PI💞HA
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🙏🌺 “ममता की मूर्ति हमारी परम वंदनीया माताजी” 🌺🙏🕉🌞आपका दिन शुभ, मंगलमय, स्वस्थ एवं सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण हो।🌞🕉🙏
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#गायत्री परिवार मुंबई महाराष्ट्र #(अखिल विश्व – गायत्री परिवार) #गायत्री परिवार #युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के विचार✒️ #🙏प्रातः वंदन
जाड़े के दिन थे, सरदियाँ बढ़ने लगी थीं। सूर्यदेव की प्रचंडता सौम्यता में रूपांतरित हो चुकी थी। शांतिकुंज अपने पर्यावरण-परिवेश में अनूठे आध्यात्मिक तत्त्वों को समेटे तपोलीन था। इसकी अधिष्ठात्री शक्ति वंदनीया माताजी उन दिनों कुछ विशेष साधना उपक्रम में लीन थीं। अभी तक देवकन्याओं का आगमन नहीं हुआ था। ये सन् 1971 के दिन थे। तब शांतिकुंज का इतना विराट-विस्तार तो नहीं हुआ था, परंतु इसकी शोभा-सुषमा में दैवी दीप्ति थी। यह कुछ ऐसा था, जैसे कि स्वर्गाधिपति देवेंद्र ने अपने नंदन-कानन में एक मनोरम आश्रम का निर्माण कर आदिशक्ति को उनकी तप-साधना के लिए अर्पित कर दिया हो।
उन दिनों का शांतिकुंज सचमुच ही कुछ विशेष था। छायादार-फलदार वृक्षों, सुरभित लताओं एवं पुष्प-पादपों से घिरे इस शांतिकुंज की छवि अलौकिक थी। माताजी के सहयोग के लिए उस समय यहाँ केवल तीन कार्यकर्त्ता थे। एक बुजुर्ग महिला माताजी की सहायक थी, जो उन्हें भोजन निर्माण एवं अन्यान्य कार्यों में सहायता किया करती थी। परमपूज्य गुरुदेव उन दिनों हिमालय में तप-प्रवास में थे। इस तप-प्रवास में वे हिमालय में कई स्थानों पर रहे। कभी तो हिमालय के उन गुह्य, गहन एवं दिव्य क्षेत्रों में रहते थे, जहाँ ऋषियों, देवों एवं सिद्धों का आवास था तो कभी वे गंगोत्तरी के किन्हीं आश्रमों को अपना आवास बना लेते, जहाँ उनकी साधना एवं लेखन का क्रम चलता रहता।
लेकिन उस अवधि में उनसे प्रत्यक्ष संपर्क का कोई साधन न था। हाँ, एक फोटो अवश्य थी, जो उन्होंने वंदनीया माताजी को दी थी। यह फोटो यों तो दीखने में कागज का टुकड़ा भर थी, जिसमें परमपूज्य गुरुदेव की श्वेत-श्याम छवि अंकित थी, परंतु इसका आध्यात्मिक मोल गहरा था। इसके सामने बैठने पर माताजी का गुरुदेव से सहज-संपर्क हो जाता। वे उन्हें स्पष्टतः सुन सकती थीं, अपनी भावनाएँ कह सकती थीं। यह फोटो और अखंड दीपक की पवित्र सिद्ध ज्योति, परमपूज्य गुरुदेव से संपर्क के यही दो प्रत्यक्ष साधन थे। इन्हीं माध्यमों से वंदनीया माताजी का संपर्क न केवल परमपूज्य गुरुदेव से बल्कि हिमालय की दिव्य सत्ताओं से सहज हो जाता था।
इन प्रत्यक्ष माध्यमों के अतिरिक्त माताजी की भावचेतना तो सदा ही गुरुदेव की चेतना से संयुक्त थी, जिसमें अनेक दिव्य अनुभूतियों का अवतरण और निस्सरण होता रहता था, परंतु परमपूज्य गुरुदेव अपने तप की विशिष्ट भावभूमि में होते थे तो उनके संपर्क के ये दैवी साधन भी काम न करते। तब वंदनीया माताजी को सभी कुछ अपने एकाकी के भरोसे करना पड़ता था। मिशन की साज-सँभाल, कार्यकर्ताओं के सुख-दुःख सभी कुछ की देख-भाल वही करती थीं। अपनी संतानों की पीड़ा भला माँ न हरेगी तो कौन हरेगा! संतानें तो केवल 'माँ !' कहकर पुकारना जानती हैं, बाकी सब कुछ तो माँ को ही देखना और सँभालना पड़ता है।
इन दिनों कुछ ऐसी ही स्थिति थी। वंदनीया माताजी का गुरुदेव से संपर्क नहीं हो पा रहा था। यह बड़ी कसौटी की घड़ी थी। इस कसौटी पर विधाता केवल शांतिकुंज परिकर को ही नहीं, समूचे राष्ट्र को कस रहे थे। पड़ोसी देश की दुरभिसंधियों के कारण युद्ध की नौबत आ पहुँची थी। पाकिस्तान के हुक्मरान अपनी ही फौज से अपने ही देश के पूर्वी हिस्से को रौंदने में लगे थे। पूर्वी बंगाल पाक सैनिकों के बूटों के तले रौंदा जा रहा था। झुंड के झुंड शरणार्थी भारत आ रहे थे। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ कहने की कोशिश की तो पाकिस्तान ने पूर्वी मोर्चे पर हमला बोल दिया। आखिर हारकर उस समय देश की प्रधानमंत्री को युद्ध की घोषणा करनी पड़ी।
उस समय सैनिक साजो-सामान की दृष्टि से पाकिस्तान भारत से कुछ अधिक ही था। इसके ऊपर अमेरिका की धौंस, जो अपने सातवें जंगी बेड़े को लेकर चला आ रहा था। हालाँकि, भारतीय रणबांकुरे सीमाओं पर अपने शौर्य और साहस के परचम लहराते जा रहे थे। जल-थल नभ, हर कहीं भारतीय शौर्य की प्रचंड प्रभा प्रकट हो रही थी। फिर भी स्थिति विकट थी। राष्ट्र पर अंतरराष्ट्रीय दबाव की पेचीदगियाँ बढ़ती जा रही थीं। युद्ध को किसी भी तरह लंबा नहीं खींचा जा सकता। यही वे क्षण थे; जबकि परमपूज्य गुरुदेव हिमालय की ऋषि-सत्ताओं के साथ धर्म के पक्षधर बने असुरता से जूझ रहे थे।
वंदनीया माताजी शांतिकुंज में इस समय सर्वथा एकाकी थीं। अपने देव परिवार के बच्चों का दुःख मिटाते-मिटाते आखिर वे स्वयं बीमार पड़ गईं। शरीर की भी सीमा होती है। कष्ट के अतिरेक ने उनके शरीर को कई असह्य आघात दिए। अपने अगणित बच्चों के जटिल प्रारब्ध ने उनके सामने हृदयाघात की चुनौती खड़ी कर दी। इन कुछ ही दिनों में उन्हें बड़ी भीषण पीड़ा झेलनी पड़ी। उन दिनों हरिद्वार में चिकित्सा की विशेष सुविधाएँ भी न थीं। अपनी शारीरिक पीड़ा से विकल माताजी भावनात्मक रूप से भी अकेली थीं। उनका अपने आराध्य से कोई भी संपर्क नहीं हो पा रहा था।
तभी अचानक परिस्थितियों के घने अंधकार में अरुणोदय हुआ। एक शाम आकाशवाणी से समाचार प्रसारित हुआ कि भारतीय फौजों ने ढाका को घेर लिया। आखिरकार पाकिस्तानी सेना को विवश होकर आत्मसमर्पण करना पड़ा। पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने भारतीय जनरल जगजीतसिंह अरोड़ा को अपने हथियार सौंप दिए। 93 हजार सैनिकों का यह आत्मसमर्पण एक अनूठी ऐतिहासिक घटना थी। सारा भारत देश खुशी से झूम उठा।
इसके एक दिन बाद ही अचानक प्रातः काल परमपूज्य गुरुदेव शांतिकुंज आ पहुँचे। पूछने पर उन्होंने कहा- "मिशन को माताजी की जरूरत है और आज माताजी को मेरी जरूरत आ पड़ी है।" परमपूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार से माताजी शीघ्र स्वस्थ हो गईं। वैसे भी उन्हें कोई रोग तो था नहीं। यह केवल अनगिनत जनों के जटिल प्रारब्ध का असह्य बोझ था, जो गुरुदेव की आध्यात्मिक ऊर्जा से विनष्ट हो गया। माताजी के स्वस्थ होने पर गुरुदेव ने उनसे कहा- "माताजी ! आपको इतना संकट अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए। आप तो प्रकृति के नियमों को जानती हैं। भला इतना संकट स्वयं पर लेने की क्या जरूरत थी।"
माताजी ने गंभीरता से जवाब दिया- "मैं माँ हूँ। मेरी कोई संतान अपने किसी संकट की घड़ी में मुझे 'माँ' कहकर पुकारे और मैं उसके कष्ट को न मिटाऊँ-यह मेरे लिए असंभव है। आजकल और यह शरीर न रहने पर भी, जब भी मेरा कोई बेटा अथवा बेटी मुझे 'माँ' कहकर याद करेगी, मैं उसके दुःख अवश्य दूर करूँगी; भले ही इसके लिए मुझे कितनी ही यातना क्यों न सहनी पड़े।" माताजी के इस उत्तर पर गुरुदेव उन्हें देखते ही रह गए। फिर कुछ क्षण मौन रहकर वे बोले- "माताजी ! सचमुच आप सिर से पाँव तक केवल माँ हो।" आज उनकी पुण्यतिथि पर हम सब उनके बच्चे अपनी प्यारी माँ को याद करते हैं। बस, उनसे प्रार्थना यही है कि हे माँ! सदा ही आपके आँचल की स्नेहछाया हम बच्चों पर बनी रहे।
--युग निर्माण योजना : अगस्त, 2020 से साभार 🌺
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