sn vyas
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## सुंदरकांड ##सुंदरकांड पाठ चौपाई📙🚩 #जय सियाराम सुंदरकांड 🚩
श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में माता सीता और हनुमान जी का प्रथम मिलन और उनके बीच का संवाद भक्ति, विश्वास, धैर्य और मर्यादा का एक अत्यंत जीवंत और भावुक प्रसंग है। यह प्रसंग न केवल सुंदरकांड का प्राण है, बल्कि व्यावहारिक जीवन के लिए जीवन-दर्शन भी है।
कथा के अनुसार हनुमान जी लंका में माता सीता की खोज करते हुए अशोक वाटिका पहुंचे। उन्होंने देखा कि माता सीता एक वृक्ष (शिशुपा) के नीचे अत्यंत दुखी, दुर्बल और शोकमग्न बैठी हैं और निरंतर प्रभु श्रीराम का स्मरण कर रही हैं। उसी समय रावण वहां आया और उसने सीता जी को डराने-धमकाने का प्रयास किया, लेकिन माता सीता ने एक तिनके की ओट लेकर रावण को उसकी औकात याद दिला दी।
जब रावण और राक्षसियां वहां से चले गए, तब हनुमान जी ने विचार किया कि माता सीता के सामने अचानक प्रकट होना उन्हें डरा सकता है। इसलिए उन्होंने एक चतुर युक्ति अपनाई।
हनुमान जी वृक्ष की डालियों में छिप गए और मधुर स्वर में श्रीराम के गुणों और उनकी महिमा का गान करने लगे। रामचंद्र जी के गुणों को सुनकर माता सीता का दुःख मिट गया और वे उत्सुक होकर ऊपर देखने लगीं
तभी हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम द्वारा दी गई 'राम-नाम अंकित' मुद्रिका (अंगूठी) नीचे गिरा दी। सीता जी ने जैसे ही उस अंगूठी को देखा, वे उसे पहचान गईं और हर्ष व आश्चर्य से भर गईं कि लंका में श्रीराम की यह दिव्य अंगूठी कैसे आ सकती है?
जब सीता जी विस्मित थीं, तब हनुमान जी वृक्ष से नीचे उतर आए और अत्यंत विनम्र भाव से दूर खड़े होकर बोले
"राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥"
अर्थात हे माता जानकी! मैं श्रीरामजी का दूत हूँ। मैं करुणानिधान प्रभु की सच्ची शपथ खाकर कहता हूँ
शुरुआत में माता सीता को भ्रम हुआ कि कहीं यह रावण की कोई नई माया तो नहीं है। लेकिन हनुमान जी के वचनों की पवित्रता और श्रीराम के प्रति उनके अनन्य अनुराग को देखकर सीता जी का संदेह दूर हो गया।
सीता जी ने हनुमान जी से श्रीराम और लक्ष्मण जी का समाचार पूछा। हनुमान जी ने बताया कि प्रभु आपकी विरह-अग्नि में निरंतर तड़प रहे हैं, लेकिन वे कुशल हैं और आपको मुक्त कराने के लिए व्याकुल हैं।
जब सीता जी ने हनुमान जी के छोटे (वानर) रूप को देखकर शंका व्यक्त की कि इतने बड़े-बड़े राक्षसों से ये छोटे वानर कैसे लड़ेंगे, तब हनुमान जी ने अपना 'कनक भूधराकार' (सोने के पर्वत जैसा विशाल) रूप दिखाया। इससे माता सीता को पूर्ण विश्वास हो गया।
हनुमान जी की निष्ठा और शक्ति को देखकर माता सीता भावुक हो गईं। उन्होंने हनुमान जी को अमरता, अष्ट सिद्धि और नव निधि का वरदान दिया
"अष्ट सिधि नव निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥"
सीता-हनुमान मिलन का यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के कठिन समय के लिए एक मार्गदर्शिका है.. इस प्रसंग से हमें कई प्रकार की शिक्षाएं भी मिलती हैं.. जैसे..
हनुमान जी सीधे सीता जी के सामने कूदकर नहीं आए। वे जानते थे कि सीता जी डरी हुई हैं। इसलिए उन्होंने पहले 'राम-कथा' सुनाई, जिससे माता के मन में सकारात्मकता और विश्वास पैदा हुआ.
जब भी किसी अत्यंत तनावग्रस्त या दुखी व्यक्ति से बात करें, तो अपनी बात की शुरुआत ऐसे विषय से करें जो उसे मानसिक शांति और सुरक्षा का अहसास कराए।
माता सीता लंका जैसे भयानक स्थान पर राक्षसों के बीच घिरी थीं, फिर भी उन्होंने मर्यादा और अपने सतीत्व को नहीं छोड़ा। उन्होंने तिनके को ढाल बनाकर रावण के अहंकार को परास्त किया।
परिस्थितियां कितनी भी विपरीत और डरावनी क्यों न हों, अपने चरित्र, संस्कारों और धैर्य को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
हनुमान जी के पास इतनी शक्ति थी कि वे माता सीता को उसी समय पीठ पर बैठाकर श्रीराम के पास ला सकते थे (उन्होंने इसका प्रस्ताव भी रखा था), लेकिन जब सीता जी ने कहा कि ऐसा करना श्रीराम की कीर्ति के अनुकूल नहीं होगा, तो हनुमान जी ने तुरंत इसे स्वीकार किया। वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने नहीं, बल्कि आज्ञा का पालन करने आए थे।
सामर्थ्य होने के बाद भी मर्यादा में रहना और बड़ों की आज्ञा का पालन करना ही सच्ची महानता है।
जब सीता जी को 'राम नाम' की अंगूठी मिली, तो उनका पूरा परिदृश्य बदल गया। निराशा आशा में बदल गई।
जब जीवन में चारों तरफ अंधकार दिखे, तो ईश्वर पर या अपने सद्गुणों पर किया गया एक छोटा सा विश्वास भी आपको सबसे बड़ा संबल (सहारा) दे सकता है।
जय सियाराम 🙏
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