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- sn vyas🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२५/६ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚प्रारब्ध तो भोगने से ही छुटकारा मिलता है🦚 🔥 (बुद्धि कर्मानुसारिणी)🔥 *न निर्मित: केन न दृष्टपूर्वं* *न श्रूयते हेम मय कुरंग:।* *तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *सोने का मृग ब्रह्मा की सृष्टि में किसी जगह निर्माण हुआ, किसी ने देखा भी नहीं और सुना भी नहीं । फिर भी उस में भगवान राम को तृष्णा जगी,,, इसलिए कि मारीच रावण और तमाम राक्षसों के विनाश के लिए भगवान राम को ऐसी बुद्धि सूझी।* *केवो हतो रावण तत्व बेत्ता* *नवे ग्रहों निकट मां रहेता।* *हरी सीता कष्ट लह्युं कुबुद्धि* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *(अर्थात् ) -- कैसा था रावण तत्व बेत्ता,, नौ ग्रह उसके निकट रहते थे ,,, सीता का हरण करके कुबुद्धि से कष्ट मोल ले लिया ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि ।* *रावण महान ज्ञानी था ,, तमाम वेदों में वह पारंगत था,, भगवान शंकर का परम भक्त था ,, पुलस्त्य कुल का पवित्र ब्राह्मण था ,, महा शक्तिशाली था,, नौ ग्रह उसकी सेवा में रहते थे । वायु देवता उसके महल में झाड़ू लगाते थे । वरुण देवता उसके महल में पानी भरते थे । ऐसा ज्ञानी और शक्तिशाली राजा होने पर भी उसकी बुद्धि विपरीत हो गई । प्रारब्ध वश होकर उसकी बुद्धि सीता के हरण में नियुक्त हुई ।* *कैसे थे कौरव काल ज्ञानी,, द्वेष के साथ क्रोध से ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि। कौरव मूर्ख नहीं थे ,, गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य थे ,,, युधिष्ठिर-- अर्जुन के साथ पढ़ते थे ,,, धर्म माने क्या ? और अधर्म माने क्या ? उसकी उनको अक्ल थी ,,, खुद दुर्योधन ने महाभारत में कबूल किया है कि ---* *जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:* *जानामि अधर्मंम् न च मे निवृत्ति:।* *केनापि देवेन ह्यदि स्थितेन* *यथा नियुक्तो अस्मि तथा करोमि॥* *धर्म और अधर्म का ज्ञान होने पर भी अंतःकरण में पड़ी हुई कामना और वासना प्रारब्ध भोगने के लिए बुद्धि को उल्टी विपरीत घुमा देती है।* क्रमश: आगे अब सातवां भाग ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙6741
- भक्ति status.v#bhagvat #एकादशी #🙏🙏🌹 JAISHRI MAHA BHAGVATI JI🌹🙏🙏 #bhagvati Randal mata #bhagvati4957
- Laxmi upadhyay697090 जो हो सही हो#श्रीमत भागवत #भागवत एकादशी #भागवत एकादशी निमीत्त हार्दिक शुभेच्छा #भागवत एकादशी च्या हार्दिक शुभेच्छा 🙏🙏 #भागवत एकादशी सर्वांना शुभेच्छा 🚩🙏🚩722771
- Hukma Ram#श्रीमद् श्रीमद् भागवत कथा सत्संग #श्रीमद् भागवत कथा 💐💐💐 #श्रीमद् भागवत कथा🚩55
- Hukma Ram#श्रीमद् भागवत कथा 💐💐💐 #श्रीमद् श्रीमद् भागवत कथा सत्संग #श्रीमद् भागवत कथा🚩1511
- sn vyas# श्रीमद्भागवत - महापुराण “कलियुग की शुरुआत” 🌸📖 🌸📖 कलियुग की शुरुआत कैसे हुई? (श्रीमद्भागवत के अनुसार) ✨ “जब भगवान पृथ्वी से जाते हैं, तब धर्म धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है” श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, कलियुग की शुरुआत कोई अचानक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक क्रमिक परिवर्तन था—जो भगवान के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद आरंभ हुआ। --- 🌿 द्वापर युग का अंत और श्री कृष्ण का प्रस्थान जब श्री कृष्ण ने अपनी लीला पूर्ण की और पृथ्वी से अपने दिव्य धाम को प्रस्थान किया, तभी से द्वापर युग का अंत हो गया। 👉 यही क्षण था जब कलियुग का प्रवेश प्रारंभ हुआ। भगवान के रहते हुए धर्म, सत्य और न्याय का संतुलन बना रहता है, लेकिन उनके जाने के बाद अधर्म धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। --- 🌿 राजा परीक्षित और कलियुग का आगमन कलियुग के आरंभ में राजा परीक्षित शासन कर रहे थे— जो महान धर्मात्मा और अर्जुन के पौत्र थे। एक दिन उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति (जो वास्तव में कलियुग था) 👉 गाय (धर्म) और बैल (सत्य) को मार रहा है 😔 राजा परीक्षित ने तुरंत उसे रोक लिया और दंड देने लगे। तब कलियुग ने उनसे प्रार्थना की— 👉 “हे राजा, मुझे भी इस संसार में रहने का स्थान दें” --- 🌿 कलियुग को मिले 5 स्थान राजा परीक्षित ने पहले तो मना किया, लेकिन फिर दया करके उसे कुछ स्थान रहने के लिए दिए— 👉 जुआ (Gambling) 👉 मदिरा (Intoxication) 👉 व्यभिचार (Illicit relations) 👉 हिंसा (Violence) 👉 और अंत में — सोना (Gold / लालच) यही वे स्थान हैं जहाँ कलियुग सबसे अधिक प्रभावी होता है। --- 🌿 धर्म के चार स्तंभों का क्षय सत्य, दया, तप और शौच—ये धर्म के चार स्तंभ माने जाते हैं। सतयुग में ये चारों पूर्ण थे त्रेता में एक कम हुआ द्वापर में दो और कलियुग में केवल सत्य का एक अंश ही शेष रह जाता है 👉 इसलिए कलियुग में झूठ, कपट और स्वार्थ बढ़ जाते हैं --- 🌿 कलियुग की विशेषताएँ श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि कलियुग में— - लोग धन को ही सब कुछ मानेंगे - रिश्ते स्वार्थ पर आधारित होंगे - धर्म केवल दिखावा बन जाएगा - आयु, बल और स्मरण शक्ति कम होगी - झूठ और कपट सामान्य हो जाएगा --- 🌿 लेकिन एक महान वरदान भी है कलियुग जितना कठिन है, उतना ही सरल भी… 👉 इस युग में केवल भगवान का नाम जप ही मुक्ति का मार्ग है न कठोर तपस्या, न यज्ञ— 👉 केवल सच्चे मन से नाम स्मरण ही पर्याप्त है --- 🌼 गहरा संदेश: 👉 कलियुग बुरा नहीं, बल्कि परीक्षा का युग है 👉 जो व्यक्ति भक्ति में स्थिर रहता है, वही सच्चा विजेता है 👉 और सबसे बड़ा साधन है—भगवान का नाम🙏 जय श्री कृष्ण 🌸1910
- sn vyas#कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #श्रीमद्भागवत #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ 🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 🌺 भाग 1️⃣9️⃣ 🌺 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🥰कौन से क्रियमाण कर्म संचित में जमा होते नहीं ?🥰 *निम्नलिखित कर्म संचित में जमा होते नहीं-* *(1) अज्ञान अवस्था में किए हुए कर्म।* *(2)अभान अवस्था में किए हुए कर्म ।* *(3)मनुष्य के अलावा योनि में किए हुए कर्म ।* *(4)कर्तापन के अभिमान रहित किए हुए कर्म।* *(5) समष्टि के कल्याण के किए हुए कर्म ।* *(6)निष्काम कर्म।* क्रमश ✍🏽1812
- sn vyas# श्रीमद्भागवत - महापुराण जड़भरत के पिता उन्हें पंडित बनाना चाहते थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे एक भी श्लोक याद न कर सके। उनके पिता ने उन्हें जड़ समझ लिया। पिता की मृत्यु के पश्चात माँ भी चल बसी। कुटुंब में रह गये भाई और भाभियाँ, जड़भरत के साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थीं। जड़भरत इधर-उधर मजदूरी करते थे। जो कुछ मिल जाता था, खा लिया करते थे और जहाँ जगह मिलती थी, सो जाया करते थे। सुख-दु:ख और मान-सम्मान को एक समान समझते थे। भाईयों ने जब देखा कि उनके छोटे भाई के कारण उनकी अप्रतिष्ठा हो रही है, तो उन्होंने उन्हें खेती के काम में लगा दिया। जड़भरत रात-दिन खेतों की मेड़ों पर बैठकर खेतों की रखवाली करने लगे। वे शरीर से बड़े स्वस्थ और हट्टे-कट्टे थे। एक दिन राजा रहूगण पालकी पर बैठकर, आत्मज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कपिल मुनि के पास जा रहे थे। मार्ग में पालकी के एक कहार की मृत्यु हो गई। राजा रहूगण ने अपने सेवकों से कहा कि वे कोई दूसरा कहार खोजकर लाएं। रहूगण के सेवक किसी दूसरे कहार की खोज में निकल पड़े। उनकी दृष्टि खेत की मेड़ पर बैठे हुए जड़भरत पर पड़ी। सेवक उन्हें पकड़कर ले गए। जड़भरत ने बिना कुछ आपत्ति किए हुए, कहारों के साथ पालकी कंधे पर रख ली और बहुत संभल-संभल कर चलने लगे। उनके पैरों के नीचे कोई जीव दब न जाए इसलिए उनके पैर डगमगा उठते थे। इससे राजा रहूगण को झटका लगता था, उन्हें कष्ट होता था। राजा रहूगण ने कहारों से कहा, तुम लोग किस तरह चल रहे हो? संभलकर, सावधानी के साथ क्यों नहीं चलते?’ कहारों ने उत्तर दिया, ‘महाराज, हम तो सावधानी के साथ चल रहे हैं, किंतु यह नया कहार हमारे चलने में विघ्न पैदा करता है। इसके पैर रह-रह कर डगमगा उठते हैं।’ राजा रहूगण ने जड़भरत को सावधान करते हुए कहा, तुम ठीक से क्यों नहीं चलते? देखने में तो हट्टे-कट्टे मालूम होते हो। क्या पालकी लेकर ठीक से चला नहीं जाता? सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करो, नहीं तो दंड दूँगा।’ रहूगण का कथन सुनकर जड़भरत मुस्करा उठे। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘आप शरीर को दंड दे सकते हैं, पर मुझे नहीं दे सकते, मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ। मैं दंड और पुरस्कार दोनों से परे हूँ। दंड देने की तो बात ही क्या, आप तो मुझे छू भी नहीं सकते।’ जड़भरत की ज्ञान भरी वाणी सुनकर रहूगण विस्मय की लहरों में डूब गए। उन्होंने आज्ञा देकर पालकी नीचे रखवा दी। पालकी से उतरकर कहा, ‘महात्मन, मुझे क्षमा कीजिए। कृपया बताइए आप कौन हैं? कहीं आप वे कपिल मुनि ही तो नहीं हैं जिनके पास मैं आत्मज्ञान की शिक्षा लेने जा रहा था?’ जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूँ और न कोई ॠषि हूँ। मैं पूर्वजन्म में एक राजा था। मेरा नाम भरत था। मैंने भगवान श्रीहरि के प्रेम और भक्ति में घर-द्वार छोड़ दिया था। मैं हरिहर क्षेत्र में जाकर रहने लगा था। किंतु एक मृग शिशु के मोह में फँसकर मैं भगवान को भी भूल गया। मृगशिशु का ध्यान करते हुए जब शरीर त्याग किया, तो मृग का शरीर प्राप्त हुआ। मृग का शरीर प्राप्त होने पर भी भगवान की अनुकंपा से मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर बड़ा दु:खी हुआ कि मैंने कितनी अज्ञानता की थी! एक मृगी के बच्चे के मोह में फँसकर मैंने भगवान श्रीहरि को भुला दिया था। राजन, जब मैंने मृग शरीर का त्याग किया, तो मुझे यह शरीर प्राप्त हुआ। यह शरीर प्राप्त होने पर भी मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर कि मेरा यह जन्म व्यर्थ न चला जाए, अपने को छिपाए हुए हूँ। मैं दिन-रात परमात्मारूपी आत्मा में लीन रहता हूँ, मुझे शरीर का ध्यान बिलकुल नहीं रहता। राजन! इस जगत में न कोई राजा है न प्रजा, न कोई अमीर है, न कोई ग़रीब, न कोई कृषकाय है, न कोई स्थूलकाय, न कोई मनुष्य है, न कोई पशु। सब आत्मा ही आत्मा हैं। ब्रह्म ही ब्रह्म हैं। ‘राजन, मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। यही मानव-जीवन की सार्थकता है। यही श्रेष्ठ ज्ञान है, और यही श्रेष्ठ धर्म है।’ रहूगण जड़भरत से अमृत ज्ञान पाकर तृप्त हो गए। उन्होंने जड़भरत से निवेदन किया, ‘महात्मन! मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।’ जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन जो मैं हूँ, वही आप हैं। न कोई गुरु है, न कोई शिष्य। सब आत्मा हैं, ब्रह्म हैं।’ जड़भरत जब तक संसार में रहे, अपने आचरण और व्यवहार से अपने ज्ञान को प्रकट करते रहे। जब अंतिम समय आया, तो चिरनिद्रा में सो गए, ब्रह्म में समा गए। यह सारा जगत ब्रह्म से निकला है और ब्रह्म में ही समा जाता है। ब्रह्म की इस लीला को जो समझ पाता है, उसी को जगत में सुख और शांति प्राप्त होती है1014
- sn vyasभगवान श्रीकृष्ण के परम सखा और सारथी दारुक की, जो कृष्ण के महाप्रयाण (धरती छोड़ने) के आखिरी पलों के इकलौते गवाह थे। # श्रीमद्भागवत - महापुराण गांधारी के श्राप और ऋषियों के वश में आकर पूरा यदुवंश आपस में ही लड़कर नष्ट हो चुका था। प्रभास क्षेत्र (गुजरात) की धरती अपनों के ही खून से लाल थी। भगवान कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे, शांत भाव से अपने बाएं पैर को दाहिने घुटने पर रखकर लेटे हुए थे। वे जानते थे कि उनके जाने का समय आ गया है। तभी दूर से धूल उड़ाता हुआ कृष्ण का रथ वहाँ पहुँचा। रथ से उनका सारथी दारुक नीचे उतरा। अपने पूरे परिवार और यादवों को मरा हुआ देखकर दारुक पहले ही टूट चुका था, लेकिन जब उसने अपने स्वामी को इस अवस्था में देखा, तो वह उनके चरणों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा। दारुक ने रोते हुए कहा, "प्रभु! यह क्या हो गया? द्वारका सूनी हो गई, आपके भाई-बेटे सब चले गए। आप यहाँ अकेले इस अवस्था में क्यों लेटे हैं? उठिए नाथ! रथ पर बैठिए, हम वापस द्वारका चलेंगे।" तभी आकाश में एक अजीब सी हलचल हुई। दारुक के देखते ही देखते, भगवान कृष्ण का वह दिव्य रथ (जिस पर बैठकर उन्होंने महाभारत का युद्ध जीता था), उनके दिव्य अस्त्र (शार्ंग धनुष, पांचजन्य शंख और गदा) और उनके रथ के चारों चमत्कारी घोड़े... साक्षात दारुक की आँखों के सामने हवा में विलीन होकर आकाश की ओर चले गए। दारुक चीख पड़ा, "प्रभु! आपके अस्त्र और रथ भी आपको छोड़कर जा रहे हैं? मुझे मत छोड़िए नाथ! आपके बिना मैं सांस कैसे लूँगा? भगवान कृष्ण ने अपनी करुणामयी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में दारुक के लिए असीम प्रेम था। उन्होंने बहुत ही क्षीण और शांत स्वर में कहा: "दारुक! धीरज रखो। यह मेरी ही इच्छा से हो रहा है। इस संसार में जो भी आया है, उसे एक दिन जाना ही होता है। अब मेरा समय पूरा हुआ। तुम तुरंत द्वारका जाओ और मेरे वृद्ध माता-पिता (वसुदेव और देवकी) और अर्जुन को संदेश दो कि यदुवंश समाप्त हो चुका है। अर्जुन से कहना कि वह द्वारका की बची हुई स्त्रियों और बच्चों को लेकर हस्तिनापुर चला जाए, क्योंकि मेरे जाते ही यह सोने की द्वारका समुद्र में डूब जाएगी। दारुक का गला रुंध गया। उसने कहा, "प्रभु! मैं आपको इस सुनसान जंगल में तड़पता छोड़कर राजाओं को संदेश देने कैसे जाऊँ? मेरी उँगलियाँ आपके रथ की लगाम पकड़ने के लिए बनी हैं, आपकी मृत्यु का शोक संदेश बांटने के लिए नहीं। लेकिन स्वामी की आज्ञा टालना दारुक के वश में नहीं था। रोते-बिलखते, बार-बार पीछे मुड़कर देखते हुए दारुक द्वारका की ओर भागा। उधर, जारा नाम के एक शिकारी ने दूर से झाड़ियों के बीच हिलते हुए कृष्ण के पैर के तलवे को देखा। उसे लगा कि कोई हिरण बैठा है। उसने ज़हरीला बाण छोड़ दिया। वह बाण सीधे कृष्ण के पैर के तलवे में (मृग के धोखे में) जा लगा। जब शिकारी पास आया और उसने देखा कि उसने साक्षात भगवान को बाण मार दिया है, तो वह उनके पैरों में गिरकर रोने लगा। कृष्ण ने उसे सांत्वना दी और मुस्कुराते हुए अपने मानव शरीर का त्याग कर दिया। जब दारुक द्वारका पहुँचा और उसने यह समाचार सुनाया, तो मानो पूरी नगरी श्मशान बन गई। देवकी और वसुदेव ने तुरंत अपने प्राण त्याग दिए। अर्जुन जब वहाँ पहुँचे, तो वे कृष्ण के बिना इतने कमजोर हो गए कि उनसे अपना गांडीव धनुष भी नहीं उठा। कहा जाता है कि दारुक ने अर्जुन को सब सौंपने के बाद, अपनी आँखें बंद कीं और कृष्ण के चरणों का ध्यान करते हुए गंडकी नदी में समाधि ले ली। दारुक कोई बाहरी व्यक्ति या सामान्य सेवक नहीं था, बल्कि वह यदुवंश के राजा उग्रसेन के कुल से ही था। इस नाते वह रिश्ते में भगवान श्रीकृष्ण का भाई (चचेरा या ममेरा भाई) लगता था। वह मथुरा और द्वारका का एक अत्यंत सम्मानित यादव राजकुमार था। दारुक बचपन से ही श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप और उनके विचारों से अत्यंत प्रभावित था। जब कृष्ण ने कंस का वध किया और द्वारका नगरी की स्थापना की, तब द्वारका के शाही रथ के लिए सबसे योग्य और वफादार सारथी की खोज शुरू हुई। दारुक ने राजपाठ और ऐश्वर्य का त्याग कर स्वयं हाथ जोड़कर कृष्ण से प्रार्थना की—"प्रभु, मुझे राजा या सेनापति नहीं बनना। मेरी बस एक ही इच्छा है कि मैं जीवन भर आपके चरणों के पास बैठकर आपके रथ की लगाम संभालूँ। कृष्ण ने उसकी निष्काम भक्ति और सारथी विद्या में उसकी निपुणता को देखा और उसे अपना निजी सारथी और सखा बना लिया था । !!जय श्री कृष्णा!! 🙏हे महादेव🙏514
- sn vyas# श्रीमद्भागवत - महापुराण अक्रूर जी को यमुना में भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने अक्रूर जी को श्रीकृष्ण और बलराम को वृंदावन से मथुरा लाने के लिए भेजा, तब अक्रूर जी के मन में एक ओर दायित्व था, तो दूसरी ओर प्रभु के दर्शन का अनुपम उत्साह। वे जानते थे कि यह यात्रा उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य बनने वाली है। यात्रा करते-करते जब वे पवित्र यमुना तट पर पहुँचे, तो उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्नान करने का संकल्प लिया। जैसे ही वे यमुना के निर्मल जल में डुबकी लगाकर ध्यानमग्न हुए और नेत्र खोले, उनके सामने ऐसा दिव्य दृश्य प्रकट हुआ जिसे शब्दों में बाँधना कठिन था। उन्होंने देखा कि स्वयं श्रीहरि विष्णु अनंत शेषनाग की दिव्य शय्या पर विराजमान हैं। माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा कर रही हैं। चारों ओर वैकुंठ धाम का अलौकिक प्रकाश फैला हुआ था। देवता, ऋषि, सिद्ध और गंधर्व प्रभु की स्तुति में लीन थे। अक्रूर जी ने अनुभव किया कि समस्त ब्रह्मांड, सभी लोक और सम्पूर्ण सृष्टि उसी एक परम दिव्य सत्ता में समाहित है। जब वे यमुना से बाहर आए, तो आश्चर्यचकित रह गए। श्रीकृष्ण और बलराम पहले की भाँति रथ के पास मुस्कुराते हुए खड़े थे। उन्हें लगा मानो अभी जो देखा वह स्वप्न था। सत्य जानने के लिए वे पुनः यमुना में उतरे। इस बार भी वही दिव्य वैकुंठ, वही श्रीहरि का विराट स्वरूप और वही अलौकिक दर्शन उनके सामने प्रकट हो गए। अब अक्रूर जी का सारा संशय मिट चुका था। उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि वृंदावन के नंदलाल कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं परमब्रह्म, जगत के पालनकर्ता और समस्त लोकों के स्वामी हैं। प्रेम, श्रद्धा और भक्ति से उनका हृदय भर उठा। उनकी आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक भगवान को बार-बार प्रणाम किया और उनकी महिमा का गुणगान किया। उस एक दिव्य दर्शन ने अक्रूर जी के जीवन को सदा के लिए प्रभु-भक्ति में समर्पित कर दिया। ✨ इस दिव्य लीला से शिक्षा: जब मन निष्कपट श्रद्धा, अटूट विश्वास और सच्ची भक्ति के साथ भगवान की शरण में जाता है, तब प्रभु स्वयं अपने दिव्य स्वरूप का अनुभव कराते हैं। जिनका हृदय निर्मल और समर्पित होता है, वे हर कण में परमात्मा की अनंत महिमा का दर्शन कर सकते हैं।1118