पौराणिक

sn vyas
617 views
8 days ago
#पौराणिक कथा प्राचीन समय की बात है। राजा नाभाग के अंबरीष नामक एक प्रतापी पुत्र थे। वे बड़े बीर, बुद्धिमान व तपस्वी राजा थे। . वे जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर प्राणी घोर नरक में जाते हैं वह कुछ ही दिनों का सुख है, इसलिए उनका मन सदैव भगवत भक्ति व दीनों की सेवा में लगा रहता था। . राज्याभिषेक के बाद राजा अंबरीष ने अनेक यज्ञ करके भगवान विष्णु की पूजा-उपासना की जिन्होंने प्रसन्न होकर उनकी रक्षा के लिए अपने ‘सुदर्शन चक्र’ को नियुक्त कर दिया। . एक बार अंबरीष ने अपनी पत्नी के साथ द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत करने का निश्चय किया। उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और ब्राह्मणों को अन्न-धन का भरपूर दान दिया। . तभी वहाँ दुर्वासा ऋषि का आगमन हो गया। वे परम तपस्वी व अलौकिक शक्तियों से युक्त थे किंतु क्रोधी स्वभाव के कारण उनकी सेवा-सुश्रुसा में विशेष सावधानी अपेक्षित थी। . अंबरीष ने उनका स्वागत किया और उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बिठाया। तत्पश्चात् दुर्वासा ऋषि की पूजा करके उसने प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। दुर्वासा ऋषि ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। . किंतु भोजन से पूर्व नित्य कर्मों से निवृत्त होने के लिये वे यमुना नदी के तट पर चले गये। वे परब्रह्म का ध्यान कर यमुना के जल में स्नान करने लगे। . इधर द्वादशी केवल कुछ ही क्षण शेष रह गयी थी। स्वयं को धर्मसंकट में देख राजा अम्बरीष ब्राह्मणों से परामर्श करते हुए बोले.. . “मान्यवरों ! ब्राह्मण को बिना भोजन करवाए स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते भोजन न करना – दोनो ही मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं। इसलिये इस समय आप मुझे ऐसा उपाय बताएँ, जिससे कि मैं पाप का भागी न बन सकूँ।” . ब्राह्मण बोले – “राजन ! शास्त्रों मे कहा गया है कि पानी भोजन करने के समान है भी और समान नहीं भी है। इसलिये इस समय आप जल पी कर द्वादशी का नियम पूर्ण कीजिये।” यह सुनकर अंबरीष ने जल पी लिया और दुर्वासा ऋषि की प्रतीक्षा करने लगे। . जब दुर्वासा ऋषि लौटे तो उन्होंने तपोबल से जान लिया कि अंबरीष भोजन कर चुके हैं। अत: वे क्रोधित हो उठे और कटु स्वर में बोले.. . “दुष्ट अंबरीष ! तू धन के मद में चूर होकर स्वयं को बहुत बड़ा मानता है। तूने मेरा तिरस्कार किया है। मुझे भोजन का निमंत्रण दिया लेकिन मुझसे पहले स्वयं भोजन कर लिया। अब देख मैं तुझे तेरी दुष्टता का दंड देता हूँ।” . क्रोधित दुर्वासा ने अपनी एक जटा उखाड़ी और अंबरीष को मारने के लिए एक भयंकर और विकराल कृत्या उत्पन्न की। कृत्या तलवार लेकर अंबरीष की ओर बढ़ी किंतु वे बिना विचलित हुए मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे। . जैसे ही कृत्या ने उनके ऊपर आक्रमण करना चाहा; अंबरीष का रक्षक सुदर्शन चक्र सक्रिय हो गया और पल भर में उसने कृत्या को जलाकर भस्म कर दिया। . जब दुर्वासा ऋषि ने देखा कि कि चक्र तेजी से उन्हीं की ओर बढ़ रहा है तो वे भयभीत हो गये। . अपने प्राणों की रक्षा के लिए वे आकाश, पाताल,पृथ्वी,समुद्र, पर्वत, वन आदि अनेक स्थानों पर शरण लेने गये किंतु सुदर्शन चक्र ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। घबराकर उन्होंने ब्रह्मा जी से रक्षा की गुहार लगायी। . ब्रह्मा जी प्रकट हुए किंतु असमर्थ होकर बोले, “वत्स, भगवान विष्णु द्वारा बनाये गये नियमों से मैं बँधा हुआ हूँ। प्रजापति, इंद्र, सूर्य आदि सभी देवगण भी इन नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते। . हम नारायण की आज्ञा के अनुसार ही सृष्टि के प्राणियों का कल्याण करते हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु के भक्त के शत्रु की रक्षा करना हमारे वश में नहीं है।” . ब्रह्माजी की बातों से निराश होकर दुर्वासा ऋषि भगवान शंकर की शरण में गये। पूरा वृत्तांत सुनने के बाद महादेव जी ने उन्हें समझाया... . “ऋषिवर ! यह सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का शस्त्र है जो उनके भक्तजन की रक्षा करता है। इसका तेज सभी के लिए असहनीय है। अतः उचित होगा कि आप स्वयं भगवान विष्णु की शरण में जाएँ। केवल वे ही इस दिव्य शस्त्र से आपकी रक्षा कर सकते हैं और आपका मंगल हो सकता है।” . वहाँ से भी निराश होकर दुर्वासा ऋषि भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनके चरणों में सिर नवाकर दया की गुहार लगायी। आर्त स्वर में दुर्वासा बोले.. . “भगवन मैं आपका अपराधी हूँ। आपके प्रभाव से अनभिज्ञ होकर मैंने आपके परम भक्त राजा अंबरीष को मारने का प्रयास किया। हे दयानिधि, कृपा करके मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए।” . भगवान नारायण ने दुर्वासा ऋषि को उठाया और समझाया, “मुनिवर ! मैं सर्वदा भक्तों के अधीन हूँ। मेरे सीधे-सादे भक्तों ने अपने प्रेमपाश में मुझे बाँध रखा है। भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। अतः मैं स्वयं अपने व देवी लक्ष्मी से भी बढ़कर अपने भक्तों को चाहता हूँ। . जो भक्त अपने बंधु-बांधव और समस्त भोग-विलास त्यागकर मेरी शरण में आ गये हैं उन्हें किसी प्रकार छोड़ने का विचार मैं कदापि नहीं कर सकता। . यदि आप इस विपत्ति से बचना चाहते हैं तो मेरे परम भक्त अंबरीष के पास ही जाइए। उसके प्रसन्न होने पर आपकी कठिनाई अवश्य दूर हो जाएगी।” . नारायण की सलाह पाकर दुर्वासा अंबरीष के पास पहुँचे और अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगे। . परम तपस्वी महर्षि दुर्वासा की यह दुर्दशा देखकर अंबरीष को अत्यंत दुख हुआ। उन्होंने सुदर्शन चक्र की स्तुति की और प्रार्थना पूर्वक आग्रह किया कि वह अब लौट जाय। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर सुदर्शन चक्र ने अपनी दिशा बदल ली और दुर्वासा ऋषि को भयमुक्त कर दिया। . जबसे दुर्वासा ऋषि वहाँ से गये थे तबसे राजा अम्बरीष ने भोजन ग्रहण नहीं किया था। वे ऋषि को भोजन कराने की प्रतीक्षा करते रहे। . उनके लौटकर आ जाने व भयमुक्त हो जाने के बाद अम्बरीष ने सबसे पहले उन्हें आदर पूर्वक बैठाकर उनकी विधि सहित पूजा की और प्रेम पूर्वक भोजन कराया। . राजा के इस व्यवहार से ऋषि दुर्वासा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अनेकशः आशीर्वाद देकर वहाँ से विदा हुए। .
sn vyas
1.8K views
10 days ago
#पौराणिक कथा कर्दम मुनि और देवहूति की दिव्य कथा यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित अत्यंत पवित्र और ज्ञानमयी प्रसंगों में से एक है। इसमें तपस्या, भक्ति, त्याग, गृहस्थ धर्म और भगवान के अवतार — सभी का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह वही कथा है जिसमें भगवान भगवान विष्णु स्वयं कपिलदेव के रूप में अवतरित होकर संसार को सांख्य ज्ञान देते हैं। ब्रह्मा जी की आज्ञा सृष्टि के प्रारंभ में जब संसार का विस्तार होना था, तब ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्रों और प्रजापतियों को सृष्टि बढ़ाने का कार्य सौंपा। उनमें एक महान योगी थे — प्रजापति कर्दम मुनि। कर्दम मुनि अत्यंत तेजस्वी, ज्ञानी और तपस्वी थे। उनका मन संसार के भोगों में नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति और योग में लगा रहता था। लेकिन ब्रह्मा जी ने उनसे कहा— “हे कर्दम! यह सृष्टि भगवान की इच्छा से बनी है। तुम्हें गृहस्थ जीवन अपनाकर संतानों द्वारा सृष्टि का विस्तार करना होगा।” पिता तुल्य ब्रह्मा जी की आज्ञा मानकर कर्दम मुनि तपस्या के लिए निकल पड़े। सरस्वती नदी के तट पर तपस्या कर्दम मुनि पवित्र सरस्वती नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने एकांत स्थान में कठोर तपस्या आरंभ की। वे वर्षों तक केवल भगवान का ध्यान करते रहे। कहा जाता है कि उन्होंने दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या की। कभी एक पैर पर खड़े रहते, कभी उपवास करते, कभी पूर्ण मौन धारण कर लेते। उनकी तपस्या से तीनों लोक प्रभावित हो गए। भगवान विष्णु का प्रकट होना अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए। चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। आकाश में गंधर्व गान करने लगे। देवता पुष्पवर्षा करने लगे। भगवान का स्वरूप अत्यंत मनोहर था— पीताम्बर धारण किए हुए, चार भुजाएँ, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म। भगवान को देखकर कर्दम मुनि भावविभोर हो गए। उन्होंने दंडवत प्रणाम किया। भगवान विष्णु ने मुस्कुराकर कहा— “हे कर्दम! मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ।” देवहूति से विवाह का वरदान भगवान ने कहा— “शीघ्र ही सम्राट स्वायंभुव मनु अपनी पुत्री देवहूति के साथ यहाँ आएँगे। उनकी कन्या तुम्हारी पत्नी बनेगी।” भगवान ने यह भी कहा कि स्वयं वे उनके पुत्र रूप में अवतार लेंगे। यह सुनकर कर्दम मुनि आनंद और विनम्रता से भर गए। स्वायंभुव मनु का आगमन कुछ समय बाद पृथ्वी के प्रथम सम्राट स्वायंभुव मनु अपनी पत्नी शतरूपा और पुत्री देवहूति के साथ वहाँ आए। देवहूति अत्यंत सुंदर, विनम्र और गुणवान थीं। राजमहल में पली होने के बावजूद उनके हृदय में वैराग्य और भक्ति थी। मनु ने कर्दम मुनि से कहा— “हे मुनिवर! मेरी पुत्री आपको पति रूप में स्वीकार करना चाहती है।” कर्दम मुनि ने विवाह स्वीकार कर लिया। देवहूति का त्याग और सेवा विवाह के बाद देवहूति ने राजसी सुख छोड़ दिए। वे वन की कुटिया में रहने लगीं और पूर्ण समर्पण से अपने पति की सेवा करने लगीं। साधारण वस्त्र पहनतीं, स्वयं भोजन बनातीं, आश्रम की सेवा करतीं, तपस्वी जीवन जीतीं। धीरे-धीरे उनका शरीर दुर्बल हो गया, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष और भक्ति की चमक बनी रही। कर्दम मुनि उनकी सेवा और समर्पण देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। योगबल से दिव्य विमान एक दिन कर्दम मुनि ने सोचा— “देवहूति ने मेरे लिए इतना त्याग किया है। अब मुझे इन्हें सुख देना चाहिए।” अपने योगबल से उन्होंने एक अद्भुत दिव्य विमान प्रकट किया। वह विमान किसी स्वर्गीय महल से कम नहीं था— उसमें सुंदर उद्यान थे, झीलें थीं, संगीत कक्ष थे, दिव्य सेविकाएँ थीं। कर्दम मुनि और देवहूति उस विमान में बैठकर अनेक लोकों की यात्रा करने लगे। उन्होंने वर्षों तक आनंदपूर्वक समय बिताया। नौ कन्याओं का जन्म समय आने पर देवहूति ने नौ दिव्य कन्याओं को जन्म दिया। बाद में इन कन्याओं का विवाह महान ऋषियों से हुआ और उनसे अनेक श्रेष्ठ वंशों की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार सृष्टि का विस्तार हुआ। भगवान कपिल का अवतार फिर वह समय आया जिसका वचन भगवान विष्णु ने दिया था। स्वयं भगवान ने देवहूति के गर्भ से कपिलदेव के रूप में अवतार लिया। जब कपिलदेव प्रकट हुए, तब वातावरण दिव्य प्रकाश से भर गया। देवताओं ने पुष्पवर्षा की। कर्दम मुनि समझ गए कि भगवान स्वयं उनके पुत्र रूप में आए हैं। कर्दम मुनि का संन्यास अपना कार्य पूर्ण होने के बाद कर्दम मुनि ने संन्यास लेने का निश्चय किया। उन्होंने भगवान कपिल और देवहूति को प्रणाम किया और वन की ओर तपस्या के लिए चले गए। कपिलदेव का सांख्य ज्ञान अब देवहूति ने अपने पुत्र कपिलदेव से कहा— “हे प्रभु! मैं संसार के मोह और दुख से थक चुकी हूँ। मुझे ऐसा ज्ञान दीजिए जिससे मैं मुक्त हो सकूँ।” तब भगवान कपिल ने उन्हें सांख्य शास्त्र और भक्ति योग का दिव्य ज्ञान दिया। उन्होंने समझाया— आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है, भक्ति ही मोक्ष का सरल मार्ग है, मनुष्य को भगवान में प्रेम करना चाहिए। यह उपदेश आगे चलकर “कपिल गीता” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कथा की मुख्य शिक्षा 1. तपस्या कभी व्यर्थ नहीं जाती कर्दम मुनि की कठोर तपस्या से स्वयं भगवान प्रकट हुए। 2. गृहस्थ जीवन भी आध्यात्मिक हो सकता है देवहूति और कर्दम का जीवन सिखाता है कि परिवार और भक्ति साथ-साथ चल सकते हैं। 3. सेवा सबसे बड़ी साधना है देवहूति ने प्रेम और समर्पण से सेवा की, जिससे उन्हें स्वयं भगवान पुत्र रूप में मिले। 4. भगवान भक्तों के लिए कुछ भी बन सकते हैं भगवान विष्णु स्वयं पुत्र बनकर आए — यह उनकी भक्तवत्सलता का प्रमाण है। इस चित्र का आध्यात्मिक अर्थ इस दिव्य चित्र में: कर्दम मुनि की तपस्या साधना का प्रतीक है, भगवान विष्णु का प्रकट होना कृपा का प्रतीक है, देवहूति सेवा और समर्पण का प्रतीक हैं, और कपिलदेव दिव्य ज्ञान के प्रतीक हैं। यह कथा बताती है कि जहाँ भक्ति, तपस्या और विनम्रता होती है, वहाँ स्वयं भगवान निवास करते हैं।
Satyanand Shanmukham Mudaliar.
17.4K views
21 days ago
माँ छिन्नमस्ता जयंती............. #पौराणिक तथ्य
Satyanand Shanmukham Mudaliar.
1.3K views
23 days ago
अचलेश्वर महादेव मंदिर, माऊंट अबू......... #पौराणिक कथा
sn vyas
805 views
1 months ago
#पौराणिक कथा #🙏🏻सीता राम #🙏रामायण🕉 #🎶जय श्री राम🚩 ॥ श्रीहरिः ॥ *सीता-शुकी-संवाद* एक दिन परम सुन्दरी सीताजी सखियोंके साथ उद्यानमें खेल रही थीं। वहाँ उन्हें शुक पक्षीका एक जोड़ा दिखायी दिया जो बड़ा मनोरम था। वे दोनों पक्षी एक डालीपर बैठकर इस प्रकार बोल रहे थे- 'पृथ्वीपर श्रीराम नामसे प्रसिद्ध एक बड़े सुन्दर राजा होंगे। उनकी महारानी सीताके नामसे विख्यात होंगी। श्रीरामजी बड़े बुद्धिमान् और बलवान् होंगे। वे समस्त राजाओंको अपने वशमें रखते हुए सीताके साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकीदेवी और धन्य हैं श्रीराम, जो एक-दूसरेको प्राप्त होकर इस पृथ्वीपर आनन्दपूर्वक विहार करेंगे।' उनको ऐसी बातें करते देख सीताजीने सोचा- 'ये दोनों मेरे ही जीवनकी मनोरम कथा कह रहे हैं। इन्हें पकड़कर सभी बातें पूछूँ।' ऐसा विचारकर उन्होंने अपनी सखियोंके द्वारा उन दोनोंको पकड़वाकर मँगवाया और उनसे कहा- 'तुम दोनों बहुत सुन्दर हो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँसे आये हो ? राम कौन हैं ? और सीता कौन हैं ? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई ? इन सारी बातोंको शीघ्रातिशीघ्र बताओ। मेरी ओरसे तुम्हें कोई भय नहीं होना चाहिये।' सीताजीके इस प्रकार पूछनेपर उन पक्षियोंने कहा- 'देवि !वाल्मीकि-नामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़े महर्षि हैं, जो धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं। हम दोनों उन्हींके आश्रममें रहते हैं। महर्षिने रामायण नामक एक महाकाव्यकी रचना की है, जो सदा ही मनको प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्योंको उसका अध्ययन कराया है तथा प्रतिदिन वे सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहकर उसके पद्योंका चिन्तन किया करते हैं। उसका कलेवर बहुत बड़ा है। हमलोगोंने उसे पूरा-पूरा सुना है। बारम्बार उसका गान तथा पाठ सुननेसे हमें भी उसका अभ्यास हो गया है। राम और सीता कौन हैं- यह हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि श्रीरामके साथ क्रीड़ा करनेवाली जानकीके विषयमें क्या-क्या बातें होनेवाली हैं, तुम ध्यान देकर सुनो। महर्षि ऋष्यश्रृंगके द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञके प्रभावसे भगवान् विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न-ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। देवांगनाएँ भी उनकी उत्तम कथाका गान करेंगी। श्रीराम महर्षि विश्वामित्रके साथ भाई लक्ष्मणसहित हाथमें धनुष लिये मिथिला पधारेंगे। वहाँ वे एक ऐसे धनुषको (जिसे दूसरा कोई उठा भी नहीं सकेगा) तोड़ डालेंगे और अत्यन्त मनोहर रूपवाली जनककिशोरी सीताको अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण करेंगे। फिर उन्हींके साथ श्रीरामजी अपने विशाल साम्राज्यका पालन करेंगे। ये तथा और भी बहुत-सी बातें जो वहाँ रहते समय हमारे सुननेमें आयी हैं, संक्षेपमें मैंने तुम्हें बता दीं। अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो।' कानोंको अत्यन्त मधुर प्रतीत होनेवाली पक्षियोंकी ये बातें सुनकर सीताजीने उन्हें मनमें धारण कर लिया और पुनः उनसे इस प्रकार पूछा- 'राम कहाँ होंगे ? किसके पुत्र हैं और कैसे वे दूल्हा-वेशमें आकर जानकीको ग्रहण करेंगे तथा मनुष्यावतारमें उनका श्रीविग्रह कैसा होगा ? उनके प्रश्नको सुनकर शुकी मन-ही-मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचानकर वह सामने आकर उनके चरणोंमें गिरकर बोली - ' श्रीरामका मुख कमलकी कलीके समान सुन्दर होगा। नेत्र बड़े-बड़े और खिले हुए पंकजकी शोभाको धारण करनेवाले होंगे। नासिका ऊँची, पतली तथा मनोहारिणी होगी। दोनों भौहें सुन्दर ढंगसे मिली होनेके कारण मनोहर प्रतीत होंगी। गला शंखके समान सुशोभित और छोटा होगा। वक्षःस्थल उत्तम, चौड़ा और शोभासम्पन्न होगा, उसमें श्रीवत्सका चिह्न होगा। सुन्दर जाँघों और कटिभागकी शोभासे युक्त दोनों घुटने अत्यन्त निर्मल होंगे, जिनकी भक्तजन आराधना करेंगे। श्रीरामजीके चरणारविन्द भी परम शोभायुक्त होंगे और सभी भक्तजन उनकी सेवामें सदा संलग्न रहेंगे। श्रीरामजी ऐसा ही मनोहर रूप धारण करनेवाले हैं। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणोंका बखान नहीं कर सकता, फिर हमारे-जैसे पक्षीकी क्या बिसात है। परम सुन्दर रूप धारण करनेवाली लावण्यमयी लक्ष्मी भी जिनकी झाँकी करके मोहित हो गयीं, उन्हें देखकर पृथ्वीपर दूसरी कौन स्त्री है, जो मोहित न होगी। उनका बल और पराक्रम महान् है। वे अत्यन्त मोहक रूप धारण करनेवाले हैं। मैं श्रीरामका कहाँतक वर्णन करूँ, वे सब प्रकारके ऐश्वर्यमय गुणोंसे युक्त हैं। परम मनोहर रूप धारण करनेवाली वे जानकीदेवी धन्य हैं, जो श्रीरामजीके साथ हजारों वर्षोंतक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी, परंतु सुन्दरि ! तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है, जो इतनी चतुरता और आदरके साथ श्रीरामके गुणोंका कीर्तन सुननेके लिये प्रश्न कर रही हो ?' शुकीकी ये बातें सुनकर जनककुमारी सीता अपने जन्मकी ललित एवं मनोहर चर्चा करती हुई बोलीं- 'जिसे तुमलोग जानकी कह रहे हो, वह जनककी पुत्री मैं ही हूँ। मेरे मनको लुभानेवाले श्रीराम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम्हें छोड़ेंगी, अन्यथा नहीं; क्योंकि तुमने अपने वचनोंसे मेरे मनमें लोभ उत्पन्न कर दिया है। अब तुम इच्छानुसार खेल करते हुए मेरे घरमें सुखसे रहो और मीठे-मीठे पदार्थ भोजन करो।' यह सुनकर शुकीने जानकीजीसे कहा- 'साध्वि ! हम वनके पक्षी हैं, पेड़ोंपर रहते हैं और सर्वत्र विचरा करते हैं। हमें तुम्हारे घरमें सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थानपर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर तुम्हारे यहाँ आ जाऊँगी।' उसके ऐसा कहनेपर भी सीताजीने उसे नहीं छोड़ा। तब उसके पति शुकने विनीत वाणीमें उत्कण्ठित होकर कहा - 'सीता ! मेरी सुन्दरी भार्याको छोड़ दो। इसे क्यों रख रही हो ? शोभने ! यह गर्भिणी है। सदा मेरे मनमें बसी रहती है। जब यह बच्चोंको जन्म दे लेगी, तब मैं इसे लेकर तुम्हारे पास आ जाऊँगा।' शुकके ऐसा कहनेपर जानकीजीने कहा- 'महामते ! तुम आरामसे जा सकते हो, किंतु तुम्हारी यह भार्या मेरा प्रिय करनेवाली है। मैं इसे अपने पास बड़े सुखसे अपनी सखी बनाकर रखूँगी।' यह सुनकर पक्षी दुःखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणीमें कहा- *'योगीलोग जो बातें कहते हैं वह सत्य ही है-किसीसे कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोषके कारण ही बन्धनमें पड़ता है। यदि हम इस पेड़पर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिये यह बन्धन कैसे प्राप्त होता ? इसलिये मौन ही रहना चाहिये था।'* इतना कहकर पक्षी पुनः बोला- 'सुन्दरि ! मैं अपनी इस भार्याके बिना जीवित नहीं रह सकता, इसलिये इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बड़ी अच्छी हो। मेरी प्रार्थना मान लो।' इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर उसने समझाया, परंतु सीताजीने शुकीको नहीं छोड़ा। तब शुकीने पुनः कहा- 'सीते ! मुझे छोड़ दो, अन्यथा शाप दे दूँगी।' सीताजीने कहा- 'तुम मुझे डराती-धमकाती हो ! मैं इससे तुम्हें नहीं छोड़ेंगी।' तब शुकीने क्रोध और दुःखमें आकुल होकर जानकीजीको शाप दिया- 'अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पतिसे विलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणी-अवस्थामें श्रीरामसे अलग होना पड़ेगा।' यों कहकर पतिवियोगके शोकमें उसके प्राण निकल गये। उसने श्रीरामका स्मरण तथा पुनः पुनः राम-नामका उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिये उसे ले जानेके लिये सुन्दर विमान आया और वह शुकी उसपर बैठकर भगवान्के धामको चली गयी। भार्याकी मृत्यु हो जानेपर शुक शोकसे आतुर होकर बोला - 'मैं मनुष्योंसे भरी हुई श्रीरामकी नगरी अयोध्यामें जन्म लूँगा और इसका बदला चुकाऊँगा। मेरे ही वाक्यसे उद्वेगमें पड़कर तुम्हें पतिवियोगका भारी दुःख उठाना पड़ेगा।' यह कहकर उसने भी अपना प्राण छोड़ दिया। *पद्मपुराण* श्रीमन्नारायण नारायण नारायण .. – ‘पौराणिक कथाएँ’ गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तकसे साभार
sn vyas
760 views
2 months ago
#पौराणिक कथा पौराणिक कथाए। ब्रम्हाजी कि पुत्री अहिल्या कि कहानि आइए जाने ब्रह्मा जी की पुत्री #अहिल्या को यह वरदान प्राप्त था कि वह सदा ही 16 वर्ष की आयु के सदृश ही रहेंगी। ब्रह्मा जी ने एक स्पर्धा करवाई, जिसे गौतम ऋषि ने जीता और अहिल्या को पत्नी रूप में प्राप्त किया। अहिल्या के रूप की चर्चा तीनों लोकों में थी। अपने रूप, गुण, सौन्दर्य और पतिव्रत धर्म के पालन के कारण ही वह भक्तों के मन में बसी हुई हैं। देवराज इन्द्र ने जब अहिल्या के बारे में सुना तो उन्होंने सूर्य से उसकी सुन्दरता के बारे में पूछा। सूर्यदेव ने इन्द्र देव की भावना भांप कर अपनी असमर्थता जताई। तब इंद्र ने चंद्रमा से पूछा तो उसने कहा कि अहल्या से अधिक रूपवती, गुणवान और पतिव्रता स्त्री सारी सृष्टि में कोई और नहीं है। ऐसा सुनकर इन्द्र ने छल रूप से अहिल्या को पाने का प्रयास करते हुए चंद्रमा की सहायता ली। योजना बनाई कि जब ऋषि गौतम प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में गंगा स्नान को जाते हैं वही समय अहिल्या को पाने के लिए सही है। इंद्र ने चन्द्रमा को अपने काम में साथ देने के लिए उन्हें ऋषि के आश्रम के ऊपर ही टिके रहने के लिए कहा ताकि जब वह किसी को आश्रम की ओर आता देखे तो वह आश्रम के ऊपर से हट जाए क्योंकि चंद्रमा के हटने पर किसी को शक भी नहीं होगा तथा इन्द्र को ऋषि के आने की सूचना भी चंद्रमा के इस संकेत से मिल जाएगी। अहिल्या को पाने की लालसा से आधी रात को ही इंद्र ने मुर्गा बन कर बांग लगाई और ऋषि गौतम प्रात: हो गई सोचकर गंगा स्नान के लिए आश्रम से निकल गए। तब इंद्र ने झट से ऋषि गौतम का वेश बनाया और आश्रम में जाने लगे तो अहिल्या ने अपने तपोबल के प्रभाव से इंद्र को पहचान लिया और कहा कि ‘यदि मेरे पति हो तो आश्रम में आ जाओ’। इंद्र के छल की लालसा को देखकर अहिल्या ने उसे श्राप दिया कि तुम्हें कोढ़ हो जाए। दूसरी तरफ जब ऋषि गौतम ने गंगा स्नान करने के लिए कमंडल में जल भरा तो गंगा मां ने कहा कि अभी तो आधी रात हुई है, तो ऋषि आश्रम की ओर वापस चल पड़े। आश्रम के बाहर उन्होंने अपने वेश में ही इन्द्र को अपने साथ टकरा कर जाते हुए देखा और छत पर चन्द्रमा को पहरेदारी करते देखकर सारी स्थिति को भांप लिया। ऋषि पत्नी अहिल्या उनके जल्दी आश्रम में लौट आने की चिंता में जैसे ही बाहर आई तो ऋषि गौतम ने अहिल्या को शिला होने और चन्द्रमा को इन्द्र का साथ देने के लिए उसमें दाग होने और ग्रहण लगने का तत्काल श्राप दे दिया। जिसके प्रभाव से अहिल्या आश्रम के बाहर एक पत्थर की शिला बन गई। देवर्षि नारद ने तब ऋषि गौतम को अहिल्या के बेकसूर होने के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि श्राप तो नहीं मिटाया जा सकता परन्तु उन्होंने अहिल्या को एक वरदान भी दिया कि सूर्यवंशी भगवान श्री राम जब उस शिला के साथ अपने चरणों का स्पर्श करेंगे तो वह पूर्ववत हो जाएगी। धर्मग्रंथों में चंद्रमा के कलंक लगने और ग्रहण लगने के बारे में भी अनेक कथाएं मिलती हैं, परंतु ऋषि गौतम का श्राप भी उनमें से एक है। मिथिला में राजा जनक के धनुष यज्ञ को दिखाने के लिए गुरु विश्वामित्र उन्हें साथ लेकर जा रहे थे तो ‘आश्रम एक दीख मग माहीं, खग, मृग, जीव जन्तु तंह नाहीं, पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी, सकल कथा मुनि कहा बिसेषी’। गुरु विश्वामित्र ने बताया ‘गौतम नारी श्राप बस उपल देह धरि धीर, चरण कमल रज चाहति, कृपा करो रघुबीर’। श्री राम जी के पवित्र एवं शोक का नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई और भक्तों को सुख देने वाले प्रभु को सामने देखकर वह प्रभु चरणों से लिपट गई। *परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥ अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥ भावार्थ:-श्री रामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री रघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनंद के आँसुओं) की धारा बहने लगी॥ *धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥ मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥ भावार्थ:-फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्री रघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की- हे ज्ञान से जानने योग्य श्री रघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगत को पवित्र करने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥ *मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥ बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥ भावार्थ:-मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥ *जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥ भावार्थ:-जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पतिलोक को चली गई॥ *अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥ भावार्थ:-प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥ !!राम राम सब कोई कहे,ठग ठाकुर और चोर!! !! जिस राम से मीरा तले,वह राम कोई और!!