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व्यस्त रहें, मस्त रहें
#गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख
गीता - उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। নিমুন্তা নানুপহমলি দহমলি ব্রানমপ্লপ: Il अथवा शरौरमें शरोरको छोड़कर जाते हुएको fea अथवा विपयोंको भोगते हुएको हुएको इस भी अज्ञानीजन সক্ষা নীনা गुणोंसे ಶ೯ हुएको नहों जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रोंवाले विवेकशील ज्ञानी हौ तत्त्वसे जानते हैं Il १० Il यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। यतन्तोउप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः I।  करनेवाले योगीजन भौ अपने हृदयमें स्थित 47 fg इस आत्माको तत्त्वसे जानते हैं; নিক্কান अपने अन्तःकरणको शुद्ध नहीं किया हैं॰ ऐसे अज्ञानौजन तो यत्न करते रहनेपर भौ इस आत्माको নঙ্কী ভানন Il ?? Il यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेउखिलम्। यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नो तत्तेजो विद्धि मामकम् I।  सूर्यमें स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित  करता हैं तथा जो तैज चन्द्रमामें हैं और जो अग्निमें है- उसको तू मेरा ही तेज जान II १२ II गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा | पुष्णामि चौपधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः II श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्। নিমুন্তা নানুপহমলি দহমলি ব্রানমপ্লপ: Il अथवा शरौरमें शरोरको छोड़कर जाते हुएको fea अथवा विपयोंको भोगते हुएको हुएको इस भी अज्ञानीजन সক্ষা নীনা गुणोंसे ಶ೯ हुएको नहों जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रोंवाले विवेकशील ज्ञानी हौ तत्त्वसे जानते हैं Il १० Il यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। यतन्तोउप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः I।  करनेवाले योगीजन भौ अपने हृदयमें स्थित 47 fg इस आत्माको तत्त्वसे जानते हैं; নিক্কান अपने अन्तःकरणको शुद्ध नहीं किया हैं॰ ऐसे अज्ञानौजन तो यत्न करते रहनेपर भौ इस आत्माको নঙ্কী ভানন Il ?? Il यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेउखिलम्। यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नो तत्तेजो विद्धि मामकम् I।  सूर्यमें स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित  करता हैं तथा जो तैज चन्द्रमामें हैं और जो अग्निमें है- उसको तू मेरा ही तेज जान II १२ II गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा | पुष्णामि चौपधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः II श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #मेरे विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - १८ मई दया अशक्तों के लिये संसार को कोमल बनाती है और शक्तिमानों के लिए संसार को उन्नत बनाती है। M १८ मई दया अशक्तों के लिये संसार को कोमल बनाती है और शक्तिमानों के लिए संसार को उन्नत बनाती है। M - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - 18 मई में कभी गलत मत बोलो, ಶಘ ठीक हो ही जाता है, मूड तो पर बोली हुई बातें , वापस नही आती। সমন্সী] इसे MN 18 मई में कभी गलत मत बोलो, ಶಘ ठीक हो ही जाता है, मूड तो पर बोली हुई बातें , वापस नही आती। সমন্সী] इसे MN - ShareChat
#📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #❤️जीवन की सीख #मेरे विचार
📖जीवन का लक्ष्य🤔 - किसी और के दीदार के लिए उठती नहीं ये आँखें बेईमान आँखों में थोड़ी सी शराफ़त आज भी है... किसी और के दीदार के लिए उठती नहीं ये आँखें बेईमान आँखों में थोड़ी सी शराफ़त आज भी है... - ShareChat
#मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - से आशाएं दूसरो छोड़ते चलिए ! निराशाएं अपने आप... जाएगी !! छूट से आशाएं दूसरो छोड़ते चलिए ! निराशाएं अपने आप... जाएगी !! छूट - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
🙏गीता ज्ञान🛕 - 17 मई जिंदगी में सच के साथ हमेशा चलते रहिए तो वक्त आपके साथ अपने आप चलने लगेगा ! MN 17 मई जिंदगी में सच के साथ हमेशा चलते रहिए तो वक्त आपके साथ अपने आप चलने लगेगा ! MN - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #गीता #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः | মনঃপত্তানীল্সিমাতি সব্ৃনিস্োনি ব্ূর্ণনি Il इस देहमें यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश स्थित मन और पाँचों हैं * और वही इन प्रकृतिमें इन्द्रियोंको आकर्पण करता हैं Il ७ ।l शरीरं यदवाप्ोति यच्चाप्युत्क्रामतींश्वरः | गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् II वायु गन्धके स्थानसे गन्धको जैंसे ग्रहण करके ले जाता हैं, वैसे हा देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरौरका त्याग करता हैं॰ उससे इन मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरौरको प्राप्त होता है उसमें जाता हैं Il ८ Il श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। নিদমানুপমনন  अधिष्ठाय मनश्चायं || जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचाको तथा रसना, यह घ्राण और मनको आश्रय करके = अर्थात् इन सवके सहारेसे हा विपयौंका सेवन करता हैं Il ९ II जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटोंमें पृथक्- पृथक्को भाँति प्रतीत होता हैं॰ बैसे हो सब TTm পূনাদ हुआ भौ परमात्मा पृथक् - पृथक्को भौति प्रतीत होता है, इसौसे स्थित देहमें स्थित जीवात्माको भगवानने अपना ' सनातन अंश ' कहा ह। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः | মনঃপত্তানীল্সিমাতি সব্ৃনিস্োনি ব্ূর্ণনি Il इस देहमें यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश स्थित मन और पाँचों हैं * और वही इन प्रकृतिमें इन्द्रियोंको आकर्पण करता हैं Il ७ ।l शरीरं यदवाप्ोति यच्चाप्युत्क्रामतींश्वरः | गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् II वायु गन्धके स्थानसे गन्धको जैंसे ग्रहण करके ले जाता हैं, वैसे हा देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरौरका त्याग करता हैं॰ उससे इन मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरौरको प्राप्त होता है उसमें जाता हैं Il ८ Il श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। নিদমানুপমনন  अधिष्ठाय मनश्चायं || जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचाको तथा रसना, यह घ्राण और मनको आश्रय करके = अर्थात् इन सवके सहारेसे हा विपयौंका सेवन करता हैं Il ९ II जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटोंमें पृथक्- पृथक्को भाँति प्रतीत होता हैं॰ बैसे हो सब TTm পূনাদ हुआ भौ परमात्मा पृथक् - पृथक्को भौति प्रतीत होता है, इसौसे स्थित देहमें स्थित जीवात्माको भगवानने अपना ' सनातन अंश ' कहा ह। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#गीता #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔
गीता - T बुद्धिमान मनुष्य वही है, जो संकट उपस्थित होने पर न उनसे मुँह छिपाता है और न घबराता है, बल्कि शान्ति के साथ स्थिर रहता है। MN T बुद्धिमान मनुष्य वही है, जो संकट उपस्थित होने पर न उनसे मुँह छिपाता है और न घबराता है, बल्कि शान्ति के साथ स्थिर रहता है। MN - ShareChat
#मेरे विचार #❤️जीवन की सीख #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #गीता
मेरे विचार - इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वरका मनन और निदिध्यासन करना चाहिये ।l ४।l निर्मानमोहा जितसङ्गदोपा - विनिवृत्तकामाः  अध्यात्मनित्या 61 द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ै - र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं  तत्।I जिसका मान और मोह नष्ट हा गया हैं, जिन्होंने आसक्तिरूप दोपको जीत लिया हैं, जिनको परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति हैं और जिनको कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयो हैंड़वे सुख-दुःख नामक विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको द्वन्द्वांसे प्राप्त होते हैं Il ५ Il तद्भासयते न शशाङ्को न पावकः | सूर्यों न न   निवर्तन्ते परमं यद्गत्वा নভ্লাস AII जिस परमपदको प्राप्त होकर मनुप्य लौटकर संसारमें नहीं आते, उस स्वयंप्रकाश परमपदको न सूर्य प्रकाशित कर सकता हैं, न चन्द्रमा और न अग्नि हो; वही मेरा परमधाम है * II६।l  परमधाम ' का अर्थ गौता अध्याय ८ श्लोक २१ में देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वरका मनन और निदिध्यासन करना चाहिये ।l ४।l निर्मानमोहा जितसङ्गदोपा - विनिवृत्तकामाः  अध्यात्मनित्या 61 द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ै - र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं  तत्।I जिसका मान और मोह नष्ट हा गया हैं, जिन्होंने आसक्तिरूप दोपको जीत लिया हैं, जिनको परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति हैं और जिनको कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयो हैंड़वे सुख-दुःख नामक विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको द्वन्द्वांसे प्राप्त होते हैं Il ५ Il तद्भासयते न शशाङ्को न पावकः | सूर्यों न न   निवर्तन्ते परमं यद्गत्वा নভ্লাস AII जिस परमपदको प्राप्त होकर मनुप्य लौटकर संसारमें नहीं आते, उस स्वयंप्रकाश परमपदको न सूर्य प्रकाशित कर सकता हैं, न चन्द्रमा और न अग्नि हो; वही मेरा परमधाम है * II६।l  परमधाम ' का अर्थ गौता अध्याय ८ श्लोक २१ में देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १५ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat
#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #गीता #🙏 प्रेरणादायक विचार
मेरे विचार - 76 ಗಿತ ఓకే ؟ ಶರಶಞಾರ ೩ ತೌಭಣ जाढै है। মঙখলত धैर्चवान बनो MN 76 ಗಿತ ఓకే ؟ ಶರಶಞಾರ ೩ ತೌಭಣ जाढै है। মঙখলত धैर्चवान बनो MN - ShareChat