Dr.Rakesh Sharma
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BREAKING NEWS - इन्दौरिया समाचार जगत Editorial राष्ट्र निर्माण की नींव है जनगणना जनगणना   केवल   सरकारी कार्य   नहीं, बल्कि   नागरिक सहभागिता का राष्ट्रीय अभियान है।किसी भी राष्ट्र की प्रगति ठोस तथ्यों और विश्वसनीय आंकड़ों पर आधारित होती है। जनगणना इसी सत्य का सबसे व्यापक और प्रामाणिक स्रोत है।जब हर व्यक्ति की सही गणना होती है, तभी सरकार वास्तविक आवश्यकताओं को समझ पाती है और योजनाएँ कागज से निकलकर जमीन पर प्रभावी रूप से उतरती हैं। आज जब देश डिजिटल जनगणना की दिशा में आगे बढ रहा है, तब आंकड़ों की शुद्धता और भी महत्वपूर्ण हो गई है। सही आंकड़े यह तय करते हैं कि कहाँ स्कूल बनेंगे, किस क्षेत्र में तक सड़क पहुँचेगी और किस अस्पताल की जरूरत है, किन गाँवों वर्ग को विशेष सहायता की आवश्यकता है। यदि आंकड़़े अधूरे या गलत हों, तो विकास की दिशा भी भटक सकती है। संतुलित विकास का अर्थ केवल शहरों की प्रगति नहीं , बल्कि गाँवों, कस्बों और दूरस्थ क्षेत्रों तक समान अवसर पहुँचाना है। यह तभी संभव है जब नीति निर्माण वास्तविक जनसंख्या संरचना, सामाजिक स्थिति और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाए। 76, কপল कार्य सरकारी बल्कि   नागरिक जनगणना सहभागिता का राष्ट्रीय अभियान है। प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह सही जानकारी प्रदान करे, और प्रत्येक अधिकारी का दायित्व है कि वह इसे ईमानदारी से दर्ज करे। जनगणना केवल लोगों की गिनती नहीं, बल्कि देश की दिशा प्रशासनिक प्रतिबद्धता, तकनीकी दक्षता तय करने वाला दर्पण है और जनसहयोग के समन्वय से ही यह राष्ट्रीय अभियान सफल हो सकता है। इन्दौरिया समाचार जगत Editorial राष्ट्र निर्माण की नींव है जनगणना जनगणना   केवल   सरकारी कार्य   नहीं, बल्कि   नागरिक सहभागिता का राष्ट्रीय अभियान है।किसी भी राष्ट्र की प्रगति ठोस तथ्यों और विश्वसनीय आंकड़ों पर आधारित होती है। जनगणना इसी सत्य का सबसे व्यापक और प्रामाणिक स्रोत है।जब हर व्यक्ति की सही गणना होती है, तभी सरकार वास्तविक आवश्यकताओं को समझ पाती है और योजनाएँ कागज से निकलकर जमीन पर प्रभावी रूप से उतरती हैं। आज जब देश डिजिटल जनगणना की दिशा में आगे बढ रहा है, तब आंकड़ों की शुद्धता और भी महत्वपूर्ण हो गई है। सही आंकड़े यह तय करते हैं कि कहाँ स्कूल बनेंगे, किस क्षेत्र में तक सड़क पहुँचेगी और किस अस्पताल की जरूरत है, किन गाँवों वर्ग को विशेष सहायता की आवश्यकता है। यदि आंकड़़े अधूरे या गलत हों, तो विकास की दिशा भी भटक सकती है। संतुलित विकास का अर्थ केवल शहरों की प्रगति नहीं , बल्कि गाँवों, कस्बों और दूरस्थ क्षेत्रों तक समान अवसर पहुँचाना है। यह तभी संभव है जब नीति निर्माण वास्तविक जनसंख्या संरचना, सामाजिक स्थिति और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाए। 76, কপল कार्य सरकारी बल्कि   नागरिक जनगणना सहभागिता का राष्ट्रीय अभियान है। प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह सही जानकारी प्रदान करे, और प्रत्येक अधिकारी का दायित्व है कि वह इसे ईमानदारी से दर्ज करे। जनगणना केवल लोगों की गिनती नहीं, बल्कि देश की दिशा प्रशासनिक प्रतिबद्धता, तकनीकी दक्षता तय करने वाला दर्पण है और जनसहयोग के समन्वय से ही यह राष्ट्रीय अभियान सफल हो सकता है। - ShareChat
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महा शिवरात्रि पर हार्दिक शुभकामनाए,, #🔴 क्राइम अपडेट #BREAKING NEWS #indoriatimes #news #samachar
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news - इन्दौरिया समाचार जगत Editorial समावेशन , विकास और संतुलन की नई राह राजस्थान सरकार आगामी वित्तीय वर्ष २०२६-२७ का बजट फ़रवरी २०२६ को राज्य विधानसभा में उपमुख्यमंत्री व वित्त 11 द्वारा प्रस्तुत करने जा रही है। यह मंत्री   दीया कुमारी बजट भजनलाल शर्मा सरकार का तीसरा वार्षिक बजट होगा, जिसमें समावेशी विकास, रोजगार, किसान उन्नति, आधारभूत अवसंरचना और सामाजिक सुरक्षा को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। इस बजट का स्वरूप स्पष्ट रूप से समाज के सभी वर्गों को के लिए रोजगार सृजन, महिलाओं और लाभ देने वाला है युवाओं स्वयं सहायता समूहों को समर्थन देने वाली योजनाओं का प्रस्ताव में वृद्धि का इशारा पेंशन और सामाजिक सुरक्षा कवरेज जारी है बुजुर्गों तथा वंचित नागरिकों को बेहतर किया जा रहा है जिससे सहायता मिलेगी किसानों  को कृषि-संबंधी सहायता, सिंचाई, डेयरी और पशुपालन जैसे क्षेत्र में पैकेज दिए जाने की अपेक्षा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी बजट सड़क, परिवहन, बिजली, पानी और राजस्थान का औद्योगिक विकास जैसे क्षेत्रों पर स्पष्ट रूप से फोकस करेगा  मिलेगा| जिससे राज्य में समग्र आर्थिक गतिविधि को बल वहीं उद्योग जगत ने बजट से व्यापार लागत घटाने और निवेश- अनुकूल नीतियों की अपेक्षा जताई है, q =1 MSME; लॉजिस्टिक्स और डिजिटल गवर्नेंस को भी प्राथमिकता देने की मांग उठी है। राजस्थान सरकार ने पिछले वर्ष की तुलना में राजस्व घाटे को लगभग   ?८,००० करोड़ तक कम करने में सफलता हासिल की है जो वित्तीय अनुशासन की ओर बढ़ता संकेत है। बजट तैयारी के समय सार्वजनिक ऋा और निवेश हालांकि, की चुनौतियाँ बनी हुई हैं, और कर्ज का स्तर अभी भी उच्च है - ध्यान में रखते हुए राज्य को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता इसी को की दिशा में कदम उठाने होंगे । बैठकों और बजट- पूर्व संवाद में मुख्यमंत्री ने ग्राम- स्तर पर विकास और पंचायती राज को बजट की मुख्य दिशा बताया है सड़कों  पानी और ग्रामीण रोजगार जैसे मुद्दों को बजट में स्थान देने की उम्मीद है विकासोन्मुख राजस्थान बजट २०२६ २७ समावेशी और नीतियों का मिक्स पेश करता प्रतीत होता है। यह न केवल सामाजिक सुरक्षा के विस्तार की दिशा में प्रयास करेगा, बल्कि अवसंरचना, कृषि, महिला सशक्तिकरण और रोजगार सृजन को भी प्राथमिकता देगा वित्तीय अनुशासन तथा निवेश- अनुकूल माहौल बनाए रखना राजकीय आर्थिक स्थिरता की दिशा में आवश्यक है बजट मांगों और अपेक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित करने का अवसर है अब यह इस पर निर्भर करेगा कि प्रस्तावित नीतियाँ धरातल पर किस हद तक लागू हो पाती हैं। इन्दौरिया समाचार जगत Editorial समावेशन , विकास और संतुलन की नई राह राजस्थान सरकार आगामी वित्तीय वर्ष २०२६-२७ का बजट फ़रवरी २०२६ को राज्य विधानसभा में उपमुख्यमंत्री व वित्त 11 द्वारा प्रस्तुत करने जा रही है। यह मंत्री   दीया कुमारी बजट भजनलाल शर्मा सरकार का तीसरा वार्षिक बजट होगा, जिसमें समावेशी विकास, रोजगार, किसान उन्नति, आधारभूत अवसंरचना और सामाजिक सुरक्षा को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। इस बजट का स्वरूप स्पष्ट रूप से समाज के सभी वर्गों को के लिए रोजगार सृजन, महिलाओं और लाभ देने वाला है युवाओं स्वयं सहायता समूहों को समर्थन देने वाली योजनाओं का प्रस्ताव में वृद्धि का इशारा पेंशन और सामाजिक सुरक्षा कवरेज जारी है बुजुर्गों तथा वंचित नागरिकों को बेहतर किया जा रहा है जिससे सहायता मिलेगी किसानों  को कृषि-संबंधी सहायता, सिंचाई, डेयरी और पशुपालन जैसे क्षेत्र में पैकेज दिए जाने की अपेक्षा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी बजट सड़क, परिवहन, बिजली, पानी और राजस्थान का औद्योगिक विकास जैसे क्षेत्रों पर स्पष्ट रूप से फोकस करेगा  मिलेगा| जिससे राज्य में समग्र आर्थिक गतिविधि को बल वहीं उद्योग जगत ने बजट से व्यापार लागत घटाने और निवेश- अनुकूल नीतियों की अपेक्षा जताई है, q =1 MSME; लॉजिस्टिक्स और डिजिटल गवर्नेंस को भी प्राथमिकता देने की मांग उठी है। राजस्थान सरकार ने पिछले वर्ष की तुलना में राजस्व घाटे को लगभग   ?८,००० करोड़ तक कम करने में सफलता हासिल की है जो वित्तीय अनुशासन की ओर बढ़ता संकेत है। बजट तैयारी के समय सार्वजनिक ऋा और निवेश हालांकि, की चुनौतियाँ बनी हुई हैं, और कर्ज का स्तर अभी भी उच्च है - ध्यान में रखते हुए राज्य को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता इसी को की दिशा में कदम उठाने होंगे । बैठकों और बजट- पूर्व संवाद में मुख्यमंत्री ने ग्राम- स्तर पर विकास और पंचायती राज को बजट की मुख्य दिशा बताया है सड़कों  पानी और ग्रामीण रोजगार जैसे मुद्दों को बजट में स्थान देने की उम्मीद है विकासोन्मुख राजस्थान बजट २०२६ २७ समावेशी और नीतियों का मिक्स पेश करता प्रतीत होता है। यह न केवल सामाजिक सुरक्षा के विस्तार की दिशा में प्रयास करेगा, बल्कि अवसंरचना, कृषि, महिला सशक्तिकरण और रोजगार सृजन को भी प्राथमिकता देगा वित्तीय अनुशासन तथा निवेश- अनुकूल माहौल बनाए रखना राजकीय आर्थिक स्थिरता की दिशा में आवश्यक है बजट मांगों और अपेक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित करने का अवसर है अब यह इस पर निर्भर करेगा कि प्रस्तावित नीतियाँ धरातल पर किस हद तक लागू हो पाती हैं। - ShareChat
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BREAKING NEWS - Editorial सुशासन की पहचान कोटपूतली - बहरोड़़ की यूडी टैक्स वसूली की नगर परिषद स्थिति सिर्फ आंकड़ों की नाकामी नहीं, बल्कि प्रशासनिक कमजोरी ক লঃয का खुला प्रमाण है। वित्तीय वर्ष २०२५-२६ में 3 करोड़ रुपये के सामने अब तक केवल १.११ करोड़ रुपये की वसूली यह सा़फ दर्शाती है कि परिषद न तो अपनी प्राथमिकताएं तय कर पाई और न ही इच्छाशक्ति दिखा सकी । के आंकड़े कोटपूतली- यूडी टैक्स নমুলী बहरोड़ नगर परिषद की प्रशासनिक सच्चाई उजागर कर रहे हैं। 3 करोड़ के लक्ष्य के सामने सिर्फ १ ९१ करोड़ की वसूली और १० बड़ी संपत्तियों पर १.३० करोड़ का बकाया यह साबित करता है कि समस्या डॉ. राकेश থIম संसाधनों की नहीं , इच्छाशक्ति की है। छोटे करदाता समय पर भुगतान कर रहे हैं, लेकिन करोडों दबाए बैठे बडे बकायेदार अब तक कार्रवाई से बाहर हैं बार-बार नोटिस और अंतिम अवसर की चेतावनियां तब सवालों के घेरे में आती हैं जब सीजिंग और जैसी ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती | कुर्की  सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सिर्फ १० बड़ी संपत्तियों पर १.३० करोड़ रुपये का बकाया लंबे समय से अटका हुआ है। यह लाजमी है कि॰ छोटे दुकानदार और सवाल TMN उठना जव गृहस्वामी समय पर टैक्स जमा कर रहे हैँ, तब करोड़ों दबाए बैठे लोग अब तक कार्रवाई से बाहर क्यों हैं ? नगर परिषद यह तर्क दे सकती है कि नोटिस दिए गए, मौके पर टीमें भेजी गईं, अंतिम अवसर दिया जा रहा है। लेकिन प्रशासन का काम सिर्फ चेतावनी देना नहीं , कार्रवाई करना होता है। अगर बार- बार नोटिस के बावजूद बकाया जमा नहीं हो रहा, तो इसका अर्थ सा़फ है-या तो प्रशासन दबाव में है,या फिर बड़े बकायेदारों को संरक्षण प्राप्त है। यह स्थिति शहर के विकास को सीधे प्रभावित करती है। सड़कें , नालियां, स्ट्रीट लाइट, पेयजल और स्वच्छता जैसे मूलभूत कार्य यूडी  टैक्स की राशि पर ही निर्भर होते हैं । जब वही राशि वसूल नहीं होगी, तो विकास कार्य ठप होना तय है और इसकी कीमत आम नागरिक चुकाता है अध्यक्ष और आयुक्त की भूमिका ऐसे समय में नगर परिषद निर्णायक होनी चाहिए थी। नेतृत्व का अर्थ है कठिन फैसले लेना, न कि फाइलों को तारीखों के बोझ तले दबाना १० बडी संपत्तियों पर होना इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक नियंत्रण सख्त कार्रवाई कमजोर पडा है। गौरतलब बात यह है कि आगामी २८ जनवरी की समय-्सीमा तय की गई है। यह तारीख केवल कैलेंडर पर दर्ज एक और दिन बनकर रह जाएगी या शहर की आवश्यकता के अनुरूप अपेक्षाओं पर और कानूनी खरी उतरेगी है।यदि इसके बाद भी सीजिंग, कुर्की कार्रवाई नहीं होती, तो यह सा़फ है कि नगर परिषद बड़े बकायेदारों के सामने नतमस्तक है यह तो स्पष्ट है कि कर व्यवस्था का सम्मान डर से नहीं, निष्पक्ष कार्रवाई से होता है। जब तक बड़े और छोटे करदाताओं के लिए एक ही मापदंड नहीं होगा, तब तक यह व्यवस्था भरोसे के लायक नहीं बन अब निर्णय नगर परिषद के हाथ में है या तो प्रशासन मजबूत सकती बने, या फिर बडे बकायेदारों की कमजोरी का पर्याय बनकर रह जाए ही सुशासन की पहचान है। निष्पक्ष कर वसूली Editorial सुशासन की पहचान कोटपूतली - बहरोड़़ की यूडी टैक्स वसूली की नगर परिषद स्थिति सिर्फ आंकड़ों की नाकामी नहीं, बल्कि प्रशासनिक कमजोरी ক লঃয का खुला प्रमाण है। वित्तीय वर्ष २०२५-२६ में 3 करोड़ रुपये के सामने अब तक केवल १.११ करोड़ रुपये की वसूली यह सा़फ दर्शाती है कि परिषद न तो अपनी प्राथमिकताएं तय कर पाई और न ही इच्छाशक्ति दिखा सकी । के आंकड़े कोटपूतली- यूडी टैक्स নমুলী बहरोड़ नगर परिषद की प्रशासनिक सच्चाई उजागर कर रहे हैं। 3 करोड़ के लक्ष्य के सामने सिर्फ १ ९१ करोड़ की वसूली और १० बड़ी संपत्तियों पर १.३० करोड़ का बकाया यह साबित करता है कि समस्या डॉ. राकेश থIম संसाधनों की नहीं , इच्छाशक्ति की है। छोटे करदाता समय पर भुगतान कर रहे हैं, लेकिन करोडों दबाए बैठे बडे बकायेदार अब तक कार्रवाई से बाहर हैं बार-बार नोटिस और अंतिम अवसर की चेतावनियां तब सवालों के घेरे में आती हैं जब सीजिंग और जैसी ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती | कुर्की  सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सिर्फ १० बड़ी संपत्तियों पर १.३० करोड़ रुपये का बकाया लंबे समय से अटका हुआ है। यह लाजमी है कि॰ छोटे दुकानदार और सवाल TMN उठना जव गृहस्वामी समय पर टैक्स जमा कर रहे हैँ, तब करोड़ों दबाए बैठे लोग अब तक कार्रवाई से बाहर क्यों हैं ? नगर परिषद यह तर्क दे सकती है कि नोटिस दिए गए, मौके पर टीमें भेजी गईं, अंतिम अवसर दिया जा रहा है। लेकिन प्रशासन का काम सिर्फ चेतावनी देना नहीं , कार्रवाई करना होता है। अगर बार- बार नोटिस के बावजूद बकाया जमा नहीं हो रहा, तो इसका अर्थ सा़फ है-या तो प्रशासन दबाव में है,या फिर बड़े बकायेदारों को संरक्षण प्राप्त है। यह स्थिति शहर के विकास को सीधे प्रभावित करती है। सड़कें , नालियां, स्ट्रीट लाइट, पेयजल और स्वच्छता जैसे मूलभूत कार्य यूडी  टैक्स की राशि पर ही निर्भर होते हैं । जब वही राशि वसूल नहीं होगी, तो विकास कार्य ठप होना तय है और इसकी कीमत आम नागरिक चुकाता है अध्यक्ष और आयुक्त की भूमिका ऐसे समय में नगर परिषद निर्णायक होनी चाहिए थी। नेतृत्व का अर्थ है कठिन फैसले लेना, न कि फाइलों को तारीखों के बोझ तले दबाना १० बडी संपत्तियों पर होना इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक नियंत्रण सख्त कार्रवाई कमजोर पडा है। गौरतलब बात यह है कि आगामी २८ जनवरी की समय-्सीमा तय की गई है। यह तारीख केवल कैलेंडर पर दर्ज एक और दिन बनकर रह जाएगी या शहर की आवश्यकता के अनुरूप अपेक्षाओं पर और कानूनी खरी उतरेगी है।यदि इसके बाद भी सीजिंग, कुर्की कार्रवाई नहीं होती, तो यह सा़फ है कि नगर परिषद बड़े बकायेदारों के सामने नतमस्तक है यह तो स्पष्ट है कि कर व्यवस्था का सम्मान डर से नहीं, निष्पक्ष कार्रवाई से होता है। जब तक बड़े और छोटे करदाताओं के लिए एक ही मापदंड नहीं होगा, तब तक यह व्यवस्था भरोसे के लायक नहीं बन अब निर्णय नगर परिषद के हाथ में है या तो प्रशासन मजबूत सकती बने, या फिर बडे बकायेदारों की कमजोरी का पर्याय बनकर रह जाए ही सुशासन की पहचान है। निष्पक्ष कर वसूली - ShareChat
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samachar - Editoriall बेटी बचाओ ' केवल नारा नहीं छिटपुट  भ्रूण लिंग जांच कोई अपराध नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित तंत्र है कोटपूतली - बहरोड़़ जैसे नवगठित जिले में भ्रूण लिंग जांच गिरोह का बेखौफ पनपना प्रशासनिक सतर्कता पर गंभीर రాని 3 पीसीपीएनडीटी ೯| কনো संवेदनशील कानून का प्रभावी क्रियान्वयन केवल अधिसूचनाओं और समितियों तक নী  হমন্ধা   মীখা সীসিন रह   जाए लाभ अपराधी नेटवर्क को मिलता हैजो यहां स्पष्ट रूप से दिख रहा है। समस्या की जड़ निगरानी, समन्वय और डॉ. राकेश शर्मा त्वरित कार्रवाई में आई शिथिलता है। नए जिला व्यवस्था जिले के गठन के बाद भी लंबे समय तक पुरानी के तहत संचालन, जिम्मेदारियों की अस्पष्टता और संसाधनों की कमी ने प्रवर्तन को कमजोर किया परिणामस्वरूप  संगठित गिरोह तकनीक, डिजिटल भुगतान और अंतर  राज्यीय नेटवर्क आगे निकलते रहे। कानून से का लाभ उठाकर कोटपूतली बहरोड़ जिले में भ्रूण लिंग जांच गिरोह का बेधड़क फलना- फूलना केवल अपराध की खबर नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का खुला प्रमाण है। सवाल सीधा है क्या कानून केवल कागजों में लागू होता है ? पीसीपीएनडीटी जैसा कठोर कानून यदि जमीन पर निष्क्रिय रहे, तो अपराधियों का हौसला बढ़ना स्वाभाविक है। इस ढिलाई ने भ्रूण हत्या के सौदागरों को सा़फ संदेश दे दिया कि यहां डरने की जरूरत नहीं | यही कारण है कि गिरोह संगठित रूप से॰ तकनीक और डिजिटल लेन- देन के सहारे   प्रशासन को में धूल  आंखों झोंकते रहे। चूक नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध के यह कोई मामूली प्रति असंवेदनशीलता है। बेटी के जन्म से पहले ही उसका सौदा होना सभ्य समाज पर कलंक है, और इससे भी बड़ा कलंक यह है कि जिम्मेदार महकमे तमाशबीन बने रहें | केवल छापे और प्रेस नोट जारी कर जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाडा़ जा सकता यह भी स्पष्ट है कि भ्रूण लिंग जांच कोई छिटपुट अपराध नहीं बल्कि सुव्यवस्थित तंत्र है॰ जिसमें उपकरण   एजेंट फर्जी शामिल हैं | ऐसे में केवल छापे पहचान और चिकित्सा दुरुपयोग या गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं | बल्कि समाज और चिकित्सा जगत की नैतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम है मांग आपूर्ति जब तक की श्रृंखला टूटेगी नहीं, तब तक कानून का भय सीमित रहेगा | आवश्यकता है जिला स्तर पर समर्पित पीसीपीएनडीटी सेल, नियमित  ऑडिट डेटा आधारित   निगरानी, अंतर- विभागीय तय होनी चाहिए। दोषी डॉक्टर, तालमेल और जवाबदेही बिचौलिए और संरक्षण देने वाले अधिकारी ~ सब पर एक समान जैसे अभियान हथौडा चलना चाहिए बेटी बचाओ ননো खोखले नारे बनकर रह जाएंगे | Editoriall बेटी बचाओ ' केवल नारा नहीं छिटपुट  भ्रूण लिंग जांच कोई अपराध नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित तंत्र है कोटपूतली - बहरोड़़ जैसे नवगठित जिले में भ्रूण लिंग जांच गिरोह का बेखौफ पनपना प्रशासनिक सतर्कता पर गंभीर రాని 3 पीसीपीएनडीटी ೯| কনো संवेदनशील कानून का प्रभावी क्रियान्वयन केवल अधिसूचनाओं और समितियों तक নী  হমন্ধা   মীখা সীসিন रह   जाए लाभ अपराधी नेटवर्क को मिलता हैजो यहां स्पष्ट रूप से दिख रहा है। समस्या की जड़ निगरानी, समन्वय और डॉ. राकेश शर्मा त्वरित कार्रवाई में आई शिथिलता है। नए जिला व्यवस्था जिले के गठन के बाद भी लंबे समय तक पुरानी के तहत संचालन, जिम्मेदारियों की अस्पष्टता और संसाधनों की कमी ने प्रवर्तन को कमजोर किया परिणामस्वरूप  संगठित गिरोह तकनीक, डिजिटल भुगतान और अंतर  राज्यीय नेटवर्क आगे निकलते रहे। कानून से का लाभ उठाकर कोटपूतली बहरोड़ जिले में भ्रूण लिंग जांच गिरोह का बेधड़क फलना- फूलना केवल अपराध की खबर नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का खुला प्रमाण है। सवाल सीधा है क्या कानून केवल कागजों में लागू होता है ? पीसीपीएनडीटी जैसा कठोर कानून यदि जमीन पर निष्क्रिय रहे, तो अपराधियों का हौसला बढ़ना स्वाभाविक है। इस ढिलाई ने भ्रूण हत्या के सौदागरों को सा़फ संदेश दे दिया कि यहां डरने की जरूरत नहीं | यही कारण है कि गिरोह संगठित रूप से॰ तकनीक और डिजिटल लेन- देन के सहारे   प्रशासन को में धूल  आंखों झोंकते रहे। चूक नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध के यह कोई मामूली प्रति असंवेदनशीलता है। बेटी के जन्म से पहले ही उसका सौदा होना सभ्य समाज पर कलंक है, और इससे भी बड़ा कलंक यह है कि जिम्मेदार महकमे तमाशबीन बने रहें | केवल छापे और प्रेस नोट जारी कर जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाडा़ जा सकता यह भी स्पष्ट है कि भ्रूण लिंग जांच कोई छिटपुट अपराध नहीं बल्कि सुव्यवस्थित तंत्र है॰ जिसमें उपकरण   एजेंट फर्जी शामिल हैं | ऐसे में केवल छापे पहचान और चिकित्सा दुरुपयोग या गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं | बल्कि समाज और चिकित्सा जगत की नैतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही अहम है मांग आपूर्ति जब तक की श्रृंखला टूटेगी नहीं, तब तक कानून का भय सीमित रहेगा | आवश्यकता है जिला स्तर पर समर्पित पीसीपीएनडीटी सेल, नियमित  ऑडिट डेटा आधारित   निगरानी, अंतर- विभागीय तय होनी चाहिए। दोषी डॉक्टर, तालमेल और जवाबदेही बिचौलिए और संरक्षण देने वाले अधिकारी ~ सब पर एक समान जैसे अभियान हथौडा चलना चाहिए बेटी बचाओ ননো खोखले नारे बनकर रह जाएंगे | - ShareChat
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indoriatimes - Editorial सशक्त, पारदर्शी , जवाबदेह लोकतंत्र की बुनियाद लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ उससे निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहितकारी भूमिका की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन उसके अनुरूप सुविधाएं, सुरक्षा और ल्सीऔत अब भी पर्याप्त नहीं हैं। जिला सम्मान कार्यरत ತತ स्तर पर पत्रकार मोईँ মমাঙনী স সহামন সা মসাত ক নীব बनकर कार्य कर रहे हैं किंतु उनके लिए 7 स्थायी और व्यवस्थित कार्यस्थल उपलब्ध नहीं डॉ राकेश शर्मा होना गंभीर चिंता का विषय है। सरकार और प्रशासन से यह अपेक्षा की जाती है कि॰वे पत्रकारिता की जमीनी आवश्यकताओं को समझें। प्रत्येक जिला एवं उपखंड मुख्यालय पर प्रेस क्लब कार्यालय की स्थापना केवल पत्रकारों की सुविधा का विषय नहीं , बल्कि सूचना तंत्र को मजबूत करने का आधार है। प्रेस क्लब पत्रकारों को संगठित मंच देता है, जिससे समाचार संकलन , प्रेस वार्ता, दस्तावेजी कार्य और प्रशासन से संवाद अधिक प्रभावी और पारदर्शी हो पाता है। प्रेस क्लब की मौजूदगी से प्रशासन और मीडिया के बीच ा है और जनसूचना " होता है, अफवाहों पर नियंत्रण रहता সনান बेहतर  प्रणाली अधिक विश्वसनीय बनती है। साथ ही यह जिम्मेदार पत्रकारिता को प्रोत्साहित करता है और फर्जी पत्रकारिता पर प्रभावी अंकुश लगाने में सहायक सिद्ध होता है।  पत्रकारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक आज जब संरक्षण को लेकर लगातार प्रश्न खड़े हो रहे हैं॰ तब प्रेस क्लब आपात सहायता, प्रशिक्षण और अधिकार संरक्षण का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। संगठित पत्रकार ही लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं । अतः सरकार एवं प्रशासन से यह संपादकीय अपील है कि॰ लोकतंत्र को सशक्त, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से प्रत्येक जिला एवं उपखंड मुख्यालय पर प्रेस क्लब कार्यालय की स्थापना को प्राथमिकता दें । यह निर्णय न केवल पत्रकारों के हित में होगा, बल्कि जनहित और सुशासन की दिशा में एक निर्णायक  सिद्ध होगा । कदम Editorial सशक्त, पारदर्शी , जवाबदेह लोकतंत्र की बुनियाद लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ उससे निष्पक्षता, निर्भीकता और जनहितकारी भूमिका की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन उसके अनुरूप सुविधाएं, सुरक्षा और ल्सीऔत अब भी पर्याप्त नहीं हैं। जिला सम्मान कार्यरत ತತ स्तर पर पत्रकार मोईँ মমাঙনী স সহামন সা মসাত ক নীব बनकर कार्य कर रहे हैं किंतु उनके लिए 7 स्थायी और व्यवस्थित कार्यस्थल उपलब्ध नहीं डॉ राकेश शर्मा होना गंभीर चिंता का विषय है। सरकार और प्रशासन से यह अपेक्षा की जाती है कि॰वे पत्रकारिता की जमीनी आवश्यकताओं को समझें। प्रत्येक जिला एवं उपखंड मुख्यालय पर प्रेस क्लब कार्यालय की स्थापना केवल पत्रकारों की सुविधा का विषय नहीं , बल्कि सूचना तंत्र को मजबूत करने का आधार है। प्रेस क्लब पत्रकारों को संगठित मंच देता है, जिससे समाचार संकलन , प्रेस वार्ता, दस्तावेजी कार्य और प्रशासन से संवाद अधिक प्रभावी और पारदर्शी हो पाता है। प्रेस क्लब की मौजूदगी से प्रशासन और मीडिया के बीच ा है और जनसूचना " होता है, अफवाहों पर नियंत्रण रहता সনান बेहतर  प्रणाली अधिक विश्वसनीय बनती है। साथ ही यह जिम्मेदार पत्रकारिता को प्रोत्साहित करता है और फर्जी पत्रकारिता पर प्रभावी अंकुश लगाने में सहायक सिद्ध होता है।  पत्रकारों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक आज जब संरक्षण को लेकर लगातार प्रश्न खड़े हो रहे हैं॰ तब प्रेस क्लब आपात सहायता, प्रशिक्षण और अधिकार संरक्षण का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। संगठित पत्रकार ही लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं । अतः सरकार एवं प्रशासन से यह संपादकीय अपील है कि॰ लोकतंत्र को सशक्त, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से प्रत्येक जिला एवं उपखंड मुख्यालय पर प्रेस क्लब कार्यालय की स्थापना को प्राथमिकता दें । यह निर्णय न केवल पत्रकारों के हित में होगा, बल्कि जनहित और सुशासन की दिशा में एक निर्णायक  सिद्ध होगा । कदम - ShareChat