sn vyas
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#पौराणिक कथा
प्रलम्बासुर वध – जब बलराम जी ने छल पर धर्म की विजय का संदेश दिया
वृंदावन की पावन धरा उस दिन भी आनंद और उल्लास से महक रही थी। यमुना की शीतल लहरें मंद-मंद बह रही थीं, कदंब के वृक्षों पर बैठे पक्षी मधुर स्वर में गान कर रहे थे और चारों ओर हरियाली बिखरी हुई थी। गौएँ निश्चिंत होकर चर रही थीं, जबकि ग्वालबाल अपने प्रिय कान्हा और दाऊ जी के साथ हँसी-खुशी वन की ओर बढ़ रहे थे।
भगवान श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंख शोभायमान था, हाथों में मुरली थी और उनके अधरों पर मन मोह लेने वाली मुस्कान खिली हुई थी। उनके साथ चल रहे बलराम जी अपने दिव्य तेज और बल से सभी का मन मोह रहे थे।
वन में पहुँचते ही सभी सखा खेल-कूद में मग्न हो गए। कोई पेड़ों पर चढ़ रहा था, कोई बाँसुरी की धुन पर झूम रहा था, तो कोई बछड़ों के पीछे दौड़ रहा था। पूरा ब्रज वन उनकी हँसी से गूँज उठा।
उधर मथुरा में अत्याचारी कंस भय और क्रोध से व्याकुल था। उसके भेजे गए अनेक असुर—पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, वत्सासुर, बकासुर, अघासुर और धेनुकासुर—भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारे जा चुके थे।
क्रोधित होकर उसने अपने सबसे मायावी और शक्तिशाली दैत्य प्रलम्बासुर को बुलाया और कहा—
"ग्वालबाल का रूप धारण कर वृंदावन पहुँचो। उचित अवसर मिलते ही कृष्ण और बलराम का अंत कर दो।"
प्रलम्बासुर ने आज्ञा स्वीकार की और देखते ही देखते एक सुंदर ग्वालबाल का रूप धारण कर वृंदावन पहुँच गया।
उसका वेश इतना स्वाभाविक था कि कोई भी उसे पहचान न सका।
लेकिन जो समस्त संसार के अंतर्यामी हैं, उनसे भला क्या छिप सकता था?
भगवान श्रीकृष्ण ने उसे देखते ही पहचान लिया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, केवल मुस्कुराए और मन ही मन विचार किया—
"आज संसार मेरे बड़े भाई बलराम के अद्भुत पराक्रम का दर्शन करेगा।"
कुछ देर बाद श्रीकृष्ण ने सभी सखाओं से कहा—
"चलो, आज एक नया खेल खेलते हैं।"
सभी प्रसन्न हो गए। दो दल बनाए गए। एक दल का नेतृत्व श्रीकृष्ण ने किया और दूसरे का बलराम जी ने।
खेल का नियम बड़ा सरल था—जो हार जाएगा, वह विजेता को अपनी पीठ पर बैठाकर निश्चित स्थान तक ले जाएगा।
प्रलम्बासुर जानबूझकर बलराम जी की टोली में शामिल हो गया।
खेल समाप्त हुआ और श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार प्रलम्बासुर हार गया।
अब उसे नियम के अनुसार बलराम जी को अपनी पीठ पर बैठाना पड़ा।
बलराम जी निश्चिंत होकर उसकी पीठ पर बैठ गए।
कुछ दूर तक वह सामान्य गति से चलता रहा, लेकिन अचानक तेज़ी से वन के भीतर भागने लगा।
उसके मन में विचार था—
"अब मैं इन्हें सबसे दूर ले जाकर मार डालूँगा।"
थोड़ी ही देर में उसने अपना वास्तविक राक्षसी रूप धारण कर लिया।
उसका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया, नेत्र अग्नि की भाँति लाल हो उठे और उसका विकराल स्वरूप देखकर कोई भी भयभीत हो सकता था।
किन्तु बलराम जी तनिक भी विचलित नहीं हुए।
उन्होंने अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया। उनके तेज और बल से प्रलम्बासुर की गति मंद पड़ने लगी।
उसे अनुभव हुआ मानो उसकी पीठ पर कोई बालक नहीं, बल्कि स्वयं पर्वत का भार बैठ गया हो।
वह घबराकर रुक गया।
उसी क्षण बलराम जी ने अपनी वज्र समान मुट्ठी बाँधी और पूरी शक्ति से उसके मस्तक पर प्रहार कर दिया।
वह प्रहार इतना प्रचंड था कि मानो स्वयं इंद्र का वज्र गिर पड़ा हो।
प्रलम्बासुर का सिर फट गया, उसके मुख से रक्त बह निकला और वह जोरदार गर्जना करता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।
कुछ ही क्षणों में उसके प्राण निकल गए।
भगवान की कृपा से उसके शरीर से दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और उसे भी मोक्ष प्राप्त हुआ।
इसी बीच श्रीकृष्ण और अन्य ग्वालबाल वहाँ पहुँच गए।
बलराम जी का पराक्रम देखकर सभी आनंद से भर उठे और एक स्वर में जयघोष करने लगे—
"दाऊ जी की जय!"
"हलधर भगवान की जय!"
भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर अपने बड़े भाई को गले लगाया और कहा—
"दाऊ! आपने आज ब्रजवासियों को एक और बड़े संकट से बचा लिया।"
देवलोक से पुष्पों की वर्षा होने लगी। गंधर्वों ने मधुर गीत गाए और दुंदुभियाँ बज उठीं।
ऋषि-मुनियों ने कहा—
"बलराम जी स्वयं अनंत शेष के अवतार हैं। उनका दिव्य बल सदैव धर्म और भक्तों की रक्षा के लिए समर्पित है।"
संध्या होने पर सभी ग्वालबाल गौओँ के साथ नंदगाँव लौट आए।
यशोदा मैया ने प्रेमपूर्वक कृष्ण और बलराम की आरती उतारी, रोहिणी माता ने दाऊ जी को हृदय से लगा लिया और नंद बाबा ने ब्राह्मणों को दान देकर पूरे ब्रज में उत्सव मनाया।
चारों ओर केवल एक ही स्वर गूँज रहा था—
"जय श्रीबलराम!"
"जय श्रीकृष्ण!"
🌺 आध्यात्मिक संदेश
प्रलम्बासुर केवल एक राक्षस नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपे छल, कपट, अहंकार और स्वार्थ का प्रतीक है। वह मित्र बनकर आया, जिससे यह शिक्षा मिलती है कि हर मुस्कुराता चेहरा सच्चा हितैषी नहीं होता।
बलराम जी गुरु-तत्त्व, आत्मबल, विवेक और धर्म के प्रतीक हैं। जब मनुष्य गुरु की शरण, सत्य के मार्ग और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति को अपनाता है, तब उसके भीतर छिपे प्रलम्बासुर रूपी दोष स्वयं नष्ट हो जाते हैं।
सच्ची शक्ति शरीर में नहीं, बल्कि सत्य, धर्म, भक्ति और सदाचार में होती है। अंततः विजय उसी की होती है जो धर्म के मार्ग पर चलता है।
॥ राधे-राधे ॥
॥ जय श्रीकृष्ण ॥
॥ जय श्रीबलराम ॥
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