sn vyas
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#राम #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #रामायण हिंदू धर्म ग्रंथों और पुराणों में बहुत से लोगों की कथाएं प्रचलित है जिन्हें किसी न किसी श्राप के कारण अपने असली रूप को खोना पड़ा। ऐसा ही एक रामायण का एक पात्र काक भुशुण्डि हैं जो एक ऋषि के द्वारा दिए गए श्राप के कारण कौआ बन गए। काकभुशुण्डि के बारे में रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी राम भक्त थे। लेकिन एक ऋषि के श्राप के कारण अपना पूरा जीवन एक कौआ बनकर बिताना पड़ा था। कौन थें काकभुशुण्डि?: पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री राम की कथा भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया थी।उसी कौवे का पुनर्जन्म काकभुशुण्डि के रूप में हुआ था। काक भुशुण्डि को पिछले जन्म में भगवान शिव के मुख से सुनी हुई रामकथा पूरी तरह से याद थी, इसलिए उन्होंने यह कथा अन्य लोगों को भी सुनाई। भगवान शिव के द्वारा सुनाई गई कथा अध्यात्म रामायण के नाम से जानी गई । शास्त्रों में काकभुशुण्डि परमज्ञानी और राम भक्त बताया गया है। रामचरितमानस के अनुसार, प्रभु श्री राम और रावण के युद्ध में जब रावण पुत्र मेघनाद ने श्री राम और लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया था ,तब नारद मुनि के कहने पर गरुड़ जी ने श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्ति दिलाई थी। काकभुशुण्डि दूर किया संदेह: श्रीराम के इस तरह नागपाश में बंध जाने से गरुड़ जी को उनके अवतारी होने पर संदेह हो गया था। तब उनका संदेह दूर करने के लिए नारद जी ने उनको ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उनको महादेव के पास भेज दिया। महादेव ने गरुड़ के संदेह को दूर करने के लिए उनको काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया. अंत में काकभुशुण्डि ने श्रीराम का चरित्र गरुड़जी के सुनाकर उनका संदेह दूर किया। काकभुशुण्डि ऐसे बने कौआ: गरुड़ जी का संदेह दूर करने के बाद काकभुशुण्डि ने उन्हें अपने कौआ बनने की कथा सुनाई थी। जिसके अनुसार, काकभुशुण्डि जी का प्रथम जन्म अयोध्या पुरी में एक शूद्र के घर में हुआ उस जन्म में वह भगवान शिव के भक्त थे, लेकिन अहंकार के वशीभूत होकर उन्होंने अन्य देवताओं की निंदा करते थे। एक बार अयोध्या में अकाल पड़ जाने पर वह उज्जैन चले गये। उन्होंने एक दयालु ब्राह्मण की सेवा की और उन्हीं के साथ रहने लगे। वह ब्रह्मण भी शिवभक्त थे लेकिन अन्य देवताओं की निंदा नहीं करते थे। एक बार काकभुशुण्डि से परेशान होकर गुरु ने उन्हें राम भक्ति का उपदेश देना शुरू किया। भगवान शिव ने दिया श्राप: घमंड में चूर काकभुशुण्डि ने एक बार अपने गुरु का ही अपमान कर दिया, जिससे भगवान शिव नाराज हो गए और श्राप दिया कि तूने अपने गुरु का अपमान किया है। इसलिए तूझे सर्प योनि में जन्म लेने के बाद 1000 बार कई योनियों में जन्म लेना पड़ेगा। लेकिन ब्राह्मण ने भगवान शिव से काकभुशुण्डि को क्षमा करने का निवेदन किया, लेकिन भगवान शिव ने कहा कि जब तक इसे अपने पापों का प्रायश्चित करना होगा। लोमेश ऋषि ने दिया श्राप समय के साथ उनमें श्री राम के प्रति भक्ति उत्पन्न हो गई और अंत में ब्राह्मण का शरीर प्राप्त किया। वह ज्ञान प्राप्ति के लिए लोमश ऋषि के पास गए। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क करता था। उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू चाण्डाल पक्षी यानी कौआ बन जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया। श्राप देने के बाद ऋषि को पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुला कर राममंत्र दिया और साथ में इच्छामृत्यु का वरदान भी दिया राममंत्र मिलने के कारण उसको उस कौए के शरीर से भी प्रेम हो गया और बाद में वह काकभुशुण्डि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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