sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(चैत्ररथपर्व)
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
द्रुपद के यज्ञ से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति...(दिन 474)
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गुर्वर्थ इति चाकाममुपयाजमचोदयत् । याजो द्रोणविनाशाय प्रतिजज्ञे तथा च सः ।। ३२ ।।
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः । आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय वै ।। ३३ ।।
यह बहुत बड़ा कार्य है' ऐसा विचार करके याजने इस कार्यके लिये किसी प्रकारकी कामना न रखने वाले उपयाज को भी प्रेरित किया तथा याज ने द्रोण के विनाश के लिये वैसा पुत्र उत्पन्न करने की प्रतिज्ञा कर ली। इसके बाद महातपस्वी उपयाज ने राजा द्रुपद को अभीष्ट पुत्ररूपी फल की सिद्धि के लिये आवश्यक यज्ञकर्म का उपदेश किया ।। ३२-३३ ।।
स च पुत्रो महावीर्यो महातेजा महाबलः । इष्यते यद्विधो राजन् भविता ते तथाविधः ।। ३४ ।।
और कहा- 'राजन् ! इस यज्ञ से तुम जैसा पुत्र चाहते हो, वैसा ही तुम्हें होगा। तुम्हारा वह पुत्र महान् पराक्रमी, महातेजस्वी और महाबली होगा' ।। ३४ ।।
भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसंधाय भूपतिः । आजहे तत् तथा सर्वं द्रुपदः कर्मसिद्धये ।। ३५ ।।
तदनन्तर द्रोण के घातक पुत्र का संकल्प लेकर राजा द्रुपदने कर्म की सिद्धि के लिये उपयाज के कथनानुसार सारी व्यवस्था की ।। ३५ ।।
याजस्तु हवनस्यान्ते देवीमाज्ञापयत् तदा ।
प्रेहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम् ।। ३६ ।।
(कुमारश्च कुमारी च पितृवंशविवृद्धये ।)
हवनके अन्तमें याजने द्रुपदकी रानीको आज्ञा दी- 'पृषतकी पुत्रवधू ! महारानी ! शीघ्र मेरे पास हविष्य ग्रहण करनेके लिये आओ। तुम्हें एक पुत्र और एक कन्याकी प्राप्ति होनेवाली है, वे कुमार और कुमारी अपने पिता के कुल की वृद्धि करने वाले होंगे' ।। ३६ ।।
राज्युवाच
अवलिप्तं मुखं ब्रह्मन् दिव्यान् गन्धान् बिभर्मि च ।
सुतार्थे नोपलब्धास्मि तिष्ठ याज मम प्रिये ।। ३७ ।।
रानी बोली- ब्रह्मन् ! अभी मेरे मुखमें ताम्बूल आदिका रंग लगा है! मैं अपने अंगोंमें दिव्य सुगन्धित अंगराग धारण कर रही हूँ, अतः मुँह धोये और स्नान किये बिना पुत्रदायक हविष्यका स्पर्श करनेके योग्य नहीं हूँ, इसलिये याजजी! मेरे इस प्रिय कार्यके लिये थोड़ी देर ठहर जाइये ।। ३७ ।।
याज उवाच
याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम् ।
कथं कामं न संदध्यात् सा त्वं विप्रेहि तिष्ठ वा ।। ३८ ।।
याजने कहा- इस हविष्यको स्वयं याजने पकाकर तैयार किया है और उपयाजने इसे अभिमन्त्रित किया है; अतः तुम आओ या वहीं खड़ी रहो, यह हविष्य यजमानकी कामनाको पूर्ण कैसे नहीं करेगा? ।। ३८ ।।
ब्राह्मण उवाच
एवमुक्त्वा तु याजेन हुते हविषि संस्कृते ।
उत्तस्थौ पावकात् तस्मात् कुमारो देवसंनिभः ।। ३९ ।।
ब्राह्मण कहता है-यों कहकर याजने उस संस्कारयुक्त हविष्यकी आहुति ज्यों ही अग्निमें डाली, त्यों ही उस अग्निसे देवताके समान तेजस्वी एक कुमार प्रकट हुआ ।। ३९ ।।
ज्वालावर्णो घोररूपः किरीटी वर्म चोत्तमम् ।
बिभ्रत् सखड्ङ्गः सशरो धनुष्मान् विनदन् मुहुः ।। ४० ।।
उसके अंगोंकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्भासित हो रही थी। उसका रूप भय उत्पन्न करनेवाला था। उसके माथेपर किरीट सुशोभित था। उसने अंगोंमें उत्तम कवच धारण कर रखा था। हाथोंमें खड्ग, बाण और धनुष धारण किये वह बार-बार गर्जना कर रहा था ।। ४० ||
सोऽध्यारोहद् रथवरं तेन च प्रययौ तदा ।
ततः प्रणेदुः पञ्जालाः प्रहृष्ठाः साधु साध्विति ।। ४१ ।।
वह कुमार उसी समय एक श्रेष्ठ रथपर जा चढ़ा, मानो उसके द्वारा युद्धके लिये यात्रा कर रहा हो। यह देखकर पांचालोंको बड़ा हर्ष हुआ और वे जोर-जोरसे बोल उठे, 'बहुत अच्छा', 'बहुत अच्छा', ।। ४१ ।।
हर्षाविष्टांस्ततश्चैतान् नेयं सेहे वसुंधरा ।
भयापहो राजपुत्रः पाञ्चालानां यशस्करः ।। ४२ ।।
राज्ञः शोकापहो जात एष द्रोणवधाय वै ।
इत्युवाच महद् भूतमदृश्यं खेचरं तदा ।। ४३ ।।
उस समय हर्षोल्लास से भरे हुए इन पांचालों का भार यह पृथ्वी नहीं सह सकी। आकाश में कोई अदृश्य महाभूत इस प्रकार कहने लगा- 'यह राजकुमार पांचालों के भयको दूर करके उनके यशकी वृद्धि करने वाला होगा। यह राजा द्रुपद का शोक दूर करने वाला है। द्रोणाचार्य के वध के लिये ही इसका जन्म हुआ है' ।। ४२-४३ ।।
कुमारी चापि पाञ्चाली वेदीमध्यात् समुत्थिता ।
सुभगा दर्शनीयङ्गी स्वसितायतलोचना ।। ४४ ।।
तत्पश्चात् यज्ञकी वेदीमेंसे एक कुमारी कन्या भी प्रकट हुई, जो पांचाली कहलायी। वह बड़ी सुन्दरी एवं सौभाग्यशालिनी थी। उसका एक-एक अंग देखने ही योग्य था। उसकी श्याम आँखें बड़ी-बड़ी थीं ।। ४४ ।।
श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा ।
ताम्रतुङ्गनखी सुभ्रूश्चारुपीनपयोधरा ।। ४५ ।।
उसके शरीर की कान्ति श्याम थी। नेत्र ऐसे जान पड़ते मानो खिले हुए कमलके दल हों। केश काले-काले और घुँघराले थे। नख उभरे हुए और लाल रंग के थे। भौंहें बड़ी सुन्दर थीं। दोनों उरोज स्थूल और मनोहर थे ।। ४५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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