सुशील मेहता
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झांसी की रानी बलिदान दिवस
भारत के गौरवशाली इतिहास में जब-जब वीरांगनाओं का जिक्र किया जाएगा, महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता और पराक्रम हमेशा लोगों को प्रेरणा देते रहेंगे। कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी रचना 'झांसी की रानी' में इसी पराक्रम का जिक्र करते हुए लिखा था- ''खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।'' अंग्रेजी हुकूमत के दांत खट्टे करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की आज पुण्यतिथि है। 18 जून सन् 1858 को अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुई थीं। हर साल 18 जून का दिन रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस के रूप में उनके शौर्य की याद दिलाता है। रानी लक्ष्मीबाई ने उस दौर में अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे, जब युद्ध के लिए सिर्फ पुरुषों को योग्य माना जाता था। रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध कौशल के साथ उनका मातृत्व धर्म भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।
14 साल की उम्र में मणिकर्णिका का विवाह झांसी के राजा गंगाधर नेवलकर से हुआ। यहीं से उनका नाम बदलकर मणिकर्णिका से लक्ष्मीबाई पड़ा। कुछ वर्षों बाद लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, हालांकि केवल चार वर्ष की आयु में ही उसका निधन हो गया। इसके बाद राजा ने दामोदर राव को दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया। हालांकि इसके कुछ दिनों में ही राजा की मृत्यु हो गई।
अंग्रेजों ने अवसर देखकर झांसी पर हमला बोल दिया। झांसी ने भी ईंट का जवाब पत्थर से दिया, इसमें कई अंग्रेज मारे गए।
17 जून को रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम युद्ध शुरू हुआ। युद्ध जब चरम पर पहुंचा, तब रानी दत्तक पुत्र को पीठ पर बांध घोड़े की लगाम मुंह में दबाए दुश्मनों से निर्भीकता पूर्वक युद्ध करने लगीं।
अंग्रे़जों से युद्ध करते हुए वह सोनरेखा नाले की ओर बढ़ चलीं, किन्तु दुर्भाग्यवश रानी का घोड़ा इस नाले को पार नहीं कर सका। उसी समय अंग्रेजों ने उनपर हमला कर दिया।इसी दौरान रानी का एक सैनिक उन्हें लेकर पास के एक सुरक्षित मंदिर में पहुंचा, जहां पुजारी से रानी ने कहा- मेरे बेटे दामोदर की रक्षा करना और अंग्रेजों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए।
इतना कहते हुए रानी ने प्राण त्याग दिए। मृत्यु के बाद वहां मौजूद रानी के अंगरक्षकों ने आनन-फानन में लकड़ियां एकत्रित कर रानी के पार्थिव शरीर को अग्नि दी।
Voice note #शत शत नमन
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