु द्रोणाचार्यने प्राप्त किया है। फिर विप्रवर द्रोणाचार्यने यह उत्तम अस्त्र मुझे प्रदान किया ।। ३० ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह । प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत् ।। ३१ ।।
विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महाबलः । अस्त्रतेजः प्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम् ।। ३२ ।।
शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनंजयः । भ्रातॄन् प्रति चकर्षाथ सोऽस्त्रपातादचेतसम् ।। ३३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो गन्धर्वपर वह प्रज्वलित आग्नेय अस्त्र चला दिया। उस अस्त्रने गन्धर्वके रथको जलाकर भस्म कर दिया। वह रथहीन गन्धर्व व्याकुल हो गया और अस्त्रके तेजसे मूढ होकर नीचे मुँह किये गिरने लगा। महाबली अर्जुनने उसके फूलकी मालाओंसे सुशोभित केश पकड़ लिये और घसीटकर अपने भाइयोंके पास ले आये। अस्त्रके आघातसे वह गन्धर्व अचेत हो गया था ।। ३१-३३ ।।
युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी । नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती ।। ३४ ।।
उस गन्धर्व की पत्नी का नाम कुम्भीनसी था। उसने अपने पतिके जीवनकी रक्षाके लिये महाराज युधिष्ठिरकी शरण ली ।। ३४ ।।
गन्धर्युवाच
त्रायस्व मां महाभाग पतिं चेमं विमुञ्च मे । गन्धर्वी शरणं प्राप्ता नाम्ना कुम्भीनसी प्रभो ।। ३५ ।।
गन्धर्वी बोली-महाभाग ! मेरी रक्षा कीजिये और मेरे इन पतिदेवको आप छोड़ दीजिये। प्रभो! मैं गन्धर्वपत्नी कुम्भीनसी आपकी शरणमें आयी हूँ ।। ३५ ।।
युधिष्ठिर उवाच
युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् । को निहन्याद् रिपुं तात मुञ्चेमं रिपुसूदन ।। ३६ ।।
युधिष्ठिरने कहा-तात ! शत्रुसूदन अर्जुन ! यह गन्धर्व युद्धमें हार गया और अपना यश खो चुका। अब स्त्री इसकी रक्षिका बनकर आयी है। यह स्वयं कोई पराक्रम नहीं कर सकता। ऐसे दीन-हीन शत्रुको कौन मारता है? इसे जीवित छोड़ दो ।। ३६ ।।
अर्जुन उवाच
जीवितं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः । प्रदिशत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः ।। ३७ ।।
अर्जुन बोले- गन्धर्व! जीवन धारण करो। जाओ, अब शोक न करो। इस समय कुरुराज युधिष्ठिर तुम्हें अभयदान दे रहे हैं ।। ३७ ।।
गन्धर्व उवाच
जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् । न च श्लाघे बलेनाङ्ग न नाम्ना जनसंसदि ।। ३८ ।।
गन्धर्वने कहा- अर्जुन ! मैं परास्त हो गया, अतः अपने पहले नाम अंगारपर्णको छोड़ देता हूँ। अब मैं जनसमुदायमें अपने बलकी श्लाघा नहीं करूँगा और न इस नामसे अपना परिचय ही दूँगा ।। ३८ ।।
साध्विमं लब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् । गान्धर्व्या माययेच्छामि संयोजयितुमर्जुनम् ।। ३९ ।।
(आजकी पराजयसे) मुझे सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि मैंने दिव्यास्त्रधारी अर्जुन को (मित्ररूप में) प्राप्त किया है और अब मैं इन्हें गन्धवों की माया से संयुक्त करना चाहता हूँ ।। ३९ ।।
अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः । सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम् ।। ४० ।।
इनके दिव्यास्त्रकी अग्निसे मेरा यह विचित्र एवं उत्तम रथ दग्ध हो गया है। पहले मैं विचित्र रथके कारण 'चित्ररथ' कहलाता था; परंतु अब मेरा नाम 'दग्धरथ' हो गया ।। ४० ।।
सम्भृता चैव विद्येयं तपसेह मया पुरा ।
निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाय महात्मने ।। ४१ ।।
मैंने पूर्वकालमें यहाँ तपस्याद्वारा जो यह विद्या प्राप्त की है, उसे आज अपने प्राणदाता महात्मा मित्रको अर्पित करूँगा ।। ४१ ।।
संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम् । यो रिपुं योजयेत् प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ।। ४२ ।।
जिन्होंने अपने वेगसे शत्रुकी शक्तिको कुण्ठित करके उसपर विजय पायी और फिर जब वह शत्रु शरणमें आ गया, तब जो उसे प्राणदान दे रहे हैं, वे किस कल्याणकी प्राप्तिके अधिकारी नहीं है? ।। ४२ ।।
चाक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः । ददौ स विश्वावसवे मम विश्वावसुर्ददौ ।। ४३ ।।
यह चाक्षुषी नामक विद्या है, जिसे मनुने सोमको दिया। सोमने विश्वावसुको दिया और विश्वावसुने मुझे प्रदान किया है ।। ४३ ।।
सेयं कापुरुषं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति । आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्यं प्रतिनिबोध मे ।। ४४ ।।
यह गुरुकी दी हुई विद्या यदि किसी कायरको मिल गयी तो नष्ट हो जाती है। (इस प्रकार) मैंने इसके उपदेशकी परम्पराका वर्णन किया है। अब इसका बल भी मुझसे सुन लीजिये ।। ४४ ।।
यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत् त्रिषु लोकेषु किंचन । तत् पश्येद् यादृशं चेच्छेत् तादृशं द्रष्टुमर्हति ।। ४५ ।।
तीनों लोकोंमें जो कोई भी वस्तु है, उसमेंसे जिस वस्तुको आँखसे देखनेकी इच्छा हो, उसे इस विद्याके प्रभावसे कोई भी देख सकता है और जिस रूपमें देखना चाहे, उसी रूपमें देख सकता है ।। ४५ ।।
एकपादेन षण्मासान् स्थितो विद्यां लभेदिमाम् । अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रतेऽकृते ।। ४६ ।।
जो एक पैरसे छः महीनेतक खड़ा रहकर तपस्या करे, वही इस विद्याको पा सकता है। परंतु आपको इस व्रतका पालन या तपस्या किये बिना ही मैं स्वयं उक्त विद्याकी प्राप्ति कराऊँगा ।। ४६ ।।
विद्यया ह्यनया राजन् वयं नृभ्यो विशेषिताः । अविशिष्टाश्च देवानामनुभावप्रदर्शिनः ।। ४७ ।।
राजन् ! इस विद्याके बलसे ही हमलोग मनुष्योंसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और देवताओंके तुल्य प्रभाव दिखा सकते हैं ।। ४७ ।।
गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम ।
भ्रातृभ्यस्तव तुभ्यं च पृथग्दाता शतं शतम् ।। ४८ ।।
पुरुषशिरोमणे ! मैं आपको और आपके भाइयोंको अलग-अलग गन्धर्वलोकके सौ-सौ घोड़े भेंट करता हूँ ।। ४८ ।।
देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यवर्णा मनोजवाः ।
क्षीणाक्षीणा भवन्त्येते न हीयन्ते च रंहसः ।। ४९ ।।
वे घोड़े देवताओं और गन्धवोंके वाहन हैं। उनके शरीरकी कान्ति दिव्य है। वे मनके समान वेगशाली और आवश्यकताके अनुसार दुबले-मोटे होते हैं; किंतु उनका वेग कभी कम नहीं होता ।। ४९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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