पौराणिक विचार

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sn vyas
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#पौराणिक कथा गौभक्त राजा दिलीप की अद्भुत कथा ----- रघुवंश महाकाव्य में महाराजा दिलीप और नंदिनी गाय की एक बहुत ही मनोहर कथा आती है। जिसमें नंदिनी गाय दिलीप राजा की सेवा से प्रसन्न होकर, उन्हें उत्तम संतान तथा सौभाग्य का वरदान देती है। यह कथा गाय माता की महिमा को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करती है। महाराजा दिलीप को वृद्धा अवस्था आने पर भी कोई संतान प्राप्त नहीं हुई थी । संतान ना होने की चिंता में वे बहुत दुखी और चिंतित रहते थे। एक समय उन्होंने अपनी महारानी के साथ विचार विमर्श किया और अपने गुरु वशिष्ठ जी से इस संदर्भ में प्रश्न पूछने की सोची । अतः राजा दिलीप रानी के साथ गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम में पहुंचे। आश्रम में पहुंचकर महाराजा दिलीप और महारानी ने गुरु वशिष्ठ को प्रणाम किया और उनसे संतान ना होने की व्यथा व्यक्त की l गुरु वशिष्ठ जी ने राजा दिलीप को याद दिलाया एक बार अनजाने में उनसे कामधेनु गाय का अनादर हो गया था । जिसके फलस्वरूप उन्हें संतान ना होने का दुख भोगना पड़ रहा है । साथ ही गुरु वशिष्ट जी ने उन्हें इस पूर्व कर्म के फल को काटने का उपाय भी बताया । उन्होंने बताया कि कामधेनु गाय की पुत्री नंदिनी गाय की सेवा करने से वे अपने कर्म का पश्चाताप कर सकते हैं। यदि नंदिनी गाय उनकी सेवा से प्रसन्न हो जाएं तो वह उन्हें शाप से मुक्त कर सकती हैं। गुरु वशिष्ट जी से यह सब सुनकर राजा दिलीप नंदिनी गाय की सेवा का व्रत ले लेते हैं और व्रत के अनुसार वे अपने दास दासीयों को छुट्टी दे कर, रानी के साथ स्वयं ही नंदिनी गाय की सेवा में लग जाते हैं । राजा दिलीप और उनकी पत्नी, गौ माता नंदनी को मीठी घास के कौर उसको अभय करते हुए खिलाते, उसके शरीर को सुहलाते, शरीर से मक्खियों और डांस वगैरह को दूर करते तथा वह जहाँ जाना चाहती वही जाने देते थे। साथ ही वे स्वयं भी उसकी गति का अनुसरण करते थे। इस प्रकार उसकी छाया के समान उसके पीछे-पीछे रहते हुए राजा दिलीप उसकी आराधना करने लगे। राजा दिलीप के तप का प्रभाव और दया-भाव के कारण वन के समस्त स्थावर-जंगम जीव मंत्रमुग्ध रहते थे। प्रजा की रक्षा करने वाले राजा के वन में पैर रखते ही बलवान् प्राणियों ने अपने से कम बल वालों को तंग करना छोड़ दिया था। राजा दिलीप प्रतिदिन प्रात: काल गाय को चराने के लिए निकलते थे। उस समय उनको रानी पहुंचाने जाती थी और सायंकाल जब राजा गाय को लेकर लौटते थे तब रानी दोनों को लेने जाती थी। महाराजा दिलीप संध्या काल में नंदिनी गाय की पूजा, अर्चना करके, उसे दुहकर, नंदनी जी के सोने के पश्चात सोते और उनके उठने से पहले उठ जाते थे। इस प्रकार राजा दिलीप को सेवा करते हुए 21 दिन बीत गए । तदनन्तर राजा की भक्ति भावना की परीक्षा करने के लिए, मुनि की होम धेनु, एक हिमालय की गुफा में, जिसमें कोमल घास उग रही थी; घुस गई। गाय हिरण पशुओं से सुरक्षित है ऐसा समझकर राजा पर्वत की शोभा देखने में तल्लीन थे। इसी बीच एक सिहं आकर गाय के ऊपर झपट्टा, जिसका पता राजा को नहीं चल सका। जब राजा को गाय की आर्त्त ध्वनि सुनाई पड़ी, तब राजा की दृष्टि पीछे गई । तब राजा ने देखा कि लाल गाय के ऊपर पंजा रखे केसरी सिंह खड़ा है । राजा लज्जित हो गए और तरकस में से बाण निकालकर ज्यों ही सिंह पर छोड़ने लगे, तभी तभी उन्हें ऐसा जान पड़ा कि उनका दाहिना हाथ जहां-का-तहां रह गया है, मानो मन्त्रौषधि के द्वारा उनका सारा बाहुबल नष्ट कर दिया है। राजा की यह लाचारी देखकर सिंह ठहाका मारकर हंसा और बोला, ” राजा ! यह वृथा श्रम क्यों करते हो ? मैं सामान्य सिंह नहीं हूं, बल्कि महादेव का किंकर कुम्भोदर हूँ। शिव जी के चरण स्पर्श से पवित्र हुए मेरे शरीर पर तुम्हारे अस्त्र काम नहीं कर सकते। इसलिए यह व्यर्थ प्रयत्न छोड़ दो और घर लौट जाओ। तुम्हें जो काम सौंपा गया था, उसे तुम कर चुके हो। तुम्हारी गुरु भक्ति सिद्ध हो गई हो चुकी है। जिसकी रक्षा शस्त्र से नहीं हो सकती उसके बचाने में शस्त्र धारी क्षत्रिय निष्फल हो जाए तो इसमें लज्जा की कोई बात नहीं।” इस पर राजा दीनतापूर्वक जवाब देते हैं, ” हे मृगेन्द्र! मैं हिल-डुल भी नहीं सकता हूं। इसलिए मेरा कहना तुम्हें हँसने योग्य भले ही लगता हो, परंतु – यह नंदिनी गाय गुरु अग्निहोत्री जी की कामधेनु का धन है। अपनी आंखों के सामने मैं इन्हें नष्ट होते हुए नहीं देख सकता। इसलिए तुम मुझ पर कृपा करके मेरा शरीर ले लो और अपनी भूख मिटाओ। कृपया करके महर्षि की इस गाय को छोड़ दो। सांझ होने पर इसका छोटा बछड़ा इसकी रहा देखेगा।” सिंह राजा को अनेकों प्रकार से समझाता है ताकि राजा अपने निश्चय को बदल दे। सिहं कहता है- ” यदि तुम भूत दया के वशीभूत हो गए हो तो अपना शरीर प्रदान करके तुम इस एक ही गाय की रक्षा कर सकोगे। लेकिन यदि जीते रहोगे तो हे प्रजानाथ! तुम अपनी प्रजा को पिता के समान सदा संकटों से उबार सकोगे। और यदि तुम्हें अपने गुरु के क्रोध का डर लगता हो तो उनको तुम घड़े-जैसे थन वाली करोड़ों गायों को देकर शांत कर सकते हो।” इस तरह सिहं द्वारा बहुत प्रकार समझाने पर भी राजा पर कोई प्रभाव न पड़ा। वरन राजा दिलीप उस सिंह से कहते हैं कि, ” जिस प्रकार तुम देवदारू वृक्ष की रक्षा शिवजी जी की आज्ञा से करते हो। उसी प्रकार मैं अपने गुरु की आज्ञा से इस गाय की रक्षा करता हूँ। इस प्रकार सेवा कार्य करने- वाले तुम मेरी सेवा की भावना को क्यों नहीं समझते हो ? “ ” यदि तुम्हें मुझ पर दया आती हो, तो मेरे इस नश्वर शरीर पर क्यों करते हो ? मेरा जो अमर यश रूपी शरीर है। उसके ऊपर दया करो और इस नश्वर शरीर को तुम खा जाओ। इस नश्वर पिंड पर मेरे- जैसे मनुष्य को कोई आस्था नहीं होती।” राजा की यह बात सुनकर शेर मन ही मन प्रसन्न होता है और राजा की बात को मान लेता है इस प्रकार राजा सिंह की भूख मिटाने के लिए उसके चरणों पर अपने शरीर को ‘मास के पिंड के समान’ अर्पण करते देते हैं । तभी सिंह के आगे पड़े हुए राजा दिलीप के शरीर पर आकाश से पुष्प वृष्टि होती है और एक धीमी अमृत-जैसी मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है- ‘वत्स उठ।’ राजा दिलीप उठते हैं और सामने देखते हैं कि अपनी जननी के समान वह गोमाता दूध की धार छोड़ती हुई खड़ी है और सिंह अदृश्य हो गया है ! माता नन्दिनी उनसे कहती है, ” यह सिंह तो मेरी ही माया थी। इस माया के द्वारा मैंने तेरी परीक्षा ली। ऋषि के प्रभाव से स्वयं काल भी मेरे ऊपर प्रहार करने में असमर्थ है।” राजा की गुरुभक्ति से, सेवा से और दया से प्रसन्न हुई गाय संतान प्राप्ति के लिए उत्सुक राजा को उनका मांगा हुआ वर प्रदान करती है, और कहती है- ” तुम्हारी गुरु भक्ति और दया भाव से मैं प्रसन्न हो गई हूं। पुत्र ! तू वर माँग। मैं केवल दूध ही देती हूं, ऐसा न समझ। मैं कामधेनु हूं। प्रसन्न होने पर, जो चाहे सो दे सकती हूं।” गाय को बचाने में प्राण अर्पण किया जाए या करोड़ों गायों का दान पुण्य प्राप्त किया जाए, इस धर्म संकट में एक को चुनने में राजा को देर नहीं लगी। फल स्वरूप राजा दिलीप को गौ रक्षा और सेवा का सच्चा मार्ग प्राप्त हुआ जिस पर चलकर उन्हें समस्त रिद्धि सिद्धि प्राप्त हो गई। इस पुण्य के प्रभाव से रानी गर्भवती हुई और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई ॥जय जय श्री राधे॥ ---:: ॐ :: ---
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sn vyas
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#पौराणिक कथा देवर्षि नारद को घुमक्कड़ ऋषि भी कहा जाता है क्यूँकि वे सदैव संसार का हाल जानने के लिए इधर-उधर घूमते रहते हैं। एक बार देवर्षि भगवान ब्रह्मा के दर्शनों को ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ उन्होंने प्रभु को नमस्कार किया और उनसे कहा - "पिताश्री! पृथ्वी पर लोग बड़े सरल है। मैं अनेकानेक स्थानों पर जाता रहता हूँ किन्तु मुझे कभी कोई जटिल समस्या नहीं दिखी। आपने वास्तव में बड़े सरल सृष्टि की रचना की है। किन्तु मुझे ये बात समझ में नहीं आती कि फिर भगवान विष्णु क्यों कहते हैं कि सृष्टि का पालन करना अत्यंत कठिन है? वे तो सर्वज्ञ हैं फिर जिस बात की जानकारी मुझे है वो उन्हें कैसे नहीं पता?" देवर्षि की बात सुनकर ब्रह्मदेव मुस्कुराये और उन्होंने उन्हें एक बार फिर पृथ्वी पर जाने की आज्ञा दी। देवर्षि को कुछ समझ में नहीं आया पर पिता की आज्ञा पाकर वे पृथ्वी पर पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही परमपिता ब्रह्मा की माया से उनकी भेंट एक अत्यंत दरिद्र व्यक्ति से हुई। जैसे ही उस व्यक्ति ने देवर्षि को देखा उसने तुरंत उन्हें पहचान लिया और दौड़ कर उनके पास आया। उसने रोते-रोते देवर्षि से अपना दुखड़ा रोया और कहा कि "हे देवर्षि! आपको तो सुख साधनों की कमी नहीं है लेकिन मेरे बारे में भी तो सोचिये। मुझे दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती और आप ऊपर देवताओं के साथ छप्पन भोग का मजा उठाते हैं। कृपा इस बार जब आप श्रीहरि से मिलें तो कह दें कि उनकी सृष्टि में कोई सुखी नहीं है। उनसे कहकर कृपया मेरे गुजारे का प्रबंध कर दें।" अपने आराध्य भगवान विष्णु के बारे में ऐसा सुनकर देवर्षि को बहुत बुरा लगा किन्तु उन्होंने कुछ कहा नहीं और आगे बढे। आगे एक अत्यंत धनी व्यक्ति उन्हें मिला। उसने भी देवर्षि को पहचाना और पास आकर कहा - "मुझे भगवान ने किस जंजाल में फसा दिया है? इतना धन देने की क्या आवश्यकता थी? मैं तो परेशान हो गया। आप स्वयं तो संयासी बन फिरते हैं और मुझे इस चक्कर में फसा दिया। इस बार परमपिता ब्रह्मा से भेंट हो तो उनसे कहें कि किस प्रकार की सृष्टि रची है? धन को बनाने की आवश्यकता ही क्या थी? उनसे कहें कि मुझे इस मुसीबत से निकालें।" नारदजी बड़े आश्चर्य में पड़ गए और आगे बढे। आगे उनकी मुलाकात साधुओं के एक झुण्ड से हुई। उन्हें देखते ही साधुओं ने उन्हें घेर लिया और कहा - "आप तो स्वर्ग में अकेले मौज करते हैं और हम यहाँ दर-दर भटक रहे हैं। भोलेनाथ भी अजीब हैं। उन्हें लगता है कि सब उन्ही की तरह बिना सुख-साधन के रह सकते हैं। अगले बार जब महादेव से मिलें तो उनसे कहें कि उनके भक्त बड़े दुखी हैं और आप जैसे ठाठ-बाठ की इच्छा रखते हैं।" घबराये नारदजी ने जैसे-तैसे उनसे पीछा छुड़ाया और सीधे ब्रह्मलोक भागे। अब पृथ्वी पर कुछ और देखने की उनकी इच्छा ना रही। ब्रह्मलोक पहुँचकर उन्होंने परमपिता को सारी घटनाएं बताई। उन्होंने कहा - "हे पिताश्री! पृथ्वी का हाल तो बहुत बुरा है। एक व्यक्ति जिस चीज के आभाव में दुखी है, दूसरा उसी चीज की अधिकता से। और तो और सब लोग अपनी-अपनी समस्या के लिए आपको, नारायण एवं महादेव को दोष दे रहे हैं।" तब ब्रह्मदेव ने हँसते हुए कहा - "पुत्र! यही कर्म का विधान है। मैं कर्म के अनुसार ही किसी को कुछ दे सकने के लिए विवश हूँ। जिसकी कर्मठता ही समाप्त हो चुकी हो उसे मैं धनी कैसे बनाऊं? अगली बार जब उस निर्धन से मिलना तो कहना कि परिश्रम करे और दरिद्रता से लड़े। उसकी दरिद्रता समाप्त हो जाएगी। उस धनी व्यक्ति से कहना कि धन संचय के लिए नहीं है। उसकी आवश्यकता के बाद जो कुछ भी बचता है उससे निर्धनों की सहायता करे जिससे उसे वास्तविक सुख प्राप्त होगा। और उन दुष्ट साधुओं से कहना कि साधुओं का ऊपरी दिखावा कर महादेव को दोष देने का कोई अर्थ नहीं। महादेव के जीवन से शिक्षा लें। उनके लिए क्या असंभव है किन्तु वे फिर भी याचक के रूप में रहते है। उसी प्रकार अगर बनना है तो वे वास्तविक संन्यासी बनें अन्यथा उन्हें नर्क के निकृष्टतम स्थान पर अनंतकाल तक रहना होगा। और अंत में ये शिक्षा तुम्हारे लिए है कि संसार में इतना कुछ है जिसे जानना किसी के लिए भी संभव नहीं है। अतः बिना पूर्ण जानकारी के किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहिए। अब तुम्हे ज्ञात हो गया होगा कि नारायण किस प्रकार सृष्टि का पालन करते हैं।" ब्रह्मदेव से इस ज्ञान को पाकर देवर्षि का भ्रम दूर हो गया। उन्होंने परमपिता का धन्यवाद किया और उनके सन्देश को सुनाने वापस पृथ्वी पर चले।
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