आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संसद में राइट टू रिकॉल यानी प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार का मुद्दा बढ़ने एक अहम बहस को जन्म दिया है। उन्होंने कहा कि अगर कोई सांसद या विधायक जनता की पार्टियों पर खरा नहीं उतरता या अपने कर्तव्यों का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं करता, तो सांसदों के पास उसे कार्यकाल पूरा होने से पहले पद से हटाने की संवैधानिक शक्ति होनी चाहिए।
राघव चड्ढा के अनुसार, लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे कार्यकाल के दौरान जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। राइट टू रिकॉल जैसी व्यवस्था से प्रतिनिधियों पर यह दबाव बना रहेगा कि वे लगातार जनता के प्रति उत्तरदायी रहें और अपने वादों व जिम्मेदारों को जिम्मेदारी से लें।
उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह का प्रावधान सत्ता के दुरुपयोग, निष्क्रियता और जनहित की अनदेखी को रोकने में सहायक हो सकता है। पार्टियों का कामकाज है कि इससे राजनीति में विस्थापन<extra_id_1> और जनता को यह भरोसा मिलेगा कि उनके पास शेष वोट देने का ही नहीं, बल्कि सांसदों के प्रदर्शन पर नियंत्रण का भी अधिकार है।
हालांकि, इस विचार को लेकर कुछ लोग डराएँ भी जताते हैं। उनका कहना है कि राइट टू रिकॉल का दुरुपयोग राजनीतिक प्रतिबंधों या बार-बार चुनाव जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। इसके बावजूद, इस प्रस्ताव ने लोकतांत्रिक सुधार, जवाबदेही और जनसत्ता को मजबूत करने पर एक गंभीर राष्ट्रीय चर्चा शुरू कर दी है।
राघव चन्ना द्वारा उठाया गया यह मुद्दा इस सवाल को केंद्र में लाता है कि क्या भारत के लोकतंत्र में अब समय आ गया है कि जनता को अपने आयामों पर और अधिक सीधा नियंत्रण दिया जाए, ताकि शासन वास्तव में जनहित के अनुरूप चल सके।
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