sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा4️⃣7️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः द्रुपद के यज्ञ से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति...(दिन 473) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अयुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय मां विभो । द्रोणवैराभिसंतप्तं प्रह्लादयितुमर्हसि ।। २२ ।। 'भगवन्! मैं आपको अस्सी हजार गौएँ भेंट करता हूँ। आप मेरा यज्ञ करा दीजिये। मैं द्रोण के वैर से संतप्त हो रहा हूँ। आप मुझे प्रसन्नता प्रदान करें ।। २२ ।। स हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्रह्मास्त्रे चाप्यनुत्तमः । तस्माद् द्रोणः पराजैष्ट मां वै स सखिविग्रहे ।। २३ ।। 'द्रोणाचार्य ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ और ब्रह्मास्त्रके प्रयोगमें भी सर्वोत्तम हैं; इसलिये मित्र मानने-न-मानने के प्रश्न को लेकर होने वाले झगड़े में उन्होंने मुझे पराजित कर दिया है ।। २३ ।। क्षत्रियो नास्ति तस्यास्यां पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः । कौरवाचार्यमुख्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः ।। २४ ।। 'परम बुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोण इन दिनों कुरुवंशी राजकुमारों के प्रधान आचार्य हैं। इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसा क्षत्रिय नहीं है, जो अस्त्र-विद्या में उनसे आगे बढ़ा हो ।। २४ ।। द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि च । षडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यते परमं महत् ।। २५ ।। स हि ब्राह्मणवेषेण क्षात्रं वेगमसंशयम् । प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः ।। २६ ।। 'द्रोणाचार्य के बाण समूह प्राणियों के शरीर का संहार करने वाले हैं। उनका छः हाथ का लंबा धनुष बहुत बड़ा दिखायी देता है। इसमें संदेह नहीं कि महान् धनुर्धर महामना द्रोण ब्राह्मण-वेश में (अपने ब्राह्मतेज के द्वारा) क्षत्रिय-तेजको प्रतिहत कर देते हैं ।। २५-२६ ।। क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवास्थितः । तस्य ह्यस्त्रबलं घोरमप्रधृष्यं नरैर्भुवि ।। २७ ।। 'मानो जमदग्निनन्दन परशुरामजी की भाँति क्षत्रियों का संहार करने के लिये उनकी सृष्टि हुई है। उनका अस्त्रबल बड़ा भयंकर है। पृथ्वी के सब मनुष्य मिलकर भी उसे दबा नहीं सकते ।। २७ ।। बाह्यं संधारयंस्तेजो हुताहुतिरिवानलः । समेत्य स दहत्याजौ क्षात्रधर्मपुरस्सरः ।। २८ ।। 'घी की आहुति से प्रज्वलित हुई अग्नि के समान वे प्रचण्ड ब्राह्मतेज धारण करते हैं और युद्धमें क्षात्रधर्म को आगे रखकर विपक्षियों से भिड़ंत होने पर वे उन्हें भस्म कर डालते हैं ।। २८ ।। ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्राह्म तेजो विशिष्यते । सोऽहं क्षात्राद् बलाद्धीनो बाह्यं तेजः प्रपेदिवान् ।। २९ ।। 'यद्यपि द्रोणाचार्यमें ब्राह्मतेज के साथ-साथ क्षात्रतेज भी विद्यमान है, तथापि आपका ब्राह्मतेज उनसे बढ़कर है। मैं केवल क्षात्रबल के कारण द्रोणाचार्य से हीन हूँ; अतः मैंने आपके ब्राह्मतेजकी शरण ली है ।। २९ ।। द्रोणाद् विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम् । द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम् ।। ३० ।। 'आप वेदवेत्ताओं में सबसे श्रेष्ठ होने के कारण द्रोणाचार्य से बहुत बढ़े-चढ़े हैं। मैं आपकी शरण लेकर एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो युद्ध में दुर्जय और द्रोणाचार्य का विनाशक हो।। ३० ।। तत् कर्म कुरु मे याज वितसम्यर्बुदं गवाम् । तथेत्युक्त्वा तु तं याजो याज्यार्थमुपकल्पयत् ।। ३१ ।। 'याजजी! मेरे इस मनोरथ को पूर्ण करने वाला यज्ञ कराइये। उसके लिये मैं आपको एक अर्बुद गौएँ दक्षिणामें दूँगा।' तब याजने 'तथास्तु' कहकर यजमान की अभीष्ट-सिद्धि के लिये आवश्यक यज्ञ और उसके साधनों का स्मरण किया ।। ३१ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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