sn vyas
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#जयंती ॥ श्रीहरिः ॥ *प्रभु की याद दिलाने वाले, तुमको अनंतो प्रणाम* *अनेकों जीवों के उद्धार का मार्ग प्रशस्त करने वाले परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज की पावन तिरोभाव तिथि पर भावांजलि और उन्हें कोटि कोटि प्रणाम* आज आंग्ल (अंग्रेजी) दिनांक के अनुसार 3 जुलाई का अत्यंत पावन दिवस है। इसी 3 जुलाई के दिन परम पूज्य स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज ने इस नश्वर शरीर का त्याग कर प्रभु के नित्य धाम में प्रवेश किया था। यद्यपि हिंदू पंचांग के अनुसार उनकी पावन तिरोभाव तिथि (आषाढ़ कृष्ण द्वितीया) कुछ दिनों के पश्चात आएगी, परंतु अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार आज ही वह पुण्य दिवस है, अतः भगवान् की कृपा से आज के दिन उन महान संत को श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं। ऐसे संत इस संसार से कभी जाते नहीं हैं—वे अपनी अमृतमयी वाणी, अपने पावन विचार और अपने श्रेष्ठ आदर्शों के रूप में सदैव हमारे बीच जीवित रहते हैं। असंख्य जीवों को भगवान के मार्ग में लगाने वाले, प्रभु के नाम और सत्संग से जोड़ने वाले, तथा अत्यंत सरल रूप से परम कल्याण का मार्ग बताने वाले ऐसे महापुरुष को आज हृदय से नमन करते हैं। *मेरे अपने जीवन में अध्यात्म का जो भी थोड़ा-बहुत बोध जागृत हुआ जीवन में दिखता हैं वह स्वामीजी और महान संतों की ही देन है।* स्वामीजी ने इतनी सरलता से भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताया कि कोई भी सामान्य व्यक्ति भी उस पर पूर्ण सहजता से चल सकता है। स्वामीजी साक्षात श्रीमद्भगवद्गीता के सजीव स्वरूप और सर्वोच्च वैराग्य की प्रत्यक्ष प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने आजीवन कभी धन का स्पर्श नहीं किया, किसी से कुछ भी नहीं मांगा। यहां तक कि किसी से मिलने की तीव्र इच्छा होने पर भी उन्होंने कभी याचना नहीं की—ऐसा कठोर व्रत इस युग में अत्यंत दुर्लभ है। उनका पूर्णतः निष्काम जीवन ही वह वास्तविक अमृत है, जो जीव को संसार की आसक्ति से हटाकर सीधे भगवान से जोड़ देता है। *दुःख सहने में ही उन्नति है* स्वामी जी कहते थे—“यदि मेरा जीवन जानना है, तो इतना जान लो कि मैंने दुःख सहा है। तुम भी दुःख सहो, क्योंकि दुःख सहने से ही मनुष्य की उन्नति होती है।” वर्तमान काल में यह अनमोल वचन हमें भीतर से सुदृढ़ बनाता है और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रहने की असीम प्रेरणा देता है। भगवत्प्राप्ति का सरल ‘पंचामृत’ स्वामी जी ने गृहस्थों के लिए अत्यंत सहज मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि कर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं है, केवल अपना भाव परिवर्तित करना है: *१. हम भगवान्‌ के ही हैं।* *२. हम जहाँ भी रहते हैं, भगवान्‌ के ही दरबार में रहते हैं।* *३. हम जो भी शुभ काम करते हैं, भगवान्‌ का ही काम करते हैं।* *४. शुद्ध-सात्त्विक जो भी पाते हैं, भगवान्‌ का ही प्रसाद पाते हैं।* *५. भगवान् के दिये प्रसाद से भगवान्‌ के ही जनों की सेवा करते हैं।* यदि कोई भी व्यक्ति इन पांच बातों को अपने जीवन में पूर्णतः उतार ले, तो वह कार्य करते-करते ही भगवान से जुड़ कर उनकी प्राप्ति कर सकता है। *अमृततुल्य संतवाणी* *सुख चाहिए तो सुख देना पड़ेगा।* *सबसे बड़ी सेवा है किसी को दुःख ना देना।* *अपने लिए कुछ भी करना बंधन है, दूसरों के लिए करना मुक्ति है।* *मैं लोगों को भगवान की ओर लगाने आया हूं अपनी ओर नहीं।* *व्यक्ति को मत पकड़ो, भगवान को पकड़ो।* *बातें तो दूसरी बहुत है, पर मैं भगवान का हूं यह सार बात है।* *संसार बाधक नहीं है, संसार का संबंध बाधक है। संसार से संबंध तोड़कर भगवान से संबंध जोड़ो, भगवान का संबंध कल्याण करने वाला है।* *भगवान का स्मरण समस्त विपत्ति का नाश करनेवाला है।* *मिली हुई वस्तु को अपनी और अपने लिए मानना ही सबसे बड़ी भूल है।* *शरीर संसार का है और जीवात्मा परमात्मा का है, इसलिए शरीर संसार की सेवा में और स्वयं भगवान की स्मृति में लगे।* *अपने लिए कुछ नहीं करना है, अपने लिए कुछ नहीं चाहिए और अपना कोई नहीं है—केवल एक भगवान ही अपने हैं।* श्रद्धेय श्री जयदयालजी गोयन्दका (सेठजी), श्रद्धेय श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार (भाईजी) एवं पूज्यपाद स्वामी श्री शरणानंद जी महाराज —इन तीनों ही महापुरुषों की पुस्तकों का मैंने भगवान की कृपा से जितना भी अध्ययन किया है। इन सबको पढ़ने के पश्चात, जब स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज को पढ़ते हैं, तो यह स्पष्ट पता चलता है कि उन सभी संतों की बातों का सम्पूर्ण सार और तत्त्व स्वामी जी की पुस्तकों एवं उनके प्रवचनों में अत्यंत सहज रूप से आ जाता है। स्वामी जी को पढ़ना मानो अनेक संतों के ज्ञान को एक ही स्थान पर पाना है। स्वामी जी का हर साहित्य सभी साधक के लिए संजीवनी बूटी के समान है: साधक संजीवनी (श्रीमद्भगवद्गीता की श्रेष्ठ टीका) साधन सुधा सिंधु साधन सुधा निधि मानव मात्र के कल्याण के लिए गीता दर्पण जीवन का सत्य इन महान ग्रंथों का नित्य स्वाध्याय जीवन को एक नई और सार्थक दिशा प्रदान कर सकता है। सभी साधको को एक बार इन ग्रंथो को अवश्य देखना चाहिए। आज की पावन तिथि पर हमारी प्रार्थना … हे नाथ ! आपसे ऐसी प्रार्थना है कि हमें ऐसा बना दीजिए कि हम आपको कभी न भूलें। हमारा मन इस नश्वर संसार में न भटके, बल्कि सदा आपके श्रीचरणों में लगा रहे। आपकी पावन स्मृति हर समय हमारे हृदय में बनी रहे। हे नाथ! हे मेरे नाथ! हम आपको भूलें नहीं। हे नाथ! हे मेरे नाथ! हम आपकी शरण में हैं। हे नाथ! हे मेरे नाथ! आप हमें प्यारे लगें। हे नाथ! हे मेरे नाथ! आप हमें अपना अटूट विश्वास प्रदान करें। हम स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं—हमें ऐसा बना दीजिए कि हम शीघ्र ही भगवान में लग जाएं। हमारा यह अमूल्य मानव जीवन व्यर्थ न जाए, बल्कि आपके बताए मार्ग पर निरंतर चलते हुए प्रभु की ओर अग्रसर हो। हमें ऐसा निर्मल भाव दीजिए कि हम सदा यही अनुभव करें—हम भगवान के हैं, भगवान हमारे हैं, और हम उन्हीं के दरबार में रह रहे हैं। अंत में … ऐसे महान संत इस धरातल पर बार-बार नहीं आते। उनका स्मरण भी साधना है, उनकी वाणी भी साधना है और उनका सम्पूर्ण जीवन भी एक महान साधना है। आइए, आज इस पावन तिथि पर हम सब यह दृढ़ संकल्प लें—हम भगवान का नाम नहीं छोड़ेंगे, उनकी स्मृति नहीं छोड़ेंगे और उनके बताए परम कल्याणकारी मार्ग से कभी नहीं हटेंगे। यही उनके प्रति हमारी सबसे सच्ची श्रद्धांजलि और भावांजलि होगी। नारायण नारायण नारायण नारायण .. 🙏🙏
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