Davinder Singh Rana
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आई लव शेयरचैट
🌞~ *श्री गणेशाय नमः*~🌞 🔱~ *हर हर महादेव*~🔱 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग* ~🌞 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🌈 *दिनांक - 20 मई 2026* 🌈 *दिन - बुधवार* 🌈 *विक्रम संवत 2083 (गुजरात अनुसार 2082)* 🌈 *शक संवत -1948* 🌈 *अयन - उत्तरायण* 🌈 *ऋतु - ग्रीष्म ॠतु* 🌈 *मास - अधिक ज्येष्ठ* 🌈 *पक्ष - शुक्ल* 🌈 *तिथि - चतुर्थी सुबह 11:06 तक तत्पश्चात पंचमी* 🌈 *नक्षत्र - आर्द्रा सुबह 06:11 तक तत्पश्चात पुनर्वसु* 🌈 *योग - शूल दोपहर 02:10 तक तत्पश्चात गण्ड* 🌈*राहुकाल - दोपहर 12:35 से दोपहर 02:14 तक* 🌈 *सूर्योदय - 06:00* 🌈 *सूर्यास्त - 07:10* 👉🕉️⏭️ *दिशाशूल - उत्तर दिशा मे* 🚩 *व्रत पर्व विवरण- विनायक चतुर्थी* *विशेष - चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)* 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग* ~🌞 🍁 *पुष्य नक्षत्र योग* 🍁 ⏩ *21 मई 2026 गुरुवार को सूर्योदय से मध्यरात्रि 02:49 तक गुरुपुष्यामृत योग है ।* 🙏🏻 *१०८ मोती की माला लेकर जो गुरुमंत्र का जप करता है, श्रद्धापूर्वक तो २७ नक्षत्र के देवता उस पर खुश होते हैं और नक्षत्रों में मुख्य है पुष्य नक्षत्र, और पुष्य नक्षत्र के स्वामी हैं देवगुरु ब्रहस्पति | पुष्य नक्षत्र समृद्धि देनेवाला है, सम्पति बढ़ानेवाला है | उस दिन ब्रहस्पति का पूजन करना चाहिये | ब्रहस्पति को तो हमने देखा नहीं तो सद्गुरु को ही देखकर उनका पूजन करें और मन ही मन ये मंत्र बोले –* *ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |...... ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |* 🍁 *कैसे बदले दुर्भाग्य को सौभाग्य में* 🍁 🌳 *बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें |* 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग* ~🌞 🌷 *गुरुपुष्यामृत योग* 🌷 🙏🏻 *‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है | पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं | ‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य: |’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है |* 🙏🏻 *इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं | (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)* 🌞~*आज का हिन्दू पंचांग* ~🌞 *☀!! श्री हरि: शरणम् !!☀* *📖 राणा जी खेड़ांवाली 🚩* 🌹🌼🌸🙏🌞☀️📖🚩🪵🌺🍃🟡☘️🔵☘️🥏🔱🥦🍏🥀🌹🌼 #🕉️सनातन धर्म🚩 #श्री हरि #आज का राशिफल / पंचाग ☀
*ॐश्री हरिहरो विजयतेतरामॐ* *📖आज का पञ्चाङ्ग 📖* *🌸 बुधवार, २० मई २०२६🌸* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 *सूर्योदय: 🌞 ०५:४४* *सूर्यास्त: ☀️ १९:०३* *चन्द्रोदय: 🌝 ०८:५८* *चन्द्रास्त: 🌜 २३:०६* *अयन 🌖 उत्तरायण* *ऋतु: ☀️ग्रीष्म* *शक सम्वत: 👉 १९४८ (पराभव)* *विक्रम सम्वत: 👉 २०८३ (रौद्र)* *युगाब्द (कलि संवत) 👉 ५१२७* *मास 👉 ज्येष्ठ (अधिक)* *पक्ष 👉 शुक्ल* *तिथि 👉 चतुर्थी (११:०६ से पंचमी)* *नक्षत्र 👉 आर्द्रा (०६:१२ से पुनर्वसु, २८:१२+ से पुष्य)* *योग 👉 शूल (१४:१० से गण्ड)* *प्रथम करण 👉 विष्टि भद्रा (११:०६ तक)* *द्वितीय करण 👉 बव (२१:४२ तक)* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *॥ गोचर ग्रहा: ॥* *🌖🌗🌖🌗* *सूर्य 🌟 वृषभ* *चंद्र 🌟 मिथुन* *मंगल 🌟 मेष (उदित, पूर्व, मार्गी)* *बुध 🌟 वृषभ (अस्त, पूर्व , मार्गी)* *गुरु 🌟 मिथुन (उदित, पूर्व, मार्गी)* *शुक्र 🌟 मिथुन (उदित, पूर्व, मार्गी)* *शनि 🌟 मीन (उदित, पूर्व, मार्गी)* *राहु 🌟 कुम्भ* *केतु 🌟 सिंह* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *शुभाशुभ मुहूर्त विचार* *⏳⏲⏳⏲⏳⏲⏳* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *अभिजित मुहूर्त 👉 ❌❌❌* *अमृत काल 👉 २६:००+ से २७:२८+* *रवि योग 👉 ०५:४४ से ०६:१२* *विजय मुहूर्त 👉 १४:३७ से १५:३०* *गोधूलि मुहूर्त 👉 १९:०२ से १९:२४* *सायाह्न सन्ध्या 👉 १९:०३ से २०:०७* *निशिता मुहूर्त 👉 २४:०२+ से २४:४५+* *ब्रह्म मुहूर्त 👉 २८:१८+ से २९:०१+* *राहुकाल 👉 १२:२४ से १४:०४* *गुलिक काल 👉 १०:४४ से १२:२४* *यमगण्ड 👉 ०७:२४ से ०९:०४* *दुर्मुहूर्त 👉 ११:५७ से १२:५०* *वर्ज्य 👉 १७:१२ से १८:४०* *भद्रा 👉 ०५:४४ से ११:०६* *विडाल योग 👉 २८:१२+ से २९:४३+* *होमाहुति 👉 बुध* *दिशा शूल 👉 उत्तर* *राहु काल वास 👉 दक्षिण-पश्चिम* *अग्निवास 👉 आकाश (११:०६ से पाताल)* *भद्रावास 👉 स्वर्ग (११:०६ तक)* *चन्द्रवास 👉 पश्चिम (२२:३८ से उत्तर)* *शिववास 👉 क्रीड़ा में (११:०६ से कैलाश पर)* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *☄चौघड़िया विचार☄* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *॥ दिन का चौघड़िया ॥* *१ - लाभ २ - अमृत* *३ - काल ४ - शुभ* *५ - रोग ६ - उद्वेग* *७ - चर ८ - लाभ* *॥ रात्रि का चौघड़िया॥* *१ - उद्वेग २ - शुभ* *३ - अमृत ४ - चर* *५ - रोग ६ - काल* *७ - लाभ ८ - उद्वेग* *नोट👉 दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है।* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *शुभ यात्रा दिशा* *🚌🚈🚗⛵🛫* *(पूर्व या दक्षिण) धनिया या तिल का सेवन करके यात्रा करें* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *तिथि विशेष* *🗓📆🗓📆* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *अधिक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी, वरदा चतुर्थी, विनायकी चतुर्थी व्रत आदि* *राणा जी खेड़ांवाली 🚩* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *आज जन्मे शिशुओं का नामकरण* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *आज ०६:१२ तक जन्मे शिशुओं के नाम आर्द्रा नक्षत्र के अनुसार क्रमशः (कु, घ, ड़ छ) नामाक्षर से एवम् उसके उपरांत पुनर्वसु नक्षत्र के अनुसार क्रमशः (के, को, हा, ही) नामाक्षर से रखना शास्त्र सम्मत है॥* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *उदय लग्न मुहूर्त* *वृषभ - ०५:२९ से ०७:२७* *मिथुन - ०७:२७ से ०९:४१* *कर्क - ०९:४१ से ११:५७* *सिंह - ११:५७ से १४:०९* *कन्या - १४:०९ से १६:२०* *तुला - १६:२० से १८:३४* *वृश्चिक - १८:३४ से २०:५०* *धनु - २०:५० से २२:५५* *मकर - २२:५५ से २४:४२+* *कुम्भ - २४:४२+ से २६:१५+* *मीन - २६:१५+ से २७:४५+* *मेष - २७:४५+ से २९:२५+* 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *पञ्चक रहित मुहूर्त* *शुभ मुहूर्त - ०५:४४ से ०६:१२* *रोग पञ्चक - ०६:१२ से ०७:२७* *शुभ मुहूर्त - ०७:२७ से ०९:४१* *मृत्यु पञ्चक - ०९:४१ से ११:०६* *अग्नि पञ्चक - ११:०६ से ११:५७* *शुभ मुहूर्त - ११:५७ से १४:०९* *रज पञ्चक - १४:०९ से १६:२०* *शुभ मुहूर्त - १६:२० से १८:३४* *चोर पञ्चक - १८:३४ से २०:५०* *शुभ मुहूर्त - २०:५० से २२:५५* *रोग पञ्चक - २२:५५ से २४:४२+* *शुभ मुहूर्त - २४:४२+ से २६:१५+* *मृत्यु पञ्चक - २६:१५+ से २७:४५+* *शुभ मुहूर्त - २७:४५+ से २८:१२+* *रोग पञ्चक - २८:१२+ से २९:२५+* *शुभ मुहूर्त - २९:२५+ से २९:४३+* 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ⭕नोट- पंचांग में जहां कहीं भी समय के साथ उपर्युक्त 👉(➕) चिन्ह का प्रयोग किया जा रहा है वहां उसका आशय अगले दिवस के समय के लिये समझा जाये॥😊🙏🏻 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *आज का सुविचार* ⛳🔱😊🙏🏻⚜️🕉️ *वार्तालाप करने के लिए समय और शब्द नहीं बल्कि मन होना चाहिए॥😊🙏🏻✅* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *आज का राशिफल* *🐐🐂💏💮🐅👩* *〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️* *मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)* *आज का दिन कभी खुशी तो कभी चिंता वाला एहसास दे सकता है। दूर रहने वाले किसी रिश्तेदार से मिली खबर मन को थोड़ा उदास कर सकती है। बिजनेस में नई पार्टनरशिप आपके लिए फायदे का सौदा साबित होगी और पुरानी योजनाओं से अच्छा लाभ मिलने के संकेत हैं। खर्चों पर लगाम लगाना जरूरी होगा, वरना बजट बिगड़ सकता है। मौसम का असर सेहत पर पड़ सकता है, इसलिए आराम और सावधानी दोनों जरूरी रहेंगे।* *वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)* *आज घर में रौनक और खुशियों का माहौल बना रहेगा। रिश्तेदारों का आना-जाना दिन को खास बना देगा और किसी शुभ कार्य की तैयारी उत्साह बढ़ाएगी। ऑफिस में आपकी मेहनत और ईमानदारी बॉस का दिल जीत लेगी। बैंकिंग या फाइनेंस से जुड़े लोगों को निवेश के अच्छे मौके मिल सकते हैं। नए घर या प्रॉपर्टी से जुड़ा काम शुरू करने का सपना भी गति पकड़ सकता है।* *मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)* *आज आपकी वाणी ही आपकी सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी दोनों बन सकती है। मनमौजी स्वभाव परिवार वालों को थोड़ा परेशान कर सकता है। घर में नए मेहमान के आने की खुशखबरी माहौल को खुशनुमा बना सकती है। अचानक धन लाभ मिलने से खुशी दोगुनी हो जाएगी। किसी को निजी जानकारी देने से बचें, क्योंकि वही बात आगे परेशानी का कारण बन सकती है। बिजनेस में नए बदलाव सफलता की राह खोल सकते हैं।* *कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)* *आज हर कदम सोच-समझकर बढ़ाने की जरूरत होगी। वाहन चलाते समय विशेष सावधानी रखें। संतान के साथ बिताया गया समय रिश्तों में प्यार और अपनापन बढ़ाएगा। पुराने प्यार से अचानक मुलाकात दिल की धड़कन बढ़ा सकती है, लेकिन भावनाओं में बहने से रिश्तों में तनाव आ सकता है। समझदारी और संयम ही आज आपकी सबसे बड़ी ताकत बनेगी।* *सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)* *आज विद्यार्थियों के लिए खुशखबरी वाला दिन साबित हो सकता है। परीक्षा के परिणाम मन मुताबिक आने के संकेत हैं। ऑफिस में बॉस आपके काम और सुझावों से बेहद प्रभावित रहेंगे। धन और सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी होगी। अपनी कमजोरियों को पहचानकर सुधारेंगे तो सफलता और तेजी से मिलेगी। पड़ोस या आसपास के विवादों से दूरी बनाए रखना ही बेहतर रहेगा।* *कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)* *आज उन्नति और नए अवसरों का दिन है। नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को मनचाहा मौका मिल सकता है। घर के लिए नया इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने का योग बन रहा है। परिवार में चल रही कलह को सुलझाने की जिम्मेदारी आपको निभानी पड़ सकती है। किसी रिश्तेदार के घर दावत या खुशी के मौके पर जाने से मन हल्का और खुश रहेगा।* *तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)* *आज मेहनत आपका सबसे बड़ा हथियार साबित होगी। राजनीति या सामाजिक क्षेत्र में बड़ा पद मिलने से सम्मान बढ़ सकता है। परिवार के बड़े सदस्यों के साथ बैठकर अहम फैसले लेने का मौका मिलेगा। संतान की ओर से कोई अच्छी खबर दिल को खुश कर सकती है। ऑनलाइन शॉपिंग में सावधानी रखें, क्योंकि नुकसान होने की संभावना है। बच्चों की सेहत को लेकर भागदौड़ बनी रह सकती है।* *वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)* *आज का दिन आपके लिए खास और लाभदायक साबित हो सकता है। नए लोगों से मुलाकात भविष्य में बड़े फायदे का कारण बनेगी। बिजनेस में अच्छा मुनाफा मिलने के संकेत हैं। जरूरत पड़ने पर धन भी आसानी से मिल सकता है। संतान के लिए नया वाहन खरीदने का योग बन रहा है। लाइफस्टाइल में बदलाव और नई खरीदारी आपको उत्साहित करेगी।* *धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)* *आज भागदौड़ ज्यादा रहेगी, लेकिन मेहनत रंग भी लाएगी। आय बढ़ाने के नए रास्तों पर आपका पूरा ध्यान रहेगा। संतान के भविष्य को लेकर किसी कोर्स या पढ़ाई के लिए बाहर जाना पड़ सकता है। माता-पिता के आशीर्वाद से रुका हुआ काम पूरा होगा। सेहत को नजरअंदाज करना परेशानी बढ़ा सकता है। ऑफिस में लापरवाही करने पर बॉस की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। राजनीति में हर कदम सोच-समझकर रखें।* *मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)* *आज एक साथ कई जिम्मेदारियाँ आपके सामने आ सकती हैं, लेकिन आपकी समझदारी हर काम को सही दिशा देगी। नए काम की शुरुआत के लिए परिवार का पूरा सहयोग मिलेगा। पुराने दोस्त से मुलाकात पुरानी यादों को ताज़ा कर सकती है। यात्रा की योजना फिलहाल टालना बेहतर रहेगा। सही फैसले आज आपको भविष्य में बड़ा फायदा दिला सकते हैं।* *कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)* *आज सकारात्मक ऊर्जा और अच्छे परिणाम आपके साथ रहेंगे। यात्रा या घूमने के दौरान कोई खास जानकारी मिल सकती है। जिम्मेदारियों को हल्के में लेने से बचें। बिजनेस में रुका हुआ काम पूरा होने की उम्मीद है। किसी को उधार देने से पहले अच्छी तरह सोच लें, क्योंकि पैसा वापस आने में परेशानी हो सकती है। घर में धार्मिक या शुभ कार्यक्रम का आयोजन माहौल को पवित्र और खुशनुमा बना देगा।* *मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)* *आज कुछ चुनौतियाँ आपका धैर्य परख सकती हैं, लेकिन समझदारी से आप हर मुश्किल से बाहर निकल आएंगे। जीवनसाथी आपकी किसी बात से नाराज हो सकते हैं, इसलिए शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करें। संतान की संगति पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा। दूसरों की बातों में आकर फैसला लेने से बचें। परिवार की समस्याओं को घर के भीतर ही सुलझाना बेहतर रहेगा, वरना बाद में पछताना पड़ सकता है।* *राणा जी खेड़ांवाली 🚩* #🕉️सनातन धर्म🚩 #श्री हरि #आज का राशिफल / पंचाग ☀
*Cholesterol कम करने के लिए खान-पान और लाइफस्टाइल बहुत महत्वपूर्ण होता है। कुछ #प्राकृतिक चीजें नियमित लेने से खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) कम करने और अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL) बढ़ाने में मदद मिलती है।* 🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵🪵 लहसुन . रोज सुबह 1–2 कली कच्चा लहसुन खून को पतला करता है और कोलेस्ट्रॉल कम करता है मेथी दाना . रात में 1 चम्मच मेथी भिगोकर सुबह खाएं LDL कम करने में मदद अलसी के बीज . 1 चम्मच रोज पाउडर बनाकर लें इसमें ओमेगा-3 होता है जो दिल के लिए अच्छा है ओट्स (जई) . सुबह नाश्ते में फाइबर ज्यादा होने से कोलेस्ट्रॉल कम होता है अखरोट और बादाम . 4–5 बादाम और 1–2 अखरोट रोज दिल को मजबूत करते हैं ग्रीन टी . दिन में 1–2 कप फैट और कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद आंवला . आंवला जूस या पाउडर खून साफ करता है और कोलेस्ट्रॉल घटाता है लाउकी और करेला जूस . दिल और शुगर दोनों में फायदेमंद लाइफस्टाइल टिप्स . रोज 30 मिनट तेज चलना . तला-भुना और ज्यादा घी-तेल कम करें . धूम्रपान और शराब से बचें . वजन कंट्रोल रखें . राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌿आयुर्वेद #💁🏻‍♀️घरेलू नुस्खे
*श्रीमद्भागवत महापुराण* *द्वीतीय स्कंध - अद्याय एक - ध्यान-विधि और भगवान्‌के विराट्स्वरूपका वर्णन* 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 मृत्युका समय आने पर मनुष्य घबराये नहीं⁠। उसे चाहिये कि वह वैराग्य के शस्त्र से शरीर और उससे सम्बन्ध रखने वालों के प्रति ममता को काट डाले ⁠।⁠।⁠ 15 ⁠।⁠। धैर्य के साथ घर से निकल कर पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करे और पवित्र तथा एकान्त स्थान में विधि पूर्वक आसन लगाकर बैठ जाय ⁠।⁠।⁠ 16 ⁠।⁠। तत्पश्चात् परम पवित्र ‘अ उ म्’ इन तीन मात्राओं से युक्त प्रणव का मन-ही-मन जप करे⁠। प्राण वायु को वश में करके मन का दमन करे और एक क्षण के लिये भी प्रणव (ॐ) को न भूले ⁠।⁠।⁠ 17 ⁠।⁠। बुद्धि की सहायता से मन के द्वारा इन्द्रियों को उनके विषयों से हटा ले और कर्म की वासनाओं से चंचल हुए मन को विचार के द्वारा रोककर भगवान्‌ के मंगलमय रूप में लगाये ⁠।⁠।⁠ 18 ।⁠। स्थिर चित्त से भगवान्‌ के श्रीविग्रहमें से किसी एक अंगका ध्यान करे⁠। इस प्रकार एक-एक अंगका ध्यान करते-करते विषय-वासना से रहित मन को पूर्ण रूप से भगवान्‌ में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषय का चिन्तन ही न हो⁠। वही भगवान् विष्णु का परम पद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेम रूप आनन्द से भर जाता है ⁠।⁠।⁠ 19 ⁠।⁠। यदि भगवान्‌ का ध्यान करते समय मन रजोगुण से विक्षिप्त या तमोगुण से मूढ़ हो जाय तो घबराये नहीं⁠। धैर्यके साथ योग धारणा के द्वारा उसे वशमें करना चाहिये; क्योंकि धारणा उक्त दोनों गुणों के दोषों को मिटा देती है ⁠।⁠।⁠ 21 ⁠।⁠। धारणा स्थिर हो जाने पर ध्यान में जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान्) - को देखता है तब उसे तुरंत ही भक्ति योग की प्राप्ति हो जाती है ⁠।⁠।⁠ 21 ।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली 🚩 034 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
*श्रीमद्भागवत महापुराण* *द्वीतीय स्कंध - अद्याय एक - ध्यान-विधि और भगवान्‌के विराट्स्वरूपका वर्णन* 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 मृत्युका समय आने पर मनुष्य घबराये नहीं⁠। उसे चाहिये कि वह वैराग्य के शस्त्र से शरीर और उससे सम्बन्ध रखने वालों के प्रति ममता को काट डाले ⁠।⁠।⁠ 15 ⁠।⁠। धैर्य के साथ घर से निकल कर पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करे और पवित्र तथा एकान्त स्थान में विधि पूर्वक आसन लगाकर बैठ जाय ⁠।⁠।⁠ 16 ⁠।⁠। तत्पश्चात् परम पवित्र ‘अ उ म्’ इन तीन मात्राओं से युक्त प्रणव का मन-ही-मन जप करे⁠। प्राण वायु को वश में करके मन का दमन करे और एक क्षण के लिये भी प्रणव (ॐ) को न भूले ⁠।⁠।⁠ 17 ⁠।⁠। बुद्धि की सहायता से मन के द्वारा इन्द्रियों को उनके विषयों से हटा ले और कर्म की वासनाओं से चंचल हुए मन को विचार के द्वारा रोककर भगवान्‌ के मंगलमय रूप में लगाये ⁠।⁠।⁠ 18 ।⁠। स्थिर चित्त से भगवान्‌ के श्रीविग्रहमें से किसी एक अंगका ध्यान करे⁠। इस प्रकार एक-एक अंगका ध्यान करते-करते विषय-वासना से रहित मन को पूर्ण रूप से भगवान्‌ में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषय का चिन्तन ही न हो⁠। वही भगवान् विष्णु का परम पद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेम रूप आनन्द से भर जाता है ⁠।⁠।⁠ 19 ⁠।⁠। यदि भगवान्‌ का ध्यान करते समय मन रजोगुण से विक्षिप्त या तमोगुण से मूढ़ हो जाय तो घबराये नहीं⁠। धैर्यके साथ योग धारणा के द्वारा उसे वशमें करना चाहिये; क्योंकि धारणा उक्त दोनों गुणों के दोषों को मिटा देती है ⁠।⁠।⁠ 21 ⁠।⁠। धारणा स्थिर हो जाने पर ध्यान में जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान्) - को देखता है तब उसे तुरंत ही भक्ति योग की प्राप्ति हो जाती है ⁠।⁠।⁠ 21 ।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली 🚩 034 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩
*श्रीमद्भागवत महापुराण* *द्वीतीय स्कंध - अद्याय एक - ध्यान-विधि और भगवान्‌के विराट्स्वरूपका वर्णन* ☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️ परीक्षित्! जो निर्गुण स्वरूप में स्थित हैं एवं विधि-निषेध की मर्यादा को लाँघ चुके हैं, वे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी प्रायः भगवान्‌ के अनन्त कल्याणमय गुण गणोंके वर्णन में रमे रहते हैं ⁠।⁠।⁠ 7 ⁠।⁠। द्वापर के अन्त में इस भगवद्‌रूप अथवा वेद तुल्य श्रीमद्‌भागवत नाम के महापुराण का अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन से मैंने अध्ययन किया था ⁠।⁠।⁠ 8 ⁠।⁠। राजर्षे! मेरी निर्गुण स्वरूप परमात्मा में पूर्ण निष्ठा है⁠। फिर भी भगवान् श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं ने बलात् मेरे हृदय को अपनी ओर आकर्षित कर लिया⁠। यही कारण है कि मैंने इस पुराण का अध्ययन किया ⁠।⁠।⁠ 9 ⁠।⁠। तुम भगवान्‌के परम भक्त हो, इसलिये तुम्हें मैं इसे सुनाऊँगा⁠। जो इसके प्रति श्रद्धा रखते हैं, उनकी शुद्ध चित्तवृत्ति भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेम के साथ बहुत शीघ्र लग जाती है ⁠।⁠।⁠ 10 ⁠।⁠। जो लोग लोक या परलोक की किसी भी वस्तु की इच्छा रखते हैं या इसके विपरीत संसार में दुःख का अनुभव करके जो उससे विरक्त हो गये हैं और निर्भय मोक्ष पद को प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकों के लिये तथा योगसम्पन्न सिद्ध ज्ञानियों के लिये भी समस्त शास्त्रों का यही निर्णय है कि वे भगवान्‌ के नामों का प्रेम से संकीर्तन करें ⁠।⁠।⁠ 11 ⁠।⁠। अपने कल्याण-साधन की ओर से असावधान रहने वाले पुरुष की वर्षों लम्बी आयु भी अनजानमें ही व्यर्थ बीत जाती है⁠। उससे क्या लाभ! सावधानी से ज्ञान पूर्वक बितायी हुई घड़ी, दो घड़ी भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके द्वारा अपने कल्याण की चेष्टा तो की जा सकती है ⁠।⁠।⁠ 12 ।⁠। राजर्षि खट्‌वांग अपनी आयुकी समाप्तिका समय जानकर दो घड़ी में ही सब कुछ त्याग कर भगवान्‌ के अभय पद को प्राप्त हो गये ⁠।⁠।⁠ 13 ।⁠। परीक्षित्! अभी तो तुम्हारे जीवन की अवधि सात दिन की है⁠। इस बीच में ही तुम अपने परम कल्याण के लिये जो कुछ करना चाहिये, सब कर लो ⁠।⁠।⁠ 14 ⁠।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली 🚩033 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
*श्रीहरिः* *जय श्रीकृष्ण मीरा चरित, विस्तार से (भाग 54)* 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 (भूत-प्रेतों का घर : भूत-महल) 'कुँवराणीसा हुकम! दाता हुकमने हुजूरको याद फरमाया है। किस समय आऊँ आपको लिवानेके लिये ?' – रतनसिंहजीकी माताजी धनाबाईकी दासीने आकर निवेदन किया । ‘दिन ढलनेपर मैं स्वयं ही उपस्थित हो जाऊँगी । तुम जाकर निवेदन कर देना कि मुझे भी बुजीसा हुकमके दर्शन किये हुए बहुत समय हो गया। आज कृपा करके उन्होंने याद फरमाया है तो दर्शनके लिये हाजिर हो जाऊँगी ।' — मीराने कहा । 'दाता हुकमने फरमाया है कि ठाकुरजीकी आरती, भोग आदि सब करके पधारें, अन्यथा सरकार वहाँ विराज नहीं सकेंगी।' – दासीने निवेदन किया । मीराने हँसकर सिर हिला दिया। रातको जब मीरा सासजीके महलमें पधारीं तो वहाँ सभी राजपरिवारकी स्त्रियाँ उपस्थित थीं। उनकी दासियाँ और पासवानों (उपपत्नियाँ) को मिलाकर सौ- डेढ़ सौ स्त्रियोंका जमघट देखकर मीराको कुछ आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपनी सासोंके चरणोंमें सिर झुकाया और देवरानियोंको आशीर्वाद दिया। .....दासियोंके अभिवादन स्वीकार करते हुए किसीके हाथ जोड़, किसीको सिर हिलाकर और किसीको दृष्टि द्वारा तथा हँसकर एकाध बात करके सम्मान दिया। सबके यथास्थान बैठ जानेपर राजमाता जोधीजी (धनाबाई) ने फरमाया— 'और सभी तो कहीं–न–कहीं इकट्ठे होते और मिलते ही हैं, किन्तु बीनणी ! तुमसे मिलना सहज नहीं हो पाता, इसी कारण सोचा कि दो घड़ी बैठकर बात ही करेंगे।' 'बड़ी कृपा हुई । मैं तो हजूरकी बालक हूँ। यह दुर्भाग्य ही है मेरा कि राजकी कोई सेवा नहीं बन आयी मुझसे ।' – मीराने हाथ जोड़कर निवेदन किया । ‘अरे भाई! भगतोंका भगवान् से पिंड छूटे तो दूसरा याद आये न ।' छोटी राजमाता हाड़ीजीने हँसकर कहा— 'कभी हमें भी याद कर लिया कीजिये कि हमारा भी उद्धार हो ।' 'प्रभु समर्थ हैं हुकम ! उद्धार उनकी कृपासे ही होता है।' 'मुझे आज्ञा हो तो कुँवराणीसासे कुछ पूछना है।'—पासवानों (उपपत्नियों) की जाजिम पर बैठी हुई महाराजकुमार पृथ्वीराजकी पासवानजीने कहा । ‘पूछो न ! ऐसी कौन-सी बात है, जिसके लिये अलगसे हुकम लेना पड़े।'— मीराने हँसकर कहा । 'मेरी बहिनकी बेटीको भूत लग गया है हुकम ! वह दिन — दिन दुबली होती जा रही है। औतरने (आवेश) के अलावा आँय- बाँय बातें करती है । बहुत टोटके किये; देवता, दिहाड़ी सबको सुमर लिया, पूज लिया, किन्तु उसपर कुछ भी असर नहीं हुआ। मरनेके बाद क्या सचमुच मनुष्य भूत बनता है हुकम ? यदि बनता है तो वह दूसरोंके सिर क्यों लगता फिरता है? क्या हमको भी कभी भूत बनना पड़ेगा ?' भूत ही क्यों, जगतमें जितने भी प्राणी दिखायी देते हैं, वे सब मनुष्य योनिसे निकले जीव हैं। मानव-जीवनमें किये गये कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही दूसरी जूण (योनि) बनी है। .....अब रही दूसरोंको लगनेकी बात, सो मरनेके पश्चात् भी स्वभाव तो साथ ही रहता है। जिसका स्वभाव संतोषी और भला है, वह भूत बने कि पशु, वह भला ही रहेगा और जिसका स्वभाव दुष्ट है, वह मरनेपर भी दुष्ट ही रहेगा। मन साथ रहनेसे तृष्णा बनी रहती है, उसी तृष्णाके वश होकर वह लोगोंके पास जाता है। ......मैंने तो कभी देखा नहीं, किन्तु सुना है कि भूतोंके मुँह सूईके छेद जैसे होते हैं। वे कुछ भी खा-पी नहीं सकते। सड़े फलोंका रस, मोरीका पानी, ऐसा ही कुछ वे ग्रहण कर सकते हैं अथवा मानव जन्मके उनके सगे-सम्बन्धी पिंड दें तो वह उन्हें प्राप्त होता है। सम्भव है कि इससे उन्हें मानसिक तृप्ति न होती हो। इसी कारण किसीकी देहको माध्यम बनाकर उसके मिससे खाते-पीते और पहनते हों।' 'तभी भूत-महलकी ओर कोई नहीं जाता। जो भी जाता है, वह या तो बीमार हो जाता है या मर जाता है। ' – हाड़ीजीने कहा । 'भगवानके नामसे भूत पास नहीं आते हुकम! राम-राम कहता हुआ मनुष्य कहीं भी जाये, भूत-प्रेत किसीकी मजाल नहीं उसके समीप आनेकी ।' — मीराने कहा। 'सच फरमा रही हैं आप?' — हाड़ीजीने आश्चर्यसे पूछा। 'इसमें आश्चर्यकी क्या बात है हुकम! भगवान् का नाम लेकर तो मनुष्य भवसागर पार कर लेते हैं। भूत बेचारा किस खेतकी मूली है? संतोंका कहना है कि भगवानसे भी भगवानका नाम बड़ा है।' 'संतोंकी बातें तो आप ही जानती होंगी। हमें तो आप एक बार भूतमहल ही दिखा दीजिये। सुना है कि बहुत सुन्दर बना है। आपके साथ रहेंगी तो भूत हमें भी कुछ नहीं कर पायेंगे।' 'जब आप फरमाइये। मैं तो प्रस्तुत हूँ।' — मीराने कहा। ‘अभी चलें? फिर तो कौन जाने कब ऐसा अवसर मिले कि आपकी भक्तिके पट खुलें। जब भी किसीसे पूछती हूँ — यही उत्तर मिलता है कि कुँवराणीसाको तो चेत ही नहीं है।' 'पधारें, भले ही ।' ‘फिर कभी पधार जायें, आजका आज ही क्या है ? भूत—महलमें देखने जैसा है ही क्या ?' – राजमाता पुँवारजीसा (करमचंद पुँवार बम्बोरीकी बेटी) ने कहा— 'कौन जाने कितनी पीढ़ियोंसे बन्द पड़े हैं वे महल। कहीं झाडू-बुहारी नहीं लगी। कहीं पड़दड़ रहे होंगे। भूत तो है कि नहीं वहाँ, किंतु साँप-गौहरे अवश्य रहते होंगे। ऐसी अँधेरी रातमें वहाँ जायँ और किसीको साँपने डस लिया तो रंगमें भंग तो होगा ही। घरमें हाण और जगतमें हँसी भी होगी।' 'अरे जीजा हुकम! अभी आपको ज्ञात ही नहीं है कि भक्तिमें कितनी शक्ति है। मैंने तो सुना है कि वैद्यजीको श्रीजीने डाँटा सो डरके मारे वे मर गये। फिर लोग उठाकर उन्हें बीनणीके पास ले गये। इन्होंने वैद्यजीको जीवित कर दिया। अपने तो वैद्य-हकीम सब घरमें ही हैं। लो, उठो सब, रात अधिक हो जायगी।' – दासियोंकी ओर देख हाड़ीरानीने कहा— 'तुम मशालें तैयार करो, जाओ।' मीराने अपनी दासियोंकी ओर देखकर कहा- 'तुम जाओ। प्रातः के उत्सवकी प्रस्तुति करनी है। मैं बुजीसा हुकमके साथ जा रही हूँ। फिर यहींसे किसीके साथ आ जाऊँगी ।' 'इन दोनोंको भेज दीजिये।' मंगलाने काँपते कंठसे कहा— 'मैं आपके साथ ही रहूँगी बाईसा हुकम !' 'नहीं मंगला ! तू भी जा। इन्हें सब समझाना पड़ेगा न ?' 'हाँ, हाँ मंगला जा। तू यहाँ क्या करेगी? कुछ काम हुआ भी तो यह चार—पाँच गाड़ियाँ भर जायँ, इतनी खड़ी हैं यहाँ ।' हाड़ीजीने हँसकर कहा— 'अरे जीजा हुकम ! (बड़ी सौत) आप विराजी कैसे हैं ? ऐसे तो विलम्ब हो जायगा, पधारें।' 'नहीं बहिन! तुम ही सब जाओ। मेरा मन नहीं करता जानेको। आँखों से दिखता नहीं। कहीं पाँव ऊँचा–नीचा पड़ गया तो बुढ़ापेमें हड्डियाँ जुड़ेंगी नहीं।' – जोधीजीने मना किया। हाड़ीजी और उनके साथ पचास—साठ स्त्रियाँ मीराको लेकर भूत–महलकी ओर चलीं। मीराकी दासियोंने सारी रात आँखोंको राहमें गड़ाये–गड़ाये ही काट दी। ड्योढ़ीके द्वार खुले ही रहे। ब्राह्ममुहूर्त लगते ही चम्पा और चमेली जोधीजीके पास दौड़ी गयीं— 'बुजीसा हुकम ! मेरे बाईसा हुकम कहाँ हैं? वे रात महलों में नहीं पधारीं । ' 'हैं! क्या महलोंमें नहीं पधारीं तो कहाँ गयीं?'– उन्होंने चौंककर पूछा । उन्होंने दासी भेजकर हाड़ीजीके महलमें पुछवाया । वहाँसे उत्तर आया कि भूत—महलसे लौटते हुए द्वार तक हमारे साथ ही थीं, फिर अचानक लोप हो गयीं। हमने सोचा कि भक्त हैं, इनकी माया कौन जान सकता है।' यह सुनकर दोनों दासियाँ रो पड़ीं। उनकी आँखोंसे चौधारा छूट गयी। हिल्कियाँ लेते हुए वे बोलीं— 'बुजीसा हुकम! मुझे भूत महलमें जानेकी आज्ञा दीजिये। अवश्य ही बाईसा हुकमको उसमें बंद कर दिया गया है।' उसकी बात सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोगोंकी आँखें भर आयीं। 'तू कहाँ जायगी और कैसे जायगी? वहाँकी चाभियाँ तो श्रीजीके पास हैं। वे भी रातको भूत— महल पधारे थे, ऐसा सुना है।' यह सुनकर वे और जोर—जोरसे रोने लगीं। रोते हुए जहर देने और तलवारसे मारनेकी सारी बात कह सुनायी–'हमारी बाईसा हुकम तो भोली हैं हुकम! छल-प्रपञ्च उन्हें छू भी नहीं गया है। वे सभीको अपने समान समझती हैं। क्यों मारना चाहते हैं वे उन्हें? क्या बिगाड़ा है उन्होंने किसीका? हम मेड़ते चले जायँगे या किसी तीर्थमें जा बैठेंगे।' दासियोंने दुःखसे अवश हो राजमाताजीके चरण पकड़ लिये—‘जहाँ हमारी बाईसा हुकम हैं, वहीं हमें भी पहुँचा दें।' ‘तू चुप रह चम्पा! तेरे यों बिलखनेसे कुछ भी ठंडाई नहीं पड़ेगी। हल्ला होनेसे तो तेरी बाईसा कल मरती होंगी तो आज ही मर जायँगी। मेरे सींग टूट गये हैं। अर्जुन—भीम जैसे बेटे खोकर आँखें फूट गयी हैं मेरी। कुछ दिखायी नहीं देता। राँड और निपूती दोनों ही हो गयी हूँ। विधाताके आगे किसका जोर चलता है ? तू जा; मुझसे जो हो सकेगा सो करूँगी। पर ध्यान रहे, घरकी बात बाहर न जाय।' दासियाँ रोती हुई चली गयीं। राजमाताने उदयकुँवरको बुलाकर कहा। उन्होंने जाकर श्रीजीसे पूछा। महाराणाने कहा—'ताले तो मेरे हाथसे बंद किये गये हैं जीजा हुकम! भाभी म्हाँरा तो बाई हुकमसे बात करते ही लोप हो गयीं ।' मंदिरमें सत्संगी एक-दूसरेसे पूछते, किंतु सत्यका ज्ञान किसे था? महाराणाके आदमी किसीसे कहते—'मेड़तणीजीसा पीहर पधारी हैं ।' किसीसे कहा—'तीर्थयात्रापर पधारी हैं।' और किसीसे कहा—'रुग्ण हैं।' लोग भजन उतारने और खुशी पूछनेके लिये ड्योढ़ीपर आये, पर किसी प्रकारकी कोई उचित जानकारी न मिली। खलबलाहट मची और बात फैलने लगी। दिन ढले बनवीर (पृथ्वीराजका पासवान पुत्र) उस ओरसे निकला और ड्योढ़ीवानको आँसू पोंछते देख समीप जाकर पूछा—'क्या हुआ?' पूछते ही जैसे आँसुओंका बाँध टूट गया, अस्वीकृतिमें मस्तक हिलाकर वह घुटनोंमें सिर दे फफक पड़ा। बनवीरको आश्चर्य हुआ कि यह बूढ़ा आदमी स्त्रियोंकी भाँति कैसे रो पड़ा ? 'क्या बात है भाई ?' – उसके कंधेपर हाथ रखकर उसने फिर पूछा। ड्योढ़ीवानने एक बार मुख उठाकर उसकी ओर देखा, उसकी आँखोंमें भय और विवशता छलक पड़ी। उसने पुनः सिर झुका लिया। आँखोंसे निकल-निकल करके आँसू उसकी दाढ़ीके श्वेत-श्याम केशोंमें मोतियोंकी भाँति लटक रहे थे। उसकी लम्बी-चौड़ी देह हिचकियोंके कारण झटके-सी खा रही थी और तलवार चलानेवाले दोनो हाथोंसे मुँह ढाँककर वह बालककी भाँति बिलख पड़ा। ‘क्या हुआ हुकम! कुँवराणीसा अस्वस्थ हैं? उसने 'नहीं' में सिर हिलाया। 'घरमें कोई अच्छी—बुरी बात हो गयी ?' उसने पुनः बतानेके लिये सिर हिलाया । ‘तब क्या है, मुझे कहिये? अपनी शक्तिके भीतर होगी तो अवश्य सहायता करूँगा।' 'हम लुट गये। हमारा आसरा टूट गया। हमारी बाईसा महलमें नहीं हैं।'— डोकरा फिर रो पड़ा। ‘महलमें नहीं हैं? महलमें नहीं तो कहाँ पधारीं? कितने दिन हुए ?'– बनवीरने पूछा । 'आज चार दिन हो गये। एक दिन साँझके समय राजमाताजीसे मिलने पधारीं और वापस नहीं लौटीं ।' 'तुम लोगोंने जानकारी नहीं ली ? ' 'सब कुछ कर लिया। हमारी शक्ति ही कितनी है? कोई कहता है कि वे लोप हो गयीं, कोई कहता है कि हमें तो कुछ नहीं मालूम। कोई भी सच्ची बात नहीं बताता। सब श्रीजीसे डरते हैं। आज चार दिनोंसे यहाँ रसोई बंद है। सबको आटा—सामान तौलकर दिया जा रहा है। कौन जाने, बाईसा हुकम जीवित हैं कि नहीं!' – वह पुनः रोने लगा। 'तुम धैर्य रखो। तुम्हारी बाईसा जीवित हैं या नहीं, यह तो एकलिंगनाथके हाथकी बात है; किन्तु वे कहाँ हैं, यह जानकारी मैं अवश्य कर लूँगा।' बनवीरने राजमाता जोधीजीके महलकी ओर पद बढ़ाये। वहाँ पूछताछ करके उसका घोड़ा साँझ ढलते—ढलते सलुम्बरके पथपर दौड़ चला। दूसरे दिन मीराके महलमें सलुम्बर बाबाजी (रावतजी) चम्पाके सम्मुख बैठे कुँवराणीसा मेड़तणीजीके विषयमें पूछ रहे थे। दूसरी दासियाँ भी घूँघट किये हुए चम्पा, मंगलाके पास झुंड बनाकर बैठी थीं । 'वापस लौटनेको तो बाईसा हुकमने ही फरमाया हुकम ! मेरी तनिक भी इच्छा नहीं थी लौटनेकी, किन्तु स्वामिनीजीकी आज्ञा कैसे फेर दूँ, यही सोचकर बहुत भारी मनसे हम सब यहाँ आयीं । बाईसा हुकमको भूत–महलके ही किसी कक्षमें बंद कर दिया गया है।' – चम्पा रो पड़ी । दूसरी भी सब घूँघटमें आँसू पोंछ रही थीं—'आज पाँच-छ: दिन हो गये । कहाँ उनका जल और जीमण ? उन्होंने कभी किसीका बुरा नहीं सोचा। दूसरोंके अपराध हँसकर टाल देती हैं। खंग लेकर सिर काटने आये, उन्हें भी हँसकर विदा किया। ऐसी सीधी, सरल और भली आत्माको भी कोई सताता है हुकम!...... .......... हमारे अन्नदाता (राव वीरमदेवजी) भला क्या जानते थे कि बड़े घरोंमें ऐसी बातें भी होती होंगी। आप भले मेरा सिर उतार लें हुकम ! पर अब सहा नहीं जाता। बाईसा हुकमने यहाँ पधारकर किसका बुरा किया ? किसे ओछी बात कही ? और किसका कुछ छीन लिया ? भक्ति छोड़ना उनके वशमें नहीं रहा। दो–दो, चार–चार दिनतक तो उन्हें चेत ही नहीं रहता। भगवान्‌के अतिरिक्त उन्हें कुछ सूझता ही नहीं तो मनुष्यका भला–बुरा सोचनेका समय ही कहाँ है उनके पास?......... .........यह बात पहले भी छिपी हुई तो न थी । इस घरकी बाईसा हुकम (गिरजाजी) उस घरकी बहू हैं। उन्होंने यह बात श्रीजीसे अर्ज कर दी थी। जानकर—समझकर ही श्रीजीने यह सम्बन्ध स्वीकार किया। अब भक्ति छुड़ानेके लिये इतने अत्याचार क्यों ? क्षमा करें हजूर! छोटे मुँह बड़ी बात अर्ज कर रही हूँ, किन्तु इसमें तनिक भी झूठ नहीं है कि चित्तौड़ोंके भाग्यसे ऐसा संयोग बना था कि एक साथ सबका उद्धार हो जाता, पर ऐसा दुर्भाग्य जागा कि कहा नहीं जाता।......... ........दूर–दूरसे लोग सुन–सुन करके दौड़े आते हैं और यहाँ आँखों देखी बातका भी इन्हें विश्वास नहीं आता। आप किसी प्रकार बाईसा हुकमको छुड़वा दीजिये । हम मेड़ते चले जायँगे ।' ‘क्यों ? मेड़ते क्यों ? यहीं रहो सिसौदिये यहाँ लाये हैं तो जीवनभरके लिये, आधी आयुके लिये नहीं । ये बातें बादमें करेंगे। मैं जाकर खोज करूँगा। सफल होता हूँ या नहीं, यह भगवान् एकलिंगनाथके हाथमें है।........ ........अपनी ओरसे प्राणोंके मूल्यपर भी मेड़तणीजीसाको यहाँ पधरा सका तो स्वयंको धन्य मानूँगा। वे जिस अवस्थामें जहाँ भी होंगी, यहाँ इस महलमें पहुँचा दूँगा।' भूत-महलकी चाबियाँ बख्शें सरकार !' — सलुम्बर बाबाजीने महाराणा विक्रमादित्यसे निवेदन किया । 'क्यों ? किसलिये ?' 'कुँवराणीसा मेड़तणीजी अपने महलमें नहीं हैं। सुना है कि सभी रानियोंके साथ वे भी भूत—महल पधारी थीं । वहाँसे लौटकर महलमें नहीं पधारीं । आज पाँच–छ: दिन हो गये। उस महलके लोग खाना—पीना भूल गये हैं। यदि उन्हें कुछ हो गया तो भगवान् क्या करेंगे सो तो भगवान ही जानें, किन्तु इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा।............ ..........एक बार भूत—महलमें देख लिया जाय । कहीं भूलसे उसीके किसी कक्षमें न रह गयी हों। सुना है कि चार—एक दिन पूर्व भूत—महलके पिछवाड़ेसे होकर एक गायरी अपनी खोयी हुई भेड़ ढूँढ़ने निकला तो उसे भूत—महलसे गीतके स्वर सुनायी दिये ।' भाभी म्हाँरा महलोंमें नहीं हैं, यह बात मुझे तो किसीने नहीं कही और आपको उतनी दूर कौन अर्ज करने दौड़ा आया ?' 'कौन आया और कौन नहीं आया, यह विवाद कुछ समय पश्चात् भी हो सकता है सरकार ! आपके सामने छोटी—मोटी बात निवेदन करनेकी छाती ही किसकी है ?' – रावतजी नहीं चाहते थे कि महाराणा चिढ़ जायँ । इसलिये अपना और उनका सम्मान बचाते हुए कामकी बात कर लेना चाहते थे। 'और किसीकी छाती हो न हो, आपकी तो है।' – महाराणाने हँसकर कहा । 'सो तो आपकी कृपा है हजूर ! समझमें नहीं आता कि घरमेंसे मनुष्य लोप हो जाय और हमें ज्ञात नहीं होता, बाहरका तो राम ही धणी है ।' 'ज्ञात तो सब कुछ है काकाजी ! पर हम नाम ही नहीं लेते। भक्तोंकी बात कौन करे ? हमारी तो पहले भी बहुत बदनामी हो चुकी है। स्त्रियोंका कहना है कि लौटते समय पोलपर ही भाभी म्हाँरा लोप हो गयीं । खोजबीन करता—कराता तो लोग माथे आये फिरते कि हमें तंग करते हैं। बताइये कि अब हम क्या करें ?" 'ज्ञात क्यों न होगा ? सुना है कि सरकार स्वयं पधारे थे वहाँ । जो भी हुआ होगा, सरकारकी नजरोंसे गुजरकर ही हुआ होगा। चाबियाँ बख्शें तो एक बार जाँच कर लें । लोप हो गयी हों तो बड़ी खुशीकी बात है, अन्यथा जीवित-मृत जैसी भी होंगी, मिल ही जायँगी ।' 'आप क्यों कष्ट करते हैं? मैं स्वयं जाकर देख लेता हूँ।'— महाराणाने कहा। 'ऐसा क्यों फरमाते हैं सरकार ! हम तो सेवक हैं। आधी रातको भी याद फरमायें तो सिरके बल दौड़ आयेंगे । यदि पधारनेकी सरकारकी इच्छा है तो अवश्य पधारें । भूत—महलके नामसे यों ही पिंडलियाँ काँपती हैं। एक से अधिक हों तो हृदयमें बल रहेगा, पधारना हो ।' – रावतजी उठ खड़े हुए। । किसी ओर थाह न पाकर महाराणाने चाबियाँ फेंक दी उनके सामने। उन्होंने कहा—‘लें ये चाबियाँ! सचमुच कहीं भीतर रह गयी होंगी तो सब मेरे माथे आ जायँगे।' 'नहीं हुकम! माथे आनेकी क्या बात है इसमें ? डेढ़ सौ स्त्रियोंके झुंडमें एकाध कहीं रह जायँ तो इसमें हुजूरको क्या दूषण है ? भूत—महलके धूल भरे कक्षमें भूमिपर पद्मासन लगाये नेत्र बंद किये मीरा विराजित थीं। उनके तेजसे वह अँधेरा कक्ष देदीप्यमान हो दप्-दप् कर रहा था। द्वार खोलते ही रावतजी और साथ आये सेवक चौंककर चार पद पीछे हट गये।......... ..........सबकी आँखें फटी–की–फटी रह गयीं। उन्होंने कभी मीराको खुले मुँह नहीं देखा था। आज यह अलौकिक रूप राशि और तेज देखकर उनके नेत्र और मुख खुले–के–खुले रह गये। कुछ क्षण पश्चात् रावतजीने अपना आपा सँभालकर उनमेंसे एक आदमीको मीराके महलकी ओर दौड़ाया दासियोंको–रथको लानेके लिये। उनके पीछे लोग खुसर—फुसर करने लगे– 'कितने दिन हो गये बिना जल—जीमणके, पर देखो न! मुखकमल तनिक भी कुम्हलाया नहीं; भक्तिका प्रताप है भाई!' अपनी स्वामिनीको इस अवस्थामें— ऐसे स्थानपर देखकर दासियोंकी आँखोंसे आँसू झरने लगे। रावतजीके धैर्य देनेपर उन्होंने ध्यानमग्ना मीराको उठाकर रथपर विराजित किया। दो दासियाँ मंगला और चम्पा रथमें बैठकर उन्हें थामे रहीं। रथके पर्दे गिरा दिये गये।........ .......बाकी दासियाँ और सेवक साथ चले। एकाएक रावतजीके कंठसे स्वर फूटा – ‘कुँवराणीसाकी जय ! भक्त शिरोमणि मेड़तणीजीकी जय!' जय—ध्वनि सुनते ही अचकचाकर महाराणा अपनी तलवारकी मूँठपर हाथ रखकर उठ खड़े हुए। जय श्री राधे.... राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
*श्रीहनुमान_चरित_३३* *|| हनुमदीश्वर° ||* दशग्रीवके परमधाम-गमनके साथ ही लंका-विजयका कार्य पूर्ण हो गया। फिर विभीषणके राज्याभिषेकक अनन्तर श्रीरघुनन्दन अपनी सहधर्मिणी सीता, अनुज लक्ष्मण, पवनपुत्र हनुमान, वानरराज सुग्रीव, युवराज अङ्गद, महामतिमान् जाम्बवान् आदि वानर-भालुओंके साथ पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो आकाश-मार्गसे चलकर गन्धमादन पर्वतपर उतरे। वहाँ परमसती विदेह-नन्दिनी सीताकी अग्नि-परीक्षाद्वारा शुद्धि की गयी। उस समय महामुनि अगस्त्यजीके साथ दण्डकारण्य-निवासी ऋषि-मुनियोंने गद्गद कण्ठसे प्रभुकी स्तुति की। श्रीराघवेन्द्रने उन तपस्वी मुनियोंके चरणोंमें श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर अत्यन्त विनयके साथ निवेदन किया— 'तपस्वी ब्राह्मणो ! मैं क्षत्रिय हूँ। दुष्टोंका शासन करना मेरा धर्म है। इस कारण मैंने लंकाधिपति रावणका तथा उसके भाइयों और पुत्रोंका ही नहीं, सम्पूर्ण पुलस्त्यकुलका संहार किया है, किंतु वह था तो ब्राह्मणकुलोत्पन्न ही। अतएव ब्राह्मण-वधके पापका प्रायश्चित्त क्या है ? आपलोग कृपापूर्वक विचार करके मुझे यह बतानेका कष्ट करें।' श्रीरघुनन्दनके वचन सुनकर मुनियोंके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा— 'मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ! आप यद्यपि स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं, पाप-नामक कोई वस्तु आपका स्पर्श भी नहीं कर सकती, आपने तो उन असुरोंको मुक्ति प्रदान कर उनका परम मङ्गल ही किया है, किंतु मर्यादा-पालन और मर्यादा-रक्षा आपका धर्म है। अतएव आप यहाँ लोकसंग्रहकी दृष्टिसे शिव-लिङ्गकी स्थापना करें। उस शिव लिङ्गकी असीम महिमा होगी और वह आपके ही नामसे प्रख्यात होगा। उसके दर्शन एवं पूजनसे मनुष्य तो परमपद प्राप्त करेंगे ही, रावण-वधका दोष भी दूर हो जायगा।' लिङ्ग-स्थापनाका पुण्यमय समय दो ही मुहूर्तमें आनेवाला था। अतएव उसी कालमें प्रतिष्ठा करनेकी दृष्टिसे श्रीराघवेन्द्रने पवनकुमारको शिव-लिङ्ग लानेके लिये कैलास पर्वत भेजा। परम पराक्रमी श्रीराम-भक्त हनुमानकी प्रसन्नताकी सीमा न रही। उन्होंने अपने आराध्य श्रीसीतारामके चरणोंमें प्रणाम किया और वायुवेगसे उड़ चले। कैलास पहुँचते उन्हें देर न लगी; किंतु वहाँ लिङ्गरूपधारी महादेवजीका दर्शन नहीं प्राप्त हुआ, तब ज्ञानिनामग्रगण्य हनुमानने आशुतोष शिवको संतुष्ट कर उनसे शिव-लिङ्ग प्राप्त कर लिया और फिर विद्युत्-गतिसे लौट पड़े। इधर हनुमानजीके न पहुँचनेसे स्थापनाका मुहूर्त व्यतीत होते देखकर तत्त्वदर्शी मुनियोंने धर्मपालक श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— 'रघुनन्दन ! पुण्यकाल समाप्त होनेवाला ही है। अतः वैदेहीने लीलापूर्वक जो बालूका शिव लिङ्ग बनाया है, इस समय आप उसीकी स्थापना कर दीजिये।' मुनियोंका आदेश प्राप्त होते ही भगवान् श्रीरामने अपनी सहधर्मिणी सीता तथा ऋषियोंके साथ मङ्गलाचरण प्रारम्भ किया। उस समय ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी दशमी तिथि और बुधवार दिन था। हस्त नक्षत्रके साथ गद करण, एवं आनन्द और व्यतीपात योग थे। कन्याराशिपर चन्द्रमा तथा वृषराशिपर सूर्य विराजमान थे। ऐसे परम पुण्यमय उपर्युक्त दस योगोंकी उपस्थितिमें गन्धमादन पर्वतपर सेतुकी सीमामें भगवान् श्रीरामने लिङ्गरूपधारी पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवकी स्थापना की। उस समय उक्त लिङ्गमें स्वयं सतीशिरोमणि पार्वतीसहित शशाङ्क-शेखर, कर्पूरगौर, आशुतोष शिव प्रकट हो गये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक भगवान् श्रीरामको वर प्रदान करते हुए कहा— 'रघुनन्दन ! आपके द्वारा प्रतिष्ठित इस रामेश्वर-लिङ्गके दर्शनार्थियोंकी समस्त पाप-राशि क्षणार्धमें ही ध्वंस हो जायगी।' भगवान् शंकर अन्तर्धान हुए ही थे कि हनुमानजी कैलास पर्वतसे एक उत्तम शिव-लिङ्ग लिये वेगपूर्वक वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने वहाँ आते ही माता जानकी, परम प्रभु श्रीराम, सौमित्रि और वानरराज सुग्रीवके चरणोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम किया, किंतु जब उन्होंने भगवती सीता एवं मुनियोंके साथ श्रीरघुनाथजीको बालुकामय शिव-लिङ्गका पूजन करते देखा तो वे अत्यन्त दुःखी हो गये। खिन्नमन उन्होंने श्रीराघवेन्द्रसे कहा— 'प्रभो ! आपके आदेशानुसार मैं वायुवेगसे कैलास पर्वतपर गया। वहाँ भगवान् शंकरका दर्शन न मिलनेसे उन्हें प्रसन्न करनेके लिये मैंने तपस्या प्रारम्भ की। फिर महादेवजीकी कृपासे यह उत्तम लिङ्ग लेकर मैं द्रुतगतिसे आ ही रहा था कि आपने यहाँ बालूका लिङ्ग स्थापित कर लिया। अब मैं इस शिव लिङ्गका क्या करूँ ?' अपने अनन्य भक्त पवनपुत्र हनुमानको उदास देखकर प्रभुने उन्हें अत्यन्त स्नेहपूर्वक समझाया— 'कपीश्वर ! तुम शोक मत करो। तुम्हारी अनुपस्थितिमें शिव-लिङ्गकी स्थापनाका पुण्यकाल व्यतीत हो रहा था, इस कारण मैंने इस सीता-निर्मित बालुका-लिङ्गकी स्थापना कर दी। तुम गम्भीरतापूर्वक विचार करोगे तो प्रत्यक्ष देखोगे कि तुम्हारा किया हुआ प्रत्येक कर्म मेरा किया हुआ है और मेरा किया हुआ प्रत्येक कर्म तुम्हारा। मैंने जो यह शिव लिङ्गकी स्थापना की है, वह तुमने ही की है, तुम यही समझो। 'वानरश्रेष्ठ ! आज शुभ दिन है, अतः इसी समय अपना कैलाससे लाया हुआ श्रेष्ठ शिव लिङ्ग यहाँ तुम्हीं स्थापित करो। 'हनुमदीश्वर'— तुम्हारे ही नामसे यह लिङ्ग त्रिलोकीमें प्रख्यात होगा। पहले हनुमदीश्वरका दर्शन करके तब रामेश्वरका दर्शन होगा।' भगवान् श्रीरामने प्राणप्रिय हनुमानजीको समझाते हुए आगे कहा— 'निष्पाप हनुमान ! तुमने मेरी सेवाकी दृष्टिसे असंख्य ब्रह्मराक्षसोंका वध किया है, तुम्हारी दृष्टि उन्हें शीघ्र परमधाम भेजनेकी थी। तुम तो स्वयं परम पावन हो, अतएव पाप तो तुम्हें स्पर्श भी नहीं कर सकता; किंतु व्यवहारतः इस लिङ्गकी स्थापनासे तुम उस पापसे मुक्त हो जाओगे।' भगवान् श्रीरामकी गहनतम आत्मीयता एवं प्रीतिसे प्रभावित पवननन्दन श्रीरघुनाथजीके सर्वमङ्गलमूल चरण-कमलोंमें दण्डकी भाँति लेट गये और फिर खड़ा होकर हाथ जोड़े गद्गद कण्ठसे स्तवन करने लगे— नमो रामाय हरये विष्णवे प्रभविष्णवे । आदिदेवाय देवाय पुराणाय गदाभृते ॥ विष्टरे पुष्पके नित्यं निविष्टाय महात्मने । प्रहृष्टवानरानीकजुष्टपादाम्बुजाय ते ॥ निष्पिष्टराक्षसेन्द्राय जगदिष्टविधायिने । नमः सहस्त्रशिरसे सहस्त्रचरणाय च ॥ सहस्राक्षाय शुद्धाय राघवाय च विष्णवे । भक्तार्तिहारिणे तुभ्यं सीतायाः पतये नमः ॥ हरये नारसिंहाय दैत्यराजविदारिणे । नमस्तुभ्यं वराहाय दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धर ॥ त्रिविक्रमाय भवते बलियज्ञविभेदिने । नमः परशुरामाय क्षत्रियान्तकराय ते ॥ नमस्ते राक्षसघ्नाय नमो राघवरूपिणे । नमो वामनरूपाय नमो मन्दरधारिणे ॥ नमस्ते मत्स्यरूपाय त्रयीपालनकारिणे । महादेवमहाभीममहाकोदण्डभेदिने ॥ क्षत्रियान्तकरक्रूरभार्गवत्रासकारिणे । नमोऽस्त्वहिल्यासंतापहारिणे चापहारिणे ॥ नागायुतबलोपेतताटकादेहहारिणे । शिलाकठिनविस्तारवालिवक्षोविभेदिने ॥ नमो मायामृगोन्माथकारिणेऽज्ञानहारिणे । दशस्यन्दनदुःखाब्धिशोषणागस्त्यरूपिणे ॥ अनेकोर्मिसमाधूतसमुद्रमदहारिणे । मैथिलीमानसाम्भोजभानवे लोकसाक्षिणे ॥ राजेन्द्राय नमस्तुभ्यं जानकीपतये हरे । तारकब्रह्मणे तुभ्यं नमो राजीवलोचन ॥ रामाय रामचन्द्राय वरेण्याय सुखात्मने । विश्वामित्रप्रियायेदं नमः खरविदारिणे ॥ प्रसीद देवदेवेश भक्तानामभयप्रद । रक्ष मां करुणासिन्धो रामचन्द्र नमोऽस्तु ते ॥ रक्ष मां वेदवचसामप्यगोचर राघव । पाहि मां कृपया राम शरणं त्वामुपैम्यहम् ॥ रघुवीर महामोहमपाकुरु ममाधुना । स्नाने चाचमने भुक्तौ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ॥ सर्वावस्थासु सर्वत्र पाहि मां रघुनन्दन । महिमानं तव स्तोतुं कः समर्थो जगत्त्रये ॥ त्वमेव त्वन्महत्त्वं वै जानासि रघुनन्दन । — स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४६| ३१-४९ 'सबकी उत्पत्तिके आदि कारण, सर्वव्यापी, श्रीहरिस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार है। आदिदेव, पुराणपुरुष, भगवान् गदाधरको नमस्कार है। पुष्पकके आसनपर नित्य विराजमान होनेवाले महात्मा श्रीरघुनाथजीको नमस्कार है। प्रभो! हर्षमें भरे हुए वानरोंका समुदाय आपके युगल चरणारविन्दोंकी सेवा करता है, आपको नमस्कार है। राक्षसराज रावणको पीस डालनेवाले तथा सम्पूर्ण जगत्‌का अभीष्ट सिद्ध करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक, सहस्रों चरण और सहस्रों नेत्र हैं, आप विशुद्ध विष्णुस्वरूप राघवेन्द्रको नमस्कार है। आप भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा सीताके प्राणवल्लभ हैं। आपको नमस्कार है। दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षः स्थलको विदीर्ण करनेवाले आप नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। अपनी दाढ़ोंपर पृथ्वीको उठानेवाले भगवान् वराह आपको नमस्कार है। बलिके यज्ञको भङ्ग करनेवाले आप भगवान् त्रिविक्रमको नमस्कार है। वामनरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है। अपनी पीठपर महान् मन्दराचल धारण करनेवाले भगवान् कच्छपको नमस्कार है। तीनों वेदोंकी सुरक्षा करनेवाले मत्स्यरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है। क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले परशुरामरूपी रामको नमस्कार है। राक्षसोंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है राघवेन्द्रका रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। महादेवजीके महान् भयंकर महाधनुषको भङ्ग करनेवाले आपको नमस्कार है। क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले क्रूर परशुरामको भी त्रास देनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन् ! आप अहिल्याका संताप और महादेवजीका चाप हरनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। दस हजार हाथियोंका बल रखनेवाली ताड़काके शरीरका अन्त करनेवाले आपको नमस्कार है। पत्थरके समान कठोर और चौड़ी वालीकी छाती छेद डालनेवाले आपको नमस्कार है। आप मायामय मृगका नाश करनेवाले तथा अज्ञानको हर लेनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। दशरथजीके दुःखरूपी समुद्रको शोष लेनेके लिये आप मूर्तिमान् अगस्त्य हैं, आपको नमस्कार है। अनन्त उत्ताल तरंगोंसे उद्वेलित समुद्रका भी दर्पदलन करनेवाले आपको नमस्कार है। मिथिलेशनन्दिनी सीताके हृदयकमलको विकसित करनेवाले सूर्यरूप आप लोकसाक्षी श्रीहरिको नमस्कार है। हरे! आप राजाओंके भी राजा और जानकीके प्राणवल्लभहैं, आपको नमस्कार है। कमलनयन ! आप ही तारक ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है। आप ही योगियोंके मनको रमानेवाले 'राम' हैं। राम होते हुए चन्द्रमाके समान आह्लाद प्रदान करनेके कारण 'रामचन्द्र' हैं, सबसे श्रेष्ठ और सुखस्वरूप हैं। आप विश्वामित्रजीके प्रिय हैं, खर नामक राक्षसका हृदय विदीर्ण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। भक्तोंको अभयदान देनेवाले देवदेवेश्वर ! प्रसन्न होइये। करुणासिन्धु श्रीरामचन्द्र ! आपको नमस्कार है, मेरी रक्षा कीजिये। वेद-वाणीके भी अगोचर राघवेन्द्र ! मेरी रक्षा कीजिये। श्रीराम ! कृपा करके मुझे उबारिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ। रघुवीर ! मेरे महान् मोहको इस समय दूर कीजिये। रघुनन्दन ! स्नान, आचमन, भोजन, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि सभी क्रियाओं और सभी अवस्थाओंमें आप मेरी रक्षा कीजिये। तीनों लोकोंमें कौन ऐसा पुरुष है, जो आपकी महिमाका वर्णन या स्तवन करनेमें समर्थ हो सकता है। रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम ! आप ही अपनी महिमाको जानते हैं।' करुणामूर्ति श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर अञ्जनानन्दन भक्तिपूर्ण हृदयसे जगज्जननी श्रीजानकीजीकी स्तुति करते हुए कहने लगे— जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ दारिद्र्यरणसंहीं भक्तानामिष्टदायिनीम् । विदेहराजतनयां राघवानन्दकारिणीम् ॥ भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम् । पौलस्त्यैश्वर्यसंहर्त्रीं भक्ताभीष्टां सरस्वतीम् ॥ पतिव्रताधुरीणां त्वां नमामि जनकात्मजाम् । अनुग्रहपरामृद्धिमनघां हरिवल्लभाम् ॥ आत्मविद्यां त्रयीरूपामुमारूपां नमाम्यहम् । प्रसादाभिमुखीं लक्ष्मीं क्षीराब्धितनयां शुभाम् ॥ नमामि चन्द्रभगिनीं सीतां सर्वाङ्गसुन्दरीम् । नमामि धर्मनिलयां करुणां वेदमातरम् ॥ पद्मालयां पद्महस्तां विष्णुवक्षःस्थलालयाम् । नमामि चन्द्रनिलयां सीतां चन्द्रनिभाननाम् ॥ आह्लादरूपिणीं सिद्धिं शिवां शिवकरीं सतीम् । नमामि विश्वजननीं रामचन्द्रेष्टवल्लभाम् । सीतां सर्वानवद्याङ्गीं भजामि सततं हृदा ॥ — स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४६|५०-५७ 'जनकनन्दिनि ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सब पापोंका नाश तथा दारिद्र्यका संहार करनेवाली हैं। भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाली भी आप ही हैं। राघवेन्द्र श्रीरामको आनन्द प्रदान करनेवाली विदेहराज जनककी लाड़िली श्रीकिशोरीजीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप पृथ्वीकी कन्या और विद्यास्वरूपा हैं, कल्याणमयी प्रकृति भी आप ही हैं। रावणके ऐश्वर्यका संहार तथा भक्तोंके अभीष्टका दान करनेवाली सरस्वतीरूपा भगवती सीताको मैं नमस्कार करता हूँ। पतिव्रताओंमें अग्रगण्य आप श्रीजनकदुलारीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप सबपर अनुग्रह करनेवाली समृद्धि, पापरहित और श्रीविष्णुप्रिया लक्ष्मी हैं। आप ही आत्मविद्या, वेदत्रयी तथा पार्वतीस्वरूपा हैं । आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आप ही क्षीरसागरकी कन्या और चन्द्रमाकी भगिनी कल्याणमयी महालक्ष्मी हैं, जो भक्तोंपर कृपा-प्रसादका अनुग्रह करनेके लिये सदा उत्सुक रहती हैं, आप सर्वाङ्गसुन्दरी सीताको मैं प्रणाम करता हूँ । आप धर्मका आश्रय और करुणामयी वेदमाता गायत्री हैं, आपको मैं प्रणाम करता हूँ। आपका कमलवनमेंनिवास है, आप ही हाथमें कमल धारण करनेवाली तथा भगवान् विष्णुके वक्षः स्थलमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हैं, चन्द्रमण्डलमें भी आपका निवास है, आप चन्द्रमुखी सीतादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। आप श्रीरघुनन्दनकी आह्लादमयी शक्ति हैं, कल्याणमयी सिद्धि हैं और कल्याणकारिणी सती हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी परम प्रियतमा जगदम्बा जानकीको मैं प्रणाम करता हूँ। सर्वाङ्गसुन्दरी सीताका मैं अपने हृदयमें सदैव चिन्तन करता हूँ।'* इसके बाद आञ्जनेयने प्रभुके आदेशानुसार श्रीरामेश्वरके उत्तरी भागमें अपने द्वारा लाया हुआ शिव लिङ्ग स्थापित कर दिया। आनन्दरामायणके सारकाण्डकी इस कथासे थोड़ी भिन्नता पायी जाती है। उसके अनुसार सेतु-बन्धके समय श्रीराघवेन्द्रने हनुमानजीको काशी जाकर भगवान् शंकरसे एक उत्तम शिव-लिङ्ग माँगकर मुहूर्तमात्रमें ले आनेकी आज्ञा दी। पवननन्दन तीव्रवेगसे काशी पहुँचे और शिवजीसे दो श्रेष्ठ लिङ्ग माँगकर उसी वेगसे लौट पड़े। उस समय उनके मनमें कुछ गर्व हो आया। सर्वान्तर्यामी भक्तवत्सल प्रभुने मुहूर्त बीतते देखकर बालूका शिव-लिङ्ग बनाकर सेतुके इस छोरपर स्थापित कर दिया। बालूके शिव-लिङ्गकी स्थापनाका समाचार पवन-कुमारको मार्गमें ही मिल गया था। इस कारण उन्होंने प्रभुके समीप आते ही क्रोधसे पृथ्वीपर अपना पैर पटका। इससे उनके दोनों पैर धरतीमें धँस गये। अत्यन्त क्षुब्ध होकर उन्होंने प्रभुसे कहा— 'प्रभो ! आपने काशीमें भगवान् शिवसे एक उत्तम शिव लिङ्ग ले आनेके लिये मुझे भेजा था, क्या यह आपको स्मरण नहीं था ? आपने व्यर्थ ही मेरा उपहास किया। अब मैं इन दोनों शिव-लिङ्गोंका क्या करूँ ?' श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त शान्तिपूर्वक हनुमानजीसे कहा— 'कपे ! अब यदि तुम मेरे द्वारा स्थापित बालुकामय शिव-लिङ्गको पूँछमें लपेटकर उखाड़ दो तो मैं तुम्हारे काशीसे लाये हुए इस शिव-लिङ्गको स्थापित कर दूँ।' हनुमानजीने उक्त बालूके लिङ्गके ऊपरी भागमें पूँछ लपेटकर उसे जोरसे हिलाया। अनेक बार हिलानेपर भी जब वह टस-से-मस नहीं हुआ, तब महावीर हनुमानने अपनी पूरी शक्ति लगाकर उसे खींचा। भगवान् श्रीरामके स्पर्शसे उक्त प्रतिष्ठित शिव-लिङ्ग वज्र-तुल्य हो गया था। महावीरकी अमित शक्तिसे वह बालूका लिङ्ग तो टस-से-मस नहीं हो सका, किंतु हनुमानजीकी पूँछ टूट गयी और वे दूर पृथ्वीपर मुँहके बल गिरकर मूच्छित हो गये। वह दृश्य देखकर वहाँ समस्त वानर-भालू हँस पड़े। कुछ क्षणोपरान्त मूर्च्छा दूर हुई, पर साथ ही श्रीराम-भक्त हनुमानका गर्व भी नष्ट हो गया। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक प्रभुकी स्तुति करते हुए कहा— 'कृपासिंधु श्रीराम ! मेरे द्वारा जो अपराध हुआ हो, उसे आप क्षमा करें।'† दयामय श्रीरामचन्द्रजीने पवननन्दनसे कहा— 'हनुमान ! तुम मेरे द्वारा स्थापित रामेश्वर शिव-लिङ्गसे उत्तरकी ओर इस विश्वनाथ-नामक लिङ्गको स्थापित कर दो।' फिर भगवान् श्रीरामने हनुमानजीके द्वारा स्थापित शिव-लिङ्गको वरदान देते हुए कहा— 'हनुमान ! तुम्हारे द्वारा स्थापित विश्वनाथ नामक उत्तम लिङ्गकी पूजा किये बिना जो मनुष्य सेतुबन्ध रामेश्वरकी पूजा करेंगे, उनकी पूजा व्यर्थ हो जायगी।' ‡ इसके अनन्तर प्रभुने पवनकुमारसे आगे कहा— 'मेरे लिये लाया हुआ विश्वनाथ शिव-लिङ्ग यहीं चुपचाप पड़ा रहने दो। यह लिङ्ग दीर्घकालतक पृथ्वीपर अपूजित ही रहेगा। भविष्यमें मैं स्वयं इसकी स्थापना करूँगा। तुम्हारी पूँछ यहीं छिन्न हुई है, अतएव तुम यहीं धरतीपर छिन्नपुच्छ तथा गुप्तपाद होकर अपने गर्वका स्मरण करते रहना।' फिर दयामूर्ति श्रीरघुनाथजीने अपने करकमलोंसे हनुमानजीकी पूँछका स्पर्श करके उसे पूर्ववत् सुदृढ़ एवं सुन्दर बना दिया। हनुमानजीने प्रभुकी लीलासे शिक्षा ग्रहण की। अब सर्वथा गर्वरहित हनुमानजीकी प्रसन्नताकी सीमा न रही। उन्होंने सीतापति श्रीरामके आदेशानुसार श्रीरामेश्वर-लिङ्गसे उत्तर अपना विश्वनाथ-लिङ्ग स्थापित कर दिया। 👉 *य इदं वायुपुत्रेण कथितं पापनाशनम् ॥ स्तोत्रं श्रीरामचन्द्रस्य सीतायाः पठतेऽन्वहम् । स नरो महदैश्वर्यमश्रुते वाञ्छितं सदा ॥ अनेकक्षेत्रधान्यानि गाश्च दोग्ध्रीः पयस्विनीः । आयुर्विद्याश्च पुत्रांश्च भार्यामपि मनोरमाम् ॥ एतत्स्तोत्रं सकृद्विप्राः पठन्नाप्नोत्यसंशयः । एतत्स्तोत्रस्य पाठेन नरकं नैव यास्यति ॥ ब्रह्महत्यादिपापानि नश्यन्ति सुमहान्त्यपि । सर्वपापविनिर्मुक्तो देहान्ते मुक्तिमाप्नुयात् ॥ —स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४६|५९-६३ 'जो मनुष्य वायुपुत्र हनुमानजीद्वारा वर्णित श्रीराम सीताके इस पापनाशक स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करता है, वह सदा मनोवाञ्छित महान् ऐश्वर्यका उपभोग करता है। अनेक क्षेत्र, धान्य, दूध देनेवाली गौएँ, आयु, विद्या, मनोरमा भार्या तथा श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है। ब्राह्मणो! इस स्तोत्रका एक बार भी पाठ करनेवाला मनुष्य इन सब वस्तुओंको निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। इसके पाठसे मनुष्य नरकमें नहीं पड़ता। उसके ब्रह्महत्या आदि बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। वह सब पापोंसे मुक्त हो और देहावसान होनेपर मोक्ष पा लेता है।' † मयापराधितं राम तत्क्षमस्व कृपानिधे । — आ० रा० सा० १०| १४० ‡असम्पूज्य विश्वनाथं मारुते त्वत्प्रतिष्ठितम् ॥ ममादौ पूजयन्त्यत्र ये नरा लिङ्गमुत्तमम् । रामेश्वराभिधं सेतौ तेषां पूजा वृथा भवेत् ॥ — आ० रा० सा० १०।१४३-१४४ °सेतु-बन्धके अनन्तर भगवान् श्रीरामके द्वारा अमित महिमामय 'रामेश्वर' की स्थापनाका उल्लेख हो चुका है, किंतु 'रामेश्वर' की स्थापनाके सम्बन्धमें एक और कथा 'आनन्दरामायण' तथा पुराण-ग्रन्थोंमें वर्णित है। प्रस्तुत कथा स्कन्दपुराणके 'ब्राह्मखण्ड, सेतु-माहात्म्य' के आधारपर लिखी गयी है। || जय_श्री_राम || || राणा जी खेड़ांवाली || #🌸जय सिया राम #🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏श्री राम भक्त हनुमान🚩 #🙏रामायण🕉
*राधा और रुक्मिणी में से लक्ष्मी कौन* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 चराचर जगत में रुक्मिणी और राधा का संबंध श्रीकृष्ण से है। संसार रुक्मिणी जी को श्रीकृष्ण की पत्नी और राधा जी को श्रीकृष्ण की प्रेमिका के रूप में मानता है। आम जगत में रुक्मिणी और राधा की यही पहचान है परंतु क्या कभी आपके मन में यह प्रशन उठा है की राधा और रुक्मिणी में से कौन लक्ष्मी का अवतरण था ? इस लेख के माध्यम से हम शास्त्रों के अनुसार इस तथ्य से आप सभी पाठकों को रूबरू करवाते हैं। शास्त्रों में लक्ष्मी जी के रहस्य को इस प्रकार उजागर किया है कि लक्ष्मी जी क्षीरसागर में अपने पति श्री विष्णु के साथ रहती हैं एवं अपने अवतरण स्वरुप में राधा के रूप में कृष्ण के साथ गोलोक में रहती हैं। महाभारत में लक्ष्मी के ‘विष्णुपत्नी लक्ष्मी’ एवं ‘राज्यलक्ष्मी’ ऐसे दो प्रकार बताए गए हैं। इनमें से लक्ष्मी हमेशा विष्णु के पास रहती हैं एवं राज्यलक्ष्मी पराक्रमी राजाओं के साथ विचरण करती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार विष्णु के दक्षिणांग से लक्ष्मी का, एवं वामांग से लक्ष्मी के ही अन्य एक अवतार राधा का जन्म हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण में निर्दिष्ट लक्ष्मी के अवतार एवं उनके प्रकट होने के स्थान इस प्रकार है 1.महालक्ष्मी जो वैकुंठ में निवास करती हैं। 2. स्वर्गलक्ष्मी जो स्वर्ग में निवास करती हैं। 3. राधा जी गोलोक में निवास करती हैं। 4. राजलक्ष्मी (सीता) जी पाताल और भूलोक में निवास करती हैं। 5. गृहलक्ष्मी जो गृह में निवास करती हैं। 6. सुरभि (रुक्मणी) जो गोलोक में निवास करती हैं। 7. दक्षिणा जो यज्ञ में निवास करती हैं। 8. शोभा जो हर वस्तु में निवास करती हैं। लक्ष्मी रहस्य का रूपकात्मक दिग्दर्शन करने वाली अनेकानेक वृतांत और कथाएं महाभारत जैसे शास्त्रों में वर्णित हैं। जिनमें से एक वृतांत है "लक्ष्मी-रुक्मिणी संवाद" महाभारत के एक प्रसंग में लक्ष्मी के रहस्य से संबंधित एक प्रशन युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था, जिसका जवाब देते समय भीष्म ने लक्ष्मी एवं रुक्मिणी के दरम्यान हुए एक संवाद की जानकारी युधिष्ठिर को दी। महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार, लक्ष्मी ने रुक्मिणी से कहा था, की मेरा निवास तुममे (रुक्मिणी) और और राधा में समानता से है तथा गोकुल कि गाएं एवं गोबर में भी मेरा निवास है। श्रीकृष्ण के तत्व दर्शन अनुसार रुक्मिणी को देह और राधा को आत्मा माना गया है। श्रीकृष्ण का रुक्मिणी से दैहिक और राधा से आत्मिक संबंध माना गया है। रुक्मिणी और राधा का दर्शन बहुत गहरा है। इसे सम्पूर्ण सृष्टि के दर्शन से जोड़कर देखें तो सम्पूर्ण जगत की तीन अवस्थाएं हैं। 1. स्थूल; 2. सूक्ष्म; 3. कारण स्थूल जो दिखाई देता है जिसे हम अपने नेत्रों से देख सकते हैं और हाथों से छू सकते हैं वह कृष्ण-दर्शन में रुक्मणी कहलाती हैं। सूक्ष्म जो दिखाई नहीं देता और जिसे हम न नेत्रों से देख सकते हैं न ही स्पर्श कर सकते हैं, उसे केवल महसूस किया जा सकता है वही राधा है और जो इन स्थूल और सूक्ष्म अवस्थाओं का कारण है वह हैं श्रीकृष्ण और यही कृष्ण इस मूल सृष्टि का चराचर हैं। अब दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो स्थूल देह और सूक्ष्म आत्मा है। स्थूल में सूक्ष्म समा सकता है परंतु सूक्ष्म में स्थूल नहीं। स्थूल प्रकृति और सूक्ष्म योगमाया है और सूक्ष्म आधार शक्ति भी है लेकिन कारण की स्थापना और पहचान राधा होकर ही की जा सकती है। यदि चराचर जगत में देखें तो सभी भौतिक व्यवस्था रुक्मणी और उनके पीछे कार्य करने की सोच राधा है और जिनके लिए यह की जा रही है और वो कारण है श्रीकृष्ण। अतः राधा और रुक्मणी दोनों ही लक्ष्मी का प्रारूप है परंतु जहां रुक्मणी देहिक लक्ष्मी हैं वहीं दूसरी ओर राधा आत्मिक लक्ष्मी हैं। जय श्री राधे राधे राणा जी खेड़ांवाली 🚩 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
*गोरख के गुरु मत्स्येंद्रनाथ की कहानी* 🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃 गुरु गोरखनाथ के गुरु थे परम योगी गुरु मत्स्येन्द्र नाथ । जिन्हे लोग मछिन्दर नाथ के नाम से भी जानते हैं । शायद बचपन मे आपने एक कहावत सुनी होगी कि "जाग मछिन्दर गोरख आया । " जी हां । इन्ही की बात कर रहा हूँ । यह कहानी भी आप लोगो ने अवश्य सुनी होगी । यह कहानी गुरु और शिष्य के प्रेम की पराकाष्ठा की कहानी है कि एक गुरु अपने शिष्य को कितना पुत्रवत प्यार करता है और शिष्य के वियोग मे गुरु पित्रवत मरणासन्न दशा मे पहुंच जाता है । यहाँ इन दोनों ही योगियो की एक अन्य कहानी की बात करेंगे जो की कम प्रचलित है । पर है मजेदार !! ☺👌 जैसे बालक को अपने पिता से बड़ा हीरो कोई दूसरा नही लगता और वो अपने पिता की बुराई नही सुन सकता, वैसे ही ये बात शिष्य के लिये भी लागू होती है । गुरु शिष्य के रिश्ते बिल्कुल पिता-पुत्र जैसे ही होते हैं और इसको गुरु शिष्य ही समझ सकते हैं । हुआ ऐसा था कि गुरु मछिन्दर नाथ जी भ्रमण करते हुये पुर्वोत्तर भारत की यात्रा पर थे । उधर ऐसा हुआ की वहां की राज कन्या के रुप यौवन के जादू मे गिरफ़तार हो गये और उस राज कन्या से शादी कर ली । सब योगिक क्रिया भक्ति छोड़ छाड़ कर मोह माया मे पडकर और वहीं रहने लग गये । वहीं उनको उस राज कन्या से एक पुत्र की प्राप्ति भी हो गई । इधर गोरख नाथ और उनके दूसरे गुरु भाईयों को दूसरे पंथ वाले ताने मारते और कहते कि ये लोग काहे के योगी हैं ? ढोंगी हैं ढोंगी । इनका गुरु मछिन्दर नाथ तो शादी करके दुनियादारी मे पडा है । यह जो गुरु की गलती शिष्यों को भुगतनी पड़ रही थी, गोरखनाथ जी को भी बहुत बुरा लगता था । यह ऐसे ही था जैसे किसी बच्चे को कोई उसके पिता के बारे मे कुछ कहे और साधू समाज मे तो आज भी इस बात्त को लेकर खून खराबा तक हो जाता है । खैर साहब .. गोरख ने अपने साथियों से चर्चा की । और यह तय हुआ की - अब बहुत हो गया । गुरु मछिन्दर नाथ को वापस उस मोह जाल से निकाल कर लाना ही पडेगा और उनको लाने गोरख जायेंगे । क्योंकी गोरख उस समय तक महान सिद्ध योगी बन चुके थे । पर क्या करें ? गुरु के कारण सब बेकार । अब गोरख वहां पहुंच गये जहां गुरु मछिन्दर का महल था । सन्देश भिजवाया । पर गुरु मछिन्दर ने हर बार मिलने मे आनाकानी की । उनको लग गया था कि ये मुझको लिये बगैर वापस लौटने वाला नही है । अब गोरख को वहां काफ़ी समय हो गया परंतु गोरख अपने गुरु से अपने मन की बात कह सकें, इतना मौका ही उनको नही मिला । मछीन्दर नाथ जी ने गोरख को सब सुख सुविधा दे रखी थी, पर जैसे ही गोरख काम की बात पर आते, वो बात पलट देते और चूँकि वो गुरु थे, अत: गोरख उनसे कुछ उल्टा सीधा भी नही बोल सकते थे । मछिन्दर तो बस सब समय उस छोटे बच्चे को ही खिलाया करते थे और महल के बाग बगीचों मे उसको लेकर घूमा करते थे । महल भी बडा रमणीय था पास ही बगीचा और साथ ही बहती नदी । वहीं गुरु मछीन्दर बालक को लिये घूमा करते थे । उनका प्रेम अब रानी मे कम और बेटे मे ज्यादा हो गया था । गोरख इसी उधेड बुन मे रहते थे कि किसी तरह गुरु अकेले मे मिल जायें और उनको समझाने की कोशिश करें । पर मछीन्दर के साथ तो कभी रानी कभी दासियां, भरपूर महफ़िल रहती थी । एक दिन ऐसा हुआ की बच्चे को लेकर मछीन्दर बगीचे मे टहल रहे थे और देव योग से अकेले ही थे और हुआ ये की राजकुमार जी हां . उनका बेटा ! उसने उनकी गोद मे मल-मूत्र त्याग दिया जिससे पिता पुत्र उसमे गंदे हो गये । अब गोरख ने देखा की उनके गुरु बडे प्रेम से उस बच्चे की गन्दगी साफ़ कर रहे हैं । उनको बडा आश्चर्य हुआ की ये सब गुरु जी को क्या हो गया है । वो मौका देख कर मछीन्दर नाथ के पास पहुंचे और बोले - गुरुदेव ! आप छोड़ो मै धो कर लाता हूँ राजकुमार को नदी पर । मछीन्दर नाथ ने सोचा - ठीक है तब तक मैं अपने आपको साफ़ कर लेता हूँ । काफी देर हो गई और गोरख नही आये तो उनको चिंता होने लगी । इतनी देर मे गोरख उनको अकेले आते दिखाई पडे तो उनकी चिन्ता और बढ गई क्योंकि गोरख अकेले ही आये थे । मछिन्दर बोले - राजकुमार कहां है गोरख ? गोरख - गुरुदेव उसको तो मैने धो कर सुखा दिया ! मछिन्दर - इसका क्या मतलब ? गोरख बोले - गुरु जी आपने उसको धो कर लाने को कहा था और वो बुरी तरह गन्दगी मे भी सना था, सो मैने उसकी दोनों टांग पकड कर उल्टा किया और फ़िर उसको खूब सिर की तरफ़ से नदी मे डुबोया निकाला और फ़िर जैसे धोबी कपडों को पछाडता है । उस तरह मैने उसको पत्थर पर पटक पटक कर पछाड़ा, तब जाकर बड़ी मुश्किल से उसकी गन्दगी साफ़ हुई और फ़िर उसमे ज्यादा जान तो थी नही । इतना धोने के बाद केवल कुछ हड्डियां ही बाकी बची थी । सो वो सूखने के लिये वहीं एक पत्थर पर रख आया हूँ । और गुरु मछिन्दर तो इतना सुनते सुनते ही पागल जैसे हो गये और उन्होने पूछा । अरे गोरख ! ये क्या किया तूने ! अरे मेरे राज कुमार ने तेरा क्या बिगाडा था ? हाय ! मेरा बेटा कहां है ? इस तरह प्रलाप करने लग गये और थोडी देर बाद बेहोश हो गये । अब गोरख उनको होश मे लाने का उपाय करने लगे । गुरु मछिन्दर नाथ जी पुत्र वियोग मे अर्धमूर्छित से थे और इधर गोरख सोच रहे थे कि मोह माया भी क्या चीज है ? जिसने गुरु मछिन्दर नाथ जैसे महाज्ञानी की बुद्धि पर भी पत्थर पटक दिये । गोरख ने गुरु को जगाने की बडी युक्तियां की । पर सब बेकार । असल मे गोरख जानते थे की जब तक इनका मन पुत्र मे रहेगा, तब तक गुरु वापस नही जायेंगे और गुरु वापस नही जायेंगे, तब तक शिष्यों को दूसरे लोगो के ताने सुनने पडेंगे । गुरु गोरख इतने सिद्ध महायोगी थे कि अगर किसी मरे हुये पशु की हड्डियां भी हो तो अपने योग बल से उसमे जान डाल देते थे और इन गोरखनाथ को आकाश मार्ग से यानि हवा मे उडने की सिद्धि भी प्राप्त हो चुकी थी । वे नही चाहते थे कि बालक को वापस जिन्दा किया जाये । वे तो बस किसी तरह गुरु का भ्रम तोड कर उनको वापस ले जाना चाहते थे । गुरु होश मे आये तो फ़िर उनका प्रलाप शुरु हो गया । तब गोरख ने लाख समझाया कि महाराज ये सब झूठी माया है आप जागो और मेरे साथ चलो । पर मछिन्दर तो जैसे पूरे मोह ममता मे डूबे थे । आखिर गोरख ने एक और पैंतरा फैंका और बोले - अगर आप चाहते हैं कि ये बालक जीवित हो जाये तो आप बदले मे क्या दे सकते हैं ? मछिन्दर बोले - इस बालक के एवज में मैं अपने प्राण भी दे सकता हूँ । गोरख तो इसी घडी के इन्तजार में थे । उन्होने कहा की गुरु तो आप संकल्प करो इस बात का । फ़िर मैं किसी से बात करके देखता हूँ । मछिन्दर बोले - गोरख, जल्दी कर । कहीं इस विरह वेदना मे मेरे प्राण ही ना निकल जायें । गोरख ने मन ही मन कहा - कि वो तो मैं नही निकलने दूंगा । उधर जैसे ही मछिन्दर ने संकल्प लिया वैसे ही गोरख ने उस बालक की हड्डियां इक्कठी करके उसको जिन्दा कर दिया वैसे ही मछीन्दर नाथ के तो प्राण मे प्राण लौट आये । अब गोरख ने उनको इशारा किया कि अब चलो, बहुत हो गई आपकी घर गृहस्थी । अब आप शर्त हार चुके हो, अपना वचन निभाओ और अब देर मत करिए । अब मछीन्दर अनमने से वापसी के लिये तैयार होने महल चले गये । वहां उन्होनें रानी को सारी बात बताई । रानी भी जानती थी कि इनके शिष्य बडे पराक्रमी हैं और एक ना एक दिन तो उनको लौटना ही होगा । रानी को उनसे एक पुत्र की अभिलाषा थी, वह भी पूरी हो ही चुकी थी । सो रानी ने उन्हे विदा किया, परंतु चूँकि वो पत्नि थी उनकी, सो साथ मे एक पोटली मे बहुत सारा यानि पांच छह किलो सोने का एक टुकडा भी रख दिया । उसने सोचा की अब इनको फ़कीरी की आदत तो रही नही सो यह इनके रास्ते मे कहीं वक़्त बेवक़्त काम आ ही जायेगा । दोनो गुरु चेले वहां से चल दिये, अब रास्ते मे कहीं जंगल मे रुकते कहीं पहाड पर । अब यहां मछीन्दर कहते, - गोरख कही आसपास बस्ती देख कर रात्री विश्राम करेंगे और गोरख को जंगल मे रुकने का मन रहता । अब गोरख को मालूम नही की इस पोटली मे माया है और इसी माया को कोई चोर डाकू ना लूट ले, इसिलिये मछिन्दर किसी ग्राम के आस पास रुकने की जिद्द करते । गोरख ने देखा की गुरु के पास एक पोटली है वे इसको नही छोडते । आखिर इसमे है क्या ? सोते जागते उनका मन इस पोटली मे ही बस रहा था । आखिर है क्या ? जो गुरु इतने अनमने से चल रहे हैं । एक दिन मछिन्दर को जरा जल्दी मे शौच लग गया और वो पोटली वहीं भूल कर चले गये । पीछे से गोरख ने देखा की अरे यह तो सोना है । तब समझ आया कि गुरुजी क्यों अनमने हैं ? और जंगल मे रुकने से क्यों डरते हैं । गोरख ने पोटली ऊठाकर पहाड से नीचे फ़ेंक दी । मछीन्दर को शौच से वापसी मे पोटली याद आयी और जल्दी जल्दी वापस आये और नजरों से इधर उधर देखना शुरु किया । संकोच वश गोरख से भी नही पूछ सके । आखिर सब जगह देखने के बाद उन्होने गोरख से पूछा - गोरख इधर एक पोटली थी , देखी क्या ? गोरख बोले - गुरुजी वो आफ़त की पोटली थी और अब आप उस आफ़त से निश्चिंत रहो । मैने वो आफ़त पहाड से नीचे फ़ेंक दी है । आप आराम से चलो, अब चोर उचक्कों का भी डर नही । ना रहा बांस और अब ना बजेगी बाँसुरी । इस तरह गुरु मछिन्दर नाथ जी का भ्रम टुटा । और वो वहां से वापस अपने धूने पर पहुंचकर तप मे लीन हो गये । सच ही कहा गया है की मोह और माया अच्छे अच्छे ज्ञानियों की भी बुद्धि भ्रष्ट कर देती है । ।।श्री गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में आदेश आदेश।। ।। राणा जी खेड़ांवाली।। #🕉️सनातन धर्म🚩 #जय गुरू गोरख नाथ जी