sn vyas
590 views • 1 days ago
#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏
यह कथा शिव पुराण के शतरुद्र संहिता तथा कोटिरुद्र संहिता में आती है। यह प्रसंग लंकापति रावण की अनन्य एवं उग्र शिव-भक्ति, उसकी भूल और भगवान शिव के 'वैद्यनाथ' (परम चिकित्सक) रूप में प्राकट्य की अद्भुत गाथा है।
1. रावण का कठोर तप और कैलाश हिलाने का दुस्साहस
रावण भगवान शिव का परम भक्त था, किंतु उसका स्वभाव अत्यंत अहंकारी भी था। एक बार उसने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की।
जब बहुत समय बीत जाने पर भी शिवजी प्रकट नहीं हुए, तो रावण ने अपनी उग्र भक्ति का परिचय दिया। उसने एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवजी के चरणों में अर्पित करना शुरू कर दिया। जब वह अपना दसवाँ सिर काटने ही वाला था, तब आशुतोष महादेव अत्यंत प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने रावण के सभी कटे हुए सिरों को पुनः जोड़ दिया तथा उसे अतुलित शक्ति प्रदान की।
2. अचल शिवलिंग प्राप्त करने की हठ
वरदान पाने के बाद भी रावण संतुष्ट नहीं हुआ। उसने भगवान शिव से प्रार्थना की:
"हे महादेव! मैं आपको केवल कैलाश पर ही नहीं, अपनी राजधानी लंका में सदा के लिए स्थापित करना चाहता हूँ। आप मेरे साथ लंका चलें।"
भगवान शिव भक्तों के वश में हैं, इसलिए उन्होंने रावण की प्रार्थना स्वीकार की और उसे एक अत्यंत दिव्य शिवलिंग (अचल लिंग) प्रदान करते हुए एक शर्त रखी:
"हे रावण! तुम इस शिवलिंग को लंका ले जा सकते हो, परंतु ध्यान रखना—यदि मार्ग में तुमने इसे कहीं भी पृथ्वी पर रख दिया, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा और पुनः नहीं उठेगा।"
रावण ने सहर्ष यह शर्त स्वीकार की और शिवलिंग को लेकर लंका की ओर चल पड़ा।
3. देवताओं की चिंता और वरुण-विष्णु की माया
देवता भली-भांति जानते थे कि यदि रावण इस दिव्य शिवलिंग को लंका में स्थापित करने में सफल हो गया, तो वह पूरी तरह अजेय हो जाएगा और उसका अत्याचार और बढ़ जाएगा। इसलिए देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता माँगी।
जब रावण शिवलिंग लेकर चित्राभूमि (वर्तमान में देवघर/झारखंड या पारली) के समीप से गुजर रहा था, तब भगवान विष्णु की प्रेरणा से वरुण देव ने रावण के पेट में तीव्र जल (लघुशंका) का वेग उत्पन्न कर दिया।
रावण अत्यंत व्याकुल हो उठा। उसने सोचा कि शिवलिंग को हाथ में लेकर अशौच अवस्था में खड़ा होना उचित नहीं है। तभी उसे पास ही 'वैजू' (वैजनाथ) नाम का एक ग्वाला (गड़रिया) दिखाई दिया (जो वास्तव में भगवान विष्णु/गणेश जी की माया से वहाँ था)। रावण ने उस ग्वाले से शिवलिंग को थोड़ी देर हाथ में थामे रखने का अनुरोध किया और चेतावनी दी कि इसे ज़मीन पर मत रखना।
4. ज्योतिर्लिंग की स्थापना
रावण जैसे ही लघुशंका के लिए गया, वरुण देव के प्रभाव से उसे अत्यधिक समय लग गया। उधर ग्वाले बने देवदूत ने भार का बहाना बनाकर शिवलिंग को भूमि पर रख दिया।
शिवलिंग भूमि का स्पर्श करते ही वहीं पाताल तक गहराई से स्थापित हो गया। जब रावण लौटकर आया और उसने देखा कि शिवलिंग भूमि पर रखा हुआ है, तो वह अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने अपनी पूरी शक्ति लगाकर शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया, किंतु वह एक इंच भी नहीं हिला। क्रोध और निराशा में रावण ने अपने हाथों से उस शिवलिंग को नीचे की ओर दबा दिया, जिससे उस पर अँगूठे का निशान बन गया।
5. रावण का सिर-छेदन और 'वैद्यनाथ' प्राकट्य
अपने मनोरथ को विफल देखकर रावण अत्यंत दुःखी हो गया। उसने अपनी भूल का प्रायश्चित करने के लिए वहीं पुनः घोर तपस्या शुरू कर दी।
उसने एक कुंड खोदा और पुनः अपने सिर काट-काटकर शिवजी को अर्पित करने लगा। जब नौ सिर कट चुके और दसवाँ सिर काटने का समय आया, तब भगवान शिव अत्यंत द्रवित हो गए। वे एक 'वैद्य' (चिकित्सक) के रूप में प्रकट हुए।
भगवान शिव ने:
रावण के सभी कटे हुए सिरों को पुनः जोड़कर औषधियों व दिव्य स्पर्श से उसका उपचार किया और उसे पूर्णतः स्वस्थ कर दिया।
वैद्य बनकर रावण के अंगों को आरोग्य प्रदान करने के कारण भगवान शिव का वह रूप और वह ज्योतिर्लिंग 'वैद्यनाथ' (वैजनाथ) कहलाया।
कथा का संदेश: भक्ति यदि अहंकार से युक्त हो, तो वह ईश्वर के दिव्य नियमों को बदल नहीं सकती। भगवान शिव भाव के भूखे हैं—वे अपने भक्त के कटे शीश भी जोड़ देते हैं, परंतु धर्म और संसार के संतुलन को सदा बनाए रखते हैं।
23 likes
22 shares