sn vyas
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#जयंती
गुरु हरगोबिंद सिंह जी जयन्ती 01 जुलाई विशेष
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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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सोलहवीं शताब्दी के अंत और सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ का भारत राजनीतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण काल था। उस समय मुगल साम्राज्य का शासन था। सिख पंथ के पाँचवें गुरु, गुरु अर्जन देव ने सिख धर्म को संगठित रूप दिया, हरिमंदिर साहिब का विकास कराया तथा आदि ग्रंथ का संकलन कराया।
किन्तु उनकी लोकप्रियता और बढ़ते प्रभाव से मुगल शासन चिंतित हुआ। अंततः 1606 ईस्वी में गुरु अर्जन देव जी ने धर्म की रक्षा के लिए शहादत स्वीकार की। यह घटना सिख इतिहास का एक निर्णायक मोड़ बनी। इसके बाद सिख समाज को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता थी जो आध्यात्मिकता के साथ-साथ अन्याय के विरुद्ध भी खड़ा हो सके।
ऐसे समय में गुरु हरगोबिंद जी का उदय हुआ।
गुरु हरगोबिंद जी का जन्म 19 जून 1595 ईस्वी को अमृतसर के समीप वडाली गुरु गाँव में हुआ। उनके पिता थे गुरु अर्जन देव जी और माता थीं माता गंगा जी। सिख परंपरा के अनुसार उनके जन्म के लिए माता गंगा जी ने संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया था। परिवार में उनके जन्म से अत्यंत आनंद का वातावरण बना।
बालक हरगोबिंद अत्यंत तेजस्वी, साहसी और बुद्धिमान थे। बचपन से ही उन्हें तीन प्रकार की शिक्षा दी गई, गुरबाणी एवं आध्यात्मिक ज्ञान, घुड़सवारी धनुष, तलवार और भाले का अभ्यास उनका मानना था कि ईश्वर का भक्त निर्भय भी होना चाहिए।
1606 ईस्वी में गुरु अर्जन देव जी को मुगल सम्राट जहाँगीर के शासनकाल में लाहौर में कठोर यातनाएँ दी गईं। उन्हें गर्म तवे पर बैठाया गया, गर्म रेत डाली गई, फिर भी उन्होंने ईश्वर का स्मरण नहीं छोड़ा।
अंततः उन्होंने धर्म के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। सिख इतिहास में यह प्रथम महान शहादत मानी जाती है।
गुरु अर्जन देव जी की शहादत के बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में गुरु हरगोबिंद जी छठे सिख गुरु बने। गुरु बनने के बाद उन्होंने घोषणा की कि अब केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए शक्ति भी आवश्यक है। यहीं से सिख इतिहास का नया अध्याय आरंभ हुआ।
गुरु गद्दी पर आसीन होने के बाद गुरु हरगोबिंद जी ने अनुभव किया कि केवल आध्यात्मिक उपदेशों से समाज की रक्षा संभव नहीं है। गुरु अर्जन देव जी की शहादत ने स्पष्ट कर दिया था कि अन्याय और अत्याचार का सामना करने के लिए धर्म के साथ शक्ति भी आवश्यक है। इसलिए उन्होंने सिख समाज के संगठन की एक नई दिशा निर्धारित की।
गुरु हरगोबिंद जी ने सिखों को यह शिक्षा दी कि प्रत्येक सिख को दो गुण अवश्य धारण करने चाहिए—
संत – जो ईश्वर का स्मरण करे, सत्य बोले, सेवा करे और विनम्र रहे।
सिपाही – जो अन्याय, अत्याचार और अधर्म के विरुद्ध निर्भय होकर खड़ा हो।
यही आदर्श आगे चलकर "संत-सिपाही" परंपरा के रूप में प्रसिद्ध हुआ और बाद में गुरु गोबिंद सिंह ने इसे खालसा पंथ के माध्यम से और अधिक सुदृढ़ किया।
अकाल तख्त की स्थापना
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लगभग 1609 ईस्वी में गुरु हरगोबिंद जी ने अकाल तख्त की स्थापना कराई। अकाल तख्त का अर्थ है—अकाल (अमर परमात्मा) का सिंहासन। यह स्थान केवल धार्मिक उपदेशों के लिए नहीं था, बल्कि यहाँ से समाज, न्याय, सुरक्षा और सामुदायिक निर्णयों का भी संचालन होता था।
आज भी अकाल तख्त सिख पंथ के सर्वोच्च तख्तों में सबसे प्रमुख माना जाता है।
मीरी–पीरी का सिद्धांत
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गुरु हरगोबिंद जी ने अपने शरीर पर दो तलवारें धारण कीं👇
पीरी – आध्यात्मिक अधिकार का प्रतीक।
मीरी – सांसारिक उत्तरदायित्व, न्याय और समाज की रक्षा का प्रतीक।
उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म का पालन केवल ध्यान और पूजा तक सीमित नहीं होना चाहिए; अन्याय का प्रतिरोध करना भी धार्मिक कर्तव्य है।
गुरु हरगोबिंद जी कहते थे कि—हाथ में शास्त्र (धर्मग्रंथ) हो तो मन पवित्र रहता है।
हाथ में शस्त्र हो तो निर्दोषों की रक्षा की जा सकती है। इसलिए उन्होंने दोनों के संतुलित अभ्यास पर बल दिया।
गुरु हरगोबिंद जी के जीवन की सबसे प्रसिद्ध और प्रेरणादायक घटनाओं में से एक है ग्वालियर किले में कैद और 52 राजाओं की मुक्ति। यह घटना सिख इतिहास में "बंदी छोड़ दिवस" के नाम से अमर है।
गुरु गद्दी संभालने के बाद गुरु हरगोबिंद जी ने सिख समाज को संगठित करना प्रारंभ किया। उन्होंने घुड़सवारी, शस्त्र-विद्या और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया। इससे सिख समुदाय का आत्मविश्वास और प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा। यह बढ़ती शक्ति मुगल दरबार के कुछ अधिकारियों को खटकने लगी। उन्होंने सम्राट जहाँगीर के सामने गुरु जी के विरुद्ध अनेक शिकायतें कीं।
ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को ग्वालियर किला भेज दिया। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में कैद के कारणों और अवधि का विवरण कुछ भिन्न मिलता है, लेकिन यह सर्वमान्य है कि गुरु जी कुछ समय तक ग्वालियर किले में रहे। किले में उस समय अनेक छोटे-छोटे राज्यों के राजा और राजकुमार भी बंदी बनाए गए थे। वे वर्षों से अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे थे। गुरु हरगोबिंद जी ने कैद को दुःख का कारण नहीं बनने दिया। उन्होंने वहाँ भी ईश्वर का स्मरण कराया, कैदियों का उत्साह बढ़ाया,
उन्हें धैर्य, विश्वास और आशा का संदेश दिया। उनकी वाणी और व्यक्तित्व से अनेक बंदी राजाओं का मनोबल बढ़ा।
कुछ समय बाद जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी की रिहाई का आदेश दिया। किंतु गुरु जी ने कहा—"मैं अकेला बाहर नहीं जाऊँगा। जब तक ये बंदी राजा भी मुक्त नहीं होंगे, मैं भी यहीं रहूँगा।" यह सुनकर सम्राट ने एक शर्त रखी कि जितने राजा गुरु जी का चोला पकड़कर बाहर निकल सकेंगे, वे ही मुक्त होंगे।
गुरु हरगोबिंद जी ने एक विशेष चोला बनवाया, जिसमें 52 लंबी कलियाँ (फंदे/छोर) लगाई गईं। जब किले से बाहर निकलने का समय आया, तो प्रत्येक राजा ने उस चोले की एक-एक कली पकड़ ली और इस प्रकार 52 राजा गुरु जी के साथ स्वतंत्र होकर बाहर आए। इस कारण गुरु हरगोबिंद जी को "बंदी छोड़" की उपाधि मिली।
जब गुरु हरगोबिंद जी हरिमंदिर साहिब पहुँचे, तब संगत ने दीप जलाकर उनका भव्य स्वागत किया। इसी स्मृति में सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस मनाता है। यह पर्व प्रायः उसी समय आता है जब दीपावली का उत्सव मनाया जाता है, इसलिए दोनों पर्व एक साथ भी दिखाई देते हैं।
गुरु हरगोबिंद जी ने अपने आचरण से यह संदेश दिया—
"जो स्वयं स्वतंत्र हो जाए, पर दूसरों को बंधन में छोड़ दे, वह पूर्ण धर्म का पालन नहीं करता।"
उनका जीवन करुणा, साहस और निःस्वार्थ नेतृत्व का अद्वितीय उदाहरण है।
मुगलों के साथ युद्ध और सिख वीरता
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गुरु हरगोबिंद जी के समय तक सिख पंथ केवल एक धार्मिक समुदाय नहीं रहा था, बल्कि वह अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाली एक संगठित शक्ति बन चुका था। शाहजहाँ के शासनकाल में यह परिवर्तन मुगल दरबार को स्वीकार नहीं था, जिसके परिणामस्वरूप कई युद्ध हुए।
1627 ईस्वी में जहाँगीर की मृत्यु के बाद शाहजहाँ मुगल सम्राट बना। वह सिखों की बढ़ती शक्ति को संदेह की दृष्टि से देखता था। समय-समय पर छोटे विवाद बड़े सैन्य संघर्षों में बदल गए। गुरु हरगोबिंद जी ने कभी राज्य-विस्तार के लिए युद्ध नहीं किया। उनके सभी युद्ध आत्मरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और निर्दोषों की रक्षा के लिए थे।
अमृतसर का युद्ध (1634 ई.)
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अमृतसर के निकट मुगल सेना और सिखों के बीच भीषण युद्ध हुआ।
युद्ध का कारण👉 ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, एक शाही बाज़ (बाज़ीगर पक्षी) के विवाद से तनाव उत्पन्न हुआ, जो बाद में बड़े संघर्ष में बदल गया। मुगल सेना संख्या में अधिक थी। सिख सैनिक संख्या में कम थे, लेकिन अत्यंत साहसी और अनुशासित थे। गुरु हरगोबिंद जी स्वयं युद्धभूमि में उपस्थित रहे और सैनिकों का नेतृत्व किया। युद्ध में सिखों ने अद्भुत वीरता दिखाई और मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा।
पहले युद्ध के कुछ समय बाद मुगल सेना ने फिर आक्रमण किया। लहिरा के निकट हुए इस संघर्ष में भी गुरु हरगोबिंद जी की सेना ने बहादुरी से मुकाबला किया। युद्ध के बाद सिखों का मनोबल और अधिक बढ़ गया तथा दूर-दूर से लोग सिख पंथ से जुड़ने लगे।
करतारपुर में गुरु हरगोबिंद जी और मुगल सेना के बीच एक और महत्वपूर्ण युद्ध हुआ। यह संघर्ष अत्यंत भीषण था। गुरु जी ने युद्धभूमि में स्वयं सैनिकों का उत्साह बढ़ाया और अनुशासन बनाए रखा। यद्यपि दोनों पक्षों को क्षति पहुँची, फिर भी सिख सेना ने अपने संगठन और साहस का परिचय दिया।
गुरु हरगोबिंद जी का पारिवारिक जीवन
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गुरु हरगोबिंद जी का जीवन अत्यंत सरल, अनुशासित और सेवा-भाव से परिपूर्ण था। वे संगत के बीच रहकर लोगों की समस्याएँ सुनते और उनका समाधान करते थे।
परंपरागत स्रोतों के अनुसार उनके कई पुत्र हुए, जिनमें प्रमुख थे👉 बाबा गुरदित्ताजी, सूरज मल, अनी राय, अटल राय, गुरु तेग बहादुर।
गुरु हरगोबिंद जी के प्रमुख उपदेश
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उन्होंने सिखों को अनेक शिक्षाएँ दीं, जिनमें प्रमुख हैं👇
(1) ईश्वर पर अटूट विश्वास
हर परिस्थिति में परमात्मा का स्मरण करो।
(2) सेवा
भूखे को भोजन, प्यासे को पानी और दुखी को सांत्वना देना सबसे बड़ी पूजा है।
(3) निर्भयता
अन्याय से कभी मत डरो।
(4) विनम्रता
शक्ति होने पर भी अहंकार न करो।
(5) सत्य
सत्य के मार्ग पर चलो, चाहे कठिनाइयाँ आएँ।
गुरु हरगोबिंद जी के दरबार में अमीर और गरीब सभी समान थे। वे निर्णय करते समय किसी का पक्ष नहीं लेते थे। उनके लिए न्याय ही सर्वोच्च था।
बाद के वर्षों में गुरु हरगोबिंद जी ने कीरतपुर साहिब को अपना प्रमुख निवास बनाया। वहाँ उन्होंने सत्संग का विस्तार किया, शिक्षा का प्रचार किया, सेवा और लंगर की परंपरा को और मजबूत किया,
सिख समुदाय को संगठित रखा।
अपने जीवन के अंतिम समय में गुरु हरगोबिंद जी ने संगत को संदेश दिया👉 नाम जपो। ईमानदारी से जीवन बिताओ।
सेवा करो। अन्याय का विरोध करो।
गुरु की वाणी को जीवन का आधार बनाओ।
सन 1644 ईस्वी में कीरतपुर साहिब में गुरु हरगोबिंद जी ज्योति-जोत समा गए।
सिख परंपरा में "मृत्यु" शब्द के स्थान पर "ज्योति-जोत समाना" कहा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि गुरु की दिव्य ज्योति परम ज्योति में विलीन हो जाती है।
उनके पश्चात गुरु हर राय सिखों के सातवें गुरु बने।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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