sn vyas
733 views • 7 days ago
#प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 #शिव पुराण रुद्रसंहिता
अंधकासुर का वध और उसका उद्धार
यह कथा शिव पुराण के रुद्र संहिता (युद्ध खंड) में आती है, जो अंधकासुर के जन्म, उसके अहंकार, भगवान शिव के साथ युद्ध और अंततः उसके उद्धार (मुक्ति) की गाथा है।
1. अंधकासुर का दिव्य जन्म
एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव ध्यान में मग्न थे। क्रीड़ा-कौतुक में देवी पार्वती ने पीछे से आकर भगवान शिव के दोनों नेत्रों को अपनी हथेलियों से ढक लिया।
भगवान शिव के नेत्र बंद होते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में अंधकार छा गया। उनके त्रिनेत्रों के तेज से देवी पार्वती के हाथों में पसीना आ गया। उस दिव्य पसीने की बूंदों से एक अत्यंत भयंकर, अंधा और अंधकारमय बालक प्रकट हुआ।
अंधकार में जन्म लेने और अंधा होने के कारण उसका नाम 'अंधक' पड़ा। बाद में, जब दैत्यराज हिरण्याक्ष ने पुत्र-प्राप्ति के लिए तपस्या की, तो भगवान शिव ने अंधक को हिरण्याक्ष को दे दिया।
2. ब्रह्मा जी का वरदान और अहंकार
हिरण्याक्ष के संरक्षण में बड़ा होकर अंधक दैत्यों का राजा बना। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया:
"कोई भी देव, दानव या मानव तुम्हारा वध नहीं कर सकेगा। तुम्हारी मृत्यु केवल तभी संभव होगी जब तुम अपनी ही माता के समान पूजनीय देवी पर कुदृष्टि डालोगे।"
वरदान के अहंकार में अंधक ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली।
3. माता पार्वती पर कुदृष्टि और शिव-अंधक युद्ध
अहंकार में अंधे होकर अंधकासुर ने कैलाश पर आक्रमण कर दिया और देवी पार्वती को प्राप्त करने की दुष्ट चेष्टा की। यह देखकर भगवान शिव का क्रोध प्रज्वलित हो उठा।
भगवान शिव और अंधकासुर के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। अंधकासुर के पास एक विशेष शक्ति थी—जैसे ही उसके रक्त की एक बूंद पृथ्वी पर गिरती, उससे सैकड़ों नए अंधकासुर पैदा हो जाते थे।
इस समस्या का अंत करने के लिए भगवान शिव ने 'मातृकाओं' (सप्तमातृका) और देवी चामुंडा का सृजन किया, जिन्होंने अंधकासुर के रक्त की हर बूंद को पृथ्वी पर गिरने से पहले ही पी लिया।
4. त्रिशूल से प्रहार और अंधकासुर का उद्धार
जब अंधकासुर का रक्त गिरना बंद हो गया, तब भगवान शिव ने अपने दिव्य त्रिशूल से अंधकासुर के वक्षस्थल पर प्रहार किया और उसे त्रिशूल की नोक पर उठा लिया।
हजारों वर्षों तक अंधकासुर शिवजी के त्रिशूल पर टंगा रहा। त्रिशूल के दिव्य स्पर्श, शिवजी के सानिध्य और अपने सारे पापों के नष्ट हो जाने के बाद अंधकासुर का अज्ञान समाप्त हो गया।
उसने त्रिशूल पर तड़पते हुए अपनी भूल स्वीकार की और भगवान शिव की स्तुति (शिव स्तोत्र) करना शुरू कर दिया:
"हे महादेव! मैं अंधकार में था। मुझे क्षमा करें और अपने चरणों में स्थान दें।"
भगवान शिव तो आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं। अंधकासुर की सच्ची भक्ति और पश्चाताप देखकर शिवजी ने उसे अपने त्रिशूल से नीचे उतारा, उसके सारे पाप क्षमा किए और उसे अपने गणों का अध्यक्ष (गणपति) बनाकर 'भृंगी' नाम दिया।
15 likes
7 shares