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कलाम अमीर ख़ुसरो #सूफी काव्य
सूफी काव्य - कलाम ' मुफ़लिसानेम आमदः दर कू॰ए॰्तू शयअन लिल्लाह अज़ जमाल ए रू-एन्तू और कंगाल तुम्हारी गली में आए हैं ख़ुदा के मुफ़्लिस  (हम लिए अपने हुस्न -ओ जमाल से कुछ अ्ता कर दीजिए (याशनी दीदार की लज़्ज़त से प्रसन्नचित्त फ़रमाइए !) जन्नत उल ्मावास्त जानाँ कू॰एन्तू सज्दः गाहे आ' शिक़ाँ अब्रू ए॰तू (ऐ मेरे महबूब! तुम्हारी गली जन्नत उल ्मावा (सबसे ऊपर का स्वर्ग है, और तुम्हारे ख़ूबसूरत मेहराब ्दार अब्रू आ शिक़ों के लिए मेहराब ए सज्दा (मस्जिद में सज्दा करने की जगह) हैं l) ब॰कुशा जानिब ए ज़म्बील ए॰्मा दस्त आफ़रीं बर्दस्त ओ-बर बाज़ू ए॰्तू ज़ंबील ए-गदाई (भिक्षा माँगने वाली थैली) की (हमारी दस्त ओ बाज़ू पर तरफ़, अपने हाथ बढ़ाओ, तुम्हारे  आफ़रीं हैI) ग़ैर एन्तू नीस्त 4 आयद दर नज़र যা বুৎ যা লু-৫-নু যা কু-য-নু (जो कुछ भी निगाहों में आ॰ता है, वो तुम्हारे इ॰लावा कुछ नहीं या तो वो तुम्हारी शक्ल है या . ख़ुशबू या নদ্কাঠী . ख़स्लत ओ सिफ़त (याPनी मज़ाहिर ए फ़ित्रत में 5: नुमायाँ है) l हर जगह तुम्हारा जल्चा ख़ुसरो) (अमीर Motivational Videos App Want कलाम ' मुफ़लिसानेम आमदः दर कू॰ए॰्तू शयअन लिल्लाह अज़ जमाल ए रू-एन्तू और कंगाल तुम्हारी गली में आए हैं ख़ुदा के मुफ़्लिस  (हम लिए अपने हुस्न -ओ जमाल से कुछ अ्ता कर दीजिए (याशनी दीदार की लज़्ज़त से प्रसन्नचित्त फ़रमाइए !) जन्नत उल ्मावास्त जानाँ कू॰एन्तू सज्दः गाहे आ' शिक़ाँ अब्रू ए॰तू (ऐ मेरे महबूब! तुम्हारी गली जन्नत उल ्मावा (सबसे ऊपर का स्वर्ग है, और तुम्हारे ख़ूबसूरत मेहराब ्दार अब्रू आ शिक़ों के लिए मेहराब ए सज्दा (मस्जिद में सज्दा करने की जगह) हैं l) ब॰कुशा जानिब ए ज़म्बील ए॰्मा दस्त आफ़रीं बर्दस्त ओ-बर बाज़ू ए॰्तू ज़ंबील ए-गदाई (भिक्षा माँगने वाली थैली) की (हमारी दस्त ओ बाज़ू पर तरफ़, अपने हाथ बढ़ाओ, तुम्हारे  आफ़रीं हैI) ग़ैर एन्तू नीस्त 4 आयद दर नज़र যা বুৎ যা লু-৫-নু যা কু-য-নু (जो कुछ भी निगाहों में आ॰ता है, वो तुम्हारे इ॰लावा कुछ नहीं या तो वो तुम्हारी शक्ल है या . ख़ुशबू या নদ্কাঠী . ख़स्लत ओ सिफ़त (याPनी मज़ाहिर ए फ़ित्रत में 5: नुमायाँ है) l हर जगह तुम्हारा जल्चा ख़ुसरो) (अमीर Motivational Videos App Want - ShareChat