#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣7️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रों की बालक्रीड़ा, दुर्योधन का भीमसेन को विष खिलाना तथा गंगा में ढकेलना और भीम का नागलोक में पहुँचकर आठ कुण्डों के दिव्य रस का पान करना...(दिन 377)
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गङ्गां चैवानुयास्याम उद्यानवनशोभिताम्।
सहिता भ्रातरः सर्वे जलक्रीडामवाप्नुमः ।। ३६ ।।
आज हमलोग भाँति-भाँतिके उद्यान और वनोंसे सुशोभित गंगाजीके तटपर चलें। वहाँ हम सब भाई एक साथ जलविहार करेंगे' ।। ३६ ।।
एवमस्त्विति तं चापि प्रत्युवाच युधिष्ठिरः।
ते रथैर्नगराकारैर्देशजैश्च गजोत्तमैः ।। ३७ ।।
निर्ययुर्नगराच्छूराः कौरवाः पाण्डवैः सह ।
उद्यानवनमासाद्य विसृज्य च महाजनम् ।। ३८ ।।
विशन्ति स्म तदा वीराः सिंहा इव गिरेर्गुहाम् ।
उद्यानमभिपश्यन्तो भ्रातरः सर्व एव ते ।। ३९ ।।
यह सुनकर युधिष्ठिरने 'एवमस्तु' कहकर दुर्योधनकी बात मान ली। फिर वे सभी शूरवीर कौरव पाण्डवोंके साथ नगराकार रथों तथा स्वदेशमें उत्पन्न श्रेष्ठ हाथियोंपर सवार हो नगरसे निकले और उद्यान-वनके समीप पहुँचकर साथ आये हुए प्रजावर्गके बड़े-बड़े लोगोंको विदा करके जैसे सिंह पर्वतकी गुफामें प्रवेश करे, उसी प्रकार वे सब वीर भ्राता उद्यानकी शोभा देखते हुए उसमें प्रविष्ट हुए ।। ३७-३९ ।।
उपस्थानगृहैः शुभैर्वलभीभिश्च शोभितम् । गवाक्षकैस्तथा जालैर्यन्त्रैः सांचारिकैरपि ।। ४० ।।
सम्मार्जितं सौधकारैश्चित्रकारैश्च चित्रितम् । दीर्घिकाभिश्च पूर्णाभिस्तथा पद्माकरैरपि ।। ४१ ।।
जलं तच्छुशुभे छन्नं फुल्लैर्जलरुहैस्तथा ।
उपच्छन्ना वसुमती तथा पुष्पैर्यथर्तुकैः ।। ४२ ।।
वह उद्यान राजाओंकी गोष्ठी और बैठकके स्थानोंसे, श्वेत वर्णके छज्जोंसे, जालियों और झरोखोंसे तथा इधर-उधर ले जानेयोग्य जलवर्षक यन्त्रोंसे सुशोभित हो रहा था। महल बनानेवाले शिल्पियोंने उस उद्यान एवं क्रीड़ाभवनको झाड़-पोंछकर साफ कर दिया था। चित्रकारोंने वहाँ चित्रकारी की थी। जलसे भरी बावलियों तथा तालाबोंद्वारा उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। खिले हुए कमलोंसे आच्छादित वहाँका जल बड़ा सुन्दर प्रतीत होता था। ऋतुके अनुकूल खिलकर झड़े हुए फूलोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी ढंक गयी थी ।। ४०-४२ ।।
तत्रोपविष्टास्ते सर्वे पाण्डवाः कौरवाश्च ह।
उपपन्नान् बहून् कामांस्ते भुञ्जन्ति ततस्ततः ।। ४३ ।।
वहाँ पहुँचकर समस्त कौरव और पाण्डव यथायोग्य स्थानोंपर बैठ गये और स्वतः प्राप्त हुए नाना प्रकारके भोगोंका उपभोग करने लगे ।। ४३ ।।
अथोद्यानवरे तस्मिंस्तथा क्रीडागताश्च ते।
परस्परस्य वक्त्रेभ्यो ददुर्भक्ष्यांस्ततस्ततः ।। ४४ ।।
ततो दुर्योधनः पापस्तद्भक्ष्ये कालकूटकम्।
विषं प्रक्षेपयामास भीमसेनजिघांसया ।। ४५ ।।
तदनन्तर उस सुन्दर उद्यानमें क्रीड़ाके लिये आये हुए कौरव और पाण्डव एक-दूसरेके मुँहमें खानेकी वस्तुएँ डालने लगे। उस समय पापी दुर्योधनने भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनके भोजनमें कालकूट नामक विष डलवा दिया ।। ४४-४५ ।।
स्वयमुत्थाय चैवाथ हृदयेन क्षुरोपमः ।
स वाचामृतकल्पश्च भ्रातृवच्च सुहृद् यथा ।। ४६ ।। ।
स्वयं प्रक्षिपते भक्ष्यं बहु भीमस्य पापकृत् प्रतीच्छितं स्म भीमेन तं वै दोषमजानता ।। ४७ ।।
ततो दुर्योधनस्तत्र हृदयेन हसन्निव ।
कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते पुरुषाधमः ।। ४८ ।।
उस पापात्माका हृदय छूरेके समान तीखा था; परंतु बातें वह ऐसी करता था, मानो उनसे अमृत झर रहा हो। वह सगे भाई और हितैषी सुहृद्की भाँति स्वयं भीमसेनके लिये भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थ परोसने लगा। भीमसेन भोजनके दोषसे अपरिचित थे; अतः दुर्योधनने जितना परोसा, वह सब-का-सब खा गये। यह देख नीच दुर्योधन मन-ही-मन हँसता हुआ-सा अपने-आपको कृतार्थ मानने लगा ।। ४६-४८ ।।
ततस्ते सहिताः सर्वे जलक्रीडामकुर्वत ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च तदा मुदितमानसाः ।। ४९ ।।
तब भोजनके पश्चात् पाण्डव तथा धृतराष्ट्रके पुत्र सभी प्रसन्नचित्त हो एक साथ जलक्रीड़ा करने लगे ।। ४९ ।।
क्रीडावसाने ते सर्वे शुचिवस्त्राः स्वलंकृताः । दिवसान्ते परिश्रान्ता विहृत्य च कुरूद्वहाः ।। ५० ।।
विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन् । खिन्नस्तु बलवान् भीमो व्यायम्याभ्यधिकं तदा ।। ५१ ।।
जलक्रीड़ा समाप्त होनेपर दिनके अन्तमें विहारसे थके हुए वे समस्त कुरुश्रेष्ठ वीर शुद्ध वस्त्र धारणकर सुन्दर आभूषणों से विभूषित हो उन क्रीड़ा भवनों में ही रात बितानेका विचार करने लगे। बलवान् भीमसेन उस समय अधिक परिश्रम करने के कारण बहुत थक गये थे ।। ५०-५१ ।।
वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतांस्तदा । प्रमाणकोट्यां वासार्थी सुष्वापावाप्य तत् स्थलम् ।। ५२ ।।
वे जलक्रीड़ाके लिये आये हुए उन कुमारोंको साथ लेकर विश्राम करनेकी इच्छासे प्रमाणकोटिके उस गृहमें आये और वहीं एक स्थानमें सो गये ।। ५२ ।।
शीतं वातं समासाद्य श्रान्तो मदविमोहितः । विषेण च परीताङ्गो निश्चेष्टः पाण्डुनन्दनः ।। ५३ ।।
पाण्डुनन्दन भीम थके तो थे ही, विषके मदसे भी अचेत हो रहे थे। उनके अंग-अंगमें विषका प्रभाव फैल गया था। अतः वहाँ ठंडी हवा पाकर ऐसे सोये कि जडके समान निश्चेष्ट प्रतीत होने लगे ।। ५३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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