sn vyas
ShareChat
click to see wallet page
@sn7873
sn7873
sn vyas
@sn7873
जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍ सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) {दूसरा अध्याय} 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ गरुड़ उवाच – गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! यमलोक का मार्ग किस प्रकार दु:खदायी होता है। पापी लोग वहाँ किस प्रकार जाते हैं, वह मुझे बताइये। श्रीभगवानुवाच – श्री भगवान बोले – हे गरुड़ ! महान दुख प्रदान करने वाले यममार्ग के विषय में मैं तुमसे कहता हूँ, मेरा भक्त होने पर भी तुम उसे सुनकर काँप उठोगे। यममार्ग में वृक्ष की छाया नहीं है, जहाँ प्राणी विश्राम कर सके। उस यममार्ग में अन्न आदि भी नहीं हैं, जिनसे कि वह अपने प्राणों की रक्षा कर सके? हे खग ! वहाँ कहीं जल भी नहीं दिखता, जिसे अत्यन्त तृषातुर वह जीव पी सके। वहाँ प्रलयकाल की भाँति बारहों सूर्य तपते रहते हैं। उस मार्ग में जाता हुआ पापी कभी बर्फीली हवा से पीड़ित होता है तथा कभी काँटे चुभते हैं और कभी महाविषधर सर्पों के द्वारा डसा जाता है। वह पापी कहीं सिंहों, व्याघ्रों और भयंकर कुत्तों द्वारा खाया जाता है, कहीं बिच्छुओं द्वारा डसा जाता है और कहीं उसे आग से जलाया जाता है। तब कहीं अति भयंकर महान असिपत्रवन नामक नरक में वह पहुँचता है, जो दो हजार योजन विस्तारवाला कहा गया है। वह वन कौओं, उल्लुओं, वटों (पक्षी विशेषों), गीधों, सरघों तथा डाँसों से व्याप्त है। उसमें चारों ओर दावाग्नि व्याप्त है, असिपत्र के पत्तों से वह जीव उस वन में छिन्न-भिन्न हो जाता है। कहीं अंधे कुएँ में गिरता है, कहीं विकट पर्वत से गिरता है, कहीं छुरे की धार पर चलता है तो कहीं कीलों के ऊपर चलता है। कहीं घने अन्धकार में गिरता है, कहीं उग्र (भय उत्पन्न करने वाले) जल में गिरता है, कहीं जोंको से भरे हुए कीचड़ में गिरता है तो कहीं जलते हुए कीचड़ में गिरता है। कहीं तपी हुई बालुका से व्याप्त और कहीं धधकते हुए ताम्रमय मार्ग, कहीं अंगार की राशि और कहीं अत्यधिक धुएँ से भरे हुए मार्ग पर उसे चलना पड़ता है। कहीं अंगार की वृष्टि होती है, कहीं बिजली गिरने के साथ शिलावृष्टि होती है, कहीं रक्त की, कहीं शस्त्र की और कहीं गर्म जल की वृष्टि होती है। कहीं खारे कीचड़ की वृष्टि होती है, मार्ग में कहीं गहरी खाई है, कहीं पर्वत-शिखरों की चढ़ाई है और कहीं कन्दराओं में प्रवेश करना पड़ता है। वहाँ मार्ग में कहीं घना अंधकार है तो कहीं दु:ख से चढ़ी जाने योग्य शिलाएँ हैं, कहीं मवाद, रक्त तथा विष्ठा से भरे हुए तालाब हैं। यम मार्ग के बीचोबीच अत्यन्त उग्र और घोर वैतरणी नदी बहती है। वह देखने पर दु:खदायिनी हो तो क्या आश्चर्य? उसकी वार्ता ही भय पैदा करने वाली है। वह सौ योजन चौड़ी है, उसमें पूय (पीब-मवाद) और शोणित (रक्त) बहते रहते हैं। हड्डियों के समूह से तट बने हैं अर्थात उसके तट पर हड्डियों का ढेर लगा रहता है। माँस और रक्त के कीचड़ वाली वह नदी दु:ख से पार की जाने वाली है। अथाह गहरी और पापियों द्वारा दु:खपूर्वक पार की जाने वाली यह नदी केशरूपी सेवार से भरी होने के कारण दुर्गम है। वह विशालकाय ग्राहों (घड़ियालों) से व्याप्त है और सैकड़ो प्रकार के घोर पक्षियों से आवृत है। हे गरुड़ ! आये हुए पापी को देखकर वह नदी ज्वाला और धूम से भरकर कड़ाह में रखे घृत की भाँति खौलने लगती है। वह नदी सूई के समान मुख वाले भयानक कीड़ो से चारों ओर व्याप्त है। वज्र के समान चोंच वाले बड़े-बड़े गीध एवं कौओं से घिरी हुई है। वह नदी शिशुमार, मगर, जोंक, मछली, कछुए तथा अन्य मांसभक्षी जलचर – जीवों से भरी पड़ी है। उसके प्रवाह में गिरे हुए बहुत से पापी रोते-चिल्लाते हैं और हे भाई! हा पुत्र! हा तात! – इस प्रकार कहते हुए बार-बार विलाप करते हैं। भूख और प्यास से व्याकुल होकर पापी जीव रक्त का पान करते हैं। वह नदी झागपूर्ण रक्त के प्रवाह से व्याप्त, महाघोर, अत्यन्त गर्जना करने वाली, देखने में दु:ख पैदा करने वाली तथा भयावह है। उसके दर्शन मात्र से पापी चेतनाशून्य हो जाते हैं। बहुत से बिच्छू तथा काले सर्पों से व्याप्त उस नदी के बीच में गिरे हुए पापियों की रक्षा करने वाला कोई नहीं है। उसके सैकड़ों, हजारों भँवरों में पड़कर पापी पाताल में चले जाते हैं। क्षण भर पाताल में रहते हैं और एक क्षण में ही ऊपर चले आते हैं। हे खग! वह नदी पापियों के गिरने के लिए ही बनाई गई है। उसका पार नहीं दिखता। वह अत्यन्त दु:खपूर्वक तरने योग्य तथा बहुत दु:ख देने वाली है। इस प्रकार बहुत प्रकार के क्लेशों से व्याप्त अत्यन्त दु:खप्रद यममार्ग में रोते-चिल्लाते हुए दु:खी पापी जाते हैं। कुछ पापी पाश से बँधे होते हैं और कुछ अंकुश में फंसाकर खींचे जाते हैं, और कुछ शस्त्र के अग्र भाग से पीठ में छेदते हुए ले जाये जाते हैं। कुछ नाक के अग्र भाग में लगे हुए पाश से और कुछ कान में लगे हुए पाश से खीचे जाते हैं। कुछ काल पाश से खींचे जाते हैं और कुछ कौओं से खींचे जाते हैं। वे पापी गरदन, हाथ तथा पैर में जंजीर से बँधे हुए तथा अपनी पीठ पर लोहे के भार को ढोते हुए मार्ग पर चलते हैं। अत्यन्त घोर यमदूतों के द्वारा मुद्गरों से पीटे जाते हुए वे मुख से रक्त वमन करते हुए तथा वमन किये हुए रक्त को पुन: पीते हुए जाते हैं। उस समय अपने दुष्कर्मों को सोचते हुए प्राणी अत्यन्त ग्लानि का अनुभव करते हैं और अतीव दु:खित होकर यमलोक को जाते हैं। इस प्रकार यममार्ग में जाता हुआ वह मन्दबुद्धि प्राणी हा पुत्र !, हा पौत्र ! इस प्रकार पुत्र और पौत्रों को पुकारते हुए, हाय-हाय इस प्रकार विलाप करते हुए पश्चाताप की ज्वाला से जलता रहता है। वह विचार करता है कि महान पुण्य के संबंध से मनुष्य-जन्म प्राप्त होता है, उसे प्राप्त कर भी मैंने धर्माचरण नहीं किया, यह मैंने क्या किया। मैंने दान दिया नहीं, अग्नि में हवन किया नहीं, तपस्या की नहीं, देवताओं की भी पूजा की नहीं, विधि-विधान से तीर्थ सेवा की नहीं, अत: हे जीव! जो तुमने किया है, उसी का फल भोगों। हे देही ! तुमने ब्राह्मणों की पूजा की नहीं, देव नदी गंगा का सहारा लिया नहीं, सत्पुरुषों की सेवा की नहीं, कभी भी दूसरे का उपकार किया नहीं, इसलिए हे जीव ! जो तुमने किया है, अब उसी का फल भोगों। मनुष्यों और पशु-पक्षियों के लिए जलहीन प्रदेश में जलाशय का निर्माण किया नहीं। गौओं और ब्राह्मणों की आजीविका के लिए थोड़ा भी प्रयास किया नहीं, इसलिए हे देही! तुमने जो किया है, उसी से अपना निर्वाह करो। तुमने नित्य-दान किया नहीं, गौओं के दैनिक भरण-पोषण की व्यवस्था की नहीं, वेदों और शास्त्रों के वचनों को प्रमाण माना नहीं, पुराणों को सुना नहीं, विद्वानों की पूजा की नहीं, इसलिए हे देही ! जो तुमने किया है, उन्हीं दुष्कर्मों के फल को अब भोगों। नारी-जीव भी पश्चाताप करते हुए कहता है मैंने पति की हितकर आज्ञा का पालन किया नहीं, पातिव्रत्य धर्म का कभी पालन किया नहीं और गुरुजनों को गौरवोचित सम्मान कभी दिया नहीं, इसलिए हे देहिन्! जो तुमने किया, उसी का अब फल भोगों। धर्म की बुद्धि से एकमात्र पति की सेवा की नहीं और पति की मृत्यु हो जाने पर वह्निप्रवेश करके उनका अनुगमन किया नहीं, वैधव्य प्राप्त करके त्यागमय जीवन व्यतीत किया नहीं, इसलिए हे देहिन्! जैसा किया, उसका फल अब भोगों। मास पर्यन्त किए जाने वाले उपवासों से तथा चान्द्रायण-व्रतों आदि सुविस्तीर्ण नियमों के पालन से शरीर को सुखाया नहीं। पूर्वजन्म में किये हुए दुष्कर्मों से बहुत प्रकार के दु:खों को प्राप्त करने के लिए नारी-शरीर प्राप्त किया था। इस तरह बहुत प्रकार से विलाप करके पूर्व देह का स्मरण करते हुए ‘मेरा मानव-जन्म शरीर कहाँ चला गया’ इस प्रकार चिल्लाता हुआ वह यमममार्ग में चलता है। हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार सत्रह दिन तक अकेले वायु वेग से चलते हुए अठारहवें दिन वह प्रेत सौम्यपुर में जाता है। उस रमणीय श्रेष्ठ सौम्यपुर में प्रेतों का महान गण रहता है। वहांँ पुष्पभद्रा नदी और अत्यन्त प्रिय दिखने वाला वटवृक्ष है। उस पुर में यमदूतों के द्वारा उसे विश्राम कराया जाता है। वहाँ दुखी होकर वह स्त्री-पुत्रों के द्वारा प्राप्त सुखों का स्मरण करता है। वह अपने धन, भृत्य और पौत्र आदि के विषय में जब सोचने लगता है तो वहाँ रहने वाले यम के किंकर उससे इस प्रकार कहते हैं – धन कहाँ है? पुत्र कहाँ है? पत्नी कहाँ है? मित्र कहाँ है? बन्धु-बान्धव कहाँ है? हे मूढ़ ! जीव अपने कर्मोपार्जित फल को ही भोगता है इसलिए सुदीर्घ काल तक इस यम मार्ग पर चलो। हे परलोक के राही! तू यह जानता है कि राहगीरों का बल और संबल पाथेय ही होता है, जिसके लिए तूने प्रयास तो किया नहीं। तू यह भी नहीं जानता था कि तुम्हें निश्चित ही उस मार्ग पर चलना है और उस रास्ते पर कोई भी लेन-देन हो नहीं सकता। यह मार्ग के बालकों को भी विदित रहता है। हे मनुष्य ! क्या तुमने इसे सुना नहीं था? क्या तुमने ब्राह्मणों के मुख से पुराणों के वचन सुने नहीं थे। इस प्रकार कहकर मुद्गरों से पीटा जाता हुआ वह जीव गिरते-पड़ते-दौड़ते हुए बलपूर्वक पाशों से खींचा जाता है। यहाँ स्नेह अथवा कृपा के कारण पुत्र-पौत्रों द्वारा दिये हुए मासिक पिण्ड को खाता है। उसके बाद वह जीव सौरिपुर को प्रस्थान करता है। उस सौरिपुर में काल के रूप को धारण करने वाला जंगम नामक राजा रहता है। उसे देखकर वह जीव भयभीत होकर विश्राम करना चाहता है। उस पुर में गया हुआ वह जीव अपने स्वजनों के द्वारा दिये हुए त्रैपाक्षिक अन्न-जल को खाकर उस पुर को पार करता है। उसके बाद शीघ्रतापूर्वक वह प्रेत नगेन्द्र-भवन की ओर जाता है और वहाँ भयंकर वनों को देखकर दु:खी होकर रोता है। दयारहित दूतों के द्वारा खींचे जाने पर वह बार-बार रोता है और दो मासों के अन्त में वह दुखी होकर वहाँ जाता है। बान्धवों द्वारा दिये गये पिण्ड, जल, वस्त्र का उपभोग करके यमकिंकरों के द्वारा पाश से बार-बार खींचकर पुन: आगे ले जाया जाता है। तीसरे मास में वह गन्धर्वनगर को प्राप्त होता है और वहाँ त्रैमासिक पिण्ड खाकर आगे चलता है। चौथे मास में वह शैलागमपुर में पहुँचता है और वहाँ प्रेत के ऊपर बहुत अधिक पत्थरों की वर्षा होती है। वहाँ चौथे मासिक पिण्ड को खाकर वह कुछ सुखी होता है। उसके बाद पाँचवें महीने में वह प्रेत क्रौंचपुर पहुँचता है। क्रौंचपुर में स्थित वह प्रेत वहाँ बान्धवों द्वारा हाथ से दिये गये पाँचवें मासिक पिण्ड को खाकर आगे क्रूरपुर की ओर चलता है। साढ़े पाँच मास के बाद बान्धवों द्वारा प्रदत्त ऊनषाण्मासिक पिण्ड और घटदान से तृप्त होकर वह वहाँ आधे मुहूर्त तक विश्राम कर के यमदूतों के द्वारा डराये जाने पर दु:ख से काँपता हुआ उस पुर को छोड़कर – चित्रभवन नामक पुर को जाता है, जहाँ यम का छोटा भाई विचित्र नाम वाला राजा राज्य करता है। उस विशाल शरीर वाले राजा को देखकर जब वह जीव डर से भागता है, तब सामने आकर कैवर्त धीवर उससे यह कहते हैं – हम इस महावैतरणी नदी को पार करने वालों के लिए नाव लेकर आये हैं, यदि तुम्हारा इस प्रकार का पुण्य हो तो इसमें बैठ सकते हो। तत्त्वदर्शी मुनियों ने दान को ही वितरण (देना या बाँटना) कहा है। यह वैतरणी नदी वितरण के द्वारा ही पार की जा सकती है, इसलिए इसको वैतरणी कहा जाता है। यदि तुमने वैतरणी गौ का दान किया हो तो नौका तुम्हारे पास आएगी अन्यथा नहीं। उनके ऎसे वचन सुनकर प्रेत ‘हा देव’ ! ऎसा कहता है। उस प्रेत को देखकर वह नदी खौलने लगती है और उसे देखकर प्रेत अत्यन्त क्रन्दन (विलाप) करने लगता है। जिसने अपने जीवन में कभी दान दिया ही नहीं, ऎसा पापात्मा उसी वैतरणी में डूबता है। तब आकाश मार्ग से चलने वाले दूत उसके मुख में काँटा लगाकर बंसी से मछली की भाँति उसे खींचते हुए पार ले जाते हैं। वहाँ षाण्मासिक पिण्ड खाकर वह अत्यधिक भूख से पीड़ित होकर विलाप करता हुआ आगे के रास्ते पर चलता है। सातवें मास में वह बह्वापदपुर को जाता है और वहाँ अपने पुत्रों द्वारा दिये हुए सप्तम मासिक पिण्ड को खाता है। हे पक्षिराज गरुड़ ! उस पुर को पारकर वह दु:खद नामक पुर को जाता है। आकाश मार्ग से जाता हुआ वह महान दु:ख प्राप्त करता है। वहाँ आठवें मास में दिये हुए पिण्ड को खाकर आगे बढ़ता है और नवाँ मास पूर्ण होने पर नानाक्रन्दपुर को प्राप्त होता है। वहाँ क्रन्दन करते हुए अनेक भयावह क्रन्दगणों को देखकर स्वयं शून्य हृदयवाला वह जीव दु:खी होकर आक्रन्दन करने लगता है। उस पुर को छोड़कर वह यमदूतों के द्वारा भयभीत किया जाता हुआ दसवें महीने में अत्यन्त कठिनाई से सुतप्तभवन नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ पुत्रादि से पिण्डदान और जलांजलि प्राप्त करके भी सुखी नहीं होता। ग्यारहवाँ मास पूरा होने पर वह रौद्रपुर को जाता है। और पुत्रादि के द्वारा दिये हुए एकादश मासिक पिण्ड को वहाँ खाता है। साढ़े ग्यारह मास बीतने पर वह जीव पयोवर्षण नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ प्रेतों को दु:ख देने वाले मेघ घनघोर वर्षा करते हैं, वहाँ पर दु:खी वह प्रेत ऊनाब्दिक श्राद्ध के पिण्ड को खाता है। इसके बाद वर्ष पूरा होने पर वह जीव शीताढ्य नामक नगर को प्राप्त होता है, वहाँ हिम से भी सौ गुनी अधिक महान ठंड पड़ती है। शीत से दु:खी तथा क्षुधित वह जीव इस आशा से दसों दिशाओं में देखता है कि शायद कहीं कोई हमारा बान्धव हो, जो मेरे दु:ख को दूर कर सके। तब यम के दूत कहते हैं – तुम्हारा ऎसा पुण्य कहाँ है? फिर वार्षिक पिण्ड को खाकर वह धैर्य धारण करता है। उसके बाद वर्ष के अन्त में यमपुर के निकट पहुँचने पर वह प्रेत बहुभीतिपुर में जाकर हाथ भर माप के अपने शरीर को छोड़ देता है। हे पक्षी! पुन: कर्म भोग के लिए अंगुष्ठ मात्र के वायुस्वरुप यातना देह को प्राप्त करके वह यमदूतों के साथ जाता है। हे कश्यपात्मज ! जिन्होंने और्ध्वदैहिक – मरणकालिक – दान नहीं दिए हैं, वे यमदूतों के द्वारा दृढ़ बन्धनों से बँधे हुए अत्यन्त कष्ट से यमपुर को जाते हैं। हे आकाशगामी ! धर्मराजपुर में चार द्वार है, जिनमें से दक्षिण द्वार के मार्ग का तुमसे वर्णन कर दिया। इस महान भयंकर मार्ग में भूख-प्यास और श्रम से दु:खी जीव जिस प्रकार जाते हैं, वह सब मैंने बतला दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो। ।।इस प्रकार गरुड़ पुराण के अन्तर्गत सारोद्वार में “यममार्गनिरुपण” नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।। क्रमश... अगले लेख में श्री गरुड़ पुराण का तृतीय अध्याय साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
गरूड़ पुराण - सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) {दूसरा अध्याय} सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) {दूसरा अध्याय} - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 🌟 एक ही मुहूर्त में जन्म लेने वालों का भाग्य अलग-अलग क्यों होता है? (कर्म और भाग्य की अद्भुत कथा) 🌟 एक बार एक राजा ने ज्योतिषियों की सभा में एक गहरा प्रश्न पूछा: "मेरी कुंडली के अनुसार मैं राजा बना, लेकिन उसी घड़ी और मुहूर्त में कई अन्य लोगों ने भी जन्म लिया होगा, तो वे राजा क्यों नहीं बने?" जब कोई उत्तर न दे सका, तो राजा को इस रहस्य का उत्तर जानने के लिए एक कठिन यात्रा पर भेजा गया। आइए जानते हैं इस अद्भुत कथा का सार: 🔹 राजा की रहस्यमयी यात्रा: उत्तर की तलाश में राजा एक घने जंगल में गए, जहाँ उन्होंने एक महात्मा को अंगार (जलते कोयले) खाते देखा। उन्होंने राजा को आगे भेज दिया। आगे जाने पर एक और महात्मा मिले जो अपना ही मांस नोचकर खा रहे थे। उन्होंने भी राजा को एक गाँव में जन्म लेने वाले एक नवजात शिशु के पास भेजा, जिसका जीवन केवल कुछ पलों का था। 🔹 पिछले जन्म का रहस्य: उस नवजात शिशु ने राजा को देखकर मुस्कुराते हुए कहा- "राजन्! हम चारों (तुम, मैं और दोनों महात्मा) पिछले जन्म में राजकुमार और भाई थे। एक बार जंगल में भटकने के कारण हम भूख-प्यास से तड़प रहे थे। तभी हमें चार रोटियां (बाटी) मिलीं। जब हम खाने बैठे, तो एक भूखे-प्यासे साधु ने आकर हमसे भोजन मांगा।" 🔹 कर्मों का फल (योग और भोग): शिशु ने आगे बताया: पहले भाई ने क्रोध में कहा- "तुम्हें दे दूँगा तो क्या मैं आग खाऊँगा?" (वही आज अंगार खा रहा है)। दूसरे भाई ने कहा- "तुम्हें दे दूँगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊँगा?" (वही आज अपना मांस खा रहा है)। तीसरे भाई (शिशु) ने कहा- "चलो आगे बढ़ो, क्या मैं भूखा मरूँ?" (इसलिए वह आज जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो रहा है)। लेकिन राजन्! आपने उस साधु पर दया की और अपने हिस्से की आधी रोटी उन्हें आदर सहित दे दी। साधु ने प्रसन्न होकर कहा था- "तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा।" ✨ कहानी की सीख (Moral): ज्योतिष शास्त्र हमें जीवन का चक्र समझाता है, लेकिन 'जैसा भोग भोगना होगा, वैसे ही योग बनेंगे'। एक ही मुहूर्त में जन्म लेने पर भी इंसान अपने पिछले और वर्तमान 'कर्मों' (दिया, लिया, 'जय श्री कृष्ण' 🙏
🙏गीता ज्ञान🛕 - एक ही़ घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं? राजा कोप्रश महात्माओं की खोज 3pR : खाने वाले महात्मा अपना 1 मांस महात्मा :ಗ वाले रहस्योद्घाटन राजा भैया ಖM1 ঐযা3 आथी बाटी মাতুকৌম सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं। जैसा भोग भोगना होगा वैसे ही योग बनेंगे। एक ही़ घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं? राजा कोप्रश महात्माओं की खोज 3pR : खाने वाले महात्मा अपना 1 मांस महात्मा :ಗ वाले रहस्योद्घाटन राजा भैया ಖM1 ঐযা3 आथी बाटी মাতুকৌম सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं। जैसा भोग भोगना होगा वैसे ही योग बनेंगे। - ShareChat
#☝आज का ज्ञान 🌊 क्षीरसागर — जब सृष्टि ने संतुलन माँगा 🌊 जब न धरती थी, न आकाश की पहचान, चारों ओर बस एक अनंत, श्वेत, शांत जलराशि थी— वही था क्षीरसागर। उस असीम सागर की गोद में अनंत शेषनाग अपनी विराट कुंडलियों पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को थामे हुए थे। उन पर विराजमान थे भगवान विष्णु— योगनिद्रा में लीन, पर पूर्ण जागरूक… शांत, तेजस्वी, करुणामय। उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, और उस कमल पर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी प्रकट हुए— सृष्टि रचने के लिए तत्पर। पर तभी… अधर्म की छाया बढ़ने लगी। असुरों का अत्याचार बढ़ा, पृथ्वी पर संतुलन डगमगाने लगा। देवताओं के हृदय में भय और आशा, दोनों एक साथ जाग उठे। सबने एक स्वर में पुकारा— “हे पालनहार! सृष्टि असंतुलित हो रही है, हमें आपकी शरण चाहिए।” देवता क्षीरसागर पहुँचे… वहाँ शांत लहरों के बीच भगवान विष्णु योगनिद्रा में विराजमान थे। उनकी स्तुति होते ही उनके नेत्र खुले… और जैसे ही नेत्र खुले, अंधकार पर प्रकाश छा गया। शेषनाग के फन दमक उठे, समुद्र की लहरें थम सी गईं, मानो पूरी सृष्टि उनकी वाणी सुनने को ठहर गई हो। भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले— “जब-जब धर्म डगमगाता है, अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेकर संतुलन स्थापित करता हूँ।” यह वचन सुनते ही देवताओं के भय की जगह विश्वास ने ले ली। वे नतमस्तक हुए… और लौट गए, क्योंकि अब उन्हें पता था— सृष्टि का संतुलन सुरक्षित है। भगवान विष्णु पुनः योगनिद्रा में लीन हो गए, पर यह निद्रा मौन नहीं थी… यह सतत जागरूकता थी, जो हर युग, हर संकट, हर असंतुलन पर नजर रखती है। और शेषनाग की शांत मुद्रा जैसे कह रही थी— “धैर्य रखो… संतुलन कभी टूटता नहीं, बस समय लेता है।” 🌼 आज की सीख ईश्वर कभी निष्क्रिय नहीं होते, वे मौन रहकर भी हर क्षण सृष्टि का संतुलन संभाल रहे होते हैं। जब अधर्म बढ़ता है, समाधान भी जन्म ले चुका होता है। धैर्य रखो… धर्म की विजय तय है। 🙏✨
☝आज का ज्ञान - ShareChat
#जय श्री राम पहले लोग प्रतिज्ञा लेते थे और उसके लिए कुछ भी क़ीमत देने को तैयार रहते थे बाद में कसमें वादों नें उसका स्थान ले लिया वो भी कुछ हद तक सही था परन्तु ज़ब से शपथ लेने की परम्परा आई लोग नीचे से नीचे गिरने को तैयारहो गए, तथाकथित लोकतंत्र में शपथ धारियों की बड़ी जमात हैं लेकिन उनका चरित्र दो कोड़ी का, पहले समाज में गंगा जल, या मंदिर में जाने की बात से ही सच बोल देते थे क्योंकि लोग डरते थे और यहीं भय समाज में नियंत्रण स्थापित करता था लेकिन आजकल संसद हो या ग्राम प्रधान सभी शपथ लेते हैँ लेकिन सिर्फ लेते हैँ सत्य निष्ठा, ईमानदारी, लगन की लेकिन उसके उलट आचरण करते हैँ! सत्यनिष्ठा में जीने के लिए क़ीमत चुकानी पड़ती हैं जो कि कमजोर लोगों के बस की बात नहीं होती हैं इसलिए वो बच निकलते हैँ! यही खुद का बचाव कायरता कहलाता हैं, महाभारत में महारथी कहा जाता था जो प्रतिज्ञा बद्ध होते थे, रामयण तो महावीरों की महा गाथा है आज किसी को घर से निकाल दिया जाय तो वो न्यायलय में केस कर देगा मीडिया बुला लेगा और हपतो बहस का मुद्दा बन जाता हैं लेकिन राम नें तो सहज वचन स्वीकार कर लिया प्रतिज्ञा भी न किये, जो सहज सरल हैं वही शुभ का हेतु भी हैं! आजकल और कल में अंतर स्पष्ट हैं अब तो हल्की हवा चली नहीं कि सब उड़ गया! राम राम 🙏🙏
जय श्री राम - ShareChat
पुत्र-वियोग में तड़पती गांधारी जब श्रीकृष्ण को शाप देने अग्रसर होती हैं, तब श्रीकृष्ण शांत स्वर में कहते हैं #महाभारत — माते, मैं शोक, मोह और पीड़ा—इन सबसे परे हूँ। न मुझे विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद। न मान मुझे बाँधता है, न अपमान। न जीवन, न मृत्यु—किसी में मैं आबद्ध नहीं हूँ। मैं न सत्य में बँधा हूँ, न असत्य में। काल और महाकाल—दोनों मेरे अधीन हैं; मैं उन्हीं के माध्यम से अपने कार्य सिद्ध कराता हूँ। हे माता, यह युद्ध अवश्यम्भावी था। जो चले गए हैं, उनके लिए विलाप मत करो। जो शेष हैं—उन्हें स्वीकारो। वर्तमान को अपनाओ, क्योंकि अतीत का शोक ही दुख का मूल है। कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी विलाप करती हुई कह उठती हैं— कृष्ण…!!! तुम यह सब कह सकते हो, क्योंकि तुम माँ नहीं हो। तुम क्या जानो एक माँ की ममता क्या होती है? तुम क्या समझो पुत्र-शोक की असहनीय पीड़ा? तुम मोह-त्याग और ज्ञान की बातें करते हो, तो जाओ—अपनी माता देवकी से पूछो कि पुत्र-वियोग क्या होता है! पूछना उनसे— कैसा लगता था जब कंस एक-एक कर उसके कलेजे के टुकड़े छीन लेता था। जब उसका दूध उतरता था और गोद सूनी रह जाती थी, तब उसकी आत्मा पर क्या बीतती थी— यह पूछना… वासुदेव से भी पूछना…!! इतना कहकर गांधारी धरती पर गिर पड़ती हैं। कृष्ण उन्हें संभालते हैं, उनके अश्रु पोंछते हैं। रुँधे कंठ से गांधारी फिर कहती हैं— कृष्ण… तुम्हारी माता ने छह पुत्र खोए, पर मैंने अपने सौ पुत्र खो दिए हैं…! कृष्ण…!! कृष्ण करुण स्वर में उत्तर देते हैं— माते, कौरवों ने स्वयं वह मार्ग चुना जिसका अंत विनाश ही था। मैं किसी के कर्म-क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कर्म का फल तो प्रत्येक को भोगना ही पड़ता है। अश्रुपूरित नेत्रों से कृष्ण को देखते हुए गांधारी कहती हैं— हूँह… यह कहना सरल है, केशव। पर एक माँ के लिए उसका पुत्र ही सर्वस्व होता है। वह योग्य हो या अयोग्य— माँ की ममता पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लोग कहते हैं तुम आदि ब्रह्म हो, पर हो तो पुरुष ही— जिसका हृदय वज्र का होता है। माता पार्वती भी अपने पुत्र गणेश का शोक सहन नहीं कर पाईं। हे कृष्ण, कभी “माँ” बनकर देखना— तब जानोगे कि तुम्हारा गीता-ज्ञान ममता के सामने कितना ठहर पाता है। यदि मोह-ममता अज्ञान है, तो फिर तुमने इस संसार की रचना ही क्यों की? बना लेते केवल ज्ञानियों का लोक— मोह और ममता की क्या आवश्यकता थी? तुम भी जानते हो— तुम्हारा ज्ञान नीरस, निर्जीव और इतना कठोर यथार्थवादी है कि उससे संसार नहीं चल सकता। इसीलिए तुम स्वयं मोह और ममता का सहारा लेते हो। तभी वहाँ पांडव आ जाते हैं। अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह कृष्ण संकेत से उन्हें हटाना चाहते हैं, पर युधिष्ठिर समीप आकर कहते हैं— बड़ी माँ, हम आपके अपराधी हैं। यदि संभव हो, तो हमें क्षमा कर दीजिए। युधिष्ठिर की वाणी सुनते ही गांधारी का क्रोध प्रज्वलित हो उठता है। उन्हें स्मरण आता है— दुर्योधन की टूटी जंघा, दुःशासन की फटी छाती और रक्त पीता भीम। कृष्ण समझ जाते हैं कि गांधारी शाप देने वाली हैं, अतः व्यंग्यपूर्वक कहते हैं— हे माता, उस जंघा का टूटना आवश्यक था जिसने आपकी पुत्रवधू का अपमान किया। उस छाती का चीरना अनिवार्य था जिसने द्रौपदी के केशों को छूने का दुस्साहस किया। इनका विनाश आवश्यक था, अन्यथा मनुष्य इन कृत्यों को आदर्श बना लेता— और फिर शिष्ट समाज की कल्पना भी असंभव हो जाती। हे माता, जिनके लिए आप शोक कर रही हैं, वे शोक के अधिकारी नहीं हैं। क्रोध से कांपती गांधारी कठोर स्वर में कहती हैं— हे यादव, हे माधव! मैं शिवभक्तिनी गांधारी अपने पतिव्रत धर्म से संचित पुण्य-बल से तुम्हें शाप देती हूँ— जिस प्रकार कुरुवंश का विनाश हुआ, उसी प्रकार सम्पूर्ण यदुवंश का भी विनाश हो! शांत मुस्कान के साथ कृष्ण कहते हैं— माते, यह शाप आपने मुझे नहीं— स्वयं को दिया है। आप अपने सौ पुत्रों का शोक पूर्ण भी नहीं कर पाईं और आपने एक और पुत्र को स्वयं से छीन लिया। माते, क्या आप मेरा शव देख पाएँगी…? मुझे आपका शाप स्वीकार है, क्योंकि न मेरा जन्म होता है न मृत्यु। मेरा इस शरीर से कोई प्रेम नहीं। पर माते— आपका इस शरीर से प्रेम है, और आपने स्वयं को पुनः दुःख-सागर में डुबो दिया है। कृष्ण की वाणी सुनकर गांधारी पश्चाताप से भर जाती हैं— हे गोविंद, कुरुवंश को तो नहीं बचा पाई, कम से कम यदुवंश को बचा लो। मैं भिक्षा माँगती हूँ, माधव— अब और पुत्रों के शव मैं नहीं देखना चाहती। कृष्ण करुण किंतु दृढ़ स्वर में कहते हैं— माते, न मैंने कुरुवंश के कर्मों में हस्तक्षेप किया, न ही यदुवंश के कर्म-क्षेत्र में करूँगा। यदुवंशी भी अपने कर्मों का फल भोगेंगे, जैसे कुरुवंशियों ने भोगा। मैं किसी भी स्थिति में धर्म का त्याग नहीं कर सकता। राधे कृष्णा।
महाभारत - ShareChat
#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१६८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड अट्ठासीवाँ सर्ग श्रीरामकी कुश-शय्या देखकर भरतका शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल और जटाधारण करके वनमें रहनेका विचार प्रकट करना निषादराजकी सारी बातें ध्यानसे सुनकर मन्त्रियोंसहित भरतने इंगुदी-वृक्षकी जड़के पास आकर श्रीरामचन्द्रजीकी शय्याका निरीक्षण किया॥१॥ फिर उन्होंने समस्त माताओंसे कहा—'यहीं महात्मा श्रीरामने भूमिपर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गोंसे विमर्दित हुआ था॥२॥ 'महाराजोंके कुलमें उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमिपर शयन करनेके योग्य नहीं हैं॥३॥ 'जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्मकी विशेष चादरसे ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनोंके समूहसे सजे हुए पलंगपर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वीपर कैसे शयन करते होंगे?॥४॥ 'जो सदा विमानाकार प्रासादोंके श्रेष्ठ भवनों और अट्टालिकाओंमें सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदीकी बनी हुई है, जो अच्छे बिछौनोंसे सुशोभित हैं, पुष्पराशिसे विभूषित होनेके कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरुकी सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहोंका कलरव होता रहता है, जो शीतल हैं एवं कपूर आदिकी सुगन्धसे व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारोंपर सुवर्णका काम किया गया है तथा जो ऊँचाईमें मेरु पर्वतके समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलोंमें जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वनमें पृथ्वीपर कैसे सोते होंगे?॥५-७॥ 'जो गीतों और वाद्योंकी ध्वनियोंसे, श्रेष्ठ आभूषणोकी झनकारोंसे तथा मृदङ्गोंके उत्तम शब्दोंसे सदा जगाये जाते थे, बहुत-से वन्दीगण समय-समयपर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियोंसे जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमिपर कैसे शयन करते होंगे?॥८-९॥ 'यह बात जगत्‌में विश्वासके योग्य नहीं है। मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती। मेरा अन्तःकरण अवश्य ही मोहित हो रहा है। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है॥१०॥ 'निश्चय ही कालके समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभावसे दशरथनन्दन श्रीरामको भी इस प्रकार भूमिपर सोना पड़ा॥११॥ 'उस कालके ही प्रभावसे विदेहराजकी परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथकी प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वीपर शयन करती हैं॥१२॥ 'यही मेरे बड़े भाईकी शय्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं। इस कठोर वेदीपर उनका शुभशयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गोंसे कुचला गया सारा तृण अभीतक पड़ा है॥१३॥ 'जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्यापर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र-तत्र सुवर्णके कण सटे दिखायी देते हैं॥१४॥ 'यहाँ उस समय सीताकी चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशमके तागे चमक रहे हैं॥१५॥ 'मैं समझता हूँ कि पतिकी शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियोंके लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दुःखका अनुभव नहीं कर रही हैं॥१६॥ 'हाय! मैं मर गया—मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीतासहित श्रीरामको अनाथकी भाँति ऐसी शय्यापर सोना पड़ता है॥१७॥ 'जो चक्रवर्ती सम्राट्‌के कुलमें उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकोंको सुख देनेवाले हैं तथा सबका प्रिय करनेमें तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कमलके समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय लगनेवाला है तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य हैं, दुःख भोगनेके कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथजी परम उत्तम प्रिय राज्यका परित्याग करके इस समय पृथ्वीपर शयन करते हैं॥१८-१९॥ 'उत्तम लक्षणोंवाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़‌भागी हैं, जो संकटके समय बड़े भाई श्रीरामके साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं॥२०॥ 'निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पतिके साथ वनका अनुसरण किया है। हम सब लोग उन महात्मा श्रीरामसे बिछुड़कर संशयमें पड़ गये हैं (हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं)॥२१॥ 'महाराज दशरथ स्वर्गलोकको गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशामें यह पृथ्वी बिना नाविककी नौकाके समान मुझे सूनी-सी प्रतीत हो रही है॥२२॥ 'वनमें निवास करनेपर भी उन्हीं श्रीरामके बाहुबलसे सुरक्षित हुई इस वसुन्धराको कोई शत्रु मनसे भी नहीं लेना चाहता है॥२३॥ 'इस समय अयोध्याकी चहारदीवारीकी सब ओरसे रक्षाका कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं—खुले विचरते हैं, नगरद्वारका फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेनामें हर्ष और उत्साहका अभाव है, समस्त नगरी रक्षकोंसे सूनी-सी जान पड़ती है, सङ्कटमें पड़ी हुई है, रक्षकोंके अभावसे आवरणरहित हो गयी है, तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजनकी भाँति इसे ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करते हैं। श्रीरामके बाहुबलसे ही इसकी रक्षा हो रही है॥२४-२५॥ 'आजसे मैं भी पृथ्वीपर अथवा तिनकोंपर ही सोऊँगा, फल-मूलका ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा॥२६॥ 'वनवासके जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनोंतक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होनेसे आर्य श्रीरामकी की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी॥२७॥ 'भाईके लिये वनमें निवास करते समय शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मणको साथ लेकर अयोध्याका पालन करेंगे॥२८॥ 'अयोध्यामें ब्राह्मणलोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामका अभिषेक करेंगे। क्या देवता मेरे इस मनोरथको सत्य (सफल) करेंगे?॥२९॥ 'मैं उनके चरणोंपर मस्तक रखकर उन्हें मनानेकी चेष्टा करूँगा। यदि मेरे बहुत कहनेपर भी वे लौटनेको राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीरामके साथ मैं भी दीर्घकालतक वहीं निवास करूँगा। वे मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे'॥३०॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥८८॥* ###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - !! ओम नमो नारायणाय !! पावस के समय, धरी कोकिलन मौन নুলমী अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिह कौंन वर्षा ऋतु आने पर कोयल मौन धारण कर लेती है। वह सोचती अब तो मेंढक टर्राएंगे, तो हमारी सुरीली आवाज 8 f को कौन अर्थात जहाँ का बोलबाला हो, वहाँ गुणहीनों पूछगा व्यक्ति का चुप रहना ही उचित है। !! ओम नमो नारायणाय !! पावस के समय, धरी कोकिलन मौन নুলমী अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिह कौंन वर्षा ऋतु आने पर कोयल मौन धारण कर लेती है। वह सोचती अब तो मेंढक टर्राएंगे, तो हमारी सुरीली आवाज 8 f को कौन अर्थात जहाँ का बोलबाला हो, वहाँ गुणहीनों पूछगा व्यक्ति का चुप रहना ही उचित है। - ShareChat
#🙏गीता ज्ञान🛕 'मनुष्य शरीर में विवेक कि महिमा। मनुष्य-शरीर में ऐसा विवेक है, जिसको महत्व देकर जीव परम धाम तक पहुँच सकता है और अविवेकपूर्वक विषयों का सेवन करके नरकों में भी जा सकता है। इसलिये गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा है- *नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी।* *ग्यान विज्ञान भगति सुभ देनी।।* (मानस ७।१२१।५ ) *'अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्य-लोके'*- मनुष्य के अतिरिक्त दूसरी सब भोग योनियाँ हैं। मनुष्ययोनि में किये हुए पाप - पुण्यों का फल भोगने के लिए ही मनुष्य को दूसरी योनियों में जाना पड़ता है। नये पाप - पुण्य करने का अथवा पाप - पुण्य से रहित होकर मुक्त होने का अधिकार और अवसर मनुष्य - शरीर में ही है। यहाँ *'मूलानि'* पद का तात्पर्य तादात्म्य, ममता और कामना रूप मूल से है, वास्तविक ऊर्ध्वमूल परमात्मा से नहीं। 'मैं शरीर हूँ'- ऐसा मानना 'तादात्म्य' है। शरीरादि पदार्थों को अपना मानना 'ममता' है। पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकेषणा- यह तीन प्रकार की मुख्य कामनाएँ हैं। 🚩 पुत्र - परिवार की कामना 'पुत्रैषणा'और 🚩धन - सम्पत्ति की कामना 'वित्तेषणा' है। 🚩'संसार में मेरा मान-आदर हो जाय'- 'मैं बना रहूँ', 'शरीर निरोग रहे', 'मैं शास्त्रों का पण्डित बन जाऊँ' आदि अनेक कामनाएँ 'लोकेषणा' के अन्तर्गत हैं। इतना ही नहीं कीर्ति की कामना मरने के बाद भी इस रूप में रहती है कि लोग मेरी प्रशंसा करते रहे; मेरा स्मारक बन जाय; मेरी स्मृति में पुस्तकेंं बन जाय; लोग मुझे याद करें, आदि। यद्यपि कामनाएँ प्राय: सभी योनियों में न्यूनाधिक रूप से रहती हैं, तथापि वे मनुष्य योनि में ही बाँधने वाली होती है*। जब कामनाओं से प्रेरित होकर मनुष्य कर्म करता है, तब उन कर्मों के संस्कार उसके अन्तःकरण में संचित होकर भावी जन्म - मरण के कारण बन जाते हैं। मनुष्ययोनि में किये हुए कर्मों का फल इस जन्म में तथा मरने के बाद भी अवश्य भोगना पड़ता है ( गीता - अठारहवें अध्याय का बारहवाँ श्लोक ) अत: तादात्म्य, ममता और कामना के रहते हुए कर्मों से सम्बन्ध नहीं छूट सकता। यह नियम है कि जहाँ से बन्धन होता है, वहीं से छुटकारा होता है; जैसे - रस्सी की गाँठ जहाँ लगी है, वहीं से वह खुलती है। मनुष्य योनि में ही जीव शुभाशुभ कर्मों से बँधता है; अत: मनुष्य योनि में ही वह मुक्त हो सकता है। गीता अध्याय १५ श्लोक संख्या २
🙏गीता ज्ञान🛕 - 9@59@ 28-02-26 शु्कष शनिवार Good Morning 9@59@ 28-02-26 शु्कष शनिवार Good Morning - ShareChat
#गोविन्दा द्वादशी #द्वादशी गोविन्द द्वादशी व्रत महात्मय एवं विधि 〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️ द्वादशी तिथि का महत्व भगवान श्री विष्णु की उपासना से संबंधित होता है। मान्यता है की यदि एकादशी का व्रत न रख पाएं तो द्वादशी का व्रत रख लेने से उसी के समान फलों की प्राप्ति भी होती है. फाल्गुन माह में आने वाली द्वादशी को "गोविंद द्वादशी" नाम से जाना जाता है। गोविंद द्वादशी के शुभ प्रभाव से व्यक्ति के कष्ट एवं व्याधियों का नाश होता है। इस द्वादशी का पूजन एवं व्रत इत्यादि करने से "अतिरात्र याग" नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है. यह वेदों में वर्णित अनुष्ठान के अंतर्गत आने वाला फल होता है. फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दूसरे दिन गोविन्द द्वादशी का व्रत करने का विधान बताया गया है. इस द्वादशी पूजा में सदाचार, शुद्ध आचार और पवित्रता का अत्यंत ध्यान रखना चाहिए. गोविंद द्वादशी तिथि में अगर तिथि वृद्धि के कारण 2 दिनों तक प्रदोष काल में भी यह व्याप्त रहे तो ऎसे में दूसरे दिन के प्रदोष काल में ही मनाया जा सकता है। गोविंद द्वादशी का पूजन एवं उपवास नियम धारण करने से व्यक्ति को सुख की प्राप्ति होती है. मानसिक शांति प्राप्ति होती है. आरोग्य को बढ़ाने वाला है, सुख से परिपूर्ण करने वाला है. गोविन्द द्वादशी करने से समस्त रोगादि की शांति भी होती है। गोविन्द द्वादशी पूजा विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गोविंद द्वादशी तिथि के दिन भगवान गोविंद का स्मरण करते हुए दिन का आरंभ करना चाहिए, दैनिक क्रियाओं से निवृत होकर, पूजा का संकल्प करना चाहिए, गोविंद का पूजन करना चाहिए. भगवान श्री विष्णु प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये, चंदन, अक्षत, तुलसी दल व पुष्प को श्री गोविंद व श्री हरी बोलते हुए भगवान को अर्पित करने चाहिए। भगवान की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाना चाहिए. इसके पश्चात प्रतिमा को पोंछन कर सुन्दर वस्त्र पहनाने चाहिए। भगवान श्री गोविंद को दीप, गंध , पुष्प अर्पित करना, धूप दिखानी चाहिए. आरती करने के पश्चात भगवान को भोग लगाना चाहिए। भगवान के भोग को प्रसाद रुप में को सभी में बांटना चाहिए. सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए व दान-दक्षिणा इत्यादि भेंट करनी चाहिए. गोविंद द्वादशी व्रत में एकादशी से ही व्रत का आरंभ करना श्रेयस्कर होता है. अगर संभव न हो सके तो द्वादशी को व्रत आरंभ करें. पूरे दिन उपवास रखने के बाद रात को जागरण कीर्तन करना चाहिए और दूसरे दिन स्नान करने के पश्चात ब्राह्मणों को फल और भोजन करवा कर उन्हें अपनी क्षमता अनुसार दान देना चाहिए. जो पूरे विधि-विधान से गोविंद द्वादशी का व्रत करता है वह बैकुंठ को पाता है. इस व्रत की महिमा से व्रती के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह सभी सांसारिक सुखों को भोग कर पाता है। गोविन्द द्वादशी व्रत विधि भविष्य पुराण से 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- महाराज ! इसी प्रकार गोविन्द - द्वादशी नाम का एक व्रत है, जिसके करने से सभी अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं। पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को उपवास कर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से कमलनयन भगवान् गोविन्द का पूजन कर अन्तर्मन में भी इसी नाम का उच्चारण करते रहना चाहिये। इस दिन पाखण्डियों से बात नहीं करनी चाहिये । ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। व्रती को गोमूत्र, गोमय, दधि अथवा गोदुग्ध का प्राशन करना चाहिये। दूसरे दिन स्नानकर उसी विधि से गोविन्द का पूजन कर ब्राह्मण को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इसके साथ ही इस दिन गौ को तृप्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिमास व्रत करते हुए वर्ष समाप्त होने पर भगवती लक्ष्मी के साथ सुवर्ण की भगवान् गोविन्द की प्रतिमा बनवाकर पुष्प, धूप, दीप, माला, नैवेद्य आदि से उसका पूजनकर सवत्सा गौ सहित ब्राह्मणों को देना चाहिये । प्रतिमास गौओं की पूजा तथा उन्हें ग्रासादि से तृप्त करना चाहिये। पारणा के दिन विशेषरूप से उनकी सेवा-भक्ति करनी चाहिये। इस व्रत को करने से वही फल प्राप्त होता है जो सुवर्णशृङ्गी सौ गोओ के साथ एक उत्तम वृष का दान देने से होता है। इस व्रत को सम्यक् रूप से करने वाला सब सुख भोगकर अन्त में गोलोक को प्राप्त होता है। गोविंद द्वादशी पूजा एवं जप मंत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गोविंद द्वादशी के दिन भगवान श्री विष्णु के मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है. श्री गोविंद का स्वरूप शांत और आनंदमयी है. वह जगत का पालन करने वाले हैं. भगवान का स्मरण करने से भक्तों के जीवन के समस्त संकटों का नाश होता है और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है. इस दिन इन मंत्रों से भगवान का पूजन करना चाहिए। "ॐ नारायणाय नम:" "ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ "ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि। " गोविंद द्वादशी कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गोविंद द्वादशी के दिन श्री विष्णु भगवान की कथाओं का श्रवण अवश्य करना चाहिए. इस दिन गीता का पाठ करने से व्यक्ति बंधन से मुक्ति पाता है. इसी प्रकार श्रीमद भागवत को पढ़ने अथवा श्रवण द्वारा भक्त को शुभ फलों की प्राप्ति होती है. गोविंद द्वादशी के दिन श्री विष्णु के बाल स्वरुप का पूजन करने से संतान का सुख प्राप्त होता है. गोविंद द्वादशी के दिन ही नृसिंह द्वादशी का पर्व भी मनाया जाता है. भगवान विष्णु के बारह अवतारों में से एक नृसिंह अवतार भी है. भगवान श्री हरि विष्णु का यह अवतार आधा मनुष्य व आधा शेर के रुप में रहता है. भगवान श्री विष्णु ने ये अवतार दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु को मारने हेतु लिया था. पौराणिक कथा अनुसार कश्यप ऋषि की पत्नी दिति से उन्हें हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु नाम दो पुत्र प्राप्त होते हैं. दिति दैत्यों की माता थी अत: उनके पुत्र दैत्य हुए. हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु दोनों ही असुर प्रवृत्ति के थे. पृथ्वी की रक्षा करने के लिए जब श्री विष्णु भगवान ने वराह अवतार लेकर हरिण्याक्ष का वध कर दिया, तो अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोद्ध लेने के लिए हिरण्यकशिपु श्री विष्णु का प्रबल विरोधी बन जाता है और जो भी व्यक्ति श्री विष्णु की भक्ति करता है वह उसे मृत्यदण्ड देता है. हिरण्यकशिपु ने अपनी कठोर तपस्या ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त करता है. अपनी शक्ति का गलत उपयोग कर हिरण्यकशिपु स्वर्ग पर भी अधिकार स्थापित कर लेता है. हिरण्यकशिपु को एक पुत्र प्राप्त होता है जिसका नाम प्रह्लाद होता है. प्रह्लाद श्री विष्णु का परम भक्त होता है. जब पिता हिरण्यकशिपु को अपने पुत्र प्रह्लाद की श्री विष्णु के प्रति भक्ति को देख वह उसे मृत्यदण्ड देता है, लेकिन हर बार श्री विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच जाता है. एक बार भरी सभा में जब प्रह्लाद भगवान श्री विष्णु के सर्वशक्तिमान होने और हर कण में उनके होने की बात कहता है, तो हिरण्यकशिपु क्रोधित हो उससे पूछता है की यदि तेरा भगवान इस खम्बे में है तो उसे बुला कर दिखा. तब प्रह्लाद अपनी भक्ति से भगवान को याद करता है और श्री विष्णु भगवान खम्बे की चीरते हुए नृसिंह अवतार में प्रकट होते हैं ओर हिरण्यकशिपु का वध कर देते हैं. भगवान नृसिंह, प्रह्लाद को वरदान देते हैं कि आज के दिन जो मेरा स्मरण, एवं पूजन करेगा उस भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी. इस प्रकार गोविंद द्वादशी का दिन ही भगवान श्री नृसिंह पूजन के लिए भी बहुत ही शुभ माना गया है. गोविंद द्वादशी के दिन श्री विष्णु भगवान का पूजन एवं कीर्तन एवं रात्रि जागरण करने से समस्त सुखों की प्राप्ति है एवं कष्टों व रोगों का नाश होता है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
गोविन्दा द्वादशी - Tಫ ೫೯ಿಗಿ व्रत 28 फरवरी महात्मय एवं ffq Tಫ ೫೯ಿಗಿ व्रत 28 फरवरी महात्मय एवं ffq - ShareChat
#नृसिंह द्वादसी #श्री नृसिंह भगवान 🙏🏻🙏🏻 #नृसिंह नृसिंह द्वादशी व्रत विशेष 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान विष्णु का नरसिंह अवतार उनके 12 स्वरूपों में से एक है। ये ऐसा अवतार था जिसमें श्रीहरि के शरीर आधा हिस्सा मानव का और आधा हिस्सा शेर का था। इसीलिए इस अवतार को नरसिंह अवतार कहा गया। भगवान ने ये अवतार अपने प्रिय भक्त प्रहलाद के प्राण बचाने के लिए लिया था. नरसिंह भगवान एक खंभे को चीरते हुए बाहर आए थे। जिस दिन ये घटना हुई, उस दिन फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी थी. तभी से हर साल होली से तीन दिन पहले द्वादशी के दिन नरसिंह भगवान की पूजा की जाती है और इस दिन को नरसिम्हा द्वादशी के रूप में जाना जाता है। आमलकी एकादशी के साथ नरसिंह द्वादशी का व्रत भी रखा जाएगा। नृसिंह मंत्र 〰️〰️〰️ ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥ (हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्षा आत्मसमर्पण करता हूँ।) श्री नृसिंह स्तवः 〰️〰️〰️〰️〰️ प्रहलाद ह्रदयाहलादं भक्ता विधाविदारण। शरदिन्दु रुचि बन्दे पारिन्द् बदनं हरि ॥१॥ नमस्ते नृसिंहाय प्रहलादाहलाद-दायिने। हिरन्यकशिपोर्ब‍क्षः शिलाटंक नखालये ॥२॥ इतो नृसिंहो परतोनृसिंहो, यतो-यतो यामिततो नृसिंह। बर्हिनृसिंहो ह्र्दये नृसिंहो, नृसिंह मादि शरणं प्रपधे ॥३॥ तव करकमलवरे नखम् अद् भुत श्रृग्ङं। दलित हिरण्यकशिपुतनुभृग्ङंम्। केशव धृत नरहरिरुप, जय जगदीश हरे ॥४॥ वागीशायस्य बदने लर्क्ष्मीयस्य च बक्षसि। यस्यास्ते ह्र्देय संविततं नृसिंहमहं भजे ॥५॥ श्री नृसिंह जय नृसिंह जय जय नृसिंह। प्रहलादेश जय पदमामुख पदम भृग्ह्र्म ॥६॥ नृसिंह जी अवतरण कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सतयुग में ऋषि कश्यप के दो पुत्र थे हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप, हिरण्याक्ष भगवान ब्रह्म से मिले वरदान की वजह से बहुत अहंकारी हो गया था। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए वो भूदेवी को साथ लेकर पाताल में भगवान विष्णु की खोज में चला गया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार में उसके साथ युद्ध किया और उसका विनाश कर दिया। लेकिन संसार के लिए खतरा अभी टला नही था क्योंकि उसका भाई हिरणाकश्यप अपने भाई के मौत की बदला लेने को आतुर था उसने देवताओ से बदला लेने के लिए अपनी असुरो की सेना से देवताओ पर आक्रमण कर दिया। हिरणाकश्यप देवताओ से लड़ता लेकिन हर बार भगवान विष्णु उनकी मदद कर देते। हिरणाकश्यप ने सोचा “अगर मुझे विष्णु को हराना है तो मुझे अपनी रक्षा के लिए एक वरदान की आवश्यकता है क्योंकि मै जब भी देवताओ और मनुष्यों पर आक्रमण करता हु , विष्णु मेरी सारी योजना तबाह कर देता है ……उससे लड़ने के लिए मुझे शक्तिशाली बनना पड़ेगा ”|अपने दिमाग में ऐसे विचार लेकर वो वन की तरफ निकल पड़ता है और भगवान ब्रह्मा की तपस्या में लीन हो जाता हो वो काफी लम्बे समय तक तपस्या में इसलिए रहना चाहता था ताकि वो भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांग सके इस दौरान वो अपने ओर अपने साम्राज्य के बारे में भूलकर कठोर तपस्या में लग जाता है। इस दौरान इंद्रदेव को ये ज्ञात होता है कि हिरणाकश्यप असुरो का नेतृत्व नही कर रहा है। इंद्रदेव सोचते है कि ” यदि इस समय असुरो को समाप्त कर दिया जाए तो फिर कभी वो आक्रमण नही कर पाएंगे हिरणाकश्यप के बिना असुरो की शक्ति आधी है अगर इस समय इनको खत्म कर दिया जाए तो हिरणाकश्यप के लौटने पर उसका आदेश मानने वाला कोई शेष नही रहेगा| “” ये सोचते हुए इंद्र अपने दुसरे देवो के साथ असुरो के साम्राज्य पर आक्रमण कर देते है। इंद्रदेव के अपेक्षा के अनुसार हिरणाकश्यप के बिना असुर मुकाबले में कमजोर पड़ गये और युद्ध में हार गये। इंद्रदेव ने असुरो के कई समूहों को समाप्त कर दिया। हिरणाकश्यप की राजधानी को तबाह कर इन्द्रदेव ने हिरणाकश्यप के महल में प्रवेश किया जहा पर उनको हिरणाकश्यप की पत्नी कयाधू नजर आयी इंददेव ने हिरणाकश्यप की पत्नी को बंदी बना लिया ताकि भविष्य में हिरणाकश्यप के लौटने पर उसके बंधक बनाने के उपयोग कर पाए इंद्रदेव जैसे ही कयाधू को इंद्र लोक लेकर जाने लगे महर्षि नारद प्रकट हुए और उसी समय इंद्र को कहा “इंद्रदेव रुक जाओ आप ये क्या कर रहे हो ” महर्षि नारद इंद्रदेव के कयाधू को अपने रथ में ले जाते देख क्रोधित हो गये इंददेव में नतमस्तक होकर महर्षि नारद से कहा “महर्षि हिरणाकश्यप के नेतृत्व के बिना असुरो पर आक्रमण किया है और मेरा मानना है कि असुरो के आतंक को समाप्त करने का यही समय है” वहा के विनाश को देखकर महर्षि नारद ने क्रोधित स्वर में कहा “हा ये सत्य है मै देख सकता हु लेकिन ये औरत इसमें कहा से आयी , क्या इसने तुमसे युद्ध किया , मुझे ऐसा नही लग रहा है कि इसने तुम्हारे विरुद्ध कोई शस्र उठाया है फिर तुम उसको क्यों चोट पंहुचा रहे हो ? “इंद्रदेव ने महर्षि नारद की तरफ देखते हुए जवाब दिया कि वो उसके शत्रु हिरणाकश्यप की पत्नी है जिसे वो बंदी बना करले जा रहा है ताकि हिरणाकश्यप कभी आक्रमण करे तो वो उसका उपयोग कर सके महर्षि नारद ने गुस्से में इन्द्रदेव को कहा कि केवल युद्ध जीतने के लिए दुसरे की पत्नी का अपहरण करोगे और इस निरपराध स्त्री को ले जाना महापाप होगा। इंद्रदेव को महर्षि नारद की बाते सुनने के बाद कयाधू को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नही था इंद्रदेव ने कयाधू को छोड़ दिया और महर्षि नारद को उसका जीवन बचाने के लिए धन्यवाद दिया महर्षि नारद ने पूछा कि असुरो के विनाश के बाद वो अब कहा रहेगी कयाधू उस समय गर्भवती थी और अपनी संतान की रक्षा के लिए उसने महर्षि नारद को उसकी देखभाल करने की प्रार्थना की महर्षि नारद उसको अपने घर लेकर चले गये और उसकी देखभाल की इस दौरान वो कयाधू को विष्णु भगवान की कथाये भी सुनाया करते थे जिसको सुनकर कयाधू को भगवान विष्णु से लगाव हो गया था उसके गर्भ में पल रहे शिशु को भी विष्णु भगवान की कहानियों ने मोहित कर दिया था समय गुजरता गया एक दिन स्वर्ग की वायु इतनी गर्म हो गयी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था कारण खोजने पर देवो को पता चला कि हिरणाकश्यप की तपस्या बहुत शक्तिशाली हो गयी थी जिसने स्वर्ग को भी गर्म कर दिय था इस असहनीय गर्मी को देखते हुए देव भगवान ब्रह्मा के पास गये और मदद के लिए कहा भगवान ब्रह्मा को हिरणाकश्यप से मिलने के लिए धरती पर प्रकट होना पड़ा भगवान ब्रह्मा हिरणाकश्यप की कठोर तपस्या से बहुत प्रस्सन हुए और उसे वरदान मांगने को कहा। हिरणाकश्यप ने नतमस्तक होकर कहा “भगवान मुझे अमर बना दो ” भगवान ब्रह्मा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “पुत्र , जिनका जन्म हुआ है उनकी मृत्यु निश्चित है मै सृष्टि के नियमो को नही बदल सकता हु कुछ ओर मांग लो ” हिरणाकश्यप अब सोच में पड़ गया क्योंकि जिस वरदान के लिए उसने तपस्या की वो प्रभु ने देने से मना कर दिया। हिरणाकश्यप अब विचार करने लगा कि अगर वो असंभव शर्तो पर म्रत्यु का वरदान मांगे तो उसकी साधना सफल हो सकती है। हिरणाकश्यप ने कुछ देर ओर सोचते हुए भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा। “प्रभु मेरी इच्छा है कि मै ना तो मुझे मनुष्य मार सके और ना ही जानवर , ना मुझे कोई दिन में मार सके और ना ही रात्रि में , ना मुझे कोई स्वर्ग में मार सके और ना ही पृथ्वी पर , ना मुझे कोई घर में मार सके और ना ही घर के बाहर , ना कोई मुझे अस्त्र से मार सके और ना कोई शस्त्र से ” हिरणाकश्यप का ये वरदान सुनकर एक बार तो ब्रह्मा खुडी चकित रह गये कि हिरणाकश्यप का ये वरदान बहुत विनाश करसकता है लेकिन उनके पास वरदान देने के अलावा ओर कोई विकल्प नही था। भगवान ब्रह्मा ने तथास्तु कहते हुए मांगे हुए वरदान के पूरा होने की बात कही और वरदान देते ही भगवान ब्रह्मा अदृश्य हो गये हिरणाकश्यप खुशी से अपने साम्राज्य लौट गया और इंद्रदेव द्वारा किये विनाश को देखकर बहुत दुःख हुआ। उसने इंद्रदेव से बदला लेने की ठान ली और अपने वरदान के बल पर इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्रदेव के पास कोई विकल्प ना होते हुए वो सभी देवो के साथ देवलोक चले गये हिरणाकश्यप अब इंद्रलोक का राजा बन गया। हिरणाकश्यप अपनी पत्नी कयाधू को खोजकर घर लेकर आ गया कयाधू के विरोध करने के बावजूद हिरणाकश्यप मनुष्यों पर यातना ढाने लगा और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाला अब कोई नही था अब कयाधू ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रहलाद रखा गया जैसे जैसे प्रहलाद बड़ा होता गया वैसे वैसे हिरणाकश्यप ओर अधिक शक्तिशाली होता गया हालांकि प्रहलाद अपने पिता से बिलकुल अलग था और किसी भी जीव को नुकसान नही पहुचता था। वो भगवान विष्णु का अगाध भक्त था और जनता उसके अच्छे व्यवाहर की वजह से उससे प्यार करती थी। एक दिन गुरु शुक्राचार्य प्रहलाद की शिकायत लेकर हिरणाकश्यप के पास पहुचे और कहा “महाराज , आपका पुत्र हम जो पढ़ाते है वो नही पढ़ता है और सारा समय विष्णु के नाम ने लगा रहता है ” हिरणाकश्यप ने उसी समय गुस्से में प्रहलाद को बुलाया और पूछा कि वो दिन भर विष्णु का नाम क्यों लेता रहता है। प्रहलाद ने जवाब दिया “पिताश्री , भगवान विष्णु ही सारे जगत के पालनहार है इसलिए मै उनकी पूजा करता हु मै दुसरो की तरफ आपके आदेशो को मानकर आपकी पूजा नही कर सकता हुआ “। हिरणाकश्यप ने अब शाही पुरोहितो से उसका ध्यान रखने को कहा और विष्णु का जाप बंद कराने को कहा लेकिन कोई फर्क नही पड़ा इसके विपरीत गुरुकुल में प्रहलाद दुसरे शिष्यों को भी उसकी तरह भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए प्रेरित करने लगा। हिरणाकश्यप ने परेशान होकर फिर प्रहलाद को बुलाया और पूछा “पुत्र तुम्हे सबसे प्रिय क्या है ?” प्रहलाद ने जवाब दिया “मुझे भगवान विष्णु का नाम लेना सबसे प्रिय लगता है ” अब हिरणाकश्यप ने पूछा “इस सृष्टि में सबसे शक्तिमान कौन है ?” प्रहलाद ने फिर उत्तर दिया “तीन लोको के स्वामी और जगत के पालनहार भगवान विष्णु सबसे सर्वशक्तिमान है “ अब हिरणाकश्यप को अपने गुस्से पर काबू नही रहा और उसने अपने पहरेदारो से प्रहलाद को विष देने को कहा प्रहलाद ने विष का प्याला पूरा पी लिया लेकिन उसकी मृत्यु नही हुयी सभी व्यक्ति इस चमत्कार को देखकर अचम्भित रह गये। अब हिरणाकश्यप ने आदेश दिया कि प्रहलाद को बड़ी चट्टान से बांधकर समुद्र में फेंक दो लेकिन फिर चमत्कार हुआ और रस्सिया अपने आप खुल गयी भगवान विष्णु का नाम लेकर वो समुद्र जल से बाहर आ गया इसके बाद एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न था तब उस पर उन्मत्त हाथियों के झुण्ड को छोड़ दिया लेकिन वो हाथी उसके पास शांति से बैठ गये। अब हिरणाकश्यप ने अपनी बहन होलिका और बुलाया और कहा “बहन तुम्हे भगवान से वरदान मिला है कि तुम्हे अग्नि से कोई नुकसान नही होगा , मै तुम्हारे इस वरदान क परखना चाहता हु , मेरा पुत्र प्रहलाद दिन भर विष्णु का नाम जपता रहता है और मुझसे सामना करता है …मै उसकी सुरत नही देखना चाहता हु …..मै उसे मारना चाहता हु क्योंकि वो मेरा पुत्र नही है …..मै चाहता हु कि तुम प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि पर बैठ जाओ ” होलिका ने अपने भाई की बात स्वीकार कर ली। अब होलिका ने ध्यान करते हुए प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाया और हिरणाकश्यप को आग लगाने को कहा हिरणाकश्यप प्रहलाद के भक्ति की शक्ति को नही जानता था फिर भी आग से प्रतिरक्षित होलिका जलने लग गयी और उसके पापो ने उसका नाश कर दिया जब आग बुझी तो प्रहलाद उस जली हुयी जगह के मध्य अभी भी ध्यान में बैठा हुआ था जबकि होलिका कही भी नजर नही आयी। अब हिरणाकश्यप भी घबरा गया और प्रहलाद को ध्यान से खीचते हुए ले गया और चिल्लाते हुए बोला “तुम कहते हो तुम्हारा विष्णु हर जगह पर है , बताओ अभी विष्णु कहा पर है ? वो पेड़ के पीछे है या मेरे महल में है या इस स्तंभ में है बताओ ? प्रहलाद ने अपने पिता की आँखों में आँखे मिलाकर कहा “हां पिताश्री , भगवान विष्णु हर जगह पर है ” क्रोधित हिरणाकश्यप ने अपने गदा से स्तम्भ पर प्रहार किया और गुस्से से कहा “तो बताओ वो कहा है “ हिरणाकश्यप दंग रह गया और देखा कि वो स्तम्भ चकनाचूर हो गया और उस स्तम्भ से एक क्रूर पशु निकला जिसका मुंह शेर का और शरीर मनुष्य जैसा था । हिरणाकश्यप उस आधे पशु और आधे मानव को देखकर पीछे हट गया तभी उस आधे पशु और आधे मानव ने जोर से कहा “मै नारायण का अवतार नरसिंह हु और मै तुम्हारा विनाश करने आया हु “ हिरणाकश्यप उसे देखकर जैसे ही बच कर भागने लगा तभी नरसिंह ने पंजो से उसे जकड़ दिया हिरणाकश्यप ने अपने आप को छुडाने के बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। नरसिंह अब हिरणाकश्यप को घसीटते हुए दरवाजे की चौखट तक ले गया [जो ना घर में था और ना घर के बाहर ] और उसे अपनी गोद में बिठा दिया [जो ना आकाश में था और ना ही धरती पर ] और सांझ के समय [ना ही दिन और ना ही रात ] हिरणाकश्यप को अपने पंजो [नाहे अस्त्र ना ही शस्त्र ] से उसका वध कर दिया| हिरणाकश्यप का वध करने के बाद दहाड़ते हुए नरसिंह सिंहासन पर बैठ गया। सारे असुर ऐसे क्रूर पशु को देखकर भाग गये और देवताओ की भी नरसिंह के पास जाने की हिम्मत नही हुयी अब बिना डरे हुए प्रहलाद आगे बढ़ा और नरसिंहा से प्यार से कहा “प्रभु , मै जानता हु कि आप मेरी रक्षा के लिए आये हो ” नरसिंह ने मुस्कुराकर जवाब दिया “हां पुत्र मै तुम्हारे लिए ही आया हु , तुम चिंता मत करो तुम्हे इस कहानी का ज्ञान नही है कि तुम्हारे पिता मेरे द्वारपाल विजय है उन्हें एक श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा और तीन ओर जन्मो के पश्चात उसे फिर वैकुण्ठ में स्थान मिल जाएगा इसलिए तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है ”। प्रहलाद ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “प्रभु अब मुझे कुछ नही चाहिए “ नरसिंह ने अपना सिर हिलाया और कहा “नही पुत्र तुम जनता पर राज करने के लिए बने हो और तुम अपने जनता की सेवा करने के पश्चात वैकुण्ठ आना “ प्रहलाद अब असुरो का उदार शासक बन गया जिसने अपने शाशनकाल के दौरान प्रसिधी पायी और असुरो के पुराने क्रूर तरीके समाप्त कर दिए। भगवान नृसिंह की मृत्यु का रहस्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। लाल आंखें और क्रोध से लदे चेहरे के साथ वे इधर-उधर घूमने लगे। उन्हें देखकर हर कोई भयभीत हो गया। भगवान नृसिंह के क्रोध से तीनों लोक कांपने लगे, इस समस्या के समाधान के लिए सभी देवता गण ब्रह्मा जी के साथ भगवान शिव के पास गए। उन्हें यकीन था कि भगवान शिव के पास इस समस्या का हल अवश्य होगा। सभी ने मिलकर महादेव से प्रार्थना की कि वे नृसिंह देव के क्रोध से बचाएं। भगवान शिव ने पहले वीरभद्र को नृसिंह देव के पास भेजा, लेकिन ये युक्ति पूरी तरह नाकाम रही। वीरभद्र ने भगवान शिव से यह अपील की कि वे स्वयं इस मसले में हस्तक्षेप करें और व्यक्तिगत तौर पर इस समस्या का हल निकालें। भगवान महेश, जिन्हें ब्रह्मांड में सबसे शक्तिशाली माना जाता है, वे नृसिंह देव के सामने कमजोर पड़ने लगे। महादेव ने मानव, चील और सिंह के शरीर वाले भगवान सरबेश्वर का स्वरूप लिया। शरभ उपनिषद के अनुसार भगवान शिव ने 64 बार अवतार लिया था, भगवान सरबेश्वर उनका 16वां अवतार माना जाता है। सरबेश्वर के आठ पैर, दो पंख, चील की नाक, अग्नि, सांप, हिरण और अंकुश, थामे चार भुजाएं थीं। ब्रह्मांड में उड़ते हुए भगवान सरबेश्वर, नृसिंह देव के निकट आ पहुंचे और सबसे पहले अपने पंखों की सहायता से उन्होंने नृसिंह देव के क्रोध को शांत करने का प्रयत्न किया। लेकिन उनका यह प्रयत्न बेकार गया और उन दोनों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया। यह युद्ध करीब 18 दिनों तक चला। जब भगवान सरबेश्वर ने इस युद्ध को समाप्त करने के लिए अपने एक पंख में से देवी प्रत्यंकरा को बाहर निकाला, जो नृसिंह देव को निगलने का प्रयास करने लगीं। नृसिंह देव, उनके सामने कमजोर पड़ गए, उन्हें अपनी करनी पर पछतावा होने लगा, इसलिए उन्होंने देवी से माफी मांगी। शरब के वार से आहत होकर नृसिंह ने अपने प्राण त्यागने का निर्णय लिया और फिर भगवान शिव से यह प्रार्थना की कि वह उनकी चर्म को अपने आसन के रूप में स्वीकार कर लें। भगवान शिव ने नृसिंह देव को शांत कर सृष्टि को उनके कोप से मुक्ति दिलवाई थी। नृसिंह और ब्रह्मा ने सरबेश्वर के विभिन्न नामों का जाप शुरू किया जो मंत्र बन गए। तब सरबेश्वर भगवान ने यह कहा कि उनका अवतरण केवल नृसिंह देव के कोप को शांत करने के लिए हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि नृसिंह और सरबेश्वर एक ही हैं। इसलिए उन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। अपने प्राण त्यागने के बाद नृसिंह भगवान विष्णु के तेज में शामिल हो गए और शिव ने उनकी चर्म को अपना आसन बना लिया। इस तरह भगवान नृसिंह की दिव्य लीला का समापन हुआ। श्री लक्ष्मीनृसिंह अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ।। ॐ श्रीं ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय नम: श्रीं ॐ।। नारसिंहो महासिंहो दिव्यसिंहो महीबल:। उग्रसिंहो महादेव: स्तंभजश्चोग्रलोचन:।। रौद्र: सर्वाद्भुत: श्रीमान् योगानन्दस्त्रीविक्रम:। हरि: कोलाहलश्चक्री विजयो जयवर्द्धन:।। पञ्चानन: परंब्रह्म चाघोरो घोरविक्रम:। ज्वलन्मुखो ज्वालमाली महाज्वालो महाप्रभु:।। निटिलाक्ष: सहस्त्राक्षो दुर्निरीक्ष्य: प्रतापन:। महाद्रंष्ट्रायुध: प्राज्ञश्चण्डकोपी सदाशिव:।। हिरण्यकशिपुध्वंसी दैत्यदानवभञ्जन:। गुणभद्रो महाभद्रो बलभद्र: सुभद्रक:।। करालो विकरालश्च विकर्ता सर्वकर्तृक:। शिंशुमारस्त्रिलोकात्मा ईश: सर्वेश्वरो विभु:।। भैरवाडम्बरो दिव्याश्चच्युत: कविमाधव:। अधोक्षजो अक्षर: शर्वो वनमाली वरप्रद:।। विश्वम्भरो अद्भुतो भव्य: श्रीविष्णु: पुरूषोतम:। अनघास्त्रो नखास्त्रश्च सूर्यज्योति: सुरेश्वर:।। सहस्त्रबाहु: सर्वज्ञ: सर्वसिद्धिप्रदायक:। वज्रदंष्ट्रो वज्रनखो महानन्द: परंतप:।। सर्वयन्त्रैकरूपश्च सप्वयन्त्रविदारण:। सर्वतन्त्रात्मको अव्यक्त: सुव्यक्तो भक्तवत्सल:।। वैशाखशुक्ल भूतोत्थशरणागत वत्सल:। उदारकीर्ति: पुण्यात्मा महात्मा चण्डविक्रम:।। वेदत्रयप्रपूज्यश्च भगवान् परमेश्वर:। श्रीवत्साङ्क: श्रीनिवासो जगद्व्यापी जगन्मय:।। जगत्पालो जगन्नाथो महाकायो द्विरूपभृत्। परमात्मा परंज्योतिर्निर्गुणश्च नृकेसरी।। परतत्त्वं परंधाम सच्चिदानंदविग्रह:। लक्ष्मीनृसिंह: सर्वात्मा धीर: प्रह्लादपालक:।। इदं लक्ष्मीनृसिंहस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम्। त्रिसन्ध्यं य: पठेद् भक्त्या सर्वाभीष्टंवाप्नुयात्।। श्री भगवान महाविष्णु स्वरूप श्री नरसिंह के अंक में विराजमान माँ महालक्ष्मी के इस श्रीयुगल स्तोत्र का तीनो संध्याओं में पाठ करने से भय, दारिद्र, दुःख, शोक का नाश होता है और अभीष्ट की प्राप्ति होती है। नृसिंहमालामन्त्रः विनियोग 〰️〰️〰️〰️〰️ श्री गणेशाय नमः अस्य श्री नृसिंहमाला मन्त्रस्य नारदभगवान् ऋषिः, अनुष्टुभ् छन्दः, श्री नृसिंहोदेवता, आं बीजम्, लं शवित्तः, मेरुकीलकम्, श्रीनृसिंहप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः। ॐ नमो नृसिंहाय ज्वलामुखग्निनेत्रय शङ्खचक्रगदाप्र्हस्ताय योगरूपाय हिरण्यकशिपुच्छेदनान्त्रमालाविभुषणाय हन हन दह दह वच वच रक्ष वो नृसिंहाय पुर्वदिषां बन्ध बन्ध रौद्रभसिंहाय दक्षिणदिशां बन्ध बन्ध पावननृसिंहाय पश्चिमदिशां बन्ध बन्ध दारुणनृसिंहाय उत्तरदिशां बन्ध बन्ध ज्वालानृसिंहाय आकाशदिशां बन्ध बन्ध लक्ष्मीनृसिंहाय पातालदिशां बन्ध बन्ध कः कः कंपय कंपय आवेशय आवेशय अवतारय अवतारय शीघ्रं शीघ्रं, ॐ नमो नारसिंहाय नवकोटिदेवग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय अष्टकोटिगन्धर्व ग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय षट्कोटिशाकिनीग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय पंचकोटि पन्नगग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय चतुष्कोटि ब्रह्मराक्षसग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय द्विकोटिदनुजग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय कोटिग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय अरिमूरीचोरराक्षसजितिः वारं वारं, श्रीभय चोरभय व्याधिभय सकल भयकण्टकान् विध्वंसय विध्वंसय, शरणागत वज्रपंजराय विश्वहृदयाय प्रल्हादवरदाय क्षरौं श्रीं नृसिंहाय स्वाहा, ॐ नमो नारसिंहाय मुद्गल शङ्खचक्र गदापद्महस्ताय नीलप्रभांगवर्णाय भीमाय भीषणाय ज्वाला करालभयभाषित श्री नृसिंहहिरण्यकश्यपवक्षस्थलविदार्णाय, जय जय एहि एहि भगवन् भवन गरुडध्वज गरुडध्वज मम सर्वोपद्रवं वज्रदेहेन चूर्णय चूर्णय आपत्समुद्रं शोषय शोषय, असुरगन्धर्वयक्षब्रह्मराक्षस भूतप्रेत पिशाचदिन विध्वन्सय् विध्वन्सय्, पूर्वाखिलं मूलय मूलय, प्रतिच्छां स्तम्भय परमन्त्रपयन्त्र परतन्त्र परकष्टं छिन्धि छिन्धि भिन्धि हं फट् स्वाहा। इति श्री अथर्वण वेदोवत्तनृसिंहमालामन्त्रः समाप्तः श्री नृसिम्हार्पणमस्तु || नृसिंह गायत्री 〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्ण दंष्ट्राय धीमहि |तन्नो नरसिंह प्रचोदयात || नृसिंह शाबर मन्त्र : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ नमो भगवते नारसिंहाय -घोर रौद्र महिषासुर रूपाय ,त्रेलोक्यडम्बराय रोद्र क्षेत्रपालाय ह्रों ह्रों क्री क्री क्री ताडय ताडय मोहे मोहे द्रम्भी द्रम्भी क्षोभय क्षोभय आभि आभि साधय साधय ह्रीं हृदये आं शक्तये प्रीतिं ललाटे बन्धय बन्धय ह्रीं हृदये स्तम्भय स्तम्भय किलि किलि ईम ह्रीं डाकिनिं प्रच्छादय प्रच्छादय शाकिनिं प्रच्छादय प्रच्छादय भूतं प्रच्छादय प्रच्छादय प्रेतं प्रच्छादय प्रच्छादय ब्रंहंराक्षसं सर्व योनिम प्रच्छादय प्रच्छादय राक्षसं प्रच्छादय प्रच्छादय सिन्हिनी पुत्रं प्रच्छादय प्रच्छादय अप्रभूति अदूरि स्वाहा एते डाकिनी ग्रहं साधय साधय शाकिनी ग्रहं साधय साधय अनेन मन्त्रेन डाकिनी शाकिनी भूत प्रेत पिशाचादि एकाहिक द्वयाहिक् त्र्याहिक चाथुर्थिक पञ्च वातिक पैत्तिक श्लेष्मिक संनिपात केशरि डाकिनी ग्रहादि मुञ्च मुञ्च स्वाहा मेरी भक्ति गुरु की शक्ति स्फ़ुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा ll नृसिंह भगवान की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ श्री नरसिंह भगवान की आरतीॐ जय नरसिंह हरे, प्रभु जय नरसिंह हरे। स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, जन का ताप हरे॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥ तुम हो दीन दयाला, भक्तन हितकारी, प्रभु भक्तन हितकारी। अद्भुत रूप बनाकर, अद्भुत रूप बनाकर, प्रकटे भय हारी॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥ सबके ह्रदय विदारण, दुस्यु जियो मारी, प्रभु दुस्यु जियो मारी। दास जान अपनायो, दास जान अपनायो, जन पर कृपा करी॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥ ब्रह्मा करत आरती, माला पहिनावे, प्रभु माला पहिनावे। शिवजी जय जय कहकर, पुष्पन बरसावे॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥ अन्य आरती 〰️〰️〰️〰️ आरती कीजै नरसिंह कुँवर की। वेद विमल यश गाऊँ मेरे प्रभुजी॥ पहली आरती प्रह्लाद उबारे, हिरणाकुश नख उदर विदारे। दूसरी आरती वामन सेवा, बलि के द्वार पधारे हरि देवा। आरती कीजै नरसिंह कुँवर की। तीसरी आरती ब्रह्म पधारे, सहसबाहु के भुजा उखारे। चौथी आरती असुर संहारे, भक्त विभीषण लंक पधारे। आरती कीजै नरसिंह कुँवर की। पाँचवीं आरती कंस पछारे, गोपी ग्वाल सखा प्रतिपाले। तुलसी को पत्र कण्ठ मणि हीरा, हरषि-निरखि गावें दास कबीरा। आरती कीजै नरसिंह कुँवर की। वेद विमल यश गाऊँ मेरे प्रभुजी॥ साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️
नृसिंह द्वादसी - नृसिंह द्वादशी ar 28 फरवरी विशेष नृसिंह द्वादशी ar 28 फरवरी विशेष - ShareChat
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *यह सकल सृष्टि अपने उत्पत्तिकाल से सदैव प्रगतिशीलता एवं निरन्तरता के लिए ही जानी जाती है | जबसे सृष्टि का सृजन हुआ तब से आज तक नित्य प्रात:काल उदय होने वाला सूर्य निरन्तर अपने नियत समय पर निकल रहा है | चाहे गर्मी हो , सर्दी हो या फिर घोर बरसात सूर्य अपनी निरन्तरता को कभी बाधित नहीं करता | घोर कुहरा देखकर कभी कभी यह लगता है कि शायद आज सूर्योदय नहीं है , परंतु विचार कीजिए कि जैसे ही कुहरा छंटता है तो सूर्य हमें अपने गंतव्यमार्ग पर चलता हुआ ही मिलता है | नदियां सदैव प्रवाहमान रहते हुए मार्ग में पड़ने वाली अनेकानेक बाधाओं को पार करते हुए अपने गंतव्य समुद्र की ओर बढती ही रहती हैं | और भी ऐसे अनेक उदाहरण इस सृष्टि में देखने को मिलते हैं जो कि निरंतर अपने कर्तव्यपथ पर चलते हुए अपने गंतव्य को प्राप्त करते हैं | धरती पर सबसे बुद्धिमान प्राणी की उपाधि प्राप्त करने वाले मनुष्य ने भी अपनी निरंतरता एवं सतत प्रयास से सफलता के कई आयाम स्थापित किये हैं | कहने का तात्पर्य यह है कि इस संसार में सफल वही हुआ है जो कि अपने कर्तव्यपथ पर निरंतर चलते हुए अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाये रहता है | इसी संसार में आपके आस - पास ही कई ऐसे मनुष्य भी मिल जायेंगे जो यह कहते हैं कि अमुक कार्य बड़ा कठिन है और मैं नहीं कर पाऊँगा | ऐसे लोग कोई भी कार्य करने से कतराते रहते हैं और अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते |* *आज का मनुष्य कोई भी लक्ष्य तुरंत ही प्राप्त कर लेना चाहता है , यदि कुछ दिन में सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है ! हमारे साहित्यों में मनुष्य को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है | उत्तम , मध्यम और निम्न | निम्नकोटि के जो मनुष्य होते हैं वे कोई भी कार्य इस भय से नहीं प्रारम्भ करते कि पता नहीं मैं कर पाऊँ या नहीं | वहीं मध्यमकोटि के जो मनुष्य होते हैं वे किसी भी कार्य को बड़े ही उत्साह एवं लगन के साथ प्रारम्भ तो कर देते हैं परंतु एक छोटी सी भी बाधा यदि उनके मार्ग में आ जाती है तो उनका उत्साह खत्म हो जाता और वे भगवान एवं उन बाधाओं को दोष देते हुए अपना कार्य बीच में ही छोड़ देते हैं | परंतु जो उत्तमकोटि के मनुष्य होते हैं जब वे किसी कार्य का संकल्प ले लेते हैं तो उन्हें सिर्फ अपना लक्ष्य दिखाई पड़ता है | उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वे अपने मार्ग में पड़ने वाली समस्त बाधाओं को पार करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते हैं और सफल भी वही होते हैं | जो लोग यह कहते हैं कि मुझसे यह कार्य नहीं हो सकता ऐसे लोगों से मेरा (आचार्य अर्जुन तिवारी का) यही कहना है कि कठिन वह कार्य नहीं बल्कि कमजोर आपका प्रयास है | ध्यान दिलाना चाहूँगा उस कोमल रस्सी की ओर जो कठोर पत्थर - ईंट पर भी अपनी निरंतरता से निशान बनाती चली जाती है | जब वह रस्सी सिर्फ अपनी निरंतरता से पत्थर पर निशान छोड़ सकती है तो इस संसार में मनुष्य के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है ! बस आवश्यकता यह है कि कोई भी कार्य करने में उचित एवं सतत् प्रयास की |* *मनुष्य सब कुछ कर सकता है ! और कर भी रहा है ! परंतु कुछ लोग निराशा एवं हताशा में पड़कर अपनी निरंतरता को खो देते हैं ! जबकि हमें अपनी निरंतरता को सदैव बनाये रखना चाहिए |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #🙏 प्रेरणादायक विचार
🙏 प्रेरणादायक विचार - P राम राम ৮ 4 = స్త 4 F P राम राम ৮ 4 = స్త 4 F - ShareChat