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sn vyas
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#पौराणिक कथा बहुत समय पहले की बात है। तीनों लोकों में असुरों और देवताओं के बीच संघर्ष चल रहा था। देवताओं के पास दिव्य शक्तियां थीं, लेकिन असुरों की ओर से एक ऐसा राजा उठ खड़ा हुआ था जिसकी शक्ति केवल युद्ध और शस्त्रों में नहीं, बल्कि उसके सत्य, तप, दान और वचन में थी। उसका नाम था राजा बलि। वह प्रह्लाद का पौत्र था और अपने दादा की तरह भगवान विष्णु का भक्त भी था। धीरे-धीरे उसकी शक्ति इतनी बढ़ गई कि उसने देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इंद्र सहित अनेक देवता अपने अधिकारों से वंचित होकर इधर-उधर भटकने लगे। तीनों लोकों में राजा बलि का प्रभाव फैलने लगा। उसके राज्य में प्रजा सुखी थी और उसके द्वार से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। लेकिन शक्ति के साथ उसके मन में धीरे-धीरे एक सूक्ष्म अहंकार भी जन्म लेने लगा। उसे विश्वास होने लगा कि संसार में उससे बड़ा दानी और शक्तिशाली कोई नहीं है। देवताओं की यह दशा देखकर उनकी माता अदिति अत्यंत दुखी हो गईं। उन्होंने अपने पुत्रों की रक्षा और उनके खोए हुए अधिकारों की पुनः प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की कठोर आराधना शुरू की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेकर देवताओं की सहायता करेंगे। समय आने पर भगवान विष्णु ने वामन के रूप में जन्म लिया। उनका स्वरूप एक छोटे ब्राह्मण बालक का था, लेकिन उनके भीतर स्वयं परमात्मा की दिव्य शक्ति विद्यमान थी। उधर राजा बलि एक महान यज्ञ का आयोजन कर रहा था। वह संकल्प कर चुका था कि उसके द्वार पर आने वाला कोई भी याचक खाली हाथ वापस नहीं जाएगा। यही उसका धर्म था और यही उसकी सबसे बड़ी प्रतिष्ठा भी थी। यज्ञ का वातावरण अत्यंत भव्य था। ऋषि-मुनि मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, अग्नि प्रज्वलित थी और राजा बलि श्रद्धा के साथ यज्ञ में आहुति दे रहा था। तभी वहां एक तेजस्वी बाल ब्राह्मण का आगमन हुआ। छोटे से शरीर, शांत मुख, हाथ में कमंडल और छत्र, तथा चेहरे पर अद्भुत तेज देखकर सभी की दृष्टि उसी पर टिक गई। वह बालक कोई साधारण ब्राह्मण नहीं था। वह स्वयं भगवान विष्णु थे, जो वामन रूप धारण करके राजा बलि की परीक्षा लेने आए थे। राजा बलि ने उन्हें देखा तो तुरंत अपने आसन से उठ खड़ा हुआ। उसने श्रद्धा से उनका स्वागत किया और कहा, “हे ब्राह्मण देवता, आपका मेरे यज्ञ में आना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। आप जो चाहें मांग सकते हैं। मेरे पास जो कुछ भी है, वह आपके लिए है।” वामन भगवान ने अत्यंत शांत स्वर में कहा, “राजन, मुझे सोना, चांदी, हाथी, घोड़े, महल या कोई बड़ा राज्य नहीं चाहिए। मैं तो केवल उतनी भूमि चाहता हूं, जितनी मेरे तीन कदमों में आ जाए।” यह सुनकर राजा बलि मुस्कुराया। उसे लगा कि यह बालक बहुत सरल है। उसने कहा, “हे ब्राह्मण कुमार, आप इतने छोटे हैं और केवल तीन कदम भूमि मांग रहे हैं। आप चाहें तो इससे कहीं अधिक मांग सकते हैं। ऐसा वर मांगिए जिससे आपका जीवन सुखी हो जाए।” लेकिन वामन अपनी मांग पर अडिग रहे। उन्होंने कहा, “जिस मनुष्य को अपनी आवश्यकता से अधिक मिल जाए, फिर भी उसका मन संतुष्ट न हो, उसके लिए पूरी पृथ्वी भी छोटी पड़ सकती है। मुझे जितना चाहिए, उतना ही पर्याप्त है।” राजा बलि ने अपना संकल्प पूरा करने के लिए जल लेकर दान की प्रतिज्ञा करने की तैयारी की। तभी उसके गुरु शुक्राचार्य ने उसे रोक दिया। शुक्राचार्य दिव्य दृष्टि से पहचान चुके थे कि यह कोई साधारण बालक नहीं बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। उन्होंने बलि से कहा, “राजन, सावधान रहो। यह ब्राह्मण रूप में स्वयं विष्णु हैं। इनके सामने किया गया यह वचन तुम्हारे लिए भारी पड़ सकता है। तुम अपना संकल्प वापस ले लो।” लेकिन बलि ने शांत होकर उत्तर दिया, “गुरुदेव, यदि स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर आए हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए क्या हो सकता है? मैंने जीवन भर दान और सत्य को अपना धर्म माना है। आज यदि भय के कारण अपने वचन से पीछे हट जाऊं तो मेरे सारे यज्ञ और सारी प्रतिष्ठा व्यर्थ हो जाएगी।” शुक्राचार्य ने फिर समझाने का प्रयास किया, लेकिन बलि ने अपना निर्णय नहीं बदला। अंततः उसने भगवान वामन को तीन पग भूमि देने का संकल्प कर लिया। जैसे ही वचन पूरा हुआ, वह छोटा सा बालक अचानक विराट रूप धारण करने लगा। उसका शरीर आकाश से भी ऊंचा हो गया। उसका तेज दिशाओं में फैल गया। देवता, ऋषि और असुर सभी उस अद्भुत रूप को देखकर स्तब्ध रह गए। भगवान ने पहला कदम उठाया तो पूरी पृथ्वी उनके एक पग में समा गई। उन्होंने दूसरा कदम बढ़ाया तो स्वर्गलोक भी उनके चरणों के नीचे आ गया। अब उनके सामने तीसरे कदम के लिए कोई भूमि शेष नहीं थी। भगवान ने राजा बलि की ओर देखकर कहा, “राजन, तुमने मुझे तीन कदम भूमि देने का वचन दिया था। मेरे दो कदमों में तुम्हारा संपूर्ण राज्य और समस्त लोक आ गए। अब मेरे तीसरे कदम के लिए स्थान कहां है?” यह सुनकर बलि समझ गया कि उसकी सारी संपत्ति, उसका साम्राज्य और उसका अहंकार उस विराट सत्ता के सामने कितना छोटा है। उसने अपना सिर झुका दिया और कहा, “प्रभु, मेरे पास अब कुछ भी शेष नहीं है। जो कुछ था, वह सब आपका ही था। यदि तीसरे कदम के लिए स्थान चाहिए, तो मेरा यह सिर आपके सामने है। अपना तीसरा कदम मेरे सिर पर रख दीजिए।” भगवान वामन बलि की इस भावना से प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना चरण उसके सिर पर रखा और उसे सुतल लोक भेज दिया। लेकिन यह दंड केवल बाहर से देखने पर दंड था। वास्तव में यह राजा बलि के लिए भगवान की विशेष कृपा थी। क्योंकि बलि ने अपना राज्य खोया था, लेकिन बदले में उसने स्वयं भगवान को पा लिया था। भगवान ने उसे वरदान दिया कि सुतल लोक में उसे किसी प्रकार की कमी नहीं होगी और स्वयं भगवान उसके द्वार की रक्षा करेंगे। राजा बलि ने विनम्र होकर कहा, “प्रभु, मुझे धन, राज्य और वैभव की आवश्यकता नहीं है। यदि आप मेरे साथ रहेंगे तो यही मेरे लिए सबसे बड़ा सौभाग्य होगा।” भगवान ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली। कहते हैं कि स्वयं वैकुंठ के स्वामी भगवान विष्णु राजा बलि के द्वार पर पहरा देने लगे। यह दृश्य अत्यंत अद्भुत था। जिनके चरणों की पूजा देवता करते हैं, वही भगवान अपने भक्त के द्वार पर सेवक के रूप में खड़े थे। यही भक्ति की वह शक्ति है जो संसार की सारी सीमाओं से परे चली जाती है। बलि ने भगवान से कुछ मांगा नहीं था, फिर भी अपने समर्पण के कारण उसने भगवान का सान्निध्य प्राप्त कर लिया था। उधर वैकुंठ में माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के बिना चिंतित थीं। उन्हें अपने स्वामी की अनुपस्थिति खल रही थी। जब उन्हें पता चला कि भगवान सुतल लोक में राजा बलि के द्वार पर हैं, तो वे भी चिंतित हो उठीं। तभी नारद मुनि उनके पास पहुंचे। माता लक्ष्मी ने उनसे पूछा कि प्रभु को वापस वैकुंठ कैसे लाया जाए। नारद मुनि ने कहा, “माते, बलि भगवान का महान भक्त है। भगवान ने उसे वचन दिया है कि वे उसके साथ रहेंगे। इसलिए बलि से भगवान को वापस मांगना सरल नहीं होगा। लेकिन प्रेम के मार्ग से हर हृदय जीता जा सकता है।” नारद मुनि की बात सुनकर माता लक्ष्मी ने एक उपाय सोचा। सावन की पूर्णिमा का पावन दिन आया। माता लक्ष्मी एक साधारण स्त्री का रूप धारण करके सुतल लोक पहुंचीं। राजा बलि ने उस स्त्री को उदास देखा तो उसके पास गया और विनम्रता से पूछा, “माता, आज तो आनंद का दिन है। फिर आपके चेहरे पर इतनी उदासी क्यों है?” माता लक्ष्मी ने कहा, “राजन, मेरे जीवन में एक कमी है। मेरा कोई भाई नहीं है। आज जब बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा का धागा बांध रही हैं, तब मेरे पास ऐसा कोई नहीं है जिसे मैं अपना भाई कह सकूं।” राजा बलि का हृदय करुणा से भर गया। उसने कहा, “आज से मैं तुम्हारा भाई हूं। तुम मुझे अपना भाई मानो और यह धागा मेरी कलाई पर बांध दो।” माता लक्ष्मी ने प्रेम से राजा बलि की कलाई पर रक्षा का धागा बांधा। बलि ने प्रसन्न होकर कहा, “बहन, आज तुमने मुझे अपना भाई बनाया है। अब तुम्हें जो चाहिए, मांग लो। मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा।” तभी माता लक्ष्मी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया। राजा बलि समझ गया कि उसके सामने स्वयं माता लक्ष्मी खड़ी हैं। उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। माता लक्ष्मी ने कहा, “भैया, यदि तुम मुझे कुछ देना चाहते हो तो मुझे मेरे स्वामी वापस दे दो। भगवान विष्णु तुम्हारे द्वार पर तुम्हारी रक्षा के लिए खड़े हैं। मैं चाहती हूं कि वे मेरे साथ वैकुंठ लौटें।” यह सुनकर राजा बलि कुछ क्षण मौन रहा। उसके सामने एक ओर भगवान के साथ रहने का सौभाग्य था और दूसरी ओर उसकी बहन की इच्छा। लेकिन बलि का हृदय विशाल था। उसने कहा, “बहन, आपने मुझे भाई माना है। मैं आपके इस बंधन का सम्मान करूंगा। प्रभु मेरे भी हैं और आपके भी। मैं उन्हें प्रेम से आपके साथ विदा करता हूं।” भगवान विष्णु राजा बलि की इस भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को आशीर्वाद दिया कि वे उसे कभी नहीं भूलेंगे। इसी कथा से रक्षाबंधन को लेकर एक प्रसिद्ध धार्मिक परंपरा जुड़ी हुई मानी जाती है, जिसमें माता लक्ष्मी और राजा बलि के भाई-बहन के संबंध को प्रेम, विश्वास और वचन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह कथा हमें बताती है कि रक्षा का बंधन केवल रक्त के रिश्ते से नहीं बनता। कभी-कभी सच्चे मन से किया गया एक वादा भी दो आत्माओं को भाई-बहन के पवित्र संबंध में बांध देता है। राजा बलि ने संसार को एक और महान सीख दी। उसके पास तीनों लोकों का वैभव था, लेकिन जब भगवान उसके सामने आए तो उसने अपने धन को बचाने के बजाय अपना वचन बचाया। उसने राज्य खो दिया, लेकिन सत्य नहीं छोड़ा। उसने साम्राज्य खो दिया, लेकिन भक्ति नहीं छोड़ी। अंत में उसने अपना सिर भी भगवान के चरणों में रख दिया और उसी समर्पण ने उसे भगवान के सबसे प्रिय भक्तों में स्थान दिलाया। इसलिए राजा बलि की महानता उसके पास मौजूद संपत्ति में नहीं बल्कि उसके त्याग, वचन और समर्पण में थी। धार्मिक परंपरा में यह भी माना जाता है कि चतुर्मास के समय भगवान विष्णु राजा बलि के सुतल लोक में निवास करते हैं और अपने भक्त को अपना सान्निध्य देते हैं। इस मान्यता में एक गहरा संदेश छिपा है। भगवान केवल मंदिरों में नहीं होते। वे अपने भक्त के प्रेम में भी बंध जाते हैं। जिस परम सत्ता को संसार का स्वामी कहा जाता है, वही अपने सच्चे भक्त के प्रेम के सामने स्वयं को समर्पित कर देती है। इस कथा का सबसे सुंदर संदेश यही है कि भगवान को पाने के लिए हमेशा बड़े-बड़े साधन आवश्यक नहीं होते। राजा बलि ने भगवान को न तो किसी कठिन मंत्र से बांधा और न ही किसी शक्ति के बल पर। उसने उन्हें अपने सत्य, वचन और प्रेम से अपना बना लिया। माता लक्ष्मी ने भी किसी युद्ध के माध्यम से भगवान को वापस नहीं पाया। उन्होंने प्रेम और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का सहारा लिया। एक छोटी सी राखी ने दो हृदयों को जोड़ दिया और उसी रिश्ते ने भगवान को भी वैकुंठ लौटने का मार्ग दिया। इसलिए जब भी रक्षाबंधन का पावन पर्व आए और किसी बहन की कलाई पर रक्षा का धागा बंधे, तो इस धागे को केवल एक परंपरा समझकर न देखें। इसके भीतर विश्वास, प्रेम, त्याग और वचन की भावना छिपी है। राजा बलि हमें सिखाते हैं कि सच्चा वचन परिस्थितियां बदल जाने पर भी नहीं टूटना चाहिए। माता लक्ष्मी हमें सिखाती हैं कि प्रेम से मांगी गई बात हृदय को छू सकती है। और भगवान विष्णु हमें यह संदेश देते हैं कि सच्चे भक्त का प्रेम इतना शक्तिशाली होता है कि स्वयं भगवान भी उसके द्वार पर खड़े होने में संकोच नहीं करते। कहते हैं कि संसार में धन, शक्ति और राज्य सब समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन सच्चे रिश्ते और सच्चे वचन मनुष्य के जीवन को अमर बना देते हैं। राजा बलि ने अपना राज्य खोकर भी ऐसी संपत्ति पा ली जिसे कोई छीन नहीं सकता था। उसने भगवान का प्रेम पा लिया था। यही कारण है कि युगों बाद भी उसकी कथा सुनाई जाती है। यह केवल वामन अवतार की कथा नहीं है, यह एक भक्त के समर्पण की कथा है, एक भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की कथा है और उस प्रेम की कथा है जिसके सामने स्वयं भगवान भी अपने भक्त से किया हुआ वचन निभाने के लिए उसके द्वार पर खड़े हो जाते हैं।
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sn vyas
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#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा #🕉️सनातन धर्म🚩 नरसिंह भगवान और प्रह्लाद के बीच ज्ञान की बात!!!!!!! भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को मारा, लेकिन उसके उपरांत भी भगवान क्रोध में थे। अब हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद सब देवता लोग आ गए, ब्रह्मा, शंकर भी आये। तब नारद मुनि सब ने कहा कि "भाई भगवान नरसिंह अवतार लिए है उनकी स्तुति करे, अभिनंदन करें, उनका धन्यवाद करना चाहिए, उन्होंने इतना बड़ा काम किया, इस लिए आप सब जाये उनके पास। " देवताओं ने पहले ही मना कर दिया। देवताओं ने कहा कि "अभी तो भगवान नरसिंह बड़े क्रोध में है, हमसे उनका यह स्वरूप देखा नहीं जा रहा है। हम सब देवता उनके इस स्वरूप से भयभीत है। अतएव हम नहीं जाएगे।" तो कौन जाएगा? यह प्रश्न हुआ। तो सबने शंकर जी को कहा की महाराज आप जाइये, आप तो प्रलय करने वाले है। तब शंकर जी ने कहा "नहीं-नहीं मेरी हिम्मत नहीं है, मैं नहीं जा सकता" तब ब्रह्मा से कहा गया, "आप तो सृष्टि करता है, आपकी दुनिया हैं, आपके लिए ही तो आए हैं।" ब्रह्मा जी कहते हैं "वह सब तो ठीक है। लेकिन मैं तो नहीं जाऊंगा।" तो फिर सब ने परामर्श किया की अब लक्ष्मी जी को बुलाया जाए और उनको बोला जाए। क्योंकि नरसिंह भगवान विष्णु जी के अवतार है और विष्णु जी की अर्धांगिनी लक्ष्मी जी है, इनको देख करके हो सकता है नरसिंह भगवान का क्रोध उतर जाए, जो विराट रूप इनका है वह विराट रूप शांत हो जाएगा और मुस्कुराहट वाला रूप आ जाएगा। इसलिए लक्ष्मी जी से कहा गया जानेको। तो लक्ष्मी जी ने कहा "मैं इस समय कोई अर्धांगिनी नहीं बनना चाहती हूँ। मैं अभी आप लोगों की बात नहीं मान सकती। मेरी हिम्मत नहीं है जाने की। नरसिंह भगवान का वह स्वरूप देखा नहीं जा रहा मुझसे, वो अनंत कोटि सूर्य के समान प्रकाश है व क्रोध भी है।" फिर सब लोग हार गए कोई भी तैयार नहीं हुआ जानेको। तब नारद जी ने तरकीब (सुझाव) दिया और उन्होंने कहा कि "देखो भाई! यह घपड़-सपड़ करना ठीक नहीं है। बड़ी बदनामी की बात है की मृत्यु लोक में इतना बड़ा काम किया भगवान ने और कोई उनकी स्तुति ना करे! अभिनंदन ना करें। " इसलिए नारद जी ने कहा कि "प्रह्लाद को भेजो!" प्रह्लाद के पास सब लोग गए और कहा कि "बेटा तुम्हारे पिता को मार कर के नरसिंह भगवान खड़े हैं। उनके पास जाओ ना!" प्रह्लाद जी को डर नहीं लगा, वो आराम से लेफ्ट राइट करते हुए पहुंच गए नरसिंह भगवान के पास। उस वक्त प्रह्लाद जी ५-६ वर्ष के थे ही। जब वह गए नरसिंह भगवान के पास तो भगवान का जो विराट स्वरूप, आंतों की माला पहने हुए, खून से लतपत नाख़ून था। तो प्रह्लाद को देख कर मुस्कुराने लगे। फिर समस्त देवी-देवता, ब्रह्मा, शंकर आदि नरसिंह भगवान के पास जाकर उनकी स्तुति व अभिनंदन करने लगे। तब नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद से कहा,भागवत ७.९.५२ "वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम्" भावार्थ - बेटा वर मांगों। जो कुछ मांगोंगे वह सब मैं देने को तैयार हूँ। सब मांगते हैं तुम भी मांगों बेटा। तब प्रह्लाद ने मन ही मन कहा अच्छा! बेवकूफ बनाना शुरु हो गया, कहते हैं वर मांगो! तब प्रह्लाद ने कहा भागवत ७.१०.४ "यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्" भावार्थ - हे प्रभु! जो दास कुछ भी कामना लेकर जाता है स्वामी के पास। तो वह दास नहीं है, वह तो बनिया (व्यापारी) है। ऐसा व्यापार तो हमारे संसार में रोज होता है। हमने ₹10 दिया तो उसने ₹10 की मिठाई दे दिया। यह तो व्यापार है। दास तो केवल दासता करता है। यदि दास्यसि मे कामान्वरांस्त्वं वरदर्षभ। कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम्॥ भावार्थ - प्रह्लाद जी कहते हैं कि अगर प्रभु आप देना ही चाहते हैं और अगर आपकी आज्ञा है कि मेरी आज्ञा है मानना ही पड़ेगा। तो ऐसा कोई आपका आदेश हो, तो प्रभु! यह वर दीजिए कि मैं आपसे कुछ न मांगू, ऐसा मेरा अंतःकरण कर दीजिए की कभी मांगने की बुद्धि पैदा ही ना हो, वर्तमान में तो नहीं है प्रभु! लेकिन आगे भी ना हो ऐसा वर दे दीजिए। क्योंकि मैं तो अकाम हूँ। मैं तो सेवा चाहता हुँ। मैं कुछ मांगने नहीं आया हुँ और वास्तविकता यह है कि आपको भी हमसे कुछ नहीं चाहिए। फिर आप मुझसे क्यों कहते हैं कि वर मांग? भागवत ७.१०.८ इन्द्रियाणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः। ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना॥ भावार्थ - प्रभु! यह कामना ऐसी बुरी चीज है की अगर कामना पैदा हो गई, तो इंद्रियां, मन, प्राण, आत्मा, धर्म, धैर्य, लज्जा, श्री, तेज, सत्य, सब नष्ट हो जाते हैं। यह कामना की बीमारी मुझको नहीं है इसलिए आप देना ही चाहते है तो मुझे ऐसा वर दीजिए कि कामना कभी पैदा ही ना हो। नरसिंह भगवान मुस्कुराने लगे उन्होंने कहा कि ठीक है, जैसा तू कहता है वैसा ही होगा। अब मेरी आज्ञा सुन,,,,भागवत ७.१०.११ "तथापि मन्वन्तरमेतदत्र दैत्येश्वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान्" भावार्थ - एक मन्वन्तर राज्य करो। (४३२०००० मानव वर्ष का चार युग, ७१ बार चार युग बीत जाये तो १ मन्वन्तर होता है जो ३०६७२०००० मानव वर्ष के बराबर है।) लगभग ३० करोड़ वर्ष तक राज्य करो, यह आज्ञा नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद को दिया। ऐसा कह कर भगवान अंतर्ध्यान हो गए और सब लोगों ने कहा कि बोलिए नरसिंह भगवान की जय।
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