sn vyas
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राजा बलि और भक्त प्रह्लाद की मार्मिक बाते जो आपके दिल को छू लेगा जरूर पढ़े :
पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद बाणासुर के लौट आने पर फिर दानव तुरंत शस्त्र लेकर देवताओं से युद्ध करने की इच्छा से लौट पड़े। अत्यधिक तेजस्वी विष्णु ने बलि के पुत्र बाण को अजेय जान करके देवताओं को बुलाकर कहा—आप लोग निर्भय होकर (सतर्कता से)
युद्ध कीजिये। विष्णु से आदेश पाकर इन्द्र आदि देवता दानवों के साथ युद्ध करने लगे। किंतु विष्णु अदृश्य हो गये। विष्णु को वहाँ से चला गया जानकर शुक्र ने बलि से कहा—बले! विष्णु ने देवताओं को अकेले युद्ध के लिये छोड़ दिया है। अब तुम जय प्राप्त करो॥
दुष्टजनों को ताड़ना देने वाले भगवान् विष्णु के चले जाने पर तेजस्वी बलि पुरोहित (शुक्राचार्य)-के वाक्य से हर्षित हो गदा लेकर देवसेना की ओर दौड़ा। बाणासुर ने हजार हाथों में अस्त्र-शस्त्र लेकर देवसेना पर चढ़ाई कर दी और हजारों का वध कर दिया। मुने! बलवान् मय दानव भी माया के द्वारा विभिन्न रूपों को धारणकर अमरों की सेना के साथ युद्ध करने लगा। विद्युज्जिह्व, पारिभद्र, वृषपर्वा, शतेक्षण, विपाक तथा विक्षर भी देवताओं की सेना पर टूट पड़े॥
भगवान् विष्णु के चले जाने पर इन्द्र आदि देवता दैत्यों के द्वारा मारे जाने पर युद्ध से पराङ्मुख हो गये। तीनों लोकों पर विजय पाने की इच्छा वाले बलि एवं बाण आदि सभी (दैत्य) भागते हुए देवताओं के पीछे दौड़ पड़े। दैत्यों के द्वारा पीड़ित इन्द्र आदि देवता डरकर और स्वर्ग को छोड़कर ब्रह्मलोक चले गये। फिर तो इन्द्र के साथ ही देवताओं के ब्रह्मलोक चले जाने पर बलि अपने पुत्र, भाई और बान्धवों के साथ स्वर्गका भोक्ता हो गया॥
ब्रह्मन्! भाग्यशाली बलि इन्द्र हुआ और बाण यम बना। मय दानव वरुण बन गया, राहु चन्द्र बना और ह्राद अग्नि बन गया। केतु सूर्य बना और शुक्राचार्य बृहस्पति बन गये। इसी प्रकार अन्य विभिन्न अधिकार-प्राप्त देवताओं के पदों पर असुरों ने अधिकार जमा लिया। पाँचवें कलियुग के प्रारम्भ और द्वापरयुग के आखिरी भाग में देवताओं और दैत्योंका भयङ्कर युद्ध हुआ, जब कि बलि इन्द्र बन गया। सातों पाताल और भूः, भुवः, स्वः नामके प्रसिद्ध तीनों लोक उसके वश में हो गये थे। इस प्रकार बलि दस लोकों का शासक बन गया था॥
इन्द्र बना हुआ बलि अत्यन्त दुर्लभ भोगों को स्वयं भोगता हुआ स्वर्ग में रहने लगा। वहाँ विश्वावसु आदिगन्धर्व उसकी सेवा करने लगे। देवर्षे! तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ (उसे प्रसन्न करने के लिये) नृत्य किया करती थीं और यक्ष तथा विद्याधर आदि बाजे बजाते थे। ब्रह्मन्! विविध भोगोंका भोग करते हुए दैत्येश्वर बलिने अपने पितामह प्रह्लादका मनसे स्मरण किया। पौत्र (बलि)-के स्मरण करते ही वे महान् भागवत (विष्णु के परम भक्त) असुर प्रह्लादजी पाताल से अक्षय स्वर्गलोक में चले आये॥
उन्हें आया हुआ देखते ही बलि ने सिंहासन छोड़कर और हाथ जोड़कर उनके चरणों की वन्दना की। प्रह्लाद चरणों में पड़े हुए वीर बलि को जल्दी से उठाकर और गले लगाकर उचित सुन्दर आसन पर बैठ गये। बलि ने उनसे कहा—अये तात! मैंने आपके पुण्य-प्रसाद से (प्राप्त) पराक्रम और बलसे देवताओंको जीत लिया और इन्द्रके राज्य को छीन लिया है। तात! आप मेरे पराक्रम से जीते गये देवों वाले इन उत्तम तीनों लोकों के राज्यका भोग करें और मैं आपके सामने नौकर बनकर रहूँ॥
तात! इस प्रकार आपके चरणों की पूजा से और आपके जूठे अन्नका भोजन करने से मैं पुण्यवान् हो जाऊँगा। सत्तम! विभो! राज्य का पालन करने वाले शासक में वह धीरता नहीं होती, जो धीरता गुरु की सेवा करने वालों में होती है। द्विजोत्तम! उसके बाद प्रह्लाद ने बलि के कहे वचन को सुनकर धर्म, अर्थ और कामका साधक वचन कहा। बलिराज! मैंने पहले शत्रुओं की विघ्न-बाधा से रहित राज्य किया है। (मैं) पृथ्वी का शासन और मित्रों का सत्कार कर चुका हूँ, इच्छानुसार दान दे चुका हूँ। (गृहस्थ-धर्मके नाते) मैंने पुत्रों को भी उत्पन्न किया है। किंतु (इन सबसे शान्ति न पाकर) इस समय मैं योगसाधक बन गया हूँ॥
पुत्र! मैंने तुम्हारे दिये (राज्य)-को विधिपूर्वक ग्रहणकर पुनः तुमको दे दिया। तुम गुरुओंकी सेवा में इसी प्रकार सदा लगे रहो। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! ऐसा वचन कहकर (प्रह्लाद ने बलि का) दाहिना हाथ पकड़कर उसे तुरंत इन्द्र के सिंहासन पर आसीन करा दिया। महेन्द्र के सभी रत्नों से बने शुभ सिंहासन पर बैठा हुआ वह दैत्यपति बलि इन्द्र के समान शोभितहुआ। उसपर बैठने के बाद उसने विनय पूर्वक हाथ जोड़कर मेघके गर्जन के समान गम्भीर वाणी में प्रह्लाद से कहा॥
तात! तीनों लोकों की रक्षा करते हुए जो मेरे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—(इन चारों पुरुषार्थों)-के लिये करणीय कार्य है, उसके लिये आप मुझे आदेश दें। उस (बलि)-के वाक्य के साथ ही शुक्रने (भी) प्रह्लाद से कहा—महाबाहो! जो उचित हो वह उत्तर दीजिये। विष्णु के भक्त प्रह्लादने बलि और शुक्र की बात सुनकर धर्म और अर्थ से युक्त श्रेष्ठ वचन कहा—पुत्र! भविष्य के लिये जो उपयुक्त हो, संसार के लिये जो हितकारी हो और धर्म के अनुकूल जो अर्थका उपार्जन और सभी प्राणियोंके अनुकूल जो काम वर्ग का फल है एवं इस लोक और परलोक में जो कल्याणकारी कर्म हो उसका आचरण करो। महामते! तुम जैसे प्रशंसनीय बन सको तथा जैसे तुम्हें यश प्राप्त हो एवं अकीर्ति न हो वैसे ही कर्तव्य को किया करो॥
उत्तम पुरुष उत्कृष्ट लक्ष्मीकी अभिलाषा इसीलिये करते हैं कि विपत्ति में पड़ा हुआ अच्छे कुल का व्यक्ति, धनहीन मित्र, वृद्ध, ज्ञाति, गुणी ब्राह्मण एवं यशोदायिनी कीर्ति उनके गृह में शान्तिपूर्वक निवास कर सकें। अतः हे पवित्र विचार एवं चेष्टावाले पुत्र! राज्यके स्थिर हो जानेपर जैसे (उपर्युक्त) कुलोत्पन्नादि (तुम्हारे गृह में) रह सकें एवं जैसे तुम लोक में यशस्वी हो सको वैसा ही प्रयत्न करो। पृथ्वी के सदा ब्राह्मणों से सुशोभित होने, क्षत्रियों से सनाथ होने, (वैश्योंद्वारा) भली भाँति (जोते)-बोये जाने तथा सेवारत (शूद्रों)-से सम्पन्न होने पर अच्छे राजाओं को समृद्धि प्राप्त होती है॥
इसलिये (तुम्हारे शासन में) वेद-शास्त्र से सम्पन्न उत्तम ब्राह्मण राजाओं से यज्ञ करवावें एवं श्रेष्ठ द्विजगण दिव्य यज्ञ किया करें। यज्ञकी अग्नि के धूएँ से राजा को शान्ति मिलती है। बले! तपस्या और वेदाध्ययन से संयुक्त यजन और अध्यापन में लगे रहने वाले ब्राह्मण तुम्हारी अनुमति पाकर पूजित हों। दैत्येन्द्र! क्षत्रिय स्वाध्याय एवं यज्ञ में निरत, दान देनेवाले, शस्त्र-जीवी तथा प्रजा-पालन करने वाले हों। वैश्यगण यज्ञाध्ययन से सम्पन्न, दाता, कृषिकर्त्ता एवं वाणिज्यजीवी हों तथा पशुपालन का कर्म करें॥
असुरश्रेष्ठ! शूद्रगण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा में सदा लगे रहें और तुम्हारे आदेश का सदा पालन करें। दितिजेश्वर! जब सभी वर्णके लोग अपने-अपने धर्म में स्थित रहते हैं तब निश्चय ही धर्म की वृद्धि होती है और धर्मकी वृद्धि होनेपर राजाकी उन्नति होती है। इसलिये बले! तुम सभी वर्णों को उनके धर्म में सदा लगाये रहो। उसकी (स्वधर्म की) वृद्धि से राजा की वृद्धि होती है। उसकी हानि से हानि कही गयी है। महासुरेन्द्र महात्मा प्रह्लाद बलि से ऐसा कहकर मौन हो गये। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) महर्षे! उसके बाद बलि ने इस प्रकार कहा—आपने जो आदेश दिया, उसी के अनुसार मैं कार्य करूँगा॥
!!जय श्री कृष्णा!!
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