sn vyas
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#कर्म #कर्म ही पूजा है #धर्म कर्म
इस कथा में ब्रह्मा जी ने उन कर्मों (पापों) का विस्तार से वर्णन किया है जिन्हें करने से मनुष्य को नरक की प्राप्ति होती है। साथ ही, उन्होंने 'पुन्नम नरक' और उससे मुक्ति के उपाय (पुत्र और शिष्य के महत्व) को भी समझाया है:
ब्रह्मा जी कहते हैं कि मनुष्य अपने गलत कर्मों के कारण अलग-अलग नरकों का भागी बनता है:
पहला नरक: पराए मर्द या पराई स्त्री से संबंध बनाना, पापियों (बुरे लोगों) का साथ देना और किसी भी जीव या प्राणी के प्रति कठोर (क्रूर) व्यवहार करना।
दूसरा नरक: फलों की चोरी करना, बिना किसी काम या अच्छे उद्देश्य के आवारा घूमना और पेड़-पौधों (वनस्पतियों) को काटना महापाप है।
तीसरा नरक: ऐसी चीजें या उपहार लेना जो दूषित हैं या जिन्हें लेना मना है; जो मारने योग्य नहीं है उसे मारना या जेल (बंधन) में डालना; और सिर्फ धन-पैसे के लालच में आकर मुकद्मेबाजी या विवाद करना।
चौथा नरक: सभी जीवों को डराना-धमकाना, समाज की या सरकारी (सार्वजनिक) संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और अपने तय धर्म-नियमों (कर्तव्यों) से भटक जाना।
पांचवां नरक: जादू-टोना या तांत्रिक क्रियाओं से किसी को जान से मारना या मौत जैसा भयंकर कष्ट देना; मित्र (दोस्त) के साथ धोखा या छल करना, झूठी कसम खाना और कोई भी मीठी या अच्छी चीज अकेले-अकेले खा जाना।
छठा नरक: फूल, पत्ते और फल चुराना; किसी को बंधक या बंधुआ मजदूर बनाकर रखना; किसी को मिलने वाले हक या लाभ में रुकावट डालकर उसे बर्बाद कर देना और घोड़ा-गाड़ी या सवारी के सामानों की चोरी करना।
सातवां नरक: धोखे से राजा या सरकार के हिस्से (टैक्स आदि) को चुरा लेना, मूर्खता में आकर दुस्साहस करना और राजा की पत्नी से संबंध बनाना या देश/राज्य का नुकसान करना।
आठवां नरक: किसी चीज या इंसान को देखकर लालच में आ जाना, अपनी मेहनत से कमाए गए धर्म के धन को नष्ट करना और कड़वी या चुभने वाली बोली बोलना।
नवां नरक: किसी प्राणी को उसके देश या घर से निकाल देना, किसी का धन चुराना, पीठ पीछे किसी की बुराई (निंदा) करना और अपने ही भाइयों या सगे-संबंधियों से दुश्मनी करना।
दसवां नरक: अच्छे व्यवहार (शिष्टता) को छोड़ देना, भले लोगों का विरोध करना, नासमझ और छोटे बच्चे की हत्या करना, धार्मिक शास्त्रों या ग्रंथों की चोरी करना और अपने धर्म का नाश करना।
ग्यारहवां नरक: वेदों के छह अंगों की विद्या को नष्ट करना और राजनीति के छह गुणों (जैसे- संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, समाश्रय) का विरोध करना या उन्हें न मानना।
बारहवां नरक: भले लोगों से हमेशा दुश्मनी रखना, सदाचार (अच्छे आचरण) से दूर रहना, हमेशा बुरे कामों में लगे रहना और बिना संस्कारों के जीना।
तेरहवां नरक: धर्म, धन और अच्छी इच्छाओं का नुकसान करना, मोक्ष का रास्ता बंद करना और इन सभी के तालमेल में अड़चन पैदा करना।
चौदहवां नरक: कंजूस होना, धर्म से हीन होना, समाज द्वारा त्यागने योग्य काम करना और किसी के घर या संपत्ति में आग लगाना।
पंद्रहवां नरक: बिना सोच-विचार के काम करना (विवेकहीनता), दूसरों के अच्छे गुणों में भी कमियां ढूंढना, अपवित्र (अस्वच्छ) रहना और झूठ बोलना।
सोलहवां नरक: आलस करना, बहुत ज्यादा गुस्सा करना, सबके प्रति हिंसक या अत्याचारी बन जाना और घर जलाना।
ब्रह्मा जी कहते हैं कि पराई स्त्री की चाह रखना, सच से नफरत या ईर्ष्या करना, और घमंड या बदतमीजी भरा व्यवहार करना मनुष्य को नरक में ले जाता है।
पुन्नम नरक क्या है?
शास्त्रों के अनुसार 'पुत' या 'पुन्' नाम का एक बहुत ही भयानक नरक होता है। जो मनुष्य ऊपर बताए गए पाप करते हैं, वे इसी 'पुन्' नाम के नरक में जाते हैं।ब्रह्मा जी समझाते हैं कि जो पिता को इस 'पुन्' नाम के नरक से बचाता है (त्राण करता है), वही 'पुत्र' कहलाता है। अगर किसी व्यक्ति के पास अच्छी संतान (सुसन्तति) है, तो भगवान विष्णु (जनार्दन) उस संतान के अच्छे कर्मों से प्रसन्न हो जाते हैं और उस मनुष्य के 'पुन्नम' नाम के भयंकर नरक को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।
इसके बाद ब्रह्मा जी आगे के पापों के बारे में बताते हैं:
महापाप (सबसे बड़े पाप): देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों और पूर्वजों (पितरों) का कर्ज न चुकाना सभी वर्णों के कर्तव्यों को एक समान समझ लेना (मर्यादा न रखना) 'ॐ' (ओम्) के जाप की उपेक्षा करना जानबूझकर पाप करना मछली (मांस) खाना और ऐसी स्त्री से संबंध बनाना जिससे संबंध बनाना शास्त्र के खिलाफ हो।
घोर पाप: घी, तेल आदि खाने-पीने की चीजों को गलत तरीके से बेचना दुष्टों या चांडालों से दान लेना अपनी गलतियों को छुपाना और दूसरों की कमियां समाज में उछालना।
नरक के अन्य कारण, दूसरों की तरक्की देखकर ईर्ष्या से जलना, कड़वे वचन बोलना, निर्दयी होना, डरावने और अधर्म के काम करना।
ब्रह्मा जी कहते हैं कि यदि इन पापों से घिरा हुआ मनुष्य भी परमज्ञानी भगवान शिव (शंकर) की सच्चे दिल से आराधना करके उन्हें प्रसन्न कर लेता है, तो वह अपने सभी पापों पर जीत हासिल कर लेता है। उस जन्म में उसके द्वारा किए गए सभी शारीरिक, मानसिक और बोलकर किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, उसके माता-पिता, आश्रितों और भाई-बंधुओं के पाप भी मिट जाते हैं।अंत में ब्रह्मा जी कहते हैं कि बेटा (सुत) और शिष्य, दोनों का यही धर्म है कि वे अपने पूर्वजों और गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाएं। अगर वे इसके विपरीत काम करते हैं, तो उन्हें नर्क की प्राप्ति होती है।
विद्वान व्यक्ति को अपनी पुत्र और शिष्य की परंपरा हमेशा बनाए रखनी चाहिए। लेकिन, शिष्य की तुलना में पुत्र को ज्यादा श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि शिष्य गुरु को केवल कुछ (शेष) पापों से ही मुक्त करवा पाता है, जबकि एक सुयोग्य पुत्र अपने पिता को सभी प्रकार के घोर पापों और नरक से बचा लेता है।
!!जय श्री कृष्णा!!
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