#पौराणिक कथा #महाभारत की कथा #महाभारत
सञ्जय को किसने दिव्य-दृष्टि दी और क्यों ?
हम सभी जानते हैं कि ' महाभारत ' ग्रंथ के भीष्म पर्व का महत्त्वपूर्ण अनुपर्व है - जम्बूखंड विनिर्माण पर्व।
जम्बूखंड विनिर्माण अनुपर्व के अंतर्गत राजा जनमेजय को ऋषि वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय ! युद्ध के लिए उद्यत दोनों ओर की सेनाओं को देखकर वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ , सत्यवती के पुत्र , संग्राम में होनेवाले युद्ध को प्रत्यक्ष देखने वाले और भूत , भविष्य तथा वर्तमान के ज्ञाता भगवान व्यास मुनि एक दिन विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र के पास आये।
और आकर धृतराष्ट्र से कहा -
यदि चेच्छसि संग्रामे द्रष्टमेतान् विशाम्पते।
चक्षुर्ददानि ते पुत्र युद्धं तत्र निशामय।।
अर्थ - हे राजन ! यदि तुम इनको संग्राम में लड़ते हुए देखना चाहते हो , तो हे पुत्र ! मैं तुम्हें इनका युद्ध देखने के लिए नेत्र दूं ! तब तुम सुख से संग्राम को देखो।
धृतराष्ट्र उवाच
न रोचये ज्ञातिवधं द्रष्टुं ब्रह्मर्षिसत्तम।
युद्धमेतत्त्वशेषेन श्रृणुयां तव तेजसा।।
अर्थ - धृतराष्ट्र ने कहा - हे ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ ! अपने सम्बन्धियों के वध के दृश्य को देखना मुझे अच्छा नहीं लगता। परंतु आपके तेज: प्रभाव से मैं युद्ध का सब समाचार सुनना चाहता हूं।
वैशम्पायन जी बोले - धृतराष्ट्र की संग्राम देखने की अनिच्छा , लेकिन उसका हाल सुनने की इच्छा प्रकट करने पर वर प्रदान करने में समर्थ व्यास जी ने तब धृतराष्ट्र को वर न देकर संजय को ही वर दे दिया।
संजय को वर देने के पश्चात् व्यासजी ने धृतराष्ट्र को कहा -
एष ते संजयो राजन्युद्धमेतद्वादिष्यति।
एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति।।
चक्षुषा संजयो राजन्दिव्येनैव समन्वित:।
कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति।।
प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि।
मनसा चिंतितमपि सर्व वेत्स्यति संजय:।।
अर्थ - इस युद्ध का सारा वृत्तांत यह संजय तुमसे कहेंगे। युद्ध की कोई बात इनसे छिपी नहीं रहेगी। इनके दिव्य नेत्र हो जाएंगे , उसी से सब बातें जान सकेंगे और युद्ध के सब वृतांत तुमसे कहेंगे।
प्रकट हो या गुप्त हो , दिन की हो या रात की हो , और जो कोई मन में भी विचार की हुई है , वह सब बात संजय जानेंगे।
भगवत् गीता में संजय कहां से आ गए ? अब आप समझ गए होंगे।
महाभारत ग्रंथ के श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं , ताकि किसी प्रकार की कोई शंका किसी के मन में न रहे।
।। योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की जय ।।