mythology

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mytholearn
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फ्रिग – नॉर्स देवताओं की रानी, ओडिन की पत्नी, और बाल्दुर की माँ। उन्होंने अपने बेटे को अमर करने के लिए दुनिया की हर चीज़ से वादा लिया – सिर्फ एक पौधा छूट गया। और वही बन गया उसकी मौत का कारण। #mytholearn #Norse gods #देसी अंदाज #पौराणिक कथा #thor
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sn vyas
551 views 1 days ago
#भक्ति पौराणिक कथा #पौराणिक कथा #रामायण #रामायण ज्ञान #रामायण कथा क्या कभी सोचा है कि सीता स्वयंवर में पूरी दुनिया के राजा बुलाए गए, पर अयोध्या के राजा दशरथ को निमंत्रण क्यों नहीं मिला? ​इसके पीछे कोई राजनीतिक रंजिश या वैमनस्य नहीं था, बल्कि इसके पीछे छिपा था एक ऐसा सत्य जिसने राजा जनक जैसे परम ज्ञानी को भी धर्मसंकट और भय में डाल दिया था। यह कहानी है—एक शाप, एक छलनी, अयोध्या की महिमा और राजा जनक के एक छिपे हुए डर की। ​राजा जनक के शासनकाल की बात है। एक नवविवाहित युवक पहली बार अपनी ससुराल जा रहा था। रास्ते में एक दलदल था, जहाँ उसने देखा कि एक गाय फँसी हुई है। गाय की हालत ऐसी थी कि उसे निकाला नहीं जा सकता था और वह अंतिम साँसें ले रही थी। ​जल्दी में गृहस्थी के सुख की ओर बढ़ रहे उस युवक के मन में दया तो आई, लेकिन उतावलेपन में उसने एक घोर पाप कर दिया—उसने दलदल में फँसी गाय की पीठ पर पैर रखा और छलांग लगाकर आगे बढ़ गया। ​गाय ने तुरंत दम तोड़ दिया, लेकिन मरते-मरते उस पाप का फल भी दे गई। गाय की आत्मा ने शाप दिया: ​"जिस स्त्री को देखने के अति-उत्साह में तूने मुझ पर पैर रखा है, यदि तूने उसे अपनी आँखों से देखा, तो वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी!" ​युवक घबरा गया। ससुराल पहुँचकर वह घर के मुख्य द्वार पर अंदर की ओर पीठ करके बैठ गया। परिजनों के लाख बुलाने पर भी उसने मुँह न मोड़ा। जब उसकी नवविवाहिता पत्नी ने आकर एकांत में इसका कारण पूछा, तो उसने रोते हुए पूरी घटना बताई। ​पत्नी ने कहा, "स्वामी! यदि मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा है, तो यह शाप आप पर निष्फल होगा। आप मेरी ओर देखिए।" ​जैसे ही पति ने अपनी पत्नी की ओर देखा, गाय के शाप का असर हुआ—पति की आँखों की रोशनी पूरी तरह चली गई! गाय की हत्या का शाप कोई साधारण बात नहीं थी। ​ ​अंधा पति और दुखी पत्नी अपनी गुहार लेकर राजा जनक के दरबार में पहुँचे। राजा जनक ने तुरंत अपने राज्य के प्रकांड विद्वानों, ज्योतिषियों और ऋषियों की सभा बुलाई। ​गहन विचार-विमर्श के बाद पंडितों ने हल निकाला: ​"यदि कोई परम पतिव्रता स्त्री एक साधारण छलनी में गंगाजल भरकर लाए और उस जल के छींटे इस व्यक्ति की आँखों पर मारे, तो गौ-हत्या के शाप का निवारण हो सकता है और इसकी दृष्टि वापस लौट सकती है।" ​राजा जनक ने पहले अपने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया, लेकिन छलनी में पानी रोकना कोई मामूली बात नहीं थी। कोई भी स्त्री इस परीक्षा में सफल न हो सकी। हारकर राजा जनक ने भारतवर्ष के अन्य सभी राज्यों में संदेश भिजवाया कि यदि उनके राज्य में कोई ऐसी परम पतिव्रता स्त्री हो, तो उसे राज-सम्मान के साथ जनकपुर भेजा जाए। ​ ​जब यह संदेश अयोध्या के महाराजा दशरथ के पास पहुँचा, तो उन्होंने अपनी रानियों से इस विषय पर चर्चा की। रानियों ने मुस्कुराते हुए कहा: ​"महाराज! आप राजमहल की बात करते हैं? अयोध्या की तो सबसे साधारण महिला, यहाँ तक कि गलियों में झाड़ू लगाने वाली स्त्री भी इतनी पवित्र और पतिव्रता है कि वह इस परीक्षा में खरी उतरेगी।" ​राजा दशरथ ने परीक्षण और अयोध्या के सामर्थ्य को सिद्ध करने के लिए राज्य की सबसे निम्न श्रेणी मानी जाने वाली एक सफाईकर्मी महिला को बुलवाया। जब उससे पूछा गया, तो उसने विनम्रता से सिर झुकाकर हाँ भर दी। ​महाराजा दशरथ ने किसी राजवंशी को भेजने के बजाय उसी सफाईकर्मी महिला को पूरे राजसी सम्मान, रथ और पालकी के साथ जनकपुर विदा किया ताकि दुनिया अयोध्या की महिमा देख सके। ​ ​जनकपुर पहुँचकर उस महिला का राजा जनक ने स्वागत किया और समस्या बताई। वह महिला निस्संकोच छलनी लेकर गंगा तट पर गई। उसने माँ गंगा का ध्यान किया और प्रार्थना की: ​"हे माँ गंगे! यदि मैंने मन, वचन और कर्म से अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष का चिंतन न किया हो और मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा हो, तो आपकी एक बूँद भी इस छलनी से नीचे न गिरे।" ​महिला ने जल में छलनी डुबोई और उसे बाहर निकाला। चमत्कार यह हुआ कि छलनी के हज़ारों छिद्रों से भी पानी की एक बूँद नीचे नहीं गिरी! जल ऐसे जम गया मानो पारदर्शी शीशा हो। ​पूरा जनकपुर इस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गया। महिला दरबार में आई, उसने उस अंधे युवक की आँखों पर गंगाजल के छींटे मारे और देखते ही देखते युवक की आँखों की रोशनी पूरी तरह वापस आ गई! ​ ​जब वह महिला अयोध्या लौटने के लिए राजा जनक से अनुमति माँगने लगी, तो राजा जनक ने अति-उत्सुकता और सम्मान से उसकी जाति और परिचय पूछा। महिला ने बताया कि वह अयोध्या राज्य में गलियों और महल के बाहर सफाई का कार्य करती है। ​यह सुनते ही राजा जनक के पैर तले जमीन खिसक गई। वे सोचने लगे: ​"जिस राज्य की सफाई करने वाली साधारण महिला इतनी शक्तिशाली और महा-पतिव्रता है, वहाँ के पुरुष और राजकुमार कितने शक्तिशाली और तेजस्वी होंगे? यदि अयोध्या से स्वयंवर में कोई भी साधारण व्यक्ति या सैनिक आ गया और उसने धनुष उठा लिया, तो मेरी राजकुमारी सीता का विवाह किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति या साधारण सेवक से भी हो सकता है!" ​इसी एक डर और भ्रम के कारण, जब सीता स्वयंवर का समय आया, तो राजा जनक ने दुनिया भर के राजाओं, महाराजाओं और दैत्यों तक को आमंत्रण भेजा—परंतु अयोध्या नरेश महाराजा दशरथ को आमंत्रण पत्र नहीं भेजा! ​ ​राजा जनक ने तो अपनी बुद्धि से अयोध्या को दूर रखा था, लेकिन विधाता ने तो सीता जी के लिए अयोध्या के ही जेष्ठ राजकुमार श्री राम को चुना था। ​नियति अपना खेल रच चुकी थी। महर्षि विश्वामित्र ताड़का और सुबाहु के वध के बाद श्री राम और लक्ष्मण को अपने साथ जनकपुर की रक्षा और धनुष-यज्ञ दिखाने ले गए। वहाँ जब कोई भी राजा शिव-धनुष को हिला तक न सका, तब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्री राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और वह टूट गया। ​इस प्रकार, राजा जनक का भय भी दूर हुआ, अयोध्या की मर्यादा भी बनी रही और जगज्जननी सीता का विवाह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ संपन्न हुआ। जय श्री राम 🙏🚩
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sn vyas
636 views 2 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा सतयुग में एक महापराक्रमी राजा हुए, जिनका पृथ्वी के सातो द्वीपों पर एकछत्र राज्य था। उनका नाम था अम्बरीष। राजा अम्बरीष प्रजावत्सल तो थे ही, भगवान विष्णु के परम भक्त भी थे। भागवत पुराण में राजा अम्बरीष की निर्मल भक्ति का बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। एक बार राजा अम्बरीष ने सपत्नीक एकादशी का ब्रत रखा। द्वादशी लगने पर वह व्रत का पारण करने जा ही रहे थे कि ठीक उसी समय वहां ऋषि दुर्वासा का आगमन हुआ। अब ब्राह्मण अतिथि सामने हो तो उसे भोजन को पूछे बिना पारण करना उचित नहीं माना जाता। सो राजा ने भी ऋषि दुर्वासा से भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। दुर्वासा ने कहा ठीक है, पर मैं अभी यमुना स्नान करके आता हूं। उस दिन द्वादशी थी, अर्थात एकादशी का पारण और समस्या ऐसी थी कि इंतजार में थोड़ी ही देर में अर्थात जल्द ही त्रयोदशी लगने को हो आयी। पारण द्वादशी में ही करना होता है प्रदोष लगने से पहले। दुर्वासा ऋषि फिर भी लेट हो रहे थे। अब अम्बरीष जी ने अपने पुरोहित जी से पूछा कि, प्रभु ये बताएं कि दरवाजे पर कोई अतिथि आया हो, तो हम बिना उन्हें भोजन करवाए स्वयं पारण कैसे कर सकते हैं। और ना करें, तो मुहूर्त निकला जा रहा है, ऐसे में हम करें तो क्या करें। पुरोहित जी ने कहा, राजन! अगर आप ठाकुर जी का चरणोदक ग्रहण कर लेंगे, तो आतिथ्य का अपमान भी नहीं होगा और आपकी पारण की प्रक्रिया भी पूरी हो जाएगी। राजा अम्बरीष ने वैसा ही किया, लेकिन दुर्वासा जी जब आए तो भड़क गए और गुस्से से जलते हुए कहा कि, राजन तुझे इसका दण्ड मिलेगा, और अपनी जटाओं से एक बाल उखाड़कर पृथ्वी पर पटक दिया। उससे एक भयंकर कृत्या उत्पन्न हुई और अग्नि कि ज्वाला के सामान धधकती हुई, जलाकर भस्म कर देने के लिए राजा अम्बरीष की ओर बढ़ी। लेकिन अम्बरीष इतने बड़े भगवान के भक्त थे, कि उनकी रक्षा के लिए भगवान ने स्वयं अपने सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर रखा था। अब कृत्या जैसे ही आगे बढ़ी, राजा घबराए नहीं, अपने स्थान पर खड़े रहे। लेकिन सुदर्शन महाराज ने काम करना शुरू किया और कृत्या को जलाकर भस्म कर दिया। कृत्या को जलाने के बाद चक्र महाराज चुप नहीं बैठे, दुर्वासा जी की ओर लपके। अब दुर्वासा घबराए, लगे भागने। आगे आगे दुर्वासा जी, पीछे पीछे सुदर्शन चक्र। दुर्वासा इन्द्रादि सभी समर्थ यजमानों के पास गए, लेकिन सबने कहा, महाराज यहाँ से आप जाइए, वरना ये सुदर्शन महाराज हमें भी नहीं छोड़ेंगे। फिर शिव जी और ब्रह्मा जी के पास गये, सबने हाथ खड़े कर दिए। उन्हें विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी। अंत में भगवान नारायण की शरण में पहुंचे दुर्वासा जी और अपने बचाव की गुहार लगाई। भगवान ने कहा, दुर्वासा मैं पूरी तरह से भक्तों के अधीन हूँ, मेरे वश में कुछ भी नहीं है। अब तुम्हें तो अम्बरीष ही बचा सकते हैं, उन्हीं के पास जाओ। अंत में दुर्वासा अम्बरीष के पास पहुचे और क्षमा याचना की। दयालु अम्बरीष ने सुदर्शन की स्तुति की तब वह शांत हुए। दुर्वासा की जान बची। 🙏🙏
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