sn vyas
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यह कथा शिव पुराण के रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) में विस्तार से आती है। यह कथा पवित्रता, पश्चाताप और भक्ति की एक अनुपम मिसाल है।
#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #शिव पार्वती
1. कथा की पृष्ठभूमि और संध्या का पश्चाताप
सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने अपने मन से कई मानस पुत्रों और एक अत्यंत सुंदर कन्या 'संध्या' की रचना की।
एक बार कामदेव के प्रभाव से ब्रह्मा जी और उनके मानस पुत्रों के मन में संध्या को देखकर विकार उत्पन्न हो गया। यद्यपि यह स्थिति क्षणिक थी, लेकिन संध्या को जब इस बात का अहसास हुआ, तो उन्हें अत्यंत ग्लानि और पश्चाताप हुआ।
संध्या ने विचार किया:
"मेरे कारण मेरे पिता और भाइयों के मन में काम-विकार उत्पन्न हुआ। ऐसा रूप और शरीर किस काम का? मैं इस शरीर का त्याग करूँगी और तपस्या के बल से यह मर्यादा स्थापित करूँगी कि इस संसार में जन्म लेने वाला कोई भी जीव काम-वासना से अंधा होकर अपनी माँ, बहन या बेटी पर बुरी दृष्टि न डाले।"
2. चंद्रभाग पर्वत पर घोर तपस्या
संध्या अपने शरीर का त्याग करने और मन की शुद्धि के लिए चंद्रभाग पर्वत (जहाँ से चंद्रभागा नदी निकलती है) पर चली गईं।
वहाँ उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू की। संध्या को तपस्या की सही विधि ज्ञात नहीं थी, इसलिए भगवान शिव की प्रेरणा से महर्षि वशिष्ठ (जो ब्रह्मचारी के रूप में आए थे) ने उन्हें शिव-आराधना की उचित विधि और मंत्र सिखाया।
संध्या ने निराहार रहकर और केवल जल-वायु का सेवन करते हुए हजारों वर्षों तक भगवान शिव की कठिन साधना की।
3. भगवान शिव का प्रकट होना और वरदान
संध्या की निश्छल भक्ति और कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।
संध्या ने शिवजी से तीन वरदान माँगे:
काम-मर्यादा की स्थापना: "हे प्रभु! इस संसार में मनुष्य जन्मांध या अबोध बालक के रूप में तो काम-रहित रहता ही है, लेकिन जब वह युवा हो, तभी उसमें काम-भावना जागे। बाल्यकाल और वृद्धावस्था में काम-विकार किसी को पीड़ित न करे।"
पतिव्रता धर्म की श्रेष्ठता: "त्रिलोक में मेरी जैसी कोई दूसरी पतिव्रता स्त्री न हो और जो भी मनुष्य मेरे इस चरित्र का स्मरण करे, वह पाप-मुक्त हो जाए।"
शरीर का त्याग: "चूंकि इस शरीर पर काम-दृष्टि पड़ी थी, इसलिए मैं इसे त्यागना चाहती हूँ। मैं जिस पुरुष को अपने पति रूप में विचारूँ, वही मेरा पति बने।"
भगवान शिव ने उनकी सभी इच्छाएँ स्वीकार कीं और कहा:
"हे संध्या! तुम्हारी तपस्या से संसार में काम-मर्यादा स्थापित होगी। तुमने जिस अग्नि में शरीर त्यागने का संकल्प लिया है, वही अग्नि तुम्हें नया और परम पवित्र रूप प्रदान करेगी।"
4. यज्ञ कुंड में आत्म-दाह और अरुंधति के रूप में पुनर्जन्म
शिवजी के अन्तर्ध्यान होने के बाद, संध्या उस समय चंद्रभाग पर्वत पर चल रहे महर्षि मेधातिथि के दिव्य यज्ञ के पास पहुँचीं।
भगवान शिव के वरदान के अनुसार, संध्या ने मन ही मन महर्षि वशिष्ठ (जिन्होंने उन्हें तपस्या का मार्ग दिखाया था) को अपना पति स्वीकार किया। इसके बाद वे निर्भय होकर प्रज्वलित यज्ञ-कुंड की अग्नि में प्रविष्ट हो गईं।
अग्निदेव ने उनके शरीर को दिव्य तेज में परिवर्तित कर दिया।
सूर्यदेव ने उनके उस दिव्य तेज को ग्रहण कर अपने रथ के मंडलों में स्थापित किया, जिसे हम 'प्रातः संध्या' और 'सायं संध्या' (दिन और रात का मिलन काल) के रूप में पूजते हैं।
यज्ञ-कुंड से संध्या एक परम पवित्र, निष्पाप और दिव्य कन्या के रूप में पुनः प्रकट हुईं। महर्षि मेधातिथि ने उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उनका नाम 'अरुंधति' (जिसका अर्थ है - जिसकी भक्ति और पतिव्रता धर्म को कोई रोक न सके) रखा।
5. महर्षि वशिष्ठ से विवाह और सप्तऋषि मंडल में स्थान
आगे चलकर देवी अरुंधति का विवाह महर्षि वशिष्ठ के साथ संपन्न हुआ।
वे अपने पतिव्रता धर्म और तपोबल के लिए समस्त ब्रह्मांड में पूजनीय हुईं। उनकी पवित्रता का मान रखते हुए उन्हें आकाश में सप्तऋषि मंडल (Seven Sages constellation) में महर्षि वशिष्ठ के ठीक बगल में स्थान दिया गया, जो आज भी 'वशिष्ठ-अरुंधति' नक्षत्र के रूप में चमकते हैं।
📖 पौराणिक सीख
संध्या की यह कथा यह संदेश देती है कि आत्म-शुद्धि, पश्चाताप और कठोर संकल्प से व्यक्ति अपने जीवन के किसी भी कलंक या संकट को मिटाकर अमरता और सर्वोच्च सम्मान प्राप्त कर सकता है।
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