शत शत नमन

सुशील मेहता
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4 days ago
गुरु अर्जुन देव जयंती गुरु अर्जुन देव जी का जन्म 15 अप्रैल साल 1563 में हुआ था। यह दिन चैत्र कृष्ण षष्ठी है। वे गुरु रामदास और माता बीवी भानी के पुत्र थे। उनके पिता गुरु रामदास स्वयं सिखों के चौथे गुरु थे, जबकि उनके नाना गुरु अमरदास सिखों के तीसरे गुरु थे गुरु अर्जुन देव जी की परवरिश गुरु अमरदास जी एवं गुरु बाबा बुड्ढा जैसे महापुरुषों की छत्रसाय में हुई थी. वे बचपन से ही बड़े शांत, गंभीर और पूजा-पाठ में रमे रहते थे. गुरु अमरदास जी ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक आगे चलकर तमाम वाणी की रक्षा करेगा। 1581 में पिता गुरु रामदास जी की मृत्यु के बाद अर्जुन देव जी को पांचवां गुरु बनाया गया. गुरू की गद्दी संभालने के पश्चात उन्होंने लोक भलाई एवं धर्म प्रचार के कार्यों में तेजी लाई. उन्होंने सिख संस्कृति को घर-घर पहुंचाया. वे गुरुवाणी में कीर्तन करते थे. उन्होंने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) की नींव रखी. संतोषखर तथा अमृत सरोवर का कार्य करवाया. अमृत सरोवर के मध्य हरिमंदिर साहब जी का निर्माण कराया. इसका शिलान्यास एकमुस्लिम फकीर साईं मिया मीर जी से करवाकर धर्म निरपेक्षता का प्रमाण दिया. गुरु अर्जुन देव जी तरन तारन साहिब, करतार पुर साहिब, छेहर्टा साहब एवं श्री हरगोविंद साहब जैसे नगर बसाये. इसके बगल में कुष्ठ रोगियों के लिए दवाखाना बनवाया, जो आज भी मौजूद है. गुरु अर्जुन देव जी ने गांव-गांव में कुओं का निर्माण करवाया, और घोषणा करवाई कि सभी सिखों को अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान में देना चाहिए.मुस्लिम फकीर साईं मिया मीर जी से करवाकर धर्म निरपेक्षता का प्रमाण दिया. गुरु अर्जुन देव जी तरन तारन साहिब, करतार पुर साहिब, छेहर्टा साहब एवं श्री हरगोविंद साहब जैसे नगर बसाये. इसके बगल में कुष्ठ रोगियों के लिए दवाखाना बनवाया, जो आज भी मौजूद है. गुरु अर्जुन देव जी ने गांव-गांव में कुओं का निर्माण करवाया, और घोषणा करवाई कि सभी सिखों को अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान में देना चाहिए। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है। गुरुग्रन्थ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है। गणना की दृष्टि से श्री गुरुग्रंथ साहिब में सर्वाधिक वाणी पंचम गुरु की ही है। ग्रन्थ साहिब का सम्पादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604 में किया। ग्रन्थ साहिब की सम्पादन कला अद्वितीय है, जिसमें गुरु जी की विद्वत्ता झलकती है। उन्होंने रागों के आधार पर ग्रन्थ साहिब में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रन्थों में दुर्लभ है। यह उनकी सूझबूझ का ही प्रमाण है कि ग्रन्थ साहिब में 36 महान वाणीकारों की वाणियाँ बिना किसी भेदभाव के संकलित हुई। #शत शत नमन
सुशील मेहता
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5 days ago
मंगल पांडे शहीदी दिवस मंगल पाण्डेय एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 1857 में भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वो ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल इंफेन्ट्री के सिपाही थे। तत्कालीन अंग्रेजी शासन ने उन्हें बागी करार दिया जबकि आम हिंदुस्तानी उन्हें आजादी की लड़ाई के नायक के रूप में सम्मान देता है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में सन् 1984 में एक डाक टिकट जारी किया गया। तथा मंगल पांडे द्वारा गाय की चर्बी मिले कारतूस को मुँह से काटने से मना कर दिया था,फलस्वरूप उन्हे गिरफ्तार कर 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई| मंगल पाण्डेय का जन्म भारत में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा नामक गांव में एक "ब्राह्मण" परिवार में हुआ था।[1][2][3]इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे था। " ब्राह्मण" होने के कारण मंगल पाण्डेय सन् 1849 में 22 साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना मे बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की ३४वी बटालियन मे भर्ती किये गए, जिसमें ज्यादा संख्या मे ब्राह्मणो को भर्ती की जाती थी। विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ। सिपाहियों को पैटऱ्न १८५३ एनफ़ील्ड बंदूक दी गयीं जो कि ०.५७७ कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली (प्रिकशन कैप) का प्रयोग किया गया था परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी। सिपाहियों के बीच अफ़वाह फ़ैल चुकी थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। २९ मार्च १८५७ को बैरकपुर परेड मैदान कलकत्ता के निकट मंगल पाण्डेय जो दुगवा रहीमपुर(फैजाबाद) के रहने वाले थे रेजीमेण्ट के अफ़सर लेफ़्टीनेण्ट बाग पर हमला कर के उसे घायल कर दिया। जनरल जान हेएरसेये के अनुसार मंगल पाण्डेय किसी प्रकार के धार्मिक पागलपन में थे जनरल ने जमादार ईश्वरी प्रसाद ने मंगल पांडेय को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया पर ज़मीदार ने मना कर दिया। सिवाय एक सिपाही शेख पलटु को छोड़ कर सारी रेजीमेण्ट ने मंगल पाण्डेय को गिरफ़्तार करने से मना कर दिया। मंगल पाण्डेय ने अपने साथियों को खुलेआम विद्रोह करने के लिये कहा पर किसी के ना मानने पर उन्होने अपनी बंदूक से अपनी प्राण लेने का प्रयास किया। परन्तु वे इस प्रयास में केवल घायल हुये। ६ अप्रैल १८५७ को मंगल पाण्डेय का कोर्ट मार्शल कर दिया गया और ८ अप्रैल को फ़ांसी दे दी गयी। मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिंगारी बुझी नहीं। एक महीने बाद ही १० मई सन् १८५७ को मेरठ की छावनी में कोतवाल धनसिंह गुर्जर के नेतृत्व में बगावत हो गयी। ओर गुर्जर धनसिंह कोतवाल इस के जनक के रूप में सामने आए यह विप्लव देखते ही देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे। इसके बाद ही हिन्दुस्तान में चौंतीस हजार सात सौ पैंतीस अंग्रेजी कानून यहाँ की जनता पर लागू किये गये ताकि मंगल पाण्डेय सरीखा कोई सैनिक दोबारा भारतीय शासकों के विरुद्ध बगावत न कर सके। #शत शत नमन
सुशील मेहता
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6 days ago
गुरु तेग बहादुर जयंती अमृतसर में जन्मे गुरु तेग बहादुर गुरु हरगोविन्द जी के पांचवें पुत्र थे। 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी के निधन के बाद इन्हें 9वां गुरु बनाया गया था। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे। गुरु श्री तेगबहादुर जी का व्यक्तित्व और कर्तृत्व एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह दैदीप्यमान है। उनका जन्म वैशाख कृष्ण पंचमी को पिता गुरु हरगोबिंद जी तथा माता नानकी जी के घर अमृतसर में हुआ। - गुरु तेग बहादुर बचपन से ही बहादुर, निर्भीक स्वभाव के और आध्यात्मिक रुचि वाले थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया। उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद इस्लाम धारण नहीं किया और तमाम जुल्मों का पूरी दृढ़ता से सामना किया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहा तो गुरु साहब ने कहा शीश कटा सकते हैं केश नहीं। औरंगजेब ने गुरुजी पर अनेक अत्याचार किए, परंतु वे अविचलित रहे। वह लगातार हिन्दुओं, सिखों, कश्मीरी पंडितों और गैर मुस्लिमों का इस्लाम में जबरन धर्मांतरण का विरोध रहे थे जिससे औरंगजेब खासा नाराज था। आठ दिनों की यातना के बाद गुरुजी को दिल्ली के चांदनी चौक में शीश काटकर शहीद कर दिया गया। उनके शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा बनाया गया जिसे गुरुद्वारा शीशगंज साहब नाम से जाना जाता है। - अपने त्याग और बलिदान के लिए वह सही अर्थों में 'हिन्द की चादर' कहलाए। धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेगबहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक ‘बाबा बकाला’ नामक स्थान पर साधना की. गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया. आनंदपुर साहब से रोपण, सैफाबाद होते हुए वे खिआला (खदल) पहुंचे. इसके बाद गुरु तेगबहादुर जी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहां उन्होंने आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक विकास के लिए कई कार्य किए. गुरु तेग बहादुर जी ने रूढ़ियों, अंधविश्वासों की घोर आलोचनाएं की और विभिन्न आदर्श स्थापित किए. सामाजिक हित में कार्य करते हुए उन्होंने कई कुएं खुदवाए और धर्मशालाएं बनवाई। गुरु तेग बहादुर सिंह के अनुसार किसी की भी गलतियां हमेशा क्षमा की जा सकती हैं, यदि आपके पास उन्हें स्वीकारने का साहस हो। वे कहते थे एक सज्जन व्यक्ति वह है जो अनजाने में भी किसी की भावनाओ को ठेस ना पहुंचाएं। हर मनुष्य का कर्तव्य है कि वह एक जीवित प्राणी के प्रति दया भाव रखें और अपने मन से घृणा का विनाश करें। अपने कई खास उपदेशों, विचारों और धर्म की रक्षा के प्रति अपना जज्बा कायम रखने वाले गुरु तेग बहादुर सिंह (biography of guru tegh bahadur) जी का सिख धर्म में अद्वितीय स्थान है। #शत शत नमन
सुशील मेहता
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10 days ago
Chatrapati Shivaji Maharaj : छत्रपति शिवाजी महाराज की आज पुण्यतिथि है. 03 अप्रैल 1680 के दिन उनकी मृत्यु रायगढ़ फोर्ट में हो गई थी. वह महान मराठा वीर थे. उन्होंने अपनी सूझबूझ और पराक्रम से मराठा साम्राज्य स्थापित किया. उनकी खासियतें वाकई प्रेरित करने वाली हैं। महान मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी का जन्म आज से 390 साल पहले हुआ था. आइए जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी खास बातें और कैसे हुआ था उनका राज्याभिषेक? शिवाजी भारत के महान् योद्धा एवं रणनीतिकार थे, जिन्होंने 1674 ई. में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी. उन्होंने कई सालों तक औरंगज़ेब के मुग़ल साम्राज्य से संघर्ष किया. सन 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ. वह छत्रपति बने। शिवाजी महाराज ने साल 1674 में रायगढ़ की गद्दी को संभाला था. ये पल उनकी जिदंगी में 44 साल की उम्र में आया था. उन्होंने युद्ध की कलाओं को ना केवल नए आयाम दिए बल्कि छापामार युद्ध की नयी शैली ही विकसित कर दी. उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया. फ़ारसी की जगह मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया। राजगद्दी संभालने से पहले शिवाजी को विरासत में सिर्फ 2 हजार सैनिकों की मराठा सेना मिली थी. उसे उन्होंने 10 हजार सैनिकों की फौज में तब्दील किया था। ऐसा माना जाता है कि गुरिल्ला युद्ध की नई तकनीकों को उन्होंने जन्म दिया था. इसकी मदद से उन्होंने मुगलों को कड़ी टक्कर दी थी. उन्होंने अपनी एक स्थायी सेना बनाई थी. उनकी मृत्यु के समय उनकी सेना में 30-40 हज़ार नियमित और स्थायी रूप से नियुक्त घुड़सवार, एक लाख पैदल सैनिक और 1260 हाथी थे. उनकी सेना तोपखानों से लैस थी। #शत शत नमन