#महाभारत
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रों की उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययाति के चरित्रों का संक्षेप से वर्णन...(दिन 241)
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ब्राह्मणा मानवास्तेषां साङ्गं वेदमधारयन्।
वेनं धृष्णुं नरिष्यन्तं नाभागेक्ष्वाकुमेव च ।। १५ ।।
कारूषमथ शर्यातिं तथा चैवाष्टमीमिलाम् । पृषधं नवमं प्राहुः क्षत्रधर्मपरायणम् ।। १६ ।।
नाभागारिष्टदशमान् मनोः पुत्रान् प्रचक्षते । : पञ्चाशत् तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन् क्षितौ ।। १७ ।।
उनमेंसे ब्राह्मणजातीय मानवोंने छहों अंगोंसहित वेदोंको धारण किया। वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग, इक्ष्वाकु, कारूष, शर्याति, आठवीं इला, नवें क्षत्रिय धर्मपरायण पृषध्र तथा दसवें नाभागारिष्ट- इन दसोंको मनुपुत्र कहा जाता है। मनुके इस पृथ्वीपर पचास पुत्र और हुए ।। १५-१७ ।।
अन्योन्यभेदात् ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम् । पुरूरवास्ततो विद्वानिलायां समपद्यत ।। १८ ।।
परंतु आपसकी फूटके कारण वे सब-के-सब नष्ट हो गये, ऐसा हमने सुना है। तदनन्तर इलाके गर्भसे विद्वान् पुरूरवाका जन्म हुआ ।। १८ ।।
सा वै तस्याभवन्माता पिता चैवेति नः श्रुतम् । त्रयोदश समुद्रस्य द्वीपानश्नन् पुरूरवाः ।। १९ ।।
सुना जाता है, इला पुरूरवाकी माता भी थी और पिता भी। राजा पुरूरवा समुद्रके तेरह द्वीपोंका शासन और उपभोग करते थे ।। १९ ।।
अमानुषैर्वृतः सत्त्वैर्मानुषः सन् महायशाः । विप्रैः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः ।। २० ।।
जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि।
महायशस्वी पुरूरवा मनुष्य होकर भी मानवेतर प्राणियोंसे घिरे रहते थे। वे अपने बल-पराक्रमसे उन्मत्त हो ब्राह्मणोंके साथ विवाद करने लगे। बेचारे ब्राह्मण चीखते-चिल्लाते रहते थे तो भी वे उनका सारा धन-रत्न छीन लेते थे ।। २० ।।
सनत्कुमारस्तं राजन् ब्रह्मलोकादुपेत्य ह ।। २१ ।।
अनुदर्श ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ । ततो महर्षिभिः क्रुद्धेः सद्यः शप्तो व्यनश्यत ।। २२ ।।
जनमेजय ! ब्रह्मलोकसे सनत्कुमारजीने आकर उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणोंपर अत्याचार न करनेका उपदेश दिया, किंतु वे उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सके। तब क्रोधमें भरे हुए महर्षियोंने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गये ।। २१-२२ ।।
लोभान्वितो बलमदान्नष्टसंज्ञो नराधिपः ।
स हि गन्धर्वलोकस्थानुर्वश्या सहितो विराट् ।। २३ ।।
आनिनाय क्रियार्थेऽग्नीन् यथावत् विहितांस्त्रिधा ।
षट् सुता जज्ञिरे चैलादायुर्धीमानमावसुः ।। २४ ।।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः । नहुषं वृद्धशर्माणं रजिं गयमनेनसम् ।। २५ ।।
स्वर्भानवीसुतानेतानायोः पुत्रान् प्रचक्षते।
आयुषो नहुषः पुत्रो धीमान् सत्यपराक्रमः ।। २६ ।।
राजा पुरूरवा लोभसे अभिभूत थे और बलके घमंडमें आकर अपनी विवेक-शक्ति खो बैठे थे। वे शोभाशाली नरेश ही गन्धर्वलोकमें स्थित और विधिपूर्वक स्थापित त्रिविध अग्नियोंको उर्वशीके साथ इस धरातलपर लाये थे। इलानन्दन पुरूरवाके छः पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं- आयु, धीमान्, अमावसु, दृढायु, वनायु और शतायु। ये सभी उर्वशीके पुत्र हैं। उनमेंसे आयुके स्वर्भानुकुमारीके गर्भसे उत्पन्न पाँच पुत्र बताये जाते हैं-नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, गय तथा अनेना। आयुर्नन्दन नहुष बड़े बुद्धिमान् और सत्य-पराक्रमी थे ।। २३-२६ ।।
राज्यं शशास सुमहद् धर्मेण पृथिवीपते । पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् गन्धर्वोरगराक्षसान् ।। २७ ।।
नहुषः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः । स हत्वा दस्युसंघातानृषीन् करमदापयत् ।। २८ ।।
पृथ्वीपते! उन्होंने अपने विशाल राज्यका धर्मपूर्वक शासन किया। पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों, गन्धों, नागों, राक्षसों तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका भी पालन किया। राजा नहुषने झुंड-के-झुंड डाकुओं और लुटेरोंका वध करके ऋषियोंको भी कर देनेके लिये विवश किया ।। २७-२८ ।।
पशुवच्चैव तान् पृष्ठे वाहयामास वीर्यवान् ।
कारयामास चेन्द्रत्वमभिभूय दिवौकसः ।। २९ ।।
तेजसा तपसा चैव विक्रमेणौजसा तथा । यतिं ययातिं संयातिमायातिमयतिं ध्रुवम् ।। ३० ।।
नहुषो जनयामास षट् सुतान् प्रियवादिनः । यतिस्तु योगमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः ।। ३१ ।।
अपने इन्द्रत्वकालमें पराक्रमी नहुषने महर्षियोंको पशुकी तरह वाहन बनाकर उनकी पीठपर सवारी की थी। उन्होंने तेज, तप, ओज और पराक्रमद्वारा समस्त देवताओंको तिरस्कृत करके इन्द्रपदका उपभोग किया था। राजा नहुषने छः प्रियवादी पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम इस प्रकार हैं- यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव। इनमें यति योगका आश्रय लेकर ब्रह्मभूत मुनि हो गये थे ।। २९-३१ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा💐
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