जय श्री राम देव जी भगवान

sn vyas
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8 hours ago
🙏🌹🥀मानस सत्संग 🥀🌹🙏 🙏🌹🥀'राम सरिस सुत मैं महतारी🥀🌹🙏 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 🎉प्रभु श्री राम के वनगमन प्रसंग में श्री रामभद्र और कौशल्या अम्बा के स्वभाव का सहज साम्य देखा जा सकता है। वन में कैकेयी अम्बा से मिलन होने पर उन्हें सांत्वना देने के लिए प्रभु ने काल, कर्म और गुण के माथे पर सारा दोष मढ़ दिया था। 🎉 *प्रथम राम भेंटी कैकेई।* *सरल सुभायँ भगति मति भेई।।* *पग परि कीन्‍ह प्रबोधु बहोरी।* *काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।* अ-२४३/७-८ 🙏उत्तरकाण्ड में दुःख के जिन चार कारणों का उल्लेख किया गया है उनमें से तीन का उल्लेख करते हुए चौथे कारण को बचा जाते हैं। उत्तरकाण्ड में काल, कर्म, गुण और स्वभाव को दुःख के हेतु के रूप में प्रस्तुत किया गया है --🙏 *राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।* *काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।* उ-२१/० 🛐 इन चारों में स्वभाव का स्मरण न करना रामभद्र की संवेदनशीलता का परिचायक है। वस्तुतः अयोध्या में जो अनर्थ हुए थे उनमें सर्वाधिक मुख्य हेतु कैकेयी का स्वभाव ही था। किन्तु उस मुख्य हेतु का स्मरण न करना इस भावना का परिचायक था कि माँ एक क्षण के लिए भी स्वयं को दोषी मानकर ग्लानि-युक्त न हों। ठीक यही औदार्य कौशल्या अम्बा की वाणी में परिलक्षित होता है। वे भी काल, कर्म और विधि का स्मरण करती हैं, स्वभाव का नहीं। जहाँ गुरु वशिष्ठ के भाषण का श्रीगणेश ही कैकेयी की आलोचना से प्रारम्भ हुआ था वहाँ राम मातु अनजाने में भी कोई ऐसा शब्द नहीं कहना चाहतीं जिससे कैकेयी को रंचमात्र पीड़ा की अनुभूति हो। 🛐 🌷 चित्रकूट में भी एक बार वार्तालाप में कैकेयी की आलोचना का स्वर मुखर हुआ था। वह अवसर था जब जनक-पत्नी सुनयना अपनी संवेदना प्रकट करने के लिए कौशल्या से मिलने आईं। वार्तालाप में महारानी सुनयना और भावमयी सुमित्रा अम्बा के मुख से कुछ ऐसे वाक्य निकले जो कैकेयी के प्रति व्यंग्य जैसे प्रतीत हो रहे थे। यद्यपि वहाँ प्रत्यक्ष रूप से केवल विधि का नाम लिया जा रहा था पर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे विधि कैकेयी का प्रतीक बन गया हो।🌷 🕉️ब्रह्मा सृष्टि का सृजन और पालन करने के पश्चात उसे विनष्ट करने में संकोच नहीं करता है।_ ऐसा लगता है कि जैसे यह वाक्य कैकेयी की ओर इंगित करने के लिए भी कहा गया हो। कैकेयी ने भी प्रारम्भ में बड़े ही स्नेह से राघवेन्द्र का लालन-पालन किया और अन्त में निष्ठुरतापूर्वक देश निकाला दे दिया -- 🕉️ *जो सृजि पालइ हरइ बहोरी।* *बाल केलि सम बिधि मति भोरी।।* अ-२८०/८ ♓ किन्तु इस प्रसंग में भी अम्बा कौशल्या अपने धैर्य और शालीनता से रंचमात्र विचलित नहीं होती हैं। उनका गम्भीर स्वर सारे स्वरों से सर्वथा भिन्न था -- ♓ *कौसल्या कह दोस न काहू।* *करम बिबस दुख सुख छति लाहू।।* *कठिन करम गति जान बिधाता।* *जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।* 💟 इस वार्तालाप के सन्दर्भ में कौशल्या अम्बा का एक और चित्र उभर कर सामने आता है। वह है उनकी पराकाष्ठा तक पहुँची हुई संवेदनशीलता। चित्रकूट के सारे वातावरण में उन्हें सबसे अधिक पीड़ा श्री भरत को लेकर थी। एक ओर भरत अपने अन्तर्द्वन्द से व्याकुल हैं। दूसरी ओर शील-संकोच के कारण अपनी हृदयगत भावना को खुलकर कह भी नहीं पाते हैं। सारा समाज अनिश्चय की स्थिति में है। लोगों के सामने अनेक विकल्प थे। कौशल्या अम्बा के हृदय में भी एक विकल्प है जिसे वे महारानी सुनयना के माध्यम से राजर्षि जनक तक पहुँचाती हैं। चित्रकूट में जिन विकल्पों पर चर्चा हुई, उसके मुख्य केन्द्र श्री राम थे। *'केहि बिधि अवध चलहिं रघुराउ'* का प्रश्न ही सबके सामने था। एक मात्र कौशल्या अम्बा ही इसकी अपवाद हैं। उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि राघव अयोध्या नहीं लौट सकते। अतः उनके चिन्तन का आधार रामभद्र का लौटना नहीं है। उनकी सारी चिन्ता के केन्द्र एक मात्र भरत हैं। राम तो वन जाएँगे ही भरत का क्या होगा ? क्या भरत को अयोध्या लौटा देना उनकी गूढ़ स्नेह भावना का अनादर नहीं है ? इससे भरत को कितनी मर्मान्तक पीड़ा होगी ? अतः उनका मत था कि राघव लक्ष्मण को अयोध्या लौटने का आदेश दें और उनके स्थान पर भरत को साथ लेते जाएँ। संक्षेप में उन्होंने संकेत सूत्र सुनयना के समक्ष रखा। 💟 ❣️लोक-मंगल और आदर्श की रक्षा के लिए यदि राघवेन्द्र का वनवासी बनना अपेक्षित है तो माँ को इसमें रंचमात्र आपत्ति नहीं है। पर भरत की भावनाओं का मूल्य उनकी दृष्टि में इससे कम भी नहीं है। अतः वे दोनों के समन्वय का मार्ग प्रस्तुत करती हैं। जब वे लक्ष्मण को अयोध्या लौटाने का प्रस्ताव करती हैं तब उनका ध्यान इस तथ्य की ओर रहा होगा कि बाल्यावस्था से अब तक लक्ष्मण रामभद्र की सेवा में सर्वदा उनके सन्निकट रहे हैं। यह अवसर अब भरत को मिलना चाहिए। इस तरह उनकी दृष्टि में यह प्रस्ताव कर्तव्य भावना और न्याय को समेटे हुए था। महाराज श्री जनक ने इस प्रस्ताव के पीछे निहित *सद्भाव, स्नेह और वात्सल्य* की भूरि-भूरि सराहना की। यद्यपि व्यवहार के पण्डित होने के कारण उन्हें पूरी तरह पता था कि यह सम्भव न होगा। माँ कौशल्या असीम धैर्य धारण किए हुए चित्रकूट से अयोध्या लौट आई।❣️ 🌹🙏 जय जय सियाराम 🙏🌹 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 #जय श्री राम
sn vyas
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8 days ago
#जय श्री राम छोड़ दो सारे प्रपंच, भूल जाओ सारी कथाएँ, सारी कहानियाँ, एक भी श्लोक, एक भी दोहा याद रखने की जरूरत नहीं है जरूरत है तो भगवान श्रीरामचंद्र जी महाराज के दो अक्षर के एक शब्द का नाम राम, सिर्फ राम को पकड़ लो। यह नाम तुम्हें भौसागर से पार करा देगा, यह नाम तुम्हें इस संसार से पार करा देगा, तुम्हें विजेता बना देगा। यदि आपने भगवान श्रीरामचंद्र जी महाराज के नाम जब को पकड़ लिया है तो फिर आपको किसी प्रवचन, किसी कथा, किसी मंदिर, किसी पुस्तक, किसी मूर्ति, किसी धूपबत्ती, किसी अगरबत्ती या किसी चालीसा, किसी आरती की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यह छोटा सा नाम आपको संसार से पार लगा देगा, और एक बात हाँ जब अपने जीवन की प्रत्येक घटना में आप भगवान की लीला का अनुभव करने लगो तो समझ लेना कि तुम भगवान के बहुत निकट पहुंच गए हो। मतलब यह आपके साथ कुछ भी गुजरे, सम्मानजनक, अपमानजनक जैसा भी उन सब में आप भगवान की लीला को तलाश करिए कि भगवान ने इस लीला के माध्यम से मेरी कौन सी परीक्षा ले रहे हैं या इस परीक्षा के माध्यम से या इस लीला के माध्यम से वे हमारा क्या भला करना चाहते हैं। इतना तो जाहिर है कि भगवान सब कुछ करते हैं और जो कुछ करते हैं वह सब भले के लिए करते हैं। कुछ समय के लिए हमको ऐसा लगता हो यह हमारे खिलाफ जा रहा है, यह हमारे विपरीत हो रहा है लेकिन अंततः जो परिणति होती है, अंततः जो परिणाम होता है वो आपके अनुकूल होता है, सदा अनुकूल होता है और वह सिर्फ इसलिए क्योंकि आपने नाम जब पकड़ा हुआ होता है तो बोलिए सियाबरामचंद्र की जय.🌹🙏⛳